महिला-जगत लेख नारी सम्मान ही सभ्य, सुसंस्कृत होने की पहचान March 5, 2026 / March 5, 2026 | Leave a Comment 8 मार्चः महिला दिवस पर विशेष विनोद बब्बर यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता अथार्त जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। इसी प्रकार कहा गया- ‘न गृहं गृह मित्याहु गृहिणी गृह मुच्यते’. सच ही है परिवार संस्था की संकल्पना नारी के बिना व्यर्थ है। महल हो या टूटी झोंपड़ी गृहलक्ष्मी के प्रवेश से ही घर […] Read more » महिला दिवस
राजनीति विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक गणतंत्र है भारत January 24, 2026 / January 24, 2026 | Leave a Comment डा. विनोद बब्बर गणतंत्र दिवस ‘गण’ और ‘तंत्र’ के सबंधों की पड़ताल करने का अवसर है। इस बात पर गर्व करने का अवसर भी कि विश्व को गणतंत्र की अवधारणा हमने दी। हजारों वर्ष पहले भी भारतवर्ष में अनेक गणराज्य थे, जहाँ शासन व्यवस्था अत्यंत सुदृढ़ थी और जनता सुखी थी। गण शब्द का अर्थ […] Read more » गणतंत्र
समाज सर्वनाश की ओर ले जाता तूफान December 31, 2025 / December 31, 2025 | Leave a Comment आज के युवाओं को प्रभावित करने वाली चीजों में से मुख्य हैं- इंटरनेट, अश्लील एवं फूहड़ फिल्में, पब संस्कृति, ड्रग्स, फैशन, महंगे मोबाइल, जिनमें एसएमएस एवं एमएमएस करना, महंगी गाड़ियां एवं न सबके लिए मोटी रकम। ये चीजें ऐसी हैं, जो युवाओं में रचनात्मक एवं सृजनात्मक सोच के बजाय, घातक सोच को अंजाम दे रही हैं, Read more » युवा युग
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म कालचक्र के नये पड़ाव के स्वागत की बेला December 27, 2025 / December 27, 2025 | Leave a Comment यह परम्परा प्रागैतिहासिक काल से चली आ रही है। दुनिया भर के तमाम समाजों, जातियों और समुदायों, सम्प्रदायों में अलग-अलग ढंग से, अलग-अलग तिथियों, महीनों में नववर्ष मनाने की परम्परा है। Read more » Time to welcome a new phase of the cycle of time नववर्ष
शख्सियत समाज अटल : राजनीति की कालिख में भी धवल December 23, 2025 / December 23, 2025 | Leave a Comment अटल जी के ओजस्वी भाषण न केवल उनके अपने दल के कार्यकर्ता बल्कि आम जनमानस को बहुत प्रभावित करते थे। अटल जी के भाषण, शालीनता और शब्दों की गरिमा का ऐसा अद्भुत मिश्रण होता था कि विरोधी भी उनके कायल है। सांसद के रूप में अटल जी आरंभ से ही अपने भाषणों की तैयारी बङी गंभीरता के साथ करते थे। Read more » अटल बिहारी वाजपेयी
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म पर्व - त्यौहार लक्ष्मी संग गणेश-सरस्वती पूजन का अर्थ October 19, 2025 / October 19, 2025 | Leave a Comment डा. विनोद बब्बर प्रकाश पर्व है पर न जाने कब से लक्ष्मी, गणेश, सरस्वती की पूजा का प्रचलन है। हम सभी ने हजारों बार उस चित्र को देखा होगा जिसके बीच में लक्ष्मी है तो एक ओर गणेश जी तो दूसरी ओर सरस्वती। क्या कभी यह सोचने का समय मिला कि आखिर प्रकाश पर्व पर […] Read more » Meaning of worshipping Ganesha-Saraswati along with Lakshmi
