राजनीति

चढ़ावा चोरी की आड़ में हिन्दू धर्म पर हमला

राजेश कुमार पासी

राम मंदिर में भक्तों के दान की चोरी आज देश का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है लेकिन मेरा मानना है कि ये मुद्दा इतना बड़ा नहीं है जितना इसे बनाया जा रहा है। वास्तव में इस मुद्दे की आड़ में हिन्दू धर्म को नीचा दिखाने की साजिश चल रही है, इसलिए इस मुद्दे को इतना बड़ा बनाया जा रहा है । अजीब बात है कि जिन लोगों को राम मंदिर से नफरत थी, वही लोग आजकल मंदिर भक्त बने घूम रहे हैं। जो लोग मुस्लिमों की नाराजगी के भय से राम लला के दर्शन तक नहीं कर पाए, उन्हें दान-चोरी की घटना से नींद नहीं आ रही है। अचानक इन लोगों को राम-मंदिर और उसके धन की इतनी चिंता क्यों होने लगी, ये एक बड़ा सवाल है। इस सवाल में ही सारी सच्चाई छुपी हुई है।

वास्तव में इन लोगों को इस घटना से हिन्दू धर्म और हिंदुओं की आस्था पर सवाल उठाने का मौका मिल गया है। हिंदुओं की आस्था को मुद्दा बनाकर भाजपा ने इतनी शक्ति प्राप्त की है कि वो सत्ता के सर्वोच्च शिखर की ओर जाती दिखाई दे रही है। भाजपा की बढ़ती ताकत ने विपक्षी दलों के लिए अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। इन दलों को लगता है कि इस मुद्दे पर भाजपा को पीछे धकेला जा सकता है और उसकी नीयत पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं। भाजपा के राम-मंदिर बनवाने पर ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं। इस घटना को इस तरह से पेश किया जा रहा है कि जैसे चढ़ावा चोरी करके सारा पैसा भाजपा को दे दिया गया है। जो लोग अभी तक यह कहते घूम रहे थे कि भाजपा को इतना चंदा मिलता है कि वो करोड़ों रुपयों में विधायकों और सांसदों की खरीद कर रही है। अब यही लोग इल्ज़ाम लगा रहे हैं कि भाजपा ने ही मंदिर में चढ़ावे की चोरी करवाई है।  देखा जाए तो पिछले कई सालों से विपक्ष को भाजपा के खिलाफ कोई बड़ा मुद्दा नहीं मिल रहा है, इसलिए वो लगातार मुद्दों की तलाश में भटकता रहता है। विपक्ष के लाये गए सभी मुद्दे कुछ ही समय में दम तोड़ देते हैं, लेकिन विपक्ष यह समझने को तैयार नहीं है कि उसकी अपनी छवि बड़ा मुद्दा है। राम-मंदिर में चढ़ावा चोरी को विपक्ष मुद्दा नहीं बना सकता, क्योंकि उसकी खुद की छवि मंदिर विरोधी की है। भाजपा ने राम-मंदिर का संघर्ष जिस उद्देश्य के लिए किया था, वो पूरा हो चुका है । राम-मंदिर के संघर्ष ने ही भाजपा को हिंदु हितैषी पार्टी के रूप में स्थापित किया है, क्योंकि विपक्षी दल एकजुट होकर राम-मंदिर के खिलाफ खड़े थे। 

                राम मंदिर में चोरी की घटना ने हिन्दू समाज को बहुत बड़ी चोट दी है लेकिन राम और राम मंदिर में उसकी आस्था को फर्क पड़ने वाला नहीं है। जहां भी पैसे का लेनदेन होता है, वहां चोरी होने की संभावना हमेशा बनी रहती है। इसको ध्यान रखते हुए ही हर जगह चोरी रोकने के पूरे इंतज़ाम किये जाते हैं। जिन मंदिरों में बड़ी मात्रा में भक्तों से दान प्राप्त होता है, वहां प्रबंधन दान की गिनती और उसके निपटारे का पूरा इंतज़ाम करता है। राम मंदिर ट्रस्ट अपने काम में पूरी तरह से असफल रहा है । इस ट्रस्ट में शामिल लोगों ने भक्तों के विश्वास को बड़ी चोट दी है। चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव  इस ट्रस्ट की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। देखा जाए तो ट्रस्ट के मुख्य कर्ताधर्ता तो चंपत राय ही थे, इसलिए वो चोरी करने वालो से किसी भी प्रकार से कम दोषी नहीं हैं। उन्होंने ऐसी व्यवस्था खड़ी की, जिसमें बड़े आराम से आरोपी भक्तों के दान पर हाथ साफ करते रहे।  गिनती करने वाले इनके ही जरिये वहां पहुँचे, जहां पर उन्हें यह काम करने का मौका मिला। ये लोग चोरी के लिए जिम्मेदार हैं, क्योंकि चोरी रोकने की जिम्मेदारी इन लोगों की ही थी । अगर ये लोग अपना काम नहीं कर पा रहे थे, तो उन्हें इस जिम्मेदारी को छोड़ देना चाहिए था। क्या उन्हें पता नहीं था कि करोड़ों रुपए देखकर चोरी करने की कोशिश हो सकती है। जिन लोगों को चढ़ावे की गिनती करने और उसे बैंक में जमा कराने के लिए रखा गया था, वो अचानक करोड़पति  बन रहे थे, जबकि उनका वेतन बहुत कम था। महीनों से ये लोग भक्तों के चढ़ावे पर हाथ साफ कर रहे थे, लेकिन ट्रस्ट के पदाधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लगी। इससे संदेह पैदा होता है कि क्या सब कुछ देखकर भी अनदेखा किया जा रहा था।

चंपत राय ईमानदार हो सकते हैं, जैसे मनमोहन सिंह बहुत ईमानदार थे लेकिन मनमोहन सिंह के मंत्रियों के भ्र्ष्टाचार के लिए क्या जनता ने उन्हें माफ कर दिया। 2014 में कांग्रेस की बड़ी हार की वजह मनमोहन सिंह के मंत्रियों का भ्र्ष्टाचार था।  जनता कुछ बोलती नहीं है लेकिन वक्त आने पर अपनी प्रतिक्रिया जरूर देती है। चंपत राय ईमानदार हो सकते हैं लेकिन उनकी देखरेख में चलने वाली व्यवस्था में बड़ी खामियां थी जिसकी कीमत आज हिन्दू समाज चुका रहा है। इस घटना के कारण ही राम-मंदिर विरोधियों को मंदिर पर उंगली उठाने का मौका मिल गया है। 

             संघ, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा ने राम मंदिर के संघर्ष में अपना खून-पसीना बहाया है। राम मंदिर के लिए भाजपा ने अपनी राजनीति को दांव पर लगा दिया था। राम मंदिर के लिए उसके संघर्ष के कारण ही दशकों तक भारतीय राजनीति में उसे छुआछूत का सामना करना पड़ा है। उसे साम्प्रदायिक पार्टी घोषित करके वर्षों तक सत्ता से दूर रखने की कोशिश की गयी है। भगवान राम को काल्पनिक घोषित करने वाले आज मंदिर की चिंता में घुले जा रहे हैं। सवाल उठता है कि मंदिर के धन की चोरी की इतनी चिंता क्यों है जबकि दशकों से दक्षिण भारत के मंदिरों पर कब्जा करके उनके धन की राज्य सरकारों द्वारा  सरेआम चोरी की जा रही है। दक्षिण भारत के मंदिरों की हज़ारों एकड़ भूमि गायब कर दी गई है जिसका अब कुछ पता नहीं है। कैसे मंदिरों की जमीनें गायब हो गईं, इसका कोई जवाब नहीं है। मंदिरों के पैसे का इस्तेमाल हिदू धर्म के लिए नहीं होता है. ये भी तो चढ़ावा चोरी ही है, उसके बारे में क्यों नहीं बात की जाती।

