कविता काल व्यूह से लड़ना होगा ! December 31, 2019 / December 31, 2019 | Leave a Comment यह पुण्य भूमि है ऋषियों की,जहां अभूतपूर्व वीरता त्याग की धारखंडित भारत आज खंड खंड ,दे रही चुनौती कर सहर्ष स्वीकार !दग्ध ज्वाल विकराल फैला,कर विस्तीर्ण विराट दिगंत पुकार,पुण्य भूमि से नीले वितान तकशत्रु दल में हो हा-हाकार !सभ्यता-संस्कृति प्रशस्त बिन्दु खातिर ,हर क्षण धधकती हो असिधार ,दृढ़ बलवती स्नायु भुजदंड अभय हो ,हाथों में […] Read more » काल व्यूह से लड़ना होगा !
कविता संघातों में सदा अविचल होना ! December 30, 2019 / December 30, 2019 | Leave a Comment तुम वीरता के दृढ़ प्रतिमान , कभी नहीं धीरज खोना ! कंटक राहें हों दुर्निवार , न भयभीत कहीं रुकना-झुकना ! तुम वीर प्रहरी पुण्यभूमि के , अनंत शक्ति संवाहक होना ; तूफान मिले विस्फोट मिले , अडिग अटल अविचल होना । तुम सभ्यता के पुरातन दृढ़ स्तम्भ , अनन्त संस्कृतियों के ,चिर-संवाहक होना ; […] Read more » संघातों में सदा अविचल होना
कविता बन्धुवर अब तो आ जा गांव ! December 19, 2019 / December 19, 2019 | Leave a Comment खोद रहे नित रेत माफिया नदिया की सब रेती चर डाले हरियाली सारी धरती की सब खेती । आम-पीपल-नीम-बरगद काट ले गए, लग रहे बबूल पर दांव बन्धुवर अब तो आ जा गांव ! समरसता अब खो चुकी धर्म खतरे में घट रहा स्वदेशी घुट रही घर में समाज देश भी बंट रहा । भाई […] Read more » Brother now come to the village! बन्धुवर अब तो आ जा गांव !
कविता नववर्ष मंगलमय हो ! April 3, 2019 / April 3, 2019 | Leave a Comment सत्य सनातन सभ्यता के रक्षक , हे उन्नत विचारों वाले , क्रुर , दु:सह दु:ख – जड़ता का विध्वंसक , हे उन्मत्त ! सुधारों वाले ! सत्यता की मलिन दशा क्यों हो गयी है आज , बन्धु लूटे खूब बान्धव को , है नहीं बची कुछ लाज ! लूट रही संपदा विविध , सर्वत्र लगी […] Read more » नववर्ष
कविता सुनो सिंहासन के रखवाले ! February 18, 2019 / February 18, 2019 | Leave a Comment -कवि आलोक पाण्डेय (जम्मू कश्मीर के पुलवामा जिले के अवंतिपुरा में आतंकी हमले में हुतात्मा वीरों के याद में शासनतंत्र को कर्तव्यबोध दिलाती एक कवि की भावपूर्ण कविता –) कह रहा स्तब्धित खड़ा हिमालय, घुटता रो-रो सिंधु का नीर, हे भारत के सेवक जगो, क्यों मौन सुषुप्त पड़े अधीर ! क्रुर प्रहार झंझावातों में, जीवन […] Read more »
कविता आज मेरा मन डोले ! January 31, 2019 / January 31, 2019 | Leave a Comment आकुल-व्याकुल आज मेरा मन , ना जाने क्यों डोले…..विघटित भारत की वैभव को ले लेभाषा इंकलाब की बोलेआज मेरा मन डोले !कष्टों का चित्रण कर रहा व्यथित ह्रदय मेरासुदृढ दासता और बंधन की फेरा…..उजड रही जीवों की बसेरा,सुखद शांति की कब होगी सबेरा…..!न्यायप्रिय शांति के रक्षक, त्वरित क्रांति को खोलें….आज मेरा मन डोले…..!भाषा इंकलाब […] Read more »
