सुनील कुमार महला

सुनील कुमार महला

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फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट, साहित्यकार
पटियाला, पंजाब

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लेख

नो डिटेंशन पॉलिसी के खात्मे से शिक्षा में होगा सुधार !

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सुनील कुमार महला हाल ही में केंद्र सरकार (शिक्षा मंत्रालय) ने ‘नो डिटेंशन पॉलिसी’ को खत्म कर दिया है जिसके तहत अब कक्षा 5 और 8 की वार्षिक परीक्षा में असफल छात्रों को फेल किया जाएगा, यह वाकई एक स्वागत योग्य कदम है। वास्तव में, केंद्र सरकार के इस फैसले से बच्चों के अंदर सीखने की इच्छा और ललक बढ़ेगी। नियम में बदलाव का फायदा यह होगा कि अब उन बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा जो किसी कारणवश पढ़ाई में अच्छी परफोर्मेंस नहीं दे पाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो, इस दौरान छात्र की शिक्षा स्थिति को सुधारने के लिए शिक्षकों की ओर से विशेष कोशिश की जाएगी और मार्गदर्शन प्रदान किया जाएगा। शिक्षक न केवल छात्र विशेष के शैक्षणिक प्रदर्शन पर ध्यान देंगे, बल्कि उनके माता-पिता, अभिभावकों को भी समय समय पर उसके बारे मार्गदर्शन व सुझाव आदि देंगे।  इस पॉलिसी के खत्म होने के बाद पांचवीं और आठवीं कक्षा में जो छात्र फेल या असफल हो जाते हैं, उन्हें फेल/असफल ही घोषित किया जाएगा और उन्हें दो महीनों के भीतर एक बार पुनः परीक्षा में शामिल होने का अवसर प्रदान किया जाएगा और यदि वे इसमें भी फेल या असफल होते हैं तो उन्हें अगली कक्षा में प्रोन्नति नहीं दी जाएगी। पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि अभी तक आठवीं कक्षा तक फेल करने का प्रावधान नहीं था। यहां यह उल्लेखनीय है कि इससे पहले, प्रारंभिक शिक्षा के दौरान किसी भी छात्र को कक्षा विशेष में रोकने की परमिशन नहीं थी। हालांकि, अब 5वीं और 8वीं कक्षा में शैक्षणिक प्रदर्शन के आधार पर रोकने की परमिशन दी गई है। बहरहाल, एक और अच्छी बात यह है कि इस पॉलिसी के तहत किसी भी छात्र को स्कूल से निकाला नहीं जाएगा। वर्ष 2010-11 से पहले पांचवीं और आठवीं कक्षा में बोर्ड की परीक्षाओं का प्रावधान किया गया था,जिसे वर्ष 2010-11 से बंद कर दिया गया था। विद्यार्थियों को अगली कक्षा में प्रमोट कर दिया जाता था। इससे स्कूली शिक्षा के स्तर में लगातार गिरावट आ गई थी। इतना ही नहीं, इसका प्रभाव 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं पर भी कमोबेश पड़ा और नतीजे खराब आ रहे थे। यहां तक कि राज्य सरकारें भी पहले से जारी व्यवस्था को लेकर असमंजस की स्थिति में थीं। नई व्यवस्था लागू होने के बाद राज्य चाहें तो परीक्षा करा सकते हैं।  पाठकों को बताता चलूं कि केंद्र सरकार ने कक्षा 5 व 8 के छात्रों को अनुत्तीर्ण न करने की नीति को खत्म करने के संबंध में शिक्षा के अधिकार कानून में बदलाव करके इसे वर्ष 2019 में ही अधिसूचित कर दिया था, लेकिन देश के बहुत से राज्य व केंद्र शासित प्रदेश इसे अपनाये हुए हैं। गौरतलब है कि जुलाई 2018 में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर लोकसभा में शिक्षा का अधिनियम, 2009 के संशोधन पर अपनी बात रखते हुए यह कहा था कि ‘कई सरकारी स्कूल अब मिड डे मील स्कूल बन गए थे क्योंकि इनमें शिक्षा और सीखना ग़ायब है।’गौरतलब है कि उस समय केंद्र में नो डिटेंशन पॉलिसी थी, जिसे अब केंद्र सरकार ने पांचवीं और आठवीं कक्षा के लिए हटा दिया है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि शिक्षा संविधान में आज समवर्ती सूची का विषय है।