डॉ नीलम महेन्द्रा

डॉ नीलम महेन्द्रा

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समाज में घटित होने वाली घटनाएँ मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती हैं।भारतीय समाज में उसकी संस्कृति के प्रति खोते आकर्षण को पुनः स्थापित करने में अपना योगदान देना चाहती हूँ।

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राजनीति

राजनीति को शर्मसार करती महाराष्ट्र की घटनाएं

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महाराष्ट्र की राजनीति में इस वक्त भूचाल आया हुआ है।   जिस प्रकार से बीएमसी ने अवैध बताते हुए नोटिस देने के 24 घंटो के भीतर ही एक अभिनेत्री के दफ्तर पर बुलडोजर चलाया और अपने इस कारनामे के लिए कोर्ट में मुंह की भी खाई उससे राज्य सरकार के लिए भी एक असहज स्थिति उत्पन्न हो गई है। इससे बचने के लिए भले ही शिवसेना कहे कि यह बीएमसी का कार्यक्षेत्र है और सरकार का उससे कोई लेना देना नहीं है लेकिन उस दफ्तर को तोड़ने की टाइमिंग इस बयान में फिट नहीं बैठ रही।क्योंकि बीएमसी द्वारा इस कृत्य को ऐसे समय में अंजाम दिया गया है जब कुछ समय से उस अभिनेत्री और शिवसेना के एक नेता के बीच जुबानी जंग चल रही थी। लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पूरी मुंबई अवैध निर्माण अतिक्रमण और जर्जर इमारतों से त्रस्त है। अतिक्रमण की बात करें तो चाहे मुंबई के फुटपाथ हों चाहे पार्क कहाँ अतिक्रमण नहीं है? और जर्जर इमारतों की बात करें तो अभी लगभग दो महीने पहले ही मुंबई में दो जर्जर इमारतों के गिरने से कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और कितने ही घायल हो गए। बरसात के मौसम में मुंबई का डूबना तो अब खबर भी नहीं बनती लोग इसके आदि हो चुके हैं। फिर भी कोरोना काल और मानसून के इस मौसम में एक विशेष बिल्डिंग के निर्माण में कानून के पालन को निश्चित करने में बीएमसी की तत्परता ने पूरे देश को आकर्षित कर दिया।  दरअसल यहाँ बात एक अभिनेत्री की नहीं बल्कि बात इस देश के किसी भी नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की है। बात किसी तथाकथित अवैध निर्माण को गिरा देने की नहीं है बल्कि बात तो सरकार की अपने देशवासियों के प्रति दायित्वों की है।  हमारे यहाँ कहा जाता है, प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां तु हिते हितं।” अर्थात प्रजा के सुख में राजा का सुख है प्रजा के हित में राजा का हित है।  भारत एक ऐसा देश है जो सदियों ग़ुलामी की जंजीरों में जकड़ा रहा और  जिसकी पीढ़ियों ने इस आज़ादी के लिए संघर्ष किया। आज जब  उस आज़ाद देश में  एक ऐसा अपराधी जो मोस्ट वांटेड है उसकी प्रॉपर्टी सीना ताने खड़ी रहती है लेकिन एक टैक्सपेयर की बिल्डिंग तोड़ दी जाती है। जब कोर्ट द्वारा उस अपराधी की 80 साल पुरानी जर्जर एवं अवैध बिल्डिंग को नेस्तनाबूद करने के एक साल पुराने आदेश के बावजूद मानसून का हवाला देकर उसे हाथ तक नहीं लगाया जाता। जब  30 सितंबर तक कोरोना के चलते किसी भी तोड़ फोड़ पर  सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाई जाने के बावजूद एक महिला की बिल्डिंग पर बुलडोजर चला दिया जाता है। जब सरकार विरोधी रिपोर्टिंग करने के कारण कुछ पत्रकारों को जेल में डाल दिया जाता है।जब सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी कुछ सामग्री पोस्ट करने के कारण किसी दल विशेष के कार्यकर्ता एक पुर्व नौसेना अधिकारी पर हिंसक आक्रमण करते हैं। तो एक आम आदमी की नज़र में अभिव्यक्ति की आज़ादी, लोकतांत्रिक मूल्यों, संविधान के प्रति आस्था, न्यायालय के आदेशों का सम्मान जैसे शब्दों की नींव ही हिल जाती है। आज जब उस देश में एक महिला के लिए सत्तारूढ़ दल के एक नेता द्वारा  आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया जाता है तो जिन महिला अधिकारों महिला सशक्तिकरण महिला अस्मिता जैसे शब्दों का प्रयोग तथाकथित लिबरलस द्वारा किया जाता है उन शब्दों का खोखलापन उभर कर सामने आ जाता है।  राजनैतिक दृष्टि से भी महाराष्ट्र सरकार द्वारा उठाए जा रहे यह कदम अपरिपक्वता ही दर्शाते हैं। क्योंकि कंगना को भी पूरी तरह सही नहीं कहा जा सकता। जिस प्रकार की भाषा और जिन तेवरों का प्रयोग वो महाराष्ट्र और वहाँ की सरकार के लिए लगातार कर रही थीं वो निश्चित ही अपमानजनक थे। हो सकता है वो जानबूझकर किसी मकसद से ऐसा कर रही हों। लेकिन सत्ता में रहते हुए गुंडागर्दी करना किसी भी परिस्थिति में जायज नहीं ठहराए जा सकते।महाराष्ट्र सरकार की गलती यही रही कि वो कंगना की चाल में फंस गई और कंगना ने पब्लिक की सहानुभूति हासिल कर ली। जबकि महाराष्ट्र सरकार अगर राजनैतिक दूरदृष्टि और समझ रखती तो कंगना की इस राजनीति का जवाब राजनीति से देती अपशब्दों और हिंसा से नहीं। इस प्रकार की हरकतों से शिवसेना ने अपना कितना नुकसान किया है उसे शायद अंदाज़ा भी नहीं है। कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाना, सुशांत केस में महाराष्ट्र पुलिस की कार्यशैली, और अब कंगना के बयानों पर हिंसक प्रतिक्रिया।  कहते हैं लोकतंत्र में जनभावनाओं को समझना ही जीत की कुंजी होती है लेकिन शिवसेना लगातार अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। 1966 में बनी एक पार्टी जिसकी पहचान आजतक केवल एक क्षेत्रीय दल के रूप में है। वो पार्टी जो अपने ही गढ़ महाराष्ट्र में भी एक अल्पमत की सरकार चला रही है। ऐसी पार्टी जो आजतक महाराष्ट्र से बाहर अपनी जमीन नहीं खड़ी कर पाई। एक ऐसी पार्टी जिसकी लोकसभा में उपस्थित मात्र 3.3% है, अपनी इन हरकतों से कहीं महाराष्ट्र में भी अपनी बची कुची जमीन ना गंवा बैठे। 

