राजनीति विश्ववार्ता अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त हुए ट्रम्प February 6, 2025 / February 6, 2025 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने से पहले भारत में खुशी मनाई जा रही थी लेकिन उनकी प्रवासी नीति भारत में एक बड़े वर्ग को चिंतित कर रही है। ट्रंप को लेकर पूरी दुनिया में एक डर है कि वो कब क्या करेंगे, किसी को पता नहीं है । उनकी नीति अमेरिका […] Read more » अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त हुए ट्रम्प
राजनीति कुंभ भगदड़ पर शर्मनाक राजनीति February 4, 2025 / February 4, 2025 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी 12 साल में आयोजित होने वाले कुंभ का भारतीय धर्म और संस्कृति में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है । इस बार का कुंभ तो 12 कुंभों के बाद होने वाला महाकुंभ है, इसलिए इसका विशेष महत्व है । उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने इसी को देखते हुए इस आयोजन की जबरदस्त तैयारी […] Read more » Shameful politics on Kumbh stampede
राजनीति दिल्ली चुनाव में कांग्रेस की दुविधा क्या है January 28, 2025 / January 28, 2025 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी इस बार दिल्ली के विधानसभा चुनाव कुछ अलग दिखाई दे रहे हैं क्योंकि केजरीवाल कुछ घबराये हुए लग रहे हैं । उनका एक बयान उनकी घबराहट दिखा रहा है कि उन्हें हार का डर सता रहा है। उन्होंने कहा है कि हरियाणा सरकार ने जानबूझकर यमुना के पानी में जहर मिला दिया है जिससे दिल्लीवासियों की मौत हो सकती है। देखा जाए तो ये देश की एक राज्य सरकार पर दूसरे प्रदेश की जनता का सामूहिक नरसंहार करने की साजिश का आरोप है। अगर इसमें थोड़ा सा भी सच होता तो केजरीवाल सरकार सबूत के साथ सुप्रीम कोर्ट में खड़ी दिखाई देती । ये घिनौना और बेतुका आरोप केजरीवाल की घबराहट दिखा रहा है। लोकतंत्र में जनता के मन में क्या है, यह पूरी तरह से किसी को पता नहीं होता है । चुनाव परिणाम आने पर ही पता चलता है कि जनता के मन में क्या है । 2015 और 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल ने जबरदस्त जीत हासिल करके सरकार बनाई थी लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी के लिए चुनाव फंसे हुए दिखाई दे रहे हैं । यह सच है कि इस चुनाव में केजरीवाल मुश्किल में दिखाई दे रहे हैं लेकिन ज्यादा संभावना यही है कि एक बार फिर आम आदमी पार्टी सत्ता में वापिसी कर सकती है। दूसरी बात यह है कि चुनाव जिस तरफ जा रहे हैं इससे लगता है कि जनता भाजपा को भी दिल्ली की सत्ता सौंप सकती है। वैसे तो भाजपा हर चुनाव गंभीरता से लड़ती है, फिर चाहे उसके जीतने की संभावना कितनी भी कम क्यों न हो लेकिन इस बार भाजपा पूरी रणनीति बनाकर केजरीवाल को पटकनी देने की तैयारी कर रही है। 2015 और 2020 के चुनाव परिणामों का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि उन चुनावों में भी भाजपा अपना वोट बैंक बचाने में कामयाब रही थी लेकिन कांग्रेस के बड़े वोट बैंक का केजरीवाल के खेमे में चले जाना उसकी बड़ी हार की वजह बना था । दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के वोट छीनकर अपनी जगह बनाई है । कांग्रेस ने जिस तरह से चुनाव में उतरने की तैयारी की थी उससे भाजपा में उत्साह पैदा हो गया था । भाजपा को लगता है कि अगर कांग्रेस अपने वोट बैंक का कुछ हिस्सा आम आदमी पार्टी से वापिस ले लेती है तो दिल्ली में भाजपा की सरकार बन सकती है। भाजपा की समस्या यह है कि कांग्रेस दो कदम आगे बढ़ाती है और फिर तीन कदम पीछे हट जाती है। वास्तव में कांग्रेस की यह समस्या सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है बल्कि कांग्रेस का यह हाल पूरे देश में है। अजीब बात यह है कि कांग्रेस की यह समस्या दिल्ली में भाजपा की समस्या बन गई है। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी भाजपा के विरोध में इतना आगे चले गए हैं कि उन्हें कांग्रेस की बर्बादी दिखाई नहीं दे रही है। राहुल गांधी यह समझने को तैयार नहीं हैं कि उनकी लड़ाई सिर्फ भाजपा से नहीं है बल्कि दूसरे विपक्षी दलों से भी है। जहां भाजपा से लड़ने के लिए विपक्षी दलों को साथ लाने की जरूरत है, वहां तो ठीक है लेकिन जहां विपक्षी दल कांग्रेस को नुकसान पहुंचा रहे हैं वहां तो कांग्रेस को सोच समझ कर आगे बढ़ने की जरूरत है। कांग्रेस ने नारा दिया है, ‘हाथ बदलेगा हालात’ लेकिन सवाल यह है कि जिसके अपने हालात खराब हैं, वो क्या हालात बदलेगा । जिस आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर कांग्रेस ने अभी सात महीने पहले लोकसभा चुनाव लड़ा था, उसी पार्टी के सर्वोच्च नेता को कांग्रेस नेता अजय माकन ने एन्टी नेशनल, भ्र्ष्ट और धोखेबाज कहा है। अजय माकन ने केजरीवाल को एन्टी नेशनल बोलते समय आम आदमी पार्टी के साथ कांग्रेस की दोस्ती को बड़ी गलती माना है। इसके बाद आप और कांग्रेस के बीच तकरार बहुत बढ़ गई है। राहुल गांधी ने केजरीवाल को मोदी की तरह झूठे वादे करने वाला बता दिया है तो केजरीवाल ने राहुल गांधी को कोसना शुरू कर दिया है। केजरीवाल कह रहे हैं कि राहुल गांधी कांग्रेस को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन वो देश बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। हैरानी की बात है कि अचानक राहुल गांधी दिल्ली चुनाव में प्रचार छोड़कर गायब हो गए हैं। इसके अलावा प्रियंका गांधी भी दिल्ली में प्रचार करती दिखाई नहीं दे रही हैं। ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस आलाकमान ने दिल्ली चुनाव को अपनी दिल्ली शाखा के ऊपर छोड़ दिया है। आप और कांग्रेस का आपस में कोई मेल नहीं है लेकिन कांग्रेस ने आप के साथ मिलकर दिल्ली का लोकसभा चुनाव लड़ा था। वास्तव में आप और कांग्रेस के मिलकर चुनाव लड़ने का एकमात्र आधार मोदी विरोध था । जब कांग्रेस मोदी को तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने से रोक नहीं पाई है तो उसे दिल्ली में अपनी बदहाली की चिंता सताने लगी है। लगातार पंद्रह वर्ष तक दिल्ली में शासन करने वाली कांग्रेस अब विपक्ष से भी गायब हो चुकी है। आज दिल्ली में कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं है। दिल्ली के कांग्रेस नेताओं को लगता है कि अब वो केजरीवाल के खिलाफ लड़ते दिखाई नहीं दिये तो दिल्ली से कांग्रेस बिल्कुल साफ हो जाएगी । दूसरी तरफ राहुