लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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-डॉ. मधुसूदन-  saint

(एक) एशियाटिक सोसायटी के स्थापक, विलियम जोन्स का घृणित उद्देश्य 
सब से पहले, विलियम जोन्स के उस पत्र पर; एक दृष्टिपात करें, जो उसने उस (१७८४) समय के बंगाल के गवर्नर वॉरन हेस्टिंग्स को भेजा था।
यह पत्र, विलियम जोन्स ने ( धर्मान्तरण के उद्देश्य से ) हिंदुओं के ग्रंथ पढने के पश्चात ही भेजा था। इस पत्र के आधार पर कहा जा सकता है कि उसे (हिंदुओं का) धर्मान्तरण असंभव प्रतीत हुआ था।
यह बात, उसके निम्न विधान से भी सुनिश्चित हो जाती है। यह पत्र ४७ पृष्ठों का लम्बा निबंध ही कहा जाएगा और ऐसा पत्र उसने गवर्नर वॉरन हेस्टिंग्स को लिखा था। इस पत्र से, एशियाटिक सोसायटी की स्थापना के पीछे का कुटिल उद्देश्य भी पता चल जाता है। इस पत्र में वह स्पष्ट कहता भी है कि
==>”रोम का  चर्च हिंदुओं को कभी धर्मान्तरित नहीं कर पाएगा।” कारण, हिंदू धर्म उसे (विलियम जोन्स को) बहुत तर्क-शुद्ध प्रतीत हुआ था। पर आगे वह इस समस्या पर  एक उपाय भी सुझाता है …  कहता है कि
==>”बाइबल के, ’इसाइया’ वाले संस्करण के अध्यायों का संस्कृत में अनुवाद करवाया  जाए। ==>.. और फिर ऐसा अनुवाद चुपचाप हिंदुओं की (अंग्रेज़ी )  शिक्षित प्रजा में फैला दिया जाए।” ==>”इसके फलस्वरूप एक बहुत बड़ी (इसाई धर्मांतरण की) क्रान्ति का बीज भारत में बोया जा  सकता है।”
ऐसे आशय वाला, ४७ पृष्ठों का निबंध-पत्र, गवर्नर वॉरन हेस्टिंग्स को, विलियम जोन्स ने भेजा था।
इस पत्र में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना के पीछे के कुटिल उद्देश्यपर प्रकाश फेंका गया था। उसी के शब्दों में पढ़िए ===> Sir William Jones (1784)
==>”Hindus will never be converted by any mission from the church of Rome,…. but a great revolution can be caused by translating into Sanskrit …chapters of Prophets, particularly of ISAIAH, …… and then quietly disperse the work among the well-educated natives.”
(दो) जोन्स पर संस्कृत ग्रंथों का प्रभाव
जब  उसने धर्मान्तरण के उद्देश्य से ही, हमारे संस्कृत ग्रंथ पढ़े। तो, विलियम जोन्स को निम्न बातें ध्यान में आयी।
(१)==> “रोम का चर्च हिंदुओं को कभी धर्मानान्तरित नहीं कर पाएगा।”  –कारण हिंदू धर्म अतीव विकसित प्रतीत होता था, साथ तर्क शुद्ध भी।
(२)==> जिस संस्कृत भाषा में हिंदु ग्रंथ थे, वह भाषा भी उसे अतीव शुद्ध, वैज्ञानिक और विकसित प्रतीत हुयी थी।
(३)==> उस भाषा में उसे विपुल ज्ञान भण्डार भी दिखाई दिया।
(४)==> विशेष:  भगवत गीता से तो वह स्वयं ही विशेष  प्रभावित हुआ। और यह बात उसने गवर्नर वॉरन हेस्टिंग्स को भी बताई (होगी)। इस बात का दृढ़ अनुमान किया जा सकता है।
(तीन) गीता का अनुवाद 
क्योंकि आगे भगवत गीता का अनुवाद करवाया गया और वॉरन हेस्टिंग्स द्वारा ये अनुवाद इंग्लैण्ड में कॉर्पोरेशनों के प्रबंधकों को भेजने की व्यवस्था की गयी।
और “आश्चर्य?”–हमारी गीता के “कर्म योग” का उपयोग कर के वहाँ की बड़ी-बड़ी औद्योगिक इकाइयां (कॉर्पोरेशन) सफल हो गयी। और हम जिनकी धरोहर गीता है, हाथ मलते रह गए? इस सचाई का उल्लेख पाण्डुरंग शास्त्री आठवले जी भी उनकी पुस्तको में करते हैं।