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राजनीति

भारतीय प्रतिभाओं के बिना भारत आगे नहीं जा सकता

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किसीभीदेशकीशक्तिहोतेहैंउसकेनागरिकऔरअगरवोयुवाहोंतोकहनेहीक्या।भारतएकऐसाहीयुवादेशहै।हालहीमेंभारतीयजनसंख्याआयोगकेरजिस्ट्रारजनरलकीओरसेतैयारकिएगएसैंपलरेजिस्ट्रेशनसिस्टम 2018 कीरिपोर्टकेअनुसारहमारेदेशमें 25 वर्षसेकमआयुवालीआबादी 46.9% है।इसमें 25 वर्षकीआयुसेकमपुरूषआबादी 47.4%  और महिला आबादी 46.3%। यह आंकड़े किसी भी देश को प्रोत्साहित करने के लिए काफी हैं। भारत जैसे देश के लिए भी यह आंकड़े अनेकों अवसर और आशा की किरणें जगाने वाले हैं लेकिन सिर्फ आंकड़ो से ही उम्मीदें पूरी नहीं होती, उम्मीदों को अवसरों में बदलना पड़ता है।  इसे हम भारत का दुर्भाग्य कहें या फिर गलत नीतियों का असर कि हम एक देश के नाते अपने इन अवसरों का उपयोग नहीं कर पाते और उन्हें उम्मीद बनने से पहले ही बहुत आसानी से इन उम्मीदों को दूसरे देशों के हाथों में फिसलने देते हैं। हमारे प्रतिभावान और योग्य युवा जो इस देश की ताकत हैं जिनमें इस देश की उम्मीदों को अवसरों में बदलने की क्षमता है वो अवसरों की तलाश में विदेश चले जाते हैं। जो युवा इस देश का एक बार फिर से विश्वगुरु बनाने का सपना साकार करने में एक अहम भूमिका निभा सकते हैं वो अपने सपनों को साकार करने के लिए इस देश से पलायन करने के लिए विवश हो जाते हैं। जी हाँ यह कटु सत्य है कि ब्रेन ड्रेनेज का शिकार होने वाले देशों में भारत पहले स्थान पर आता है। यू एस नेशनल साइंस फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2003 से 2013 के बीच यू एस में भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की संख्या में 85% की वृद्धि हुई है। अगर ब्रेन ड्रेनेज के मामले में एशिया के अन्य देशों से तुलना की जाए तो यहाँ भी इसी रिपोर्ट के अनुसार एशिया के सभी देशों को मिलाकर विदेश जाने वाले 2.96 मिलियन वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की संख्या में से भारत 9,50,000 के साथ पहले स्थान पर है। लेकिनअगरआपसोचरहेहैंकियहपिछलेकुछसालोंकीहीसमस्याहैतोऐसानहींहै।इसदेशकेइतिहासमेंऐसेअनेकउदाहरणमिलजातेहैं।श्रीनिवासरामानुजनऐय्यंगरकाउदाहरणहमारेसामनेहैजिनकेपासगणितकीकोईऔपचारिकशिक्षायाडिग्रीनहींहोनेकेबावजूदगणितमेंउनकायोगदानअतुलनीयहै।आजभलेहीउनकेनामपरअनेकोंसम्मानदिएजातेहोंलेकिनयहभीसचहैकिउनकेजीवनकालमेंइसदेशमेंउनकीरिसर्चकोकोईमददतोदूरकीबातहै, स्वीकार्यताभीनहींमिलीथी।हारकेउन्होंनेकैम्ब्रिजयूनिवर्सिटीकेएकब्रिटिशगणितज्ञजीएचहार्डीकोअपनीरिसर्चभेजीतोहार्डीनेनासिर्फउनकेकार्यको “असाधारण” मानाबल्किउनकीप्रतिभाकोपहचानतेहुएउनकेब्रिटेनआनेकाप्रबंधभीकिया।यहघटना 1913 कीहै।