कुछ आदमी मंदिर का धन चोरी करके अपने घर ले गए तो दूसरी तरफ सरकार ने मंदिर का धन लेकर अपने पास रख लिया। मेरी नजर में दोनों ही चोर हैं, क्योंकि मंदिर का धन सिर्फ हिंदुओं के धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल किया जा सकता है। मद्रास हाईकोर्ट ने भी एक फैसले में कहा है कि मंदिर का पैसा सिर्फ धार्मिक कार्यो के लिए ही इस्तेमाल किया जा सकता है। तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने मंदिरों के पैसे से सार्वजनिक निर्माण कार्य शुरू किए थे, इसके खिलाफ माननीय अदालत ने फैसला सुनाया है। समस्या यही है कि भक्तों के चढ़ावे का सही इस्तेमाल करने की व्यवस्था सभी मन्दिरों में नहीं है। हिन्दू समाज को राम-मंदिर के चढ़ावे की चोरी की चिंता करनी चाहिए लेकिन यह भी देखना चाहिए कि अन्य मंदिरों में आ रहे चढ़ावे का क्या हो रहा है। सरकारें मंदिरों की व्यवस्था संभाल रही हैं लेकिन उसके धन का क्या कर रही हैं, इस पर भी सवाल होना चाहिए। माता वैष्णोदेवी ट्रस्ट द्वारा एक मेडिकल कॉलेज की स्थापना की गई तो उसमें 90% मुस्लिम विद्यार्थियों को दाखिला मिल गया. इससे जम्मू-कश्मीर का हिन्दू समुदाय बहुत नाराज हो गया। सवाल यह है कि मेडिकल कॉलेज बनाना क्या मंदिर का काम है। गरीब लोगों की मदद के लिए अस्पताल खोलना सही हो सकता है लेकिन मेडिकल कॉलेज खोलना अलग बात है। क्या मस्जिदों और चर्चो के पैसे से हिंदुओं के लिए कोई मेडिकल कॉलेज खोला गया है। 

              मेरा मानना है कि मंदिर में चढ़ावा चोरी होना इतनी बड़ी घटना नहीं है जितना इसे बनाया जा रहा है। इसको बड़ा बनाने वालों की नीयत में खोट है, उसे देखने की जरूरत है। कुछ लोगों ने चढ़ावे की चोरी की क्योंकि उन्हें चोरी करने का मौका दिया गया। जो लोग मंदिर की व्यवस्था संभाल रहे थे, उन्हें इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए लेकिन ऐसा होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। अपने पद से इस्तीफा देने से कुछ होने वाला नहीं है.  इसके लिए समाज और देश से माफी मांगनी चाहिए। ट्रस्ट के नियमों के अनुसार तो सिर्फ चोर को ही सजा मिल सकती है, लेकिन चोरी रोकने में असफल होने वालों को भी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। ट्रस्ट का निर्माण इसलिए किया गया था, ताकि सरकार की दखलंदाजी के बिना मंदिर की व्यवस्था अच्छी तरह से चलती रहे, लेकिन अब लगता है कि सरकार का दखल बढ़ने वाला है। इस घटना ने यह बता दिया है कि हिन्दू अपने मंदिरों का प्रबंधन भी सही तरीके से नहीं कर सकते। कितनी अजीब बात है कि ट्रिलियन डॉलर की कंपनियों का प्रबंधन हिन्दू कर रहे हैं लेकिन दूसरी तरफ एक मंदिर के प्रबंधन ने सवाल खड़ा कर दिया है । इस घटना ने मंदिरों पर सरकारी कब्जे खत्म करने की लड़ाई को कमजोर कर दिया है। मंदिर में चोरी होना बड़ी बात नहीं है. बड़ी बात इस घटना से निकला हुआ संदेश है जो हिन्दू समाज को भारी पड़ने वाला है। 

राजेश कुमार पासी