इस संदर्भ में विवेकानंद जी को भी अमरिका में प्रश्न पूछा गया था कि जिस भारत के पास भगवत गीता थीं, वह गुलाम कैसे हो गया? विवेकानंद जी ने क्या उत्तर दिया था, स्मरण नहीं कर पा रहा। पर, जब हम ही हमारी भगवत गीता के अनुसार व्यवहार नहीं करेंगे तो उसे पढ़ने मात्र से सफलता थोड़ी प्राप्त हो पाएगी? उसे जीवन के व्यवहार में उतारना भी तो चाहिए?  पढ़ना बौद्धिक समझदारी दे सकता है। सफलता व्यावहारिक क्षेत्र की बात है, जो प्रत्यक्ष व्यवहार से सम्पन्न होती है।
(चार) संस्कृत में उपलब्ध ज्ञान भण्डार
पर, जब संस्कृत का ज्ञान भण्डार विलियम जोन्स को पता लगा (होगा) तो उस ज्ञान भण्डार को प्राप्त  करने के लिए उसने एक चाल चली। जो “एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल” की स्थापना के पीछे थी। यह एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल १७८४ में स्थापन हुयी। उस समय उसके सारे के सारे ३० सदस्य विलायती थे। उसमें  एक भी भारतीय सदस्य नहीं रखा गया था। क्यों? आप समझ सकते हैं।
आगे, इस एशियाटिक सोसायटी ने जो गतिविधि अपनाई और जिसका  इतिहास उपलब्ध है; उसे देखने पर, स्पष्ट हो जाता है; कि एशियाटिक सोसायटी का उद्देश्य क्या था? उद्देश्य था, संस्कृत की पाण्डु लिपियों का एकत्रीकरण जो उस समय हस्त लिखित पाण्डुलिपियों के रूप में थी। उद्देश्य था, इन पाण्डुलिपियों को, एशियाटिक सोसायटी में एकत्रित करना।
वहीं पर उनके विषय में चर्चाएं वार्षिक गोष्ठियां इत्यादि के साथ साथ  छांट-छांटकर चुने हुए ग्रंथ यूरोप में भेजने का भी उपक्रम चला करता था।
“The True History and the Religion of India” में अनेक उद्धहरणों सहित एशियाटिक सोसायटी के इतिहास पर काफी प्रकाश फेंका गया है।
डॉ. हॅरीस और डॉ. ब्लुमफिल्ड दोनों, ७ वर्ष जर्मनी जाकर संस्कृत व्याकरण सीख आए थे, काशी नहीं गए। क्यों? यह प्रश्न भी सोचने योग्य है।
पर एशियाटिक सोसायटी की स्थापना पर, हमारी भोली जनता ने सोचा कि कितनी दयालु है, यह माइ-बाप सरकार, अपना पैसा लगाकर, (या हमारा ही पैसा लगाकर?) हमारे हस्तलिखित ग्रंथों की इसे इतनी चिंता है कि उन ग्रंथों को संजोकर रख रही है। वाह! वाह! इस एशियाटिक सोसायटी की सराहना करनेवाले भारतीय भाषा वैज्ञानिकों को जानता हूं।
पर आगे एशियाटिक सोसायटी के इतिहास (जो आगे घटता है ) से ऐसा भी नितांततः  स्पष्ट हो जाता है कि विलियम जोन्स और मण्डली भी संस्कृत की पाण्डु लिपियों का, एकत्रीकरण करते करते उस में उपलब्ध ज्ञान भण्डार से भी अतिशय प्रभावित हुयी होगी। और उस को हथियाने के लिए ही, सारा एशियाटिक सोसायटी का आडम्बर खडा किया होगा। जय हो! माई-बाप सरकार की।
(पांच) ग्रंथों का संग्रहण।
ऐसा जो संग्रहण किया उस संग्रहण के केवल आंकड़े ही देख लीजिए। कुछ अनुमान अवश्य हो जाएगा।
कर्नल कॉलिन मॅकेन्झी (१७५३-१८२१)—इनके  हस्तलिखितों का संग्रह १००० पाउण्ड देकर उनके मृत्यु पश्चात इंग्लैण्ड की रानी ने खरिदा था।
सर विलियम जोन्स (१७४६-१७९४) एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल का स्थापक।
सोसायटी ने हस्तलिखितों और पाण्डुलिपियों  का प्रचण्ड संग्रह किया था, सोसायटी के कलकत्ता के ग्रंथालय में।
रॉबर्ट काल्डवेल (१८१५-१८९१) इसने दुर्लभ संस्कृत हस्तलिखितों का संग्रह किया था।
जोहान बुह्लर(१८३७-१८९८) इसने ५०० संस्कृत पाण्डुलिपियों का संग्रह किया था।
हर्मन जॅकोबी (१८५०-१९३७) यह अकेला सभी से अलग मत रखता है कि वैदिक मंत्र ई. पूर्व ४५०० में संग्रहित किए गए थे।
आर्थर मॅक्डॉनेल (१८५४-१९३०) इसने  ७००० संस्कृत पाण्डुलिपियां काशी से खरिदी थीं।
यह मृत्यु पहले ऋग्वेद का अंग्रेज़ी अनुवाद कर रहे थे।
(छः) ग्रंथों का परदेश भेजा जाना।