राजनीति लेख एकात्म मानववाद के प्रणेता पं दीनदयाल उपाध्याय September 24, 2025 / September 24, 2025 | Leave a Comment 25 सितंबर, दीनदयाल जयंती डा. विनोद बब्बर एक संगोष्ठी में एक शोधार्थी ने मुझसे पूछा कि ‘क्या दीनदयाल जी भाजपा के गांधी हैं?’ तो मेरा उत्तर था कि दीनदयाल जी भारतीय जनता के दीनदयाल हैं। उनके मन-मस्तिष्क में केवल और केवल भारत के उत्थान की चिंता थी। वे विकास के नाम पर पश्चिमी विचारधारा के अंधानुसरण के विरोधी थे। भारतीय संस्कृति […] Read more » Pt. Deendayal Upadhyay the pioneer of Integral Humanism pt deendayal पं दीनदयाल उपाध्याय
कला-संस्कृति ऋतु परिवर्तन और नवरात्र की वैज्ञानिकता September 19, 2025 / September 19, 2025 | Leave a Comment डा. विनोद बब्बर नवरात्र ‘शक्ति-जागरण‘ पर्व है। पुराणों में शक्ति उपासना के अनेक प्रसंग हैं। भगवान राम ने रावण को पराजित करने से पूर्व शक्ति की उपासना थी तो श्रीकृष्ण ने योगमाया (देवी कात्यायनि) का आश्रय लेकर ही विभिन्न लीलाएं की। नवरात्र भारतीय गृहस्थ के लिए शक्ति-पूजन, शक्ति-संवर्द्धन और शक्ति-संचय के दिन हैं। नवरात्र में […] Read more » The scientific basis of seasonal changes and Navratri ऋतु परिवर्तन और नवरात्र की वैज्ञानिकता
प्रवक्ता न्यूज़ शिक्षक : दायित्वबोध और सम्मान September 3, 2025 / September 3, 2025 | Leave a Comment शिक्षक दिवस विशेष डा. विनोद बब्बर शिक्षक दिवस है तो वातावरण में ‘गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागू पाय‘ से ‘शिक्षक राष्ट्र निर्माता है’, ‘युग निर्माता है’ का शोर तो होगा ही लेकिन इस शब्दजाल और नारों के प्रवाह में बहने से पहले यह समझना जरूरी है कि क्या शिक्षक गुरु है? क्या हम उसे पर्याप्त सम्मान […] Read more »
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म लोक जागरण का महापर्व है श्री कृष्ण जन्माष्टमी August 12, 2025 / August 12, 2025 | Leave a Comment डा. विनोद बब्बर जागरण अर्थात चेतना जीवंतता की पहली शर्त है। यूं तो सभी जीवों में चेतना होती है लेकिन जागृत चेतना केवल मनुष्य में ही संभव है। जागृत चेतना का अभिप्राय अपने परिवेश की हलचल के प्रति सजग रहते हुए अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के गौरव को सुरक्षित रखने का चिंतन के अतिरिक्त […] Read more » Shri Krishna Janmashtami is a great festival of public awakening श्री कृष्ण जन्माष्टमी
लेख बाल मन में राष्ट्रीय चेतना जागरण August 11, 2025 / August 11, 2025 | Leave a Comment विनोद बब्बर 79वें स्वतंत्रता दिवस पर भारत की एकता, अखण्डता को अक्षुण रखने के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीरों, पूरे विश्व में भारत की प्रतिष्ठा को बुलंदियों तक पहुंचाने के लिए दिन-रात एक करने वाले सभी वैज्ञानिकों, शिक्षकों, सांस्कृतिक राजदूत साहित्यकारों को श्रद्धा से नमन करना कर्मकांड नहीं अपितु हम सब का कर्तव्य है। स्वाभाविक रूप से संपूर्ण राष्ट्र अपने इस कर्तव्य का पालन करेगा। इस अवसर पर देश की भावी पीढ़ी के बाल मन में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने के अभियान को गति देना