1976 से पूर्व शिक्षा पूर्ण रूप से राज्यों का उत्तरदायित्व था, लेकिन 1976 में किये गए 42 वें संविधान संशोधन द्वारा जिन पाँच विषयों को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में डाला गया, उनमें शिक्षा भी शामिल थी। गौरतलब है कि समवर्ती सूची में शामिल विषयों पर केंद्र और राज्य मिलकर काम करते हैं। अब केंद्र सरकार ने शिक्षा (पांचवीं/आठवीं कक्षा के बच्चों) के संदर्भ में यह निर्णय लिया है कि कमजोर छात्रों की मॉनीटरिंग हो और इनकी कमजोरी को चिह्नित कर अभिभावकों की मदद से इन छात्रों पर विशेष ध्यान दिया जाए ताकि शिक्षा के स्तर में सुधार किए जा सकें। यह पॉलिसी केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय व सैनिक स्कूलों सहित सरकार द्वारा संचालित तीन हजार से ज्यादा स्कूलों में लागू होगी। कहना ग़लत नहीं होगा कि  शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर लंबे समय से सवाल उठाये जा रहे थे। अब नई पालिसी से शिक्षा में पहले से कहीं अधिक सुधार होगा। यह भी कहना ग़लत नहीं होगा कि शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर कभी समझौता नहीं किया जाना चाहिए, क्यों कि शिक्षा का किसी राष्ट्र का प्रमुख आधार स्तंभ होती है, विकास की असली रीढ़ होती है। आज भी हमारे देश की शिक्षा प्रणाली कमोबेश मैकोले शिक्षा प्रणाली पर आधारित है। अतः आज जरूरत इस बात की है कि शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर हमेशा ठोस कार्य हों। शिक्षा पद्धति को जटिल नहीं अपितु सरल होना चाहिए अथवा उसमें ऐसा समावेश किया जाना चाहिए, जिससे छात्र सरलता से जटिलता की ओर आगे बढ़ें। नीरस और स्तरहीन शिक्षा का कोई औचित्य नहीं होता। आज जरूरत इस बात की है कि शिक्षा में परंपरागत पद्धतियों के स्थान पर आधुनिक पद्धतियों का समावेश किया जाए। आज के परिवेश में छात्र अधिक महत्वपूर्ण है। विद्यालयों में विभिन्न संसाधनों इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ ही शिक्षकों की कमी आदि पर भी आज ध्यान देने की जरूरत है। शिक्षा में पर्यावरण, प्रकृति व खेल को विशेष स्थान दिया जाना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा विद्यार्थी शिक्षा से जुड़ें।  हमें यह बात अपने जेहन में रखनी चाहिए कि आज शिक्षा का अधिकार जितना अहम है, उतना ही उसकी गुणवत्ता में कंट्रोल भी जरूरी और अति आवश्यक है। बिना गुणवत्ता वाली शिक्षा का कोई औचित्य नहीं है। समाज को भी यह समझना होगा कि अनुत्तीर्ण छात्र को अनुत्तीर्ण करना ही उचित व सही है। अनुत्तीर्ण छात्र को उत्तीर्ण करने से शिक्षा में गुणवत्ता कहां से आएगी ? अनुत्तीर्ण छात्र की शिक्षा पर ध्यान दिया जा सकता है, उसे अभ्यास और मेहनत से नये आयामों की ओर ले जाया जा सकता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज शिक्षा प्रणाली में निश्चित ही आमूलचूल परिवर्तन आए हैं, बहुत से सुधार किए गए हैं, लेकिन आज भी शिक्षा में और भी बहुत से सुधार किए जाने की आवश्यकता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि शिक्षा को छात्रों को व्यावहारिक कौशल और ज्ञान से लैस करना चाहिए, ताकि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें और दूसरों पर कम निर्भर हों। सच तो यह है एक व्यापक व अच्छी शिक्षा प्रणाली ही हमारे शरीर,मन और आत्मा को समृद्ध करती है और हमें देश के अच्छे नागरिक बनाती है और इससे व्यक्ति,देश, समाज और राष्ट्र उन्नयन और प्रगति की ओर अग्रसर होते हैं। सुनील कुमार महला

