निरंजन परिहार

लेखक राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं

कांग्रेस सावधान… कचूमर निकालने निकल पड़े हैं मोदी के ‘हनुमान’ !

आराम न करना अमित शाह का शगल है और निशाना साधे रखना उनकी फितरत। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अथक सेनापति अमित शाह ने अपने अगले युद्ध की तैयारी शुरू कर दी है। वे लोकसभा चुनाव में अपना रणनीतिक कौशल साबित कर चुके हैं। और अब यूपी और उत्तराखंड में उनकी रणनीतिक सफलता ने बीजेपी को चमत्कृत कर देनेवाली जीत दिला दी है। मणिपुर और गोवा में भी सरकार बनाने का काम पूरा हो गया है।

अमरिंदर सिंह की आशिकी में आरुशा का आलम

कुछ साल पहले की पंजाब सरकार की सरकारी फाइलों पर भरोसा करे, तो मुख्यमंत्री के रूप में प्रकाश सिंह बादल की सीआईडी ने एक फाइल गृह मंत्रालय को भेजी थी। जिसमें कैप्टन अमरिंदर सिंह की एक बहुत हसीन पाकिस्तानी पत्रकार मित्र अरूशा आलम के बारे में बहुत सारी अलग अलग किस्म की जांच और जानकारियां थी। अरूसा आलम की मां पाकिस्तान के सैनिक शासक याहिया खां की लंबे समय तक अंतरंग मित्र रहने के बाद कुछ समय तक जुल्फिकार अली भुट्टो की भी बेहद अंतरंग मित्र रहीं।

कांग्रेस नहीं, अमरिंदर जीते पंजाब में !

हम सबने देखा है कि सन 2012 के विधानसभा चुनावों में भी पंजाब में कांग्रेस जीत के बहुत करीब आकर भी अटक गई थी। कांग्रेस ने वह चुनाव किसी को भी आगे करके नहीं लड़ा था। लेकिन इस बार के चुनाव में यूपी में जैसे बीजेपी नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव लड़ रहे थे, उसी तरह पंजाब में कांग्रेस नहीं बल्कि कैप्टन चुनाव लड़ रहे थे और उन्हीं की इज्जत दांव पर लगी थी।

राहुल गांधी में दम है, तो कांग्रेस का दम क्यों निकल रहा है ?

ताजा परिदृश्य में देखे, तो पंद्रह सालों से लगातार कोशिशें करने के बावजूद राहुल गांधी देश के राजनैतिक परिदृश्य में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने और जगह बना पाने में शाश्वत रूप से असफल रहे हैं। राहुल गांधी के पार्टी की कमान पूरी तरह से संभालने में लगातार देरी भी उनकी काबिलियत पर सवाल खड़े कर रही है। राज्यों में पार्टी की कमान सौंपने के मामले में भी गलतियां हो रही हैं।

ऐसे तो कैसे कांग्रेस मजबूत होगी राहुलजी!

राहुल गांधी की राजनीतिक समझ पर शक होने लगा है। मुंबई में करारी हार हुई है। महाराष्ट्र में शर्मनाक स्थिति में कांग्रेस का प्रदर्शन रहा। यूपी में गठबंधन के बावजूद कांग्रेस के पनपने के आसार कम हैं। कांग्रेस को अब कोई और उपाय करना होगा।

रासलीलाओं के रसिया अब बीजेपी की चौखट पर !

वे लोग धन्य हैं जो कहते हैं कि नारायण दत्त का राजनीति में बहुत सम्मान है। कांग्रेस में तो खैर तिवारी की कोई कदर बची नहीं है। लेकिन वैसे भी अब उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में न तो नारायण दत्त तिवारी की और न ही उनके नाम की कोई ऐसी हैसियत बची है कि उसके दम पर राजनीति की जा सके। सो, बीजेपी और उसके अध्यक्ष अमित शाह ने ठीक ही किया कि नारायण दत्त तिवारी को बीजेपी लेने का उपकार नहीं किया।

राहुल गांधी पर अपने भाषणों में बहुत क्रूर हैं मोदी !

देखा जाए तो, मोदी को इस क्रूर अंदाज में लाने का श्रेय भी कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी और उनकी माता सोनिया गांधी को ही जाता है, जिन्होंने मोदी को ‘लाशों का सौदागर’ से लेकर ‘शहीदों के खून का दलाल’… और न जाने क्या क्या कहा। फिर वैसे देखा जाए, तो लोकतंत्र में अपनी ताकत को ज्यादा लंबे वक्त तक जमाए रखने के लिए कुछ हद तक क्रूर और अत्यंत आक्रामक होना भी आज मोदी की सबसे पहली जरूरत है।