आजरामानुजनइसदुनियामेंनहींहैंलेकिनगणितमेंउनकेद्वाराकिएगएकामपरजबलगभगसौसालबाद 2011 – 2012 में रिसर्च की जाती  है तो आज के गणितज्ञ भी उनके काम को गहन, बेहद बारीक और उच्चतम बौद्धिक स्तर का स्वीकार करते हैं। हरगोविंद खुराना,जिन्होंने पोस्ट ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई भारत में ही की थी,आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए थे उसके बाद पी एच डी करके भारत आए, 1949 की बात है, लेकिन उन्हें यहाँ नौकरी नहीं मिली तो वो वापस विदेश चले गए और यू एस के नागरिक बन गए। हम सब जानते हैं कि 1968 में उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया गया था। जिस देश में अपने देश के एक होनहार युवा के  लिए एक नौकरी नहीं थी, आज उसी देश में अमरीकी नागरिक हरगोविंद खुराना के नाम पर उभरती हुई प्रतिभाओं को सम्मान दिए जाते हैं। सी आर राव, हरिश्चंद्र ऐसे नामों की फेहरिस्त अंतहीन है क्योंकि हमने अपनी गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा और 21 वीं सदी में भी इस फेहरिस्त में नाम जुड़ते जा रहे हैं। इसविषयमेंहमचीनसेसीखसकतेहैंजोचीनकलतकब्रेनड्रेनेजकेमामलेमेंभारतकेकरीबखड़ाथाआजउसनेअपनीनीतियोंमेंबदलावकरकेअपनेदेशसेप्रतिभाओंकेपलायनकोकाफीहदतकरोकलियाहै।इसकेलिएउसनेशोधऔरअनुसंधानपरजोरदेनाशुरूकरदियाहैऔरउसकेबजटमेंबेतहाशावृद्धिकीहै।भारतकीअगरहमबातकरेंतोहमारेयहाँबुनियादीशिक्षामेंप्रायोगिककेबजाएसैद्धांतिकशिक्षापरजोरदियाजाताहै।इसकापरिणामहमारेसामनेउससर्वेरिपोर्टकेरूपमेंआताहैजोयहकहतीहैकिदेशके 80% इंजीनियरबनकरनिकलनेवालेयुवानौकरीकरनेकेलायकनहींहैं।केवल 2.5% के पास वो टैलेंट होता है  जो आज की आवश्यकता के अनुरूप है।और जैसा कि होता आया है इस 2.5% में से अधिकांश युवा बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश चले जाते हैं। सुन्दर पिचाई सत्या नडेला इंद्रा नूई कल्पना चावला ऐसे अनेकों नाम हैं। अगरहमवाकईमेंएकदेशकेरूपमेंएकराष्ट्रकेरूपमेंआगेबढ़नाचाहतेहैंतोहमेंअपनेदेशकीप्रतिभाओंकोपहचाननाहोगा।ऐसीप्रतिभाएंजोविज्ञानकेक्षेत्रमेंविश्वकानेतृत्वकरनेकीक्षमतारखतीहों।भारतकेपासप्रतिभाओंकीकमीनहींहै।भारतसदासेहीकल्पनाओंऔरविचारोंकाकेंद्रबिंदुरहाहै।अपनेलक्ष्योंकोसीमितसंसाधनोंऔरकमबजटमेंहासिलकरनेकीभारतीयोंकीक्षमताविश्वमेंबेजोड़है।हमारेस्पेसप्रोग्रामइसकासर्वश्रेष्ठउदाहरणहैं।पिछलेकुछसालोंमेंइसरोनेजिसप्रकारविश्वकाध्यानअपनीओरआकर्षितकियाहैवोइसकासबूतहै।लेकिनयहभीसचहैकिभारतीयप्रतिभाओंकेबिनाभारतआगेनहींजासकता। देर से ही सही लेकिन अब सरकार ने इस दिशा में सोचना शुरू कर दिया है। 2019 के बजट में देश की प्रतिभाओं को देश में ही अनेक अवसर उपलब्ध कराने की घोषणाएं तो हुई हैं लेकिन उन्हें यथार्थ में बदलना सरकार के लिए चुनौती होगी।  अगर हम विश्व में भारत का कद बढ़ाने का सपना साकार करना चाहते हैं तो हमें इस दिशा में प्रयास करने होंगे कि हमारे देश की प्रतिभाओं को अपने सपने सच करने के लिए इसी देश की जमीन मिले उनके हौसलों की उड़ान को इसी देश का आसमान मिले। अपने सपने सच करने के लिए उन्हें विदेशी धरती का सहारा ना लेना पड़े।

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