डॉ नीलम महेन्द्रा

समाज में घटित होने वाली घटनाएँ मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती हैं।भारतीय समाज में उसकी संस्कृति के प्रति खोते आकर्षण को पुनः स्थापित करने में अपना योगदान देना चाहती हूँ।

ना फैलाएँ नफरत का वातावरण

बीफ के नाम पर गोवध करना और विरोध स्वरूप बीफ पार्टी करके गोमांस का सेवन या तो विकृत मानसिकता है या फिर देश की भोली भाली जनता को मूर्ख बनाकर अपने राजनैतिक हित साधने की गंदी राजनीति।

क्यों न फिर से निर्भर हो जाए 

जरा एक पल रुक कर सोचिए तो सही कि यह भौतिकवादी संस्कृति हमें कहाँ लेकर जा रही है?
क्यों हमारे समाज में जहाँ समाज और परिवार एक दूसरे के पूरक थे आज उन दोनों के बिखराव को झूलाघरों एवं वृद्धाश्रमों द्वारा पूरा किया जा रहा है?
शायद इन सभी सवालों के जबाव इन सवालों में ही है।

 विरोध का गिरता स्तर गोवध

क्यों अन्य पशुओं जैसे भैंस बकरी ऊँटनी के दूध में मातृत्व के पूरक अंश नहीं पाए जाते?
क्या गाय के अलावा किसी अन्य जीव के मल मूत्र में औषधीय गुण पाए जाते हैं?
जब ईश्वर ने स्वयं गाय का सृजन मनुष्य का पालन करने योग्य गुणों के साथ किया है और आधुनिक विज्ञान भी इन तथ्यों को स्वीकार कर चुका है तो फिर वह गाय जो जीते जी उसे पोषित करती है तो क्यों हम उसे माँ का दर्जा नहीं दे पा रहे ? राजिस्थान हाई कोर्ट की सलाहानुसार अपने पड़ोसी देश नेपाल की तरह क्यों नहीं हम भी गाय को अपना राष्ट्रीय पशु घोषित कर देते उसे मारकर उसके ही माँस से पोषण प्राप्त करने की मांग कहाँ तक उचित है?