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क्यों लगातार असफल हो रही हैं भारतीय एयरलाइंस ?


पंकज जायसवाल


भारत आज विश्व के सबसे तेजी से विकसित होते विमानन बाजारों में शामिल है। पिछले दो दशकों में हवाई यात्रियों की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है। देशभर में नए हवाई अड्डों का निर्माण और पुराने हवाई अड्डों का विस्तार अभूतपूर्व गति से हो रहा है। भारतीय एयरलाइंस ने सामूहिक रूप से एक हजार से अधिक नए विमानों का ऑर्डर दिया है जिनकी कीमत सैकड़ों अरब डॉलर है। सरकार की उड़ान योजना ने क्षेत्रीय हवाई संपर्क को मजबूत किया है और हवाई यात्रा अब मध्यम वर्ग की पहुँच में आ चुकी है।

लेकिन यदि हम भारतीय विमानन उद्योग के वित्तीय इतिहास पर नजर डालें तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। एयर डेक्कन और सहारा एयरलाइंस इतिहास बन गईं। किंगफिशर एयरलाइंस और जेट एयरवेज जैसी प्रतिष्ठित कंपनियाँ धराशायी हो गईं। गोएयर, गो फर्स्ट बनकर भी दिवालिया प्रक्रिया में चली गई। जेट जैसे कई छोटे ऑपरेटर अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करते रहे। एयर इंडिया ने निजीकरण से पहले कई हजार करोड़ से अधिक का घाटा दर्ज किया और निजीकरण के बाद भी कंपनी घाटा एकीकरण, संचालन तथा लाभप्रदता जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है।

ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, तब भी एयरलाइंस अपने निवेशकों के लिए मूल्य क्यों नहीं बना पा रहीं? इसका उत्तर विमानन उद्योग की वास्तविक अर्थव्यवस्था को समझने में छिपा है। सामान्य धारणा यह है कि एयरलाइंस यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाकर लाभ कमाती हैं। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। विमानन केवल परिवहन का व्यवसाय नहीं, बल्कि कैश फ्लो का व्यवसाय है। किसी भी एयरलाइन की सफलता तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित होती है पहला, मजबूत नकदी प्रवाह दूसरा, विमान का अधिकतम उपयोग और तीसरा, प्रभावी यील्ड मैनेजमेंट, अर्थात प्रत्येक सीट से अधिकतम राजस्व प्राप्त करना।

जो विमान जमीन पर खड़ा है, वह कोई आय उत्पन्न नहीं करता। जो सीट खाली उड़ गई, उसे दोबारा कभी बेचा नहीं जा सकता। और यदि टिकट उसकी वास्तविक लागत से कम कीमत पर बेच दिया गया, तो वह नुकसान स्थायी हो जाता है। इसलिए विमानन ऐसा उद्योग है जहाँ परिचालन अनुशासन और वित्तीय अनुशासन एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते। भारत की अधिकांश असफल एयरलाइंस इन्हीं मूलभूत सिद्धांतों पर नियंत्रण खो बैठीं।

भारतीय विमानन उद्योग आज चार गंभीर संरचनात्मक समस्याओं से जूझ रहा है। पहली समस्या है अत्यधिक लागत। विश्वभर में एयरलाइंस सामान्यतः केवल 3 से 8 प्रतिशत के शुद्ध लाभ मार्जिन पर काम करती हैं। भारत में स्थिति और कठिन है। यहाँ विमान ईंधन पर ऊँचे कर, एयरपोर्ट शुल्क, नेविगेशन शुल्क, सुरक्षा व्यय, डॉलर में देय विमान लीज़ किराया, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े रखरखाव व्यय तथा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव एयरलाइंस की लागत को अत्यधिक बढ़ा देते हैं। केवल ईंधन ही कुल परिचालन लागत का 35 से 45 प्रतिशत तक हो सकता है। जैसे ही कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है या रुपया कमजोर होता है, एयरलाइंस का लाभ तुरंत प्रभावित हो जाता है। उत्पादन उद्योग की तरह एयरलाइंस हर बार अपनी कीमतें नहीं बढ़ा सकतीं। यही संरचनात्मक असंतुलन भारतीय विमानन की सबसे बड़ी कमजोरी है।