कविता वे लोग January 27, 2019 / January 27, 2019 | Leave a Comment उदासीन जीवन को लेक्या-क्या करते होंगे वे लोगन जाने किन-किन स्वप्नों को छोड़कितने बिलखते होंगो वे लोग।कितने संघर्ष गाथाओं में, अपनी एक गाथा जोड़ते होंगे वे लोगपर भी, असहाय होकरकैसे-कैसे भटकते होंगो वे लोग।कुछ बाधाओं से जूझते परास्त नहींकैसे होते होंगे वे लोग;जीवन को दाँव लगा राष्ट्र हित में,मिटने वाले कौन होते होंगे वे लोग।गरीबी में […] Read more »
कविता आर्त्त गैया की पुकार January 15, 2019 / January 15, 2019 | Leave a Comment _________________ कंपित ! कत्ल की धार खडी ,आर्त्त गायें कह रही –यह देश कैसा है जहाँ हर क्षण गैया कट रही !आर्त्त में प्रतिपल धरा, वीरों की छाती फट रहीयह धरा कैसी है जहाँ हर क्षण ‘अवध्या’ कट रही |आज सांप्रदायिकता के जहर में मार मुझको घोल रहा,सम्मान को तु भूल ,मुझे कसाई को तू […] Read more » cows calling to protect themselves गैया
कविता पूछ रहा मूझसे स्वदेश ! January 5, 2019 / January 5, 2019 | Leave a Comment पूछ रहा मुझसे हिमालय, पूछ रहा वैभव अशेष, पूछ रहा क्रांत गौरव भारत का, पूछ रहा तपा भग्नावशेष !अनंत निधियाँ कहाँ गयी, क्यों आज जल रहा तपोभूमि अवशेष;कैसे लूटी महान सभ्यता प्राचीन, क्यों लुप्तप्राय वीरोचित मंगल उपदेश !कितने कलियों का अन्त हुआ भयावह, कितने द्रोपदियों के खुले केश,बता,कवि! कितनी मणियाँ लुटी, कितनों के लुटे संसृति-चीर […] Read more »
व्यंग्य भारत भूमण्डल के मंगलस्वरुप January 5, 2019 / January 5, 2019 | Leave a Comment संसार की सार आधार ,स्थूल, सूक्ष्म पावन विचार ,दिव्य शांति सौम्य विविध प्रकार ,जिनसे सर्वत्र क्लांत , क्रंदन की प्रतिकार !करूणावरूणालया कल्याणकारिणी,मनःशोक निवारिणी लीलाविहारिणी,तत्वस्वरूपिणी दुःख भयहारिणी,व्याधिनाशिनी हे मनोहारिणी !मंगलमय चिह्नों से युक्त वीस्तीर्ण नयन,वैभववेदान्तवेद्य ऐश्वर्य विद्या, धनमहारौद्ररूपिणी ! कोटि नमनअनंत अनंत प्रणमन वंदन !विश्व की उत्पत्ति, स्थिति प्रलय की प्रेरित,सूर्य- चन्द्र , वरूण , पवन […] Read more »
कविता धरणी नववर्ष January 5, 2019 / January 5, 2019 | Leave a Comment क्रुर संस्कृति, निकृष्ट परंपरा कायह अपकर्ष हमें अंगीकार नहीं,धुंध भरे इस राहों मेंयह नववर्ष कभी स्वीकार नहीं ।अभी ठंड है सर्वत्र कुहासा , अलसाई अंगड़ाई है,ठीठुरी हुई धरा – नील-गगन, कैसी सुंदरता ठिठुराई है।बाग बगीचों में नहीं नवीनता, नहीं नूतन पल्लवों का उत्कर्ष ;विहगों का झुंड सहमी – दुबकी ,अन्य वन्यजीवों में भी नहीं हर्ष […] Read more »