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राजनीति

तस्करी के लिए हाइटेक ड्रोन्स और तकनीक का इस्तेमाल कर रहा पाकिस्तान

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सुनील कुमार महला सभी जानते हैं कि पाकिस्तान दुनिया में आतंकवाद का गढ़ है। पाकिस्तान न केवल आज दुनिया में आतंकवाद फैला रहा है बल्कि वह स्वयं भी इससे बहुत त्रस्त है। हाल ही में उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में एक सुरक्षा चौकी पर बड़ा आतंकवादी हमला हुआ, मीडिया के हवाले से खबरें आईं हैं कि आतंकवादियों की ओर से किए गए इस भीषण हमले में 16 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए हैं। मीडिया से यह भी सूचना मिली है कि पिछले कुछ महीनों में सुरक्षा बलों पर हुआ सबसे बड़ा आतंकवादी हमला है।न केवल आतंकवाद बल्कि पाकिस्तान अपने यहां से नशा व हथियारों की तस्करी का भी आज एक बड़ा गढ़ ही है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज पाकिस्तान ड्रग्स व हथियारों की स्मगलिंग के लिए ऐसे हाईटेक ड्रोनों का इस्तेमाल कर रहा है, जो आसानी से पकड़ में नहीं आते।  गौरतलब है कि जहां नशीली दवाओं की तस्करी अक्सर अपराध के अन्य रूपों जैसे-आतंकवाद, मनी लॉन्ड्रिंग अथवा भ्रष्टाचार से जुड़ी होती है, वहीं दूसरी ओर हथियारों की तस्करी आतंकवाद व आतंकी घटनाओं को जन्म देती है।कहना ग़लत नहीं होगा कि आज नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी से राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर खतरा है। नशा व हथियार तस्करी ही नहीं धार्मिक शिक्षा के नाम पर भी पाकिस्तान आज एक खतरनाक खेल, खेल रहा है। पाठकों को बताता चलूं कि हाल ही में पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद और खुफिया एजेंसी आइएसआइ के गठजोड़ का भी एक फ्रांसीसी पत्रिका ‘ले स्पेक्टेकल डू मोंड’ द्वारा यह खुलासा किया गया है कि पाकिस्तान जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों को सेना की तरह प्रशिक्षित कर रहा है और धार्मिक शिक्षा के नाम पर साज़िश रच रहा है। यह बहुत ही खतरनाक है कि आज जैश धार्मिक शिक्षा की आड़ में आतंकी तैयार कर रहा है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज पाकिस्तान धार्मिक शिक्षा की आड़ में आतंकी ही तैयार नहीं कर रहा है अपितु वह भारत में हथियार और मादक पदार्थों की तस्करी के नये-नये तरीके खोज रहा है और उन्हें इस्तेमाल में ला रहा है। सच तो यह है कि पाकिस्तान स्थित विभिन्न आतंकवादी समूह आज डिजिटल यानी कि विभिन्न आनलाइन गतिविधियों के जरिए भारत विरोधी भावनाओं को बढ़ावा देने में लिप्त है। हालांकि, भारतीय सुरक्षा एजेंसियां, हमारे देश की साइबर टीम और हमारे तमाम सुरक्षा बिल इसको लेकर पहले से ही बहुत सतर्क और मुस्तैद हैं। बावजूद इसके भारत को पाकिस्तान द्वारा की जा रही डिजिटल घुसपैठ को रोकने के लिए और बड़े कदम उठाने की जरूरत इसलिए है क्योंकि आज का जमाना सूचना क्रांति का है।