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प्रशासन को चलाने के लिए जिम्मेदार लोक सेवक,राजस्व वसूली एवं कार्यकारी न्याय की भी जिम्मेदारी

सिविल सेवा : देश की प्रशासनिक व्यवस्था की “रीढ़”

– प्रदीप कुमार वर्मा

भारतीय संवैधानिक प्रावधानों में तीसरी स्तंभ कहे जाने वाले कार्यपालिका के तहत सिविल सर्विस वह सेवा है, जो देश की सरकार के सार्वजनिक प्रशासन के लिए जिम्मेदार है। भारत में सिविल सेवा में भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा ,भारतीय विदेश सेवा और अखिल भारतीय सेवाओं और केंद्रीय सेवा समूह शामिल हैं।

हमारे देश में भारतीय सिविल सेवक न केवल नीतियों के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार होते हैं, बल्कि वे नीतियों को आकार देने, निर्णय लेने और स्थानीय स्तर पर समस्याओं के समाधान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी जिम्मेदारियों में प्रशासनिक संचालन,विकास योजनाओं का क्रियान्वयन,कानून व्यवस्था बनाए रखने,प्राकृतिक आपदाओं से निपटने तथा नागरिक सेवाओं की डिलीवरी सुनिश्चित करना शामिल है। देश की विभिन्न सार्वजनिक सेवा विभागों में लगे सिविल सेवा के इन्ही अधिकारियों के काम को “स्वीकार” करने के लिए हर साल 21 अप्रैल को राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस मनाया जाता है। यह दिन सिविल सेवकों के लिए देश की प्रशासनिक मशीनरी को सामूहिक रूप से और नागरिकों की सेवा के प्रति “समर्पण” के साथ चलाने की भी याद दिलाता है। 

         सिविल सेवा शब्द सबसे पहले ब्रिटिश काल में आया था, जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नागरिक कर्मचारी प्रशासनिक नौकरियों में शामिल थे। तब उन्हें “लोक सेवक” के रूप में जाना जाता था। इस व्यवस्था की नींव ब्रिटश अधिकारी वॉरेन हेस्टिंग्स द्वारा रखी गई। लेकिन बाद में चार्ल्स कॉर्नवॉलिस द्वारा और अधिक सुधार किए गए, इसलिए उन्हें “भारत में नागरिक सेवाओं के “पिता” के रूप में जाना जाता है। तत्कालीन भारतीय इतिहास में सिविल सेवा की शुरुआत मूल रूप से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा वाणिज्यिक कार्यों को संभालने के लिए की गई थी। कंपनी का उद्देश्य व्यापारिक हितों की रक्षा करना था, लेकिन धीरे-धीरे यह सेवा प्रशासनिक मशीनरी के रूप में भी विकसित हुई। कालांतर में जैसे-जैसे कंपनी के क्षेत्रीय प्रभाव में विस्तार हुआ, वैसे-वैसे सिविल सेवकों की जिम्मेदारियाँ भी बढ़ीं और प्रशासनिक कामकाज के संचालन के लिए उन्हें तैयार किया गया। धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों में “प्रशासन” का उल्लेख मनुस्मृति और कौटिल्य के अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथों में राजधर्म, प्रशासनिक ढांचे, अधिकारियों की नियुक्ति और उनके कर्तव्यों के रूप में मिलता है। 

                तब शासन में न्याय, कर-संग्रह, जनकल्याण, और दंड नीति पर विशेष बल दिया गया था। हमारे प्राचीन महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों में राजधर्म, दंडनीति और राज्य व्यवस्था के उच्च आदर्शों का भी उल्लेख मिलता है। यही नहीं भारतीय सम्राट अशोक ने अपने शासनकाल में प्रशासनिक संचालन के लिए राजुक एवं महामात्र आदि अधिकारियों की नियुक्ति की थी। यह अधिकारी न्याय, कर संग्रह, जन-कल्याण और राज्य की निगरानी जैसे कार्य करते थे। प्राचीन शिलालेखों में “धम्म नीति” का उल्लेख मिलता है, जो शासन में नैतिकता और लोकहित को प्रमुखता देता है। वहीं,गुप्त काल की प्रशासनिक व्यवस्था में विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्ति देखी गई। प्रशासनिक पदों में उपरिक, विषयपति, नगरपति, और ग्रामिक जैसे पदाधिकारी नियुक्त होते थे।स्थानीय प्रशासन को अधिक अधिकार प्राप्त थे, जिससे शासन सुगठित रूप से चलता था। मध्यकालीन भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में दक्षिण भारत के साम्राज्य चोल, चेर, पाण्ड्य और विजयनगर साम्राज्य में संगठित प्रशासनिक तंत्र था। 