एक बात आंख में घुसकर चुभती है।क्या?
कि, एक तो, ==>ग्रंथ हमारे अति दुर्लभ थे, हमारे अधिकार के थे,पर दान कोई  और ही दे रहा था, और किसी तीसरे को दिया जा रहा था। 
मॅकडॉनल, मॅक्समूलर, एच एच विल्सन इत्यादि लोगों ने छाँट छाँट कर अच्छे अच्छे ग्रंथों को भारत के बाहर भेज दिया।
उसके कुछ उदाहरण।
(१)एच एच विल्सन (१७८६-१८६०) ने  ५४० वैदिक हस्तलिखितों को दान देकर ऑक्सफर्ड भेजा था। { वेद हमारे दान कोई और किसी तीसरे को ही दे रहा है?}
(२) मॅकडॉनल (१८५४-१९३०), ने गवर्नर लॉर्ड कर्ज़न(१८५९-१९२५) की सहायता (दबाव बनाकर)  लेकर ,
काशी की  ७,००० हस्तलिखित पांडुलिपियां ऑक्सफ़र्ड भिजवायी थीं।
इस, मॅकडॉनल ने कुल १०,००० संस्कृत हस्तलिखितों को ऑक्सफर्ड भेजा था। ऋग्वेद का अंग्रेज़ी  अनुवाद करते करते उसकी मृत्यु हुयी थी। गवर्नर कर्ज़न ने बनारस पर दबाव बनाकर ऐसा काम सफल किया  था।
(सात) गुरू भूमिपर और अज्ञानी शिष्य आसन पर?
ऑक्सफर्ड में प्रार्थना स्थल के सामने पत्थर की शिला पर विलियम जोन्स की प्रतिमा खोदी गयी है। बड़े आसन पर लिखते हुए दिखाया है उसे और भूमि पर तीन विद्वान पण्डित बैठे हुए हैं, विलियम जोन्स के चरणों के पास और, संस्कृत की कोई (ग्रंथ) संहिता पर ये तीन विद्वान पण्डित, कुछ लिखवा रहे हैं। सोचिए, क्या दृश्य है? तीन जानकार गुरू भूमिपर,और अज्ञानी विलियम्स उच्च आसन पर?  क्या यही है, हमारे भारत का आदर्श?
पर ऐसा एकांगी भी सारा इतिहास नहीं है और सारा समग्र वृतान्त भी वैसे केवल एकपक्षी कहा नहीं जा सकता।
कुछ गोरे साहिबों के विषय में ऐसा भी लगता है कि वे बड़े आत्मविश्वास से चुटकी में धर्मान्तरण करने की महत्वाकांक्षा लेकर आये थे। पर वास्तव में जब परमज्ञानी भारत को पहचाने तो बदलकर रह गए थे। इस वर्ग में अति महत्व के विद्वान थे, मॅक्समूलर और मॉनियर विलियम्स। मॅक्स्मूलर वेदार्थ और शासकीय परीक्षार्थियों को प्रशिक्षित किया करते थे। और मॉनियर विलियम्स नें दो बडी बडी संस्कृत से अंग्रेज़ी, और अंग्रेज़ी से संस्कृत की डिक्शनरियां बनाई थी। और कॉलिन मॅकेन्जी भी इसी वर्ग में पर, काफी कम मह्त्व के गिने जाएंगे।
ऐसे लोगों के विषय में, कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होंगी कि ये “आये थे गुरू बनकर चेले बन वापस गए।”
इस प्रकार की उपलब्धि साधारण नहीं मानता। इन सभी पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष चर्च का दबाव रहा ही होगा। इसलिए दिखता है कि उन्होंने बहुत बार अपनी निष्ठा दिखाने के लिए, जो उनकी विवशता ही होगी, दोनों पक्षों के दिखे ऐसे विधान किए थे। जब वेतन ही उनका, वहां से आता था, तो उनकी विवशता समझी जा सकती है।
तो  आए थे गुरू बनने चेले बन चले गए। 