आवश्यक है। प्रत्येक बालक को अपनी मातृभूमि और श्रेष्ठ सांस्कृतिक मूल्यों के बारे में जानकारी होनी चाहिए। दुनिया भर के मनोवैज्ञानिक एक स्वर में बताते हैं कि श्रेष्ठ संस्कार प्रदान करने का ‘सही समय’ बचपन ही हो सकता है। केवल भारत ही नहीं, दुनिया का हर विवेकशील राष्ट्र अपने भावी कर्णधारों को स्कूली शिक्षा के साथ राष्ट्रभक्ति के गुणों से भी समृद्ध करने का प्रयास करता है। जापान का वह प्रसंग सर्वविदित है जब स्वामी रामतीर्थ वहां के एक विद्यालय में गए। स्वामी जी ने एक विद्याार्थी से पूछा, ‘बच्चे, तुम किस धर्म को मानते हो? छात्र का उत्तर था, ‘बौद्ध धर्म।’ स्वामी जी ने फिर पूछा, ‘बुद्ध के विषय में तुम्हारे क्या विचार हैं?’ विद्यार्थी ने उत्तर दिया, ‘हर रिश्ते नाते में प्रथम बुद्ध हमारे भगवान हैं।’ इतना कह कर उसने अपने देश की प्रथा के अनुसार भगवान बुद्ध को सम्मान के साथ प्रणाम किया। अनेक प्रश्नों के अंत में स्वामी जी ने पूछा, ‘बेटा, अगर किसी दूसरे देश से जापान को जीतने के लिए एक भारी सेना आए और उसके सेनापति बुद्ध हों तो उस समय तुम क्या करोगे?’ इतना सुनते ही छात्र का चेहरा क्रोध से तमतमा उठा। अपनी लाल-लाल आंखों से स्वामी रामतीर्थ को घूरते हुए उसने जोश से कहा, ‘तब मैं अपनी तलवार से बुद्ध का सिर काट दूंगा।’समाज और राष्ट्र के भावी स्वरूप की पृष्ठभूमि तैयार करने में श्रेष्ठ बाल साहित्य और शैक्षिक पाठ्यक्रम की महत्वपूर्ण भूमिका है। सरकार ने शिक्षा नीति में अनेक महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं लेकिन स्कूली पाठ्यक्रम में देश प्रेम और संस्कृतिके प्रति जागृत करने वाली सामग्री का अभाव दिखाई देता है। बदलते परिवेश में समाज- परिवार भी अपने बच्चों को श्रेष्ठ संस्कार और विचार रूपी खाद प्रदान करने के प्रति बहुत सजग नहीं है। इसी कारण परिस्थितियां हमारे बच्चों को मोबाइल, इंटरनेट गेम आदि की ओर धकेल रही हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि परिवारों में साहित्य और संस्कृति से संबंधित साहित्य का पठन-पाठन लगभग बंद हो गया है। ऐसे में हमारे बच्चे भी बाल साहित्य की पत्रिकाओं से दूर गेम डाउनलोड करने अथवा यू-ट्यूब पर वह सब देख-सुन रहे हैं जो इस आयु में उनसे दूर होना चाहिए था। ऐसा नहीं है कि इन परिस्थितियों और उनके विस्फोटक परिणाम की जानकारी न हो। परंतु न जाने क्यों अभिभावक, शिक्षक, समाज, सरकार सब लगभग मौन हैं। कटु सत्य तो यह कि कुछ पत्रिकाओं को छोड़ अधिकांश साहित्यकार भी देश प्रेम और संस्कृति से संबंधित सरस रचनाएं लिखना भूल दिखावटी प्रेम और तथाकथित आधुनिकता के रंग में रंगा भ्रमित है। ऐसे में जापान जैसी भावना हमारे छात्र में भला कैसे संभव है? उसके लिए तो अपने स्कूली पाठ्यक्रम से बाल-साहित्य, लोक-व्यवहार, खेलों, गीतों, फिल्मों, टीवी चैनलों पर प्रसारित किये जा रहे कार्यक्रमों को राष्ट्रीय चेतना से समृद्ध करना होगा। राष्ट्रीय चेतना के विकास में बाधक उपसंस्कृति को हतोत्साहित करना होगा। ज्ञातव्य है कि महात्मा गांधी भी बच्चों में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने के प्रबल पक्षधर थे इसलिए उन्होंने बच्चों