निरंजन परिहार

लेखक राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं

भाई हो तो ऐसा ???

मोबाइल की दुनिया में कदम रखते ही मुकेश अंबानी ऐसा भूचाल ले आए कि उनके स्मार्टफोन और फ्री डेटा से अनिल अंबानी की दुनिया न केवल हिलने लगी, बल्कि गश खाकर धराशायी हो गई। इन दिनों अनिल अंबानी की नींद उड़ी हुई है। वे धंधा समेटने की फिराक में है।

सिर्फ दो लोग जानते हैं कि कौन होगा अगला राष्ट्रपति

हमारे हिंदुस्तान के अगले राष्ट्रपति के लिए उम्मीदवारी किसको दी जाए, उस व्यक्ति के नाम पर सत्ता पक्ष और विरोधी दलों में चर्चा की शुरुआत कोई डेढ़ – दो महीने पहले से ही गई थी। लेकिन पक्ष हो या विपक्ष, जिन नेताओं के बीच चर्चा चल रही है, उन्हें और सहमति बनाने के लिए डगर डगर फिर रहे देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह और नगर विकास मंत्री वेंकैया नायडू को सच में नहीं पता कि सहमति आखिर किसके नाम पर बनानी है। राजनीति का यह सबसे मनोरंजक परिदृश्य है कि देश के आला मंत्री भी नहीं जानते कि उन्हें किसके नाम पर सहमति बनानी है।

कहीं अपने होने का अर्थ ही न खो दें राहुल गांधी !

राहुल गांधी शुरू से ही राजनीति को लेकर दुविधा में दिखते रहे हैं। वे सार्वजनिक रूप से यहां तक कह चुके हैं कि सत्ता तो जहर है। लेकिन फिर भी मनमोहन सिंह की पहली सरकार में ही मंत्री बन गए होते, तो देश चलाना सीख जाते और सत्ता का जहर पीना भी। कांग्रेस ने अगली बार फिर जब मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया था, तब भी उनको न बनाकर, राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना दिया जाता, तो कोई कांग्रेस का क्या बिगाड़ लेता ?

वाघेला ‘बापू’ कांग्रेस को गच्चा देने की फिराक में

वाघेला की राजनीति का इतिहास रहा है कि वे अपने हर राजनीतिक कदम को बहुत नाप तोलकर रखते रहे हैं। सो, वापू के समर्थकों की तरफ से भले ही यह कहलवाया जा रहा हो कि कांग्रेस की ओर से वाघेला को मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बनाया जाए। लेकिन वाघेला खुद भी जानते हैं कि कांग्रेस ऐसा नहीं करेगी। फिर हाल ही में गुजरात कांग्रेस के प्रभारी महासचिव अशोक गहलोत ने भी मुख्यमंत्री के उम्मीदवार का नाम घोषित करने से साफ इनकार भी कर ही दिया है। मतलब साफ है कि कांग्रेस से किनारा करने की पहली सीढ़ी को वाघेला ने पार कर लिया है।

गुजरात की आंधी में मारवाड़ का ‘गांधी’

दिसंबर से पहले गुजरात में चुनाव होने हैं। लेकिन समय बहुत कम है। थोड़ा सा जमीनी स्तर पर जाकर देखें, तो गहलोत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि गुजरात के कई कई गांवों में न तो कांग्रेस का कोई नाम लेनेवाला है और न ही कोई शुभचिंतक। फिर, प्रदेश में कांग्रेस का कोई भी ऐसा नेता नहीं है, जिसके नाम से कहीं पर भी एक हजार लोग भी इकट्ठे किए जा सकें। गुजरात मं तो राहुल गांधी को भी रोड़ शो के जरिए लोगों की संख्या ज्यादा दिखाने का नुस्खा अपनाना पड़ता है। हालांकि गुजरात के सारे कांग्रेसी नेता थोड़े बहुत जनाधारवाले जरूर हैं, लेकिन पूरे प्रदेश में कांग्रेस के पक्ष में माहौल खड़ा कर दे, यह क्षमता किसी में नहीं है। जिस गुजरात में कांग्रेस मरणासन्न अवस्था में हैं, वहां गहलोत के लिए अपनी पार्टी को चुनाव जितवाना तो दूर बल्कि कांग्रेस संगठन को फिर से खड़ा करना भी जिस एक अलग किस्म की चुनौती है, उस पर विस्तार से बात कभी और करेंगे।

डरे – डरे से राहुल और सहमी – सहमी सी कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी की सबसे बड़ी समस्या उसके संगठन का लगातार कमजोर होना भी है। कई राज्यों में कई – कई सालों से कांग्रेस संगठन की कार्यकारिणी का गठन तक नहीं हुआ है। यही नहीं राहुल गांधी ने अपने नजदीकी ऐसे लोगों को प्रदेश की बागडोर सोंप दी है, जिनका न तो कोई राजनीतिक आधार है और न ही कोई बड़ा अनुभव। राजस्थान में अशोक गहलोत को दरकिनार करके सचिन पायलट जैसे नौसिखिए नेता तको युवा होने के कारण प्रदेश की बागडोर सौंपना कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है।

जिन्ना हाउस ध्वस्त होना ही चाहिए, आखिर भारत के विभाजन की निशानी है 

वैसे भी ऐतिहासिक इमारतें किसी भी समाज के लिए धरोहर मानी जाती हैं। लेकिन जिस जगह पर राष्ट्र के विभाजन की साझिश रची गई हो, उसे धरोहर तो किसी भी हाल में नहीं माना जा सकता। जिन्ना हाउस निश्चित रूप से भारत के दुखद विभाजन का प्रतीक है। दक्षिण मुंबई में सबसे महंगे इलाके मलबार हिल में भाऊसाहेब हीरे मार्ग पर स्थित जिन्ना हाउस सन 1936 में बनाया गया था। उस जमाने में इसके निर्माण पर कुल दो लाख रुपए की लागत आई थी।

‘न्यू इंडिया’ के लिए राष्ट्रपति कौन… ये, वो या फिर कोई और ?

राष्ट्रपति पद के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल में से देखें, तो वित्त मंत्री अरुण जेटली, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, नगर विकास मंत्री वेंकैया नायडू समेत लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन जैसे भी कुछेक जानदार नाम हैं। पार्टी में देखे, तो लालकृष्ण आडवाणी भी सबसे प्रबल स्वरूप में सामने हैं। मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार, केशूभाई पटेल और यशवंत सिन्हा भी उम्मीद पाले हुए हैं। लेकिन इन सब में जेटली और आडवाणी को छोड़कर बाकी सभी को तो उपराष्ट्रपति पद से भी संतुष्ट किया जा सकता है।

मोदी और अमित शाह के बाद अब योगी आदित्यनाथ सबसे ताकतवर !

जीवन भर मुसलमानों के खिलाफ आग उगलनेवाले योगी आदित्यनाथ मुखिया ने शपथ ले ली है और अब वे यूपी के मुखिया हैं। उत्तर प्रदेश के 325 विधायकों ने नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने उनका चयन किया। उन्होंने चयन इसलिए किया, क्योंकि उनको उन्हीं के मुताबिक मुख्यमंत्री की तलाश थी। यूपी में 18 फीसदी मुसलमान हैं और हमारे हिंदुस्तान के इस सबसे बड़े प्रदेश की सरकार चलाने के लिए योगी के इस चयन से संकेत साफ हैं कि मोदी और शाह राजनीति को उसके परंपरागत और सहज स्वरूप में आजमाने के मुरीद नहीं हैं।