हम सभी जानते हैं कि आज आनलाइन माध्यमों से पलों में भारत विरोधी कंटेंट को इधर से उधर पहुंचाया जा सकता है। आज तस्कर और आतंकी लगातार तकनीक और मोबाइल क्रांति का सहारा ले रहे हैं। सच तो यह है कि मोबाइल और तकनीक के इस्तेमाल ने आतंकियों/तस्करों/ माफियाओं के लिए तस्करी के तरीके, रास्ते सटीक और आसान बना दिए हैं। आलम यह है कि अब सरहद के पास कोई स्थान विशेष को निर्दिष्ट करके हथियार और हेरोइन, अफीम, गांजा ,चरस, नशीली दवाएं आदि मादक पदार्थ तथा हथियार तक गिराए जाते हैं। गौरतलब है कि पाकिस्तान, भारत समेत विश्व के अनेक देशों में हथियारों और नशीले पदार्थों की खपत करता है। आंकड़े बताते हैं कि पाकिस्तान में सालाना 44 टन तक संसाधित हेरोइन की खपत होती है। पड़ोसी अफ़गानिस्तान से 110 टन हेरोइन और मॉर्फिन की तस्करी पाकिस्तान के ज़रिए अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में की जाती है। इसके अलावा, माना जाता है कि पाकिस्तान का अवैध ड्रग व्यापार सालाना 2 बिलियन डॉलर तक कमाता है। आज पाकिस्तान ड्रोन से अवैध रूप से ड्रग्स कारोबार में लिप्त है।आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2024 के दस महीनों में ही पाकिस्तान से पंजाब सीमा पर भेजे गए 177 ड्रोन बरामद किए गए हैं। यह बरामदगी 2023 में पकड़े गए ड्रोन की संख्या से 107 अधिक है। गत वर्ष 60 ड्रोन बरामद हुए थे। वर्ष 2022 में जून के महीने में यह सामने आया था कि पाक के तस्कर पंजाब सीमा से सटे खेतों व बॉर्डर फेंसिंग के पास नशे से भरी ईंटें फेंक रहे हैं। उस वक्त यह भी सामने आया था कि पानी की मोटरों में इस्तेमाल होने वाले होलो पंप में भी नशा भरकर सीमा पार से भेजा जा रहा है और कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलों का भी इस्तेमाल नशा तस्करी में किया जा रहा है। पिछले कुछ समय पहले यह भी सामने आया था कि अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट भारत में नशे की खेप लाने के लिए अलग-अलग रास्तों का फायदा उठा रहे हैं। मसलन, गुजरात का मुंद्रा पोर्ट, पंजाब बॉर्डर, नेपाल और म्यामांर के रास्ते भारत में ड्रग्स लाई जा रही है। वाकई यह बहुत ही संवेदनशील है कि आज भारतीय तस्कर पाकिस्तानी तस्करों को लोकेशन भेज ड्रोन के माध्यम हेरोइन,गांजा, चरस और असलहा आदि की खेप मंगवा रहे हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि पाक तस्करों का समर्थन पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ भी करती है। आइएसआइ इन्हीं तस्करों की मदद से भारत में विस्फोटक सामग्री, हथियार व नशीले पदार्थों तक को भिजवाती है। सच तो यह है कि पाकिस्तान भारत में शांति व सौहार्द को भंग करने के उद्देश्य से चोरी-छुपे हथियारों की सप्लाई के साथ नशा तस्करी को भी अंजाम दे रहा है और यही कारण है कि भारत में तस्करी आज एक बड़ी समस्या के रूप में उभरकर सामने आ रही है, जो सिर्फ कानून व्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि देश की आर्थिक स्थिति, हमारे समाज और पर्यावरण, स्वास्थ्य पर भी कहीं न कहीं बुरा असर डाल रही है। कहना ग़लत नहीं होगा कि तस्करी का प्रभाव केवल कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहता। यह पूरे देश की सुरक्षा, स्वास्थ्य, समाज और पर्यावरण तक को प्रभावित करता है। पाकिस्तान अपनी धरती से भारत विरोधी गतिविधियों का संचालन करता रहा है और आज भी वह लगातार ऐसी गतिविधियों में संलिप्त है। तस्करी की बात करें तो हाल ही में पंजाब के अमृतसर (ग्रामीण) में पुलिस ने 4 किलो हेरोइन के साथ तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। बताया जा रहा है कि इस हेरोइन को पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए तस्करी करके लाया गया था। हेरोइन ही नहीं पुलिस ने एक 9 एमएम पिस्तौल भी बरामद की है। आज भी नेपाल और पंजाब के रास्ते पाकिस्तान से हेरोइन और अफीम जैसे नशीले पदार्थों की तस्करी की जाती है और इस आशय की खबरें मीडिया के माध्यम से आतीं रहतीं हैं। दो साल पहले एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक के हवाले से यह खबरें आईं थीं कि पाकिस्तान, अपने हितैषी चीन में बने नये ड्रोन के स्थान पर अब पाकिस्तान में ही बनाए गए पुराने ड्रोन तस्करी के लिए इस्तेमाल कर रहा है।