के लिए धार्मिक संदेशों व शिक्षा पर आधारित बाल पोथी और नीति धर्म नामक पुस्तकें तैयार की। आश्चर्य है कि हम पश्चिम की तरफ भाग रहे हैं लेकिन पश्चिम भारत के श्रेष्ठ गुणों को धारण करने की दिशा में अग्रसर है। एक विद्यार्थी के रूप में मुझे विश्व के अनेक देशों में जाने का अवसर मिला। लगभग हर देश में मुझे सम्मान से भारतीय (इण्डियन) के रूप में पहचान ‘नमस्ते इण्डिया’ सुनने को मिला। विश्व फैशन नगरी मिलान (इटली) के अनुभव ने गौरवांवित होने का अवसर प्रदान किया। सात समुद्र पार, अपने देश की सीमाओं से हजारों मील दूर एक अनजान व्यक्ति के मुख से भारत का गौरव गान सुनना रोमांचित करने वाला क्षण था। वह हमारे भारत की माटी, हमारे पूर्वज ऋषियों और उनके द्वारा विकसित संस्कृति का अभिषेक था। भारत की गुरुता के प्रमाण रूपी ऐसे एक नहीं, हजारों बल्कि लाखों- करोड़ों उदाहरण यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं। तब हमारे युवा पीढ़ी को इस गौरव गाथा की जानकारी क्यों नहीं होनी चाहिए? एक घटना का उल्लेख करना आवश्यक समझता हूं जिसके स्मरण मात्र से दशकों बाद आज भी मन-मस्तिष्क को असीमित उत्साह और ऊर्जा मिलती है। एक बार सर्वत्र मांसाहारी भोजन के कारण बहुत समस्या हो गई तो किसी ने लगभग 10 किमी दूर इण्डियन रेस्टोरेंट की राह दिखाई जहां भारतीय भोजन उपलब्ध था। हम प्रतिदिन शाम को वहां जाते। अपने प्रवास की समाप्ति पर रेस्टोरेंट के स्वामी के मिलने पर यह जानना आश्चर्य हुआ कि वह भारत नहीं, पाकिस्तान से था। ‘आपने अपने प्रतिष्ठान का नाम इण्डियन की बजाय पाकिस्तानी रेस्टोरेंट क्यों नहीं रखा?’ के जवाब में उसका कहना था, ‘तब यहां कौन आएगा!’ उसके ये चार शब्द मेरे देश, मेरी जन्मभूमि की यशोगाथा है। भारत से हजार युद्ध करने का उद्घोष करने वाले सर्वत्र प्रतिष्ठित भारत ब्रांड से अपनी रोजी-रोटी चल रहे हैं। परंतु यदा-कदा जब जब अपने ही देश में कुछ लोगों के मुख से इस महान धरा को काटने अथवा बांटने की बात सुनता हूं तो मन आक्रोश से भर उठता है। समाजशास्त्रियों की विवेचना के अनुसार ‘आत्मगौरव विहीन इन लोगों को यदि ‘सही समय’ अर्थात बाल्य काल में ही राष्ट्रीय चेतना से परिचित कराया जाता तो वेे भ्रामक प्रचार के शिकार नहीं होते।’ वर्तमान में नई शिक्षा नीति में मातृभाषा और भारतीय भाषाओं को महत्व दिए जाने की बात तो सराहनीय है लेकिन यह भी देखना होगा कि भारी-भरकम बस्ते में क्या ऐसा कुछ है जो सहजता से बच्चों की सांसों में ‘सबसे पहले देश’ का भाव जागृत करें। क्या स्कूली पाठ्यक्रम में देश की बलि बेदी पर अपना सर्वस्व समर्पित कर देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों पर नाखून कटाकर शहीद होने वाले तो हावी नहीं हैं? काले पानी की सेल्यूलर जेल में दो दो उम्र कैद की सजा भुगतने वालों को महत्वहीन और महलों में ‘सजा’ बिताने वालों को देश का एकमात्र उद्धारक बताया जाने की प्रवृत्ति देश की भावी पीढ़ी कोसत्य से बहुत दूर ले जा सकती है। बिना किसी भेदभाव के अमर बलिदानियों के बारे में हर बच्चे को पता होना ही चाहिए। उनके द्वारा सहे अकल्पनीय कष्टों की जानकारी होनी चाहिए। तभी उनके हृदय में देश के