नववर्ष मंगलमय हो !


सत्य सनातन सभ्यता के रक्षक , हे उन्नत विचारों वाले ,
क्रुर , दु:सह दु:ख – जड़ता का विध्वंसक , हे उन्मत्त ! सुधारों वाले !
सत्यता की मलिन दशा क्यों हो गयी है आज ,
बन्धु लूटे खूब बान्धव को , है नहीं बची कुछ लाज !
लूट रही संपदा विविध , सर्वत्र लगी है आग ,
आतंकों से आतंकित कर जिहादी, खूब मनावे फाग !
मिट रहा जो सभ्यता प्रतिक , क्या सचमुच छिट पायेगा ,
संस्कारों की धूमिल छवि से,
क्या भारत मिट जायेगा !
नहीं! नहीं ! है असंभव , अप्रतिम यह संस्कृति संस्कार ;
क्या मिट सकता सूर्य-चन्द्र , या निति-नियामक हिन्द तप विहार !
भले मिट जायें मानने वाले योद्धा धर्म स्वरूप ,
विघटित होकर भी रखेंगे , इतिहास जीवंत प्रारुप ।
छोड़ें यह संक्रमण कालखंड ,
नयी नवीनता लाया है बसंत ,
हों उल्लसित प्रफुल्लित हों निर्मल , कुटिलताओं का करें अंत ।
तन से बन विरले – समरशूर , करें ब्रह्मांड का उन्नयन उत्कर्ष ,
मन से मंगलमय सदा दृढ़ बन , फैला दें भास्वित भास्वर हर्ष ,
विश्व शांति मानवता का जोत जला , दूर करें अन्यान्य अपकर्ष ;
हे धरा के प्रहरी, वीर प्रबुद्धजन , आयें मनायें शाश्वत नववर्ष ।
यह नववर्ष नवीनता का स्वरुप ले , अनंत खुशियां लाया है ,
वन वृक्षों से हरे भरे , नयी हरियाली मन भाया है ।
वन्यजीवों में खुशियां छाई , सब प्राणी हैं उत्कर्ष में ,
हर स्वरूप नवीनतम देख पुलकित , विहगों का झुंड बड़े हर्ष में ।
आयें सभ्यता के यशस्वी रक्षक बन , मंगल हर्ष मना लें हम ,
पावन चैत्र शुक्ल तिथि प्रतिपदा को, अपना नववर्ष मना लें हम ।

आलोक पाण्डेय

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