मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

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लेखक - मनमोहन आर्य - के पोस्ट :

धर्म-अध्यात्म

वेदालोचन (वेदों के अध्ययन) से रहित संस्कृत शिक्षा पूर्ण लाभ न देने वाली व हानिकारक

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संस्कृत भाषा का अध्ययन, उसके द्वारा वेदालोचन और वेद विहित योगाभ्यास को करके ही बालक मूलशंकर ऋषि दयानन्द बने। आज भी ऋषि दयानन्द का यशोगान चहुं दिशाओं में हो रहा है। यदि वह ऐसा न करते तो अपने टंकारा गांव के अन्य लोगों की भांति आज उन्हें कोई जानता भी नहीं। अतः अपना परम कर्तव्य मानकर संस्कृत भाषा का अध्ययन करते हुए वेदों का स्वाध्याय वा वेदालोचन मनुष्य का आवश्यक कर्तव्य है। महर्षि दयानन्द के बाद उनके संस्कृताध्ययन व वेदालोचन के उद्देश्य से ही उनके अनुयायी स्वामी श्रद्धानन्द ने गुरुकुल कागड़ी खोला था। उनसे भी पूर्व पं. गुरुदत्त विद्यार्थी जी ने लाहौर में अष्टाध्यायी का अध्ययम कराने के लिए पाठशाला खोली थी जहां अधिक आयु के लोग पढ़ते थे।

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शख्सियत समाज

सभी देशवासियों के सम्मानीय महात्मा ज्योतिबा फूले

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समाज सुधार के क्षेत्र में भी आपका महत्वपूर्ण योगदान है। आपने विधवा विवाह की वकालत की थी और धार्मिक अन्धविश्वासों का विरोध किया था। महात्मा ज्योतिबा फूले ने 24 सितम्बर, 1872 को ‘सत्य शोधक समाज’ की स्थापना की थी। हमें यह नाम बहुत प्रभावित करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि महात्मा फूले इसके द्वारा समाज का शोधन कर देश को सत्य मान्यताओं और सिद्धान्तों पर आरूढ़ करना चाहते थे। इस समाज को स्थापित करने का महात्मा जी का मूल उद्देश्य दलितों पर अत्याचारों का उन्मूलन करना था। आपने विधवाओं व महिलाओं का शोषण दूर कर समानता का अधिकार उन्हें दिलाया। आपने किसानों व श्रमिकों की हालात सुधारने के अनेक प्रयास किये। आप अपने समस्त कार्यों से महाराष्ट्र में प्रसिद्ध हो गये और समाज सुधारकों में आपकी गणना की जाने लगी। आपने अनेक पुस्तकों का प्रणयन किया। आपकी कुछ पुस्तकें हैं- तृतीय रत्न, छत्रपति शिवाजी, ब्राह्मणों का चातुर्य, किसान का कोड़ा, अछूतों की कैफीयत, गुलाम-गिरी, संसार, सार्वजनिक सत्यधर्म आदि। आप निःसन्तान रहे। आपने एक विधवा के बच्चे यशवन्त को गोद लिया था। यह बालक बाद में डाक्टर बना। इसने महात्मा फूले के कार्यों को विस्तार दिया। जुलाई, 1888 में महात्मा फुले जी को पक्षाघात हो गया था। आपने 18 नवम्बर, 1890 को अपने कुछ मित्रों को वार्तालाप के लिये बुलाया था। उनसे वार्तालाप किया। दाके कुछ देर बाद आपकी मृत्यु हो गई थी।

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धर्म-अध्यात्म

हमारी रक्षा के लिए उसका धन्यवाद करना हम सबका परम कर्तव्य

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प्रतिदिन प्रातः एवं सायं ईश्वर का सम्यक् ध्यान वा सन्ध्या करना सभी मनुष्यों का परम कर्तव्य है। जो नहीं करता वह अपराध करता है। ऋषियों का विधान है कि सन्ध्या न करने वाले के सभी अधिकार छीन लेने चाहिये और उसे श्रमिक कोटि का मनुष्य बना देना चाहिये। सन्ध्या पर अनेक विद्वानों ने टीकायें लिखी हैं। पं. विश्वनाथ वेदोपाध्याय, पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय, पं. चमूपति, स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी आदि की टिकायें उपलब्ध हो जाती हैं। अभ्युदय व निःश्रेयस की प्राप्ति के इच्छुक सभी मनुष्यों को प्रतिदिन दोनों समय सन्ध्या अवश्य करनी चाहिये

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धर्म-अध्यात्म

प्रमुख वैश्विक संस्था आर्यसमाज की स्थापना का मुख्य उद्देश्य व इसके उपयोगी राष्ट्रहितकारी कार्य

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आर्यसमाज की स्थापना वेद प्रचार अर्थात् सत्य ज्ञान के प्रचार के लिए की गई थी जिससे देश व संसार के सभी मानवों का कल्याण हो। ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज के दस नियम सूत्र बद्ध किये हैं। इनका उल्लेख कर देना उचित प्रतीत होता है। पहला नियम है ‘सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उनका आदि मूल परिमेश्वर है।’ दूसरा नियम: ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकत्र्ता है।

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धर्म-अध्यात्म

सृष्टि एवं विक्रमी नव संवत्सर हमारे इतिहास का एक गौरवपूर्ण दिन

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हम संसार में यह भी देखते हैं कि संसार में जितने भी मत, सम्प्रदाय, वैदिक संस्कृति से इतर संस्कृतियां व सभ्यतायें हैं, वह सभी विगत 3-4 हजार वर्षों में ही अस्तित्व में आईं हैं जबकि सत्य वैदिक धर्म व संस्कृति एवं वैदिक सभ्यता विगत 1.96 अरब वर्षों से संसार में प्रचलित है। वैदिक धर्म ही सभी मनुष्यों का यथार्थ धर्म है, ज्ञान व विवेक पर आधारित, पूर्ण वैज्ञानिक, युक्ति एवं तर्क सिद्ध है। वेद के ईश्वरीय ज्ञान होने के कारण वैदिक सिद्धान्तों की पोषक अन्य मतों की मान्यतायें ही स्वीकार्य होती है, विपरीत मान्यतायें नहीं।

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