लिए कुछ कर गुजरने का भाव जागृत और स्थापित होगा। प्राथमिक स्तर तक प्रत्येक बच्चे को अपने राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय गीत, राष्ट्रीय चिन्ह आदि की जानकारी होनी चाहिए। उनके सम्मान का भाव होना चाहिए। प्रत्येक बालक को स्थानीय भाषा में लोकगीतों तथा कहानियों के माध्यम से अपने महान पूर्वजो की गौरव गाथा से परिचित कराय़ा जाना चाहिए। माध्यमिक स्तर पर उन्हें अनिवार्य रूप से ऐसीे गतिविधियों में शामिल किया जाये जिससे राष्ट्रीय चेतना विकसित हो। विश्वविद्यालय स्तर पर उत्तर के युवाओं के लिए पूर्व या दक्षिण, दक्षिण वालों को उत्तर या पश्चिम, पूर्व वालों को पश्चिम या दक्षिण, पश्चिम वालों कोउत्तर या पूर्व शिविर लगाये जाये जहां वे अपने देश और उसकी माटी की सुगंध को जाने। भारत को जानने के इस अभियान को अनिवार्य बनाया जाए। अध्ययन के साथ गोष्ठियां आयोजित कर छात्रों को प्रतिभागिता के लिए प्रोत्साहित किया जाये। प्रतिभाशाली छात्रों को विदेश बसने की ललक को अपने देश, अपनी माटी के लिए कुछ विशिष्ट करने की ओर मोड़ना है तो कागजी प्रोजेक्टों के स्थान पर कुछ विशिष्ट लेकिन वास्तविक करने की कार्यपद्धति विकसित करनी होगी। ‘यहां सब बेकार है’ का भाव तिरोहित कर ‘यही धरा सबसे न्यारी’ भाव जागरण बिन सकारात्मक बदलाव संभव नहीं। अनियंत्रित सोशल मीडिया पर भी सेंसर जैसा कुछ होना चाहिए ताकि हमारे किशोर और युवा पथभ्रष्ट न हो। पाश्चात् संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण कामुक और देश की गौरवशाली परम्पराओं को कलुषित करने वाली फिल्मों तथा टीवी सीरियलों के प्रसारण की अनुमति नहीं होनी चाहिए। जबकि सामाजिक समरसता, एकता, सौहार्द को बढ़ावा देने वाले गीतों, लघु नाटिकाओं आदि को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। साहित्य अकादमियों को अपने प्रतिष्ठित पुरस्कारों का निर्णय करते समय समकालीन साहित्य में एकता, समता, सौहार्द की प्रतिध्वनि को सुनना चाहिए। यह प्रसन्नता की बात है कि पिछले कुछ समय से समाज में राष्ट्रीयता के महत्व और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति जागरण बढ़ा है। भारत हमारा राष्ट्र है हम सबकी पहचान है। इसका भविष्य हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है इसलिए बाल मन में राष्ट्रीय चेतना के अंकुर रोपित करने के इस महत्वपूर्ण यज्ञ में सरकार, समाज और भारत के प्रत्येक जागरूक नागरिक को अपनी भूमिका सुनिश्चित करनी चाहिए। विनोद बब्बर Read more » Awakening national consciousness in the minds of children बाल मन में राष्ट्रीय चेतना जागरण
कला-संस्कृति वर्त-त्यौहार राष्ट्र रक्षाबंधन अनुष्ठान पर्व August 4, 2025 / August 4, 2025 | Leave a Comment डा. विनोद बब्बर संस्कृति और पर्व एक दूसरे के उसी तरह से पूरक है जैसे नदी और जल। रक्त और मज्जा। शरीर और आत्मा। संस्कृति जीवन दर्शन, कला, साहित्य, अध्यात्म और संस्कारों जैसे असंख्य रंग-बिरंगे पुष्पों का वह गुलदस्ता है जिसकी सुगंध हजारों वर्षों से निरंतर प्रवाहमान है। पर्व समय-समय पर उस सुगंध की छटा […] Read more » Rakshabandhan national festival