               प्राचीन भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के इतिहास में चोलों के काल में स्थानीय स्वशासन प्रणाली अत्यंत विकसित थी। तब ग्राम सभाएं सक्रिय रूप से कर संग्रह, न्याय और विकास कार्यों में लगी रहती थीं। आज की प्रशासनिक व्यवस्था में काल की प्रशासनिक व्यवस्था परिलक्षित होती है। इसी प्रकार छत्रपति शिवाजी महाराज ने एक संगठित प्रशासनिक ढांचा स्थापित किया जिसे “अष्टप्रधान मंडल” कहा जाता था, जिसमें आठ मंत्री विभिन्न विभागों का संचालन करते थे।इनमें पेशवा, अमात्य, सुमंत, सचिव, पंडितराव, सेनापति, नायक एवं न्यायाधीश शामिल थे। उस काल में भी आज की ही तरह “गांव” प्रशासन की सबसे छोटी इकाई होती थी, जिसका संचालन ग्रामसभा करती थी। इसके बाद में तब के मुगल  शासन में प्रशासनिक ढांचे को व्यवस्थित किया गया। जिसमे न्यायपालिका, पुलिस और राजस्व प्रशासन को अलग-अलग विभागों में बांटा गया। राजस्व नीति में टोडरमल की व्यवस्था को ऐतिहासिक माना जाता है।

              भारत के स्वतंत्र होने के बाद देश के सिविल सेवकों के पहले बैच को सरदार वल्लभ भाई पटेल ने संबोधित किया था। देश के सिविल सेवकों को समर्पित इस प्रेरक भाषण में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने उन्हें भारत का स्टील फ्रेम कहा था। सरदार पटेल ने उस ऐतिहासिक भाषण में सिविल सेवकों से आग्रह किया था कि वे राजनीतिक दबावों से ऊपर उठकर निष्पक्षता, निष्ठा और पारदर्शिता के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करें।  सरदार वल्लभ भाई पटेल ने घोषणा की कि देश के लिए सिविल सेवकों के योगदान का सम्मान करने के लिए हर साल राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस मनाया जाएगा. 21 अप्रैल 2006 को विज्ञान भवन में पहला राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस मनाया गया। तब से, यह दिन हर साल एक ही दिन मनाया जाता है। स्वतंत्रता के बाद, भारतीय संविधान निर्माताओं ने सिविल सेवा को एक गैर-राजनीतिक, निष्पक्ष और सक्षम संस्था के रूप में बनाए रखने का निर्णय लिया।भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा, और भारतीय विदेश सेवा जैसी अखिल भारतीय सेवाओं की स्थापना की गई। 

          भारत में युवाओं का सिविल सेवा की ओर रुझान लगातार बढ़ रहा है। भारत में सिविल सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी में पिछले एक दशक में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो देश के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में एक सकारात्मक बदलाव का संकेत है। भारतीय सिविल सेवा में सफलता के झंडे गाड़ने वाली दो बहनों टीना डाबी और रिया डाबी के नाम से आज कौन परिचित नहीं है। वहीं,देश की पहली महिला आईपीएस किरण बेदी आज भी इन युवा महिलाओं के लिए प्रेरणा की स्रोत है। अप्रैल 2026 की रिपोर्टों के अनुसार सिविल सेवा में महिलाओं की हिस्सेदारी अब 31 प्रतिशत से अधिक हो गई है और कुल सफल उम्मीदवारों के एक तिहाई की ओर लगातार बढ़ रही है। लगभग एक दशक पहले सफल उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत थी। यह एक महत्‍वपूर्ण परिवर्तन का संकेत है। सिविल सेवाओं में युवाओं की बढ़ती संख्या और इस बढ़ते आकर्षण के पीछे प्रतिष्ठा, सुरक्षा, और समाज सेवा जैसे कई महत्वपूर्ण कारक हैं। 

          आज के डिजिटल युग में सिविल सेवकों की भूमिका और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है। उन्हें ‘ई-गवर्नेंस’, ‘समावेशी विकास’ और ‘डिजिटल इंडिया’ जैसे लक्ष्यों को जमीनी स्तर पर उतारने के लिए तेजी से और पारदर्शी तरीके से काम करना पड़ता है। महिला अधिकारियों की बढ़ती भागीदारी ने सिविल सेवाओं को और अधिक समावेशी बना दिया है। राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस हमें याद दिलाता है कि एक सुदृढ़ राष्ट्र के लिए एक प्रतिबद्ध प्रशासनिक तंत्र अनिवार्य है। सरदार पटेल के सपनों के ‘स्टील फ्रेम’ को आज के संदर्भ में न केवल मजबूत, बल्कि संवेदनशील और जन-केंद्रित होने की आवश्यकता है। भारतीय लोक सेवक भारतीय प्रशासन की रीढ़ हैं, जो लोकतंत्र को मजबूत बनाने और सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि सिविल सेवा वह स्तंभ है, जिस पर सरकार देश की नीतियों और कार्यक्रमों को सुचारू रूप से चलाती है। यही बजह है कि सिविल सेवकों के योगदान को सेवा के साथ-साथ राष्ट्र के प्रति समर्पण के रूप में भी जाना,माना और समझना चाहिए।