यह भी उनके उद्धरणों से ही प्रमाणित होता है।
इस आलेख को लिखने में मैंने तर्क के आधार ही, पर पंक्तियों के बीच में पढ़कर भी विधान किए हैं। पर सौम्य आक्रामकता भी अपनायी है। इससे विपरीत यह भी सच्चाई ही है कि आज हमारे अनेक दुर्लभ ग्रंथ हमारे अपने अधिकार में नहीं है। ऐसी हस्त लिखित प्रतियां खिलवाड़ करने के लिए सरलातिसरल ही होती है। ग्रंथों में प्रक्षिप्त श्लोकों को डाला जा सकता है।

9 Responses to “आये थे गुरू बनकर, चेले बन चले गये”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    भरत जी—आप ऑक्सफर्ड जा कर प्रयास कीजिए।
    और चुनौती वाली भाषा से काम बिगड जा सकता है। कुछ सरल प्रस्तुति कीजिए।
    शुभेच्छा सहित —–

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  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन

    अमरिका में, अनेक भारत हितैषी संस्थाओं की स्थापना के पीछे जिनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन एक प्रबल कारण है, ऐसे व्यक्तित्व के धनी डॉ. महेश मेहता जी का निम्न संदेश प्रस्तुत है।

    Dear Madhu bhai:
    Thank you for writing such wonderful, authentic articles.
    Hope all your articles can be published in a book form.
    Regards
    Mahesh Mehta

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  3. DS Nagda

    उत्तम. अति उत्तम | सब कुछ होते हुए, समझते हुए भी आज भी हम पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित है | पश्चिम की कई अछाईओ को न लेकर आज भी हम वहाँ की कुरीतियो को ही ग्रहण कर रहे हैं | आज भी हम बहु का गोरा रंग ही देखते है न की उसके संस्कार चरित्र | या दहेज़ की सामग्री व रकम | आज भी हमारी पढ़ाई जब तक एम् ये, बी ये नहीं हो तब तक पूरी नहीं मानी जाती | और फिर पढ़ाई का मूल उद्देश्य तो धन उपार्जन करना ही होता है इसीलिए हमारे यहाँ पर विश्व स्तरीय ज्ञानी होते हुए भी अभी तक कोई नोबेल लॉरेट या ओलिंपिक में गोल्ड मेडलिस्ट्स ज्यादा नहीं हुयें | क्या यह हमारी वरतमान शिक्षा की वजह से नहीं हैं ? यहाँ तक की यह लेख भी मुझे अंग्रेजी के अल्फाबेट द्वारा ही लिखना सम्भव हुआ है | क्या वास्तव में हमारी मानसिक गुलामी अभी तक नहीं गयी है? जब हम सुपर कंप्यूटर बना सकते है तो क्या हम हिंदी में हिंदी के अक्षरो द्वारा नहीं लिख सकते है? दुःख की बात ही है यह |
    और जहां तक गुरु चेले की बात है तो भारत आदि काल से विश्व गुरु था और रहेगा ऐसी आशा है | आज भी भारत में ऐसे ऐसे धुरंधर है मात्र दिखने में नहीं आते , संभवतया खोजने वाले पर्याप्त खोज नहीं कर पाते |

    धन्यवाद मधुसूदन जी |

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ.मधुसूदन

      नमस्कार नागदा जी, और धन्यवाद।
      आप की टिप्पणी भी विचार करने पर विवश करती हैं।
      और आपका दूर भाष भी आया था।
      कृपा बनाए रखें।
      मधुसूदन

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  4. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन

    आय.पॅड से भेजा गया संदेश।

    “प्रस्तुत शोधपरक आलेख ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित होने से प्रामाणिक है। मैंने १९६४ में”इंडिया आॅफ़िस लाइब्रेरी” लन्दन में अपने अनेक प्राचीन ग्रन्थों की पांडुलिपियाँ देखीं थीं , जब मैं अपने कार्य के सम्बन्ध में वहाँ गई थी ।
    आपके द्वारा दी गई जानकारी सराहनीय है ।”
    शकुन्तला बहादुर

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  5. mahendra gupta

    यह भारतीय संस्कृति की ही विशेषता है कि वह हर किसी को अपना बना लेती है.जितने भी विदेशी आक्रांता आये भारत में रह यहीं के होकर रह गए.इस जादू का ज्ञान हम भारतीयों को नहीं, पर हमारी जीवन प्रक्रिया इससे अच्छी तरह परीचित है.भारत इसलिए विभिन्न संस्कृतियों का देश बन गया.

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ.मधुसूदन

      सही है, गुप्त जी आपकी बात।
      पर कुछ शत्रुओं का मुझे अलग परिचय लगता है।
      शायद वे चर्च के वेतनधारी होने के कारण, विवशता हो सकती है।
      इस लिए लगता है, कि, सभी को एक तरह आँकना कठिन है।
      पर जो प्रामाणिक है, उसके लिए सच्चाई स्वीकारना, संभव अवश्य है।
      संक्षेप में इतना ही।
      कुछ उद्धरण इन लोगों के, प्रारंभ के, (हीनता भरे –पत्थर पूजने वाले, जंगली ) इत्यादि मिलते हैं।
      जब संस्कृत पढ कर, कुछ वर्ष भारत में बस कर, फिर वही परदेशी भारत की महानता को मान लेता है।
      मॉनियर और मॅक्स्मूलर ये दोनो का यह बदलाव मुझे स्पष्ट लगता है।
      जोन्स का पता नहीं, उसपर तिवारी जी का विधान मुझे अधिक सही ही लगता है।
      आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद।

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  6. मुकुल शुक्ल

    आदरणीय डा॰ साहब
    आपके द्वारा दिये जा रहे इस अमूल्य ज्ञान और शिक्षा का प्रचार प्रसार किया जाना बहुत आवश्यक है | अब तक हम भारतवासी इन बातों से अनजान थे और नहीं जानते थे की कैसे हमारे साथ ऐसे षड्यंत्र किए गए जिनकी हमे भनक तक नहीं लगी | बहुत हद तक भाई राजीव दीक्षित और स्वामी रामदेव जी ने इन षडयंत्रों से अवगत तो करवाया पर आगे भी इन बातों का प्रसार किया जाना नितांत आवश्यक है | सही इतिहास का ज्ञान न होने का परिणाम है की आज भारत का युवा भारत से अधिक पश्चिम की ओर देखता है | अंग्रेज़ी को अपनी मातृ भाषा से भी अधिक सम्मान देता है और पढ़ने लिखने के बाद भारत छोड़ कर विदेश का रुख कर लेता है | शिक्षा मे गिरवाट के कारण ही भारत के युवाओं मे चरित्र, मूल्यों और देशभक्ति मे लगातार कमी हो रही है और इसका सीधा लाभ पश्चिम को हो रहा है क्योंकि उन्हे बैठे बिठाये ही सस्ते मे भारत के बुद्धि जीवी युवा वर्ग की सेवाएं प्राप्त हो रही है | इतिहास की सही जानकारी और आने वाले युवाओं मे राष्ट्र के प्रति सम्मान और स्वाभिमान की भावना दिये जाना अब नितांत अवश्यक हो गया है | आपके आलेखों से लगातार ऐसी सुंदर और राष्ट्र हित से परिपूर्ण ज्ञान का प्राप्त होना बहुत सुखद लगता है | आपके इन प्रयासों के लिए आपको अनेकों साधुवाद |

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ.मधुसूदन

      शुक्ल जी–नमस्कार–एवं धन्यवाद।
      सहमत हूँ। कि, ग्रामीण से लेकर महा नगरवासी तक,१००% समग्र भारत की उन्नति (लिख लीजिए) “कभी भी परदेशी भाषा के बलपर नहीं होगी।
      बैसाखी पर व्यक्ति दौड नहीं सकता। अंग्रेज़ी बैसाखी है।
      कभी विश्व की स्पर्धा का ऑलिम्पिक भी बैसाखी पर जीता जा सकता है?
      सहमती व्यक्त करता हूँ।
      बहुत बहुत धन्यवाद।

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