सूत्रों के मुताबिक भारतीय सुरक्षा बलों की पाकिस्तानी तस्करों पर लगातार कार्रवाई और महंगे चीनी ड्रोन से होने वाले आर्थिक नुकसान को कम करने के लिए पाकिस्तान द्वारा ऐसा किया जा रहा है। गौरतलब है कि पाकिस्तान से भारतीय सीमा में आने वाले ज्यादातर ड्रोन चीन में ही बने होते हैं, जिनमें हेक्साकॉप्टर और क्वाडकॉप्टर ड्रोन भी शामिल हैं। बहरहाल, कहना ग़लत नहीं होगा कि पाकिस्तान आज ज्यादातर अपने देश में बने ड्रोन से ही हथियार और नशा भारत में सप्लाई कर रहा है। आज हमारे देश की सीमा सुरक्षा एजेंसियाँ, सीमा सुरक्षा बल और सीमा शुल्क अधिकारी, पाकिस्तानी तस्करों के खिलाफ़ सख्त कार्रवाई करते हैं, अनेक ड्रोनों को उन्होंने मार गिराये हैं और तस्करों को पकड़ा भी हैं,जिसके परिणामस्वरूप अवैध व्यापार अस्थायी रूप से रुका भी  है। हालाँकि, यह बात अलग है कि तस्करी में शामिल लोग अपने अवैध व्यापार(नशीले पदार्थों, हथियारों की सप्लाई) को जारी रखने के लिए वैकल्पिक मार्गों के साथ ही तस्करी के अन्य विकल्पों की तलाश करते हैं। आज पाकिस्तान आतंकियों, तस्करों की सहायता से देश के अंदरूनी इलाकों में अव्यवस्थाओं को फैलाने की कोशिश करता है और इसके लिए वह सूचना क्रांति के इस दौर में नये-नये हथकंडे अपना रहा है। यह बहुत ही गंभीर और संवेदनशील है कि आज पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकियों और नशा माफिया/तस्करों ने अपनी गतिविधियों के पुराने तरीकों को छोड़कर नये तरीके अपना लिए हैं। आज पाकिस्तान से पाकिस्तानी सिम कार्ड की रेंज बढ़ा दी गई है। पाकिस्तानी आतंकी और तस्कर आज वाट्सएप व पाकिस्तानी सिमकार्ड से भारतीय तस्करों से संपर्क साधते हैं, क्योंकि अब रेंज बढ़ाये जाने से पाक मोबाइल कंपनियों का सिग्नल सीमावर्ती भारतीय गांवों तक पहुंचने लगा है। अब सीमा पर पूरे षड्यंत्र के साथ तस्करी (हेरोइन, गांजा,चरस, नशीली दवाओं और असलहा की खेप)और आतंकी गतिविधियां हो रही हैं। अक्सर तस्कर आपस में कोड वर्ड देकर एक दूसरे से मादक पदार्थ व हथियार मंगवाते हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि तस्करी के काम में ज्यादातर बेरोजगार युवा जुड़े हुए हैं। यहां तक कि इस कारोबार में आजकल युवतियां भी शामिल हो गई हैं। अमूमन होता यह है कि लड़कियों/महिलाओं पर पुलिस, सेना, सुरक्षा बल शक नहीं करते हैं और वे इनकी गिरफ्त में आने से अक्सर बच जाते हैं। आज भारतीय सरहद में ऐसे बहुत से गांव हैं, जिनमें खेत आधे भारतीय सरहद में और आधे पाकिस्तानी सरहद में है, तस्कर विभिन्न कृषि गतिविधियों के ज़रिए इसका फायदा उठाते हैं। यह संवेदनशील और गंभीर है कि आज नशा तस्करी के लिए अब ऑनलाइन प्लेटफार्म का भी इस्तेमाल हो रहा है।बहरहाल, भारत ड्रोन व सूचना क्षेत्र में क्रांति के मार्ग पर अग्रसर हो गया है। भारत में आज सुरक्षा व्यवस्था भी बहुत पुख्ता और सख्त है।बावजूद इसके पाकिस्तान की ओर से नशे व हथियारों की तस्करी का धंधा थमने का नाम नहीं ले रहा। अतः इसका मुकाबला करने के लिए हमें नई रणनीतियों को बनाने की जरूरत है। सुनील कुमार महला

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खान-पान लेख समाज

कुपोषण आज भी एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है

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सुनील कुमार महला आधुनिक युग में हमारी जीवनशैली में आमूलचूल परिवर्तन आए हैं और आज हमारी खान-पान की आदतों में बहुत बदलाव हो चुके हैं। खान-पान भी समय पर नहीं किया जा रहा है, आधुनिक शहरी, भागम-भाग भरी जीवनशैली के साथ देर रात को खाना आज जैसे फैशन हो चुका है। दिन में भी न ब्रेकफास्ट का कोई समय है और न ही लंच का। आजकल तो ब्रेकफास्ट और लंच दोनों के स्थान पर ब्रंच का कंसेप्ट भी भारतीय संस्कृति में जन्म ले चुका है। आज मनुष्य अपने शरीर की आवश्यकता से अधिक कैलोरी का सेवन करता है और उस अनुरूप शारीरिक व्यायाम,कसरत, मेहनत आज आदमी नहीं करता। कहना ग़लत नहीं होगा कि अत्यधिक प्रसंस्कृत(डिब्बा बंद) भोजन, उच्च चीनी वाले खाद्य पदार्थ और पेय, तथा उच्च मात्रा में संतृप्त वसा वाले खाद्य पदार्थ आज मनुष्य में अधिक वजन का कारण बन रहें हैं। आनुवंशिकी मोटापे का एक मजबूत घटक है. चीनी-मीठे, उच्च वसा वाले इंजीनियर्ड जंक फूड्स, फास्ट फूड, हमारी भोजन की असमय करने की आदतें, वेस्टर्न कल्चर(पाश्चात्य संस्कृति) के बहुत से आहार, तथा बहुत बार विभिन्न पर्यावरणीय कारक भी मोटापा लाते हैं। वास्तव में मोटापा (ओबैसिटी) वो स्थिति होती है. जब अत्यधिक शारीरिक वसा शरीर पर इस सीमा तक एकत्रित हो जाती है कि वो स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालने लगती है। यहां तक कि यह आयु संभावना को भी घटा सकता है, मनुष्य की बीएमआई(शरीर द्रव्यमान सूचक) को प्रभावित कर सकता है। सच तो यह है कि मोटापा बहुत से रोगों से जुड़ा हुआ है, जैसे हृदय रोग(हार्टअटैक) , मधुमेह(डायबिटीज), निद्रा कालीन श्वास समस्या, कई प्रकार के कैंसर आदि आदि। सच तो यह है कि आज मोटापा दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। यह बहुत ही चिंतनीय है कि आज दुनिया में हर आठवां व्यक्ति मोटापे का शिकार है। क्या यह बहुत चिंताजनक नहीं है कि तीन दशकों में मोटापे (ओबैसिटी) की समस्या में चार गुना से भी अधिक इजाफा हुआ है। आज बड़े बुजुर्गों से लेकर महिलाओं, बच्चों को शामिल करते हुए सभी उम्र के लोगों में मोटापे की समस्या बढ़ रही है। आज शहरों में वज़न कंट्रोल करने के लिए अनेक जिम खुले हैं लेकिन हमारी जीवनशैली ऐसी हो चुकी है कि मोटापा कम होने का नाम तक नहीं ले रहा है। हम अपनी संस्कृति को छोड़कर वेस्टर्न कल्चर को आज अपना रहे हैं और आज हमारी भोजन पद्धति में जो बदलाव आए हैं, वे मोटापे के प्रमुख कारण हैं। आज क्रोनिक बीमारियों का कारण कुछ और नहीं बल्कि शरीर का मोटापा ही तो है। मोटापे के संदर्भ में द लैंसेट जर्नल का अध्ययन चौंकाने वाला है। जानकारी देना चाहूंगा कि द लैंसेट जर्नल में प्रकाशित विश्लेषण के अनुसार, दुनिया भर में मोटापे से ग्रस्त बच्चों, किशोरों और वयस्कों की कुल संख्या एक बिलियन (एक अरब) से अधिक हो गई है। शोधकर्ताओं ने यह बात कही है कि, साल 1990 के बाद से कम वजन वाले लोगों की घटती व्यापकता के साथ अधिकांश देशों में मोटापा के शिकार लोगों की संख्या काफी बढ़ी है‌। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अन्य सहयोगियों के साथ इस वैश्विक डेटा के विश्लेषण में अनुमान लगाया है कि दुनिया भर के बच्चों-किशोरों में साल 1990 की तुलना में 2023 में, यानी तीन दशकों में मोटापे की दर चार गुना बढ़ गई है। सबसे बड़ी बात तो यह है यह चलन लगभग सभी देशों में देखा गया है। वयस्क आबादी में, महिलाओं में मोटापे की दर दोगुनी और पुरुषों में लगभग तीन गुना से अधिक हो गई। अध्ययन के अनुसार साल 2022 में 159 मिलियन (15.9 करोड़) बच्चे-किशोर और 879 मिलियन (87.9 करोड़) वयस्क मोटापे के शिकार पाए गए हैं। अध्ययन में यह पाया गया कि पिछले तीन दशकों में वयस्कों में मोटापा दोगुना से अधिक हो गया है। वहीं 5 से 19 साल के बच्चों और किशोरों में यह समस्या चार गुना बढ़ गई है। इतना ही नहीं, अध्ययन में यह भी सामने आया कि 2022-23 में 43 फीसद वयस्क अधिक वजन वाले थे। इस अध्ययन के अनुसार 1990 से 2022 तक विश्व में सामान्य से कम वजन वाले बच्चों और किशोरों की संख्या में कमी आई है। इतना ही नहीं, यह स्टडी बताती है कि दुनिया भर में समान अवधि में सामान्य से कम वजन से जूझ रहे वयस्कों का अनुपात आधे से भी कम हो गया है। बहरहाल, कहना ग़लत नहीं होगा कि यह अध्ययन कुपोषण के विभिन्न रूपों संबंधी वैश्विक रूझानों की विस्तृत तस्वीर प्रस्तुत करता है। यहां यह भी कहना ग़लत नहीं होगा कि आज दुनिया के ग़रीब इलाकों, हिस्सों में करोड़ों लोग आज भी कुपोषण से पीड़ित हैं। बहरहाल, पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि ‌रिसर्चर ने इस अध्ययन के लिए 190 से अधिक देशों का प्रतिनिधित्व करने वाले पांच वर्ष या उससे अधिक उम्र के 22 करोड़ से अधिक लोगों के वजन और लंबाई(बीएमआई) का विश्लेषण किया, जिसमें सामने आया है कि सामान्य से कम वजन वाली लड़कियों का अनुपात वर्ष 1990 में 10.3 फीसद से गिरकर 2023 में 8.2 फीसद हो गया और लड़कों का अनुपात 16.7 फीसद से गिरकर 10.8 फीसद हो गया है।अध्ययन में यह भी पाया गया कि कुपोषण की दर भी कई जगहों पर विशेषकर दक्षिण- पूर्व एशिया और उप-सहारा अफ्रीका में एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है।

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लेख समाज साक्षात्‍कार सार्थक पहल

रोज़गार के कम अवसरों से भी एकल परिवारों को मिल रही है गति !

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सुनील कुमार महला किसी भी व्यक्ति के विकास के लिए परिवार व समाज की भूमिका महत्वपूर्ण है। व्यक्ति समाज में रहता है और आज भारत में दो प्रकार के परिवार हैं -संयुक्त परिवार और एकल परिवार। आंकड़ों की बात करें तो 2021 के डेटा के अनुसार भारत में 30.24 करोड़ परिवार निवास करते हैं। इसके अनुसार भारत में 58.2 फीसदी एकल परिवार हैं तथा 41.8 फीसदी परिवार संयुक्त परिवार हैं। मतलब यह है इस डेटा के अनुसार भारत में संयुक्त परिवारों की संख्या एकल परिवारों की तुलना में कहीं कम है।आज भारतीय समाज में आज एकल परिवार(न्यूक्लियर फैमिली) का कंसेप्ट लगातार बढ़ता चला जा रहा है और संयुक्त परिवारों(जॉइंट फैमिलीज)की संख्या में कमी देखने को मिल रही है। कारण बहुत से हैं।आज पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति, बढ़ते शहरीकरण, बढ़ती जनसंख्या के गहरे प्रभाव के कारण आज भारतीय समाज का परिवेश, वातावरण लगातार बदल रहा है। सबसे पहला कारण तो बढ़ती जनसंख्या ही है क्योंकि जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती है, वैसे-वैसे ही रोजगार के अवसरों में कमी होती चली जाती है और एकल परिवार का कंसेप्ट जन्म लेने लगता है। जब जनसंख्या में वृद्धि होती है तो लोगों को काम के संदर्भ में अपने घर से दूर दूसरे स्थानों , दूसरे राज्यों में यहां तक कि दूसरे देशों में जाकर काम करने के लिए विवश होना पड़ता है और इसका असर यह होता है कि समाज में एकल परिवार बढ़ने लगते हैं। भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है, आज भी यह देश कृषि प्रधान ही है। पहले के जमाने में मतलब कि आज से तीस-पैंतीस या चालीस बरस पहले लोगों की जीविका का मुख्य साधन कृषि और पशुपालन हुआ करता था। मतलब यह है कि पहले के जमाने में कृषि और पशुपालन पर निर्भरता ज्यादा थी, इसलिए लोग संयुक्त परिवार में रहना पसंद करते थे। आज कृषि और पशुपालन के अतिरिक्त लोगों की आजीविका के अनेक साधन उपलब्ध हैं, इसलिए लोग आज गांवों से शहरों की ओर पलायन करने लगे हैं और एकल परिवार का कंसेप्ट समाज में बढ़ने लगा है। पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति के प्रभाव के कारण आज बुजुर्गों का परिवार में वह सम्मान नहीं रहा है जो बरसों पहले हुआ करता था। पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति के प्रभाव के कारण आज हमारे समाज में नैतिक मूल्यों, संस्कारों, संस्कृति में निरंतर गिरावट आई है। बुजुर्गों की टोका-टाकी आज के युवा सहन नहीं कर पाते। आज की युवा पीढ़ी में सहनशक्ति का अभाव हो गया है और सहनशक्ति के अभाव के कारण भी कहीं न कहीं संयुक्त परिवार आज टूटकर एकल परिवार का रूप धारण कर रहे हैं।  आज की युवा पीढ़ी पर स्वार्थ, लालच, अहम् की भावना,अहंकार, क्रोध हावी हो रहा है जो संयुक्त परिवारों को लगातार तोड़ रहा है। कहना ग़लत नहीं होगा कि संयुक्त परिवार को जोड़ कर रखने के लिए सेवा, त्याग, धैर्य, अनुशासन, सहनशीलता, प्यार, सम्मान, समझदारी, न्यायपूर्ण व्यवहार आदि की आवश्यकता होती है। समर्पण और त्याग की भावना बहुत ही जरूरी है। बिना समर्पण और त्याग की भावना के परिवार को जोड़ कर नहीं रखा जा सकता है। आपसी विश्वास, सहनशक्ति भी परिवार को जोड़ कर रखने के लिए एक आवश्यक शर्त है। बड़े बुजुर्ग यदि किसी बात पर दो बातें युवा पीढ़ी को कह भी दें तो युवा पीढ़ी को यह चाहिए कि वह अपने बुजुर्गों की बात को मान लें. बुजुर्गों का कहना मान लेने से युवा पीढ़ी का कुछ बिगड़ नहीं जाएगा क्योंकि कोई भी बुजुर्ग/परिवार का मुखिया कभी भी अपने बच्चों के बारे में, अपने परिवार के बारे में कभी भी बुरा नहीं सोच सकता है। युवा पीढ़ी को यह बात याद रखनी चाहिए कि बच्चे चाहे जितने बड़े हो जाएं, बड़ों के सामने वे हमेशा बच्चे ही होते हैं। संयुक्त परिवार के अपने फायदे हैं। मसलन, एक संयुक्त परिवार में बच्चों को सर्वाधिक सुरक्षित और उचित शारीरिक एवं चारित्रिक विकास के अवसर प्राप्त होते हैं। परिवार के मुखिया या सदस्यों द्वारा बच्चों की इच्छाओं और आवश्यकताओं का अधिक ध्यान रखा जा सकता है। उसे परिवार के अन्य बच्चों के साथ खेलने, घुलने-मिलने के अवसर प्राप्त होते हैं। संयुक्त परिवार में माता-पिता के साथ-साथ ही अन्य परिवारजनों (परिजनों) विशेष तौर पर दादा-दादी, चाचा-चाची का प्यार भी मिलता है। आज की युवा पीढ़ी को यह लगता है कि लगता है कि जॉइंट फैमिली में उन्हें कई तरह की रोक-टोक का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी आजादी छिन जाती है। लेकिन यह विडंबना ही है कि हमारी युवा पीढ़ी यह भूल जाती है कि जॉइंट फैमिली में रहना अकेले रहने से कहीं ज्यादा सिक्योर होता है। एक व्यक्ति संयुक्त परिवार में जितना खुश रह सकता है, उतना शायद एकल परिवार में नहीं। एकल परिवार में व्यक्ति को अक्सर तनाव और अवसाद का सामना करना पड़ता है क्योंकि किसी परेशानी और मुसीबत के समय उनके पास सहायता करने वाला, उनका दुःख, परेशानी, तकलीफ़ सुनने वाला, दुःख को बांटने वाला कोई नहीं होता है। संयुक्त परिवार में रहने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसी भी परेशानी या मुसीबत, दुःख और तकलीफ़ का सामना हमें अकेले नहीं करना पड़ता है। हमारे साथ हर कठिन व नाजुक परिस्थितियों में हमारे घर -परिवार के लोग हमेशा हमारी सपोर्ट के लिए हमारे साथ होते हैं। घर में अनेक लोग हमारे मार्गदर्शक होते हैं, जो हमें कठिनाइयों से आसानी से बाहर निकाल ले जाते हैं। संयुक्त परिवार में हमें फाइनेंशियल सपोर्ट भी अच्छी मिलती है क्योंकि वहां कमाने वाले अधिक होते हैं। संयुक्त परिवार में बच्चों को दादा-दादी, चाचा-चाची और अन्य सदस्यों के कारण अच्छी परवरिश मिलती है और बच्चे एकल परिवार की तुलना में कहीं अधिक संस्कारी बनते हैं, कारण यह है कि संयुक्त परिवार में बच्चों को सही-गलत,अच्छे-बुरे, नैतिक-अनैतिक, सकारात्मक-नकारात्मक की पहचान कराने के लिए कोई न कोई सदस्य अवश्य ही मौजूद होते हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि संयुक्त परिवार अंतर-पीढ़ीगत अंतःक्रियाओं के माध्यम से सांस्कृतिक परंपराओं और मूल्यों को संरक्षित करने के लिए उत्कृष्ट हैं। उत्कृष्ट इसलिए क्यों कि बुजुर्ग लोग  हमारे देश के विभिन्न सांस्कृतिक रीति-रिवाजों, प्रेरक नैतिक कहानियों और मूल्यों और संस्कृति -संस्कारों को युवा पीढ़ी तक पहुंचाते हैं। ज्ञान का यह हस्तांतरण सांस्कृतिक विरासत की निरंतरता सुनिश्चित करता है।  संयुक्त परिवार में बच्चों को अकेलापन महसूस नहीं होता है और परिवार का कोई भी सदस्य बेखौफ कहीं भी इधर उधर जा सकता है। संयुक्त परिवार में भावनात्मक समर्थन और साहचर्य बच्चों को मिलता है जो एकल परिवार में उस रूप में नहीं मिल पाता है। संयुक्त परिवार में जिम्मेदारियां (घरेलू काम-काज, बच्चों की देखभाल और वित्तीय-प्रबंधन) साझा होने के कारण परिवार के समक्ष जल्दी से कोई परेशानियां नहीं आ पातीं हैं। संयुक्त परिवार से बच्चों में सामाजिकता का भरपूर विकास होता है और संबंध घनिष्ठ और मजबूत बनते हैं।संयुक्त परिवारों में अक्सर बच्चों की देखभाल और शिक्षा के लिए एक अंतर्निहित व्यवस्था होती है, जिसमें दादा-दादी और परिवार के अन्य सदस्य बच्चे के पालन-पोषण में योगदान देते हैं। संयुक्त परिवार का एक फायदा यह भी है कि इसमें विभिन्न संसाधनों को आपस में साझा किया जा सकता है। सोशल नेटवर्क का भी निर्माण होता है। हालांकि कुछ लोग संयुक्त परिवार के नुकसान भी मानते हैं जैसे कि ऐसे परिवार अनेक बार भावनात्मक और वित्तीय सहायता के लिए परिवार के अन्य सदस्यों पर निर्भरता की भावना को बढ़ावा देते हैं। संयुक्त परिवार से जनरेशन गैप को बढ़ावा मिलता है क्योंकि युवा सदस्यों के विचार बुजुर्गों के विचारों(पारंपरिक मान्यताओं और मूल्यों) से मेल नहीं खाते हैं। संयुक्त परिवार में निर्णय लेने की स्वतंत्रता सीमित होती है क्योंकि परिवार का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति ही ऐसे परिवारों में निर्णय लेता है। पारिवारिक सदस्यों की अधिक निकटता के कारण पारिवारिक सदस्यों में अनेक बार संघर्ष और मतभेद की स्थितियां पैदा हो सकतीं हैं। संयुक्त परिवार में गोपनीयता का भी अभाव होता है और इससे तनाव पैदा हो सकता है।कभी-कभी, परिवार के कुछ सदस्यों को पक्षपात या असमान व्यवहार का सामना करना पड़ता है जिसके परिणामस्वरूप असंतोष और विभाजन पैदा होता है। संचार संबंधी चुनौतियां भी संयुक्त परिवार में देखने को मिल सकतीं हैं। सुनील कुमार महला

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