दूसरी समस्या है ऋण आधारित विस्तार। भारत की अनेक एयरलाइंस ने अपनी वित्तीय क्षमता से कहीं अधिक तेजी से विस्तार किया। एक नैरो-बॉडी विमान की कीमत लगभग ₹500 से ₹800 करोड़ तक होती है, जबकि वाइड-बॉडी विमान की कीमत ₹2,000 करोड़ से भी अधिक हो सकती है। इसलिए अधिकांश एयरलाइंस ऑपरेटिंग लीज़, फाइनेंस लीज़, बैंक ऋण अथवा सेल-एंड-लीजबैक जैसी व्यवस्थाओं पर निर्भर रहती हैं। परिणामस्वरूप उनके ऊपर भारी स्थायी वित्तीय दायित्व आ जाते हैं। जब मांग घटती है या लागत बढ़ती है, तब नकदी प्रवाह कमजोर हो जाता है लेकिन लीज़ और ऋण की किश्तें लगातार चुकानी ही पड़ती हैं।

किंगफिशर एयरलाइंस इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कंपनी ने प्रीमियम ब्रांड बनने की रणनीति अपनाई लेकिन उसका विस्तार मुख्यतः ऋण के सहारे हुआ। एयर डेक्कन के अधिग्रहण ने वित्तीय और परिचालन जटिलताओं को और बढ़ा दिया। अंततः कंपनी पर कई हजार करोड़ से अधिक का कर्ज हो गया। ब्याज का बोझ असहनीय हो गया, कर देनदारियाँ बढ़ती गईं और कार्यशील पूंजी समाप्त हो गई। किंगफिशर इसलिए बंद नहीं हुई क्योंकि यात्रियों ने उड़ान भरना बंद कर दिया था; बल्कि इसलिए क्योंकि उसकी देनदारियाँ उसकी नकदी उत्पन्न करने की क्षमता से कहीं अधिक तेजी से बढ़ती चली गईं।

तीसरी समस्या है बाजार हिस्सेदारी की अंधी दौड़। कई एयरलाइंस ने लाभ कमाने के बजाय बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने को प्राथमिकता दी। उनकी सोच थी कि पहले अधिक से अधिक यात्री जोड़ लिए जाएँ, लाभ बाद में अपने आप आ जाएगा लेकिन विमानन उद्योग इस सिद्धांत पर काम नहीं करता। प्राइस वार से कुछ समय के लिए यात्रियों की संख्या बढ़ सकती है, लेकिन इससे टिकटों की औसत आय स्थायी रूप से घट जाती है। भारत में कई बार एयरलाइंस ने केवल प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए टिकट उनकी वास्तविक आर्थिक लागत से भी कम कीमत पर बेचे। इसका लाभ यात्रियों को मिला, लेकिन निवेशकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। वस्तुतः कई एयरलाइंस उधार लिए गए धन से यात्रियों की यात्रा को सब्सिडी दे रही थीं, जो कभी भी टिकाऊ मॉडल नहीं हो सकता था।

चौथी समस्या है कमजोर फ्लीट योजना। विमान बेड़े की योजना विमानन व्यवसाय के सबसे कम आंके गए लेकिन सबसे महत्वपूर्ण पक्षों में से एक है। अलग-अलग प्रकार के विमानों के लिए अलग पायलट प्रशिक्षण, अलग स्पेयर पार्ट्स, अलग रखरखाव व्यवस्था और अलग इंजीनियरिंग सहायता की आवश्यकता होती है। जितना अधिक विविध विमान बेड़ा होगा, परिचालन लागत उतनी ही अधिक होगी।

जेट एयरवेज इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। सेवा गुणवत्ता, ग्राहक संतुष्टि और ब्रांड प्रतिष्ठा के मामले में वह विश्वस्तरीय एयरलाइंस की श्रेणी में गिनी जाती थी। उसके ग्राहकों की वफादारी भी मजबूत थी। फिर भी कंपनी बंद हो गई। कारण स्पष्ट था उत्कृष्ट परिचालन भी कमजोर बैलेंस शीट की भरपाई नहीं कर सकता। कम लागत वाली एयरलाइंस के मुकाबले जेट की लागत अधिक थी। जैसे-जैसे प्रतिस्पर्धा बढ़ी और किराए घटे, उसकी लाभप्रदता समाप्त होती चली गई। इससे यह महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है कि एक अच्छी एयरलाइन होना और एक अच्छा व्यवसाय होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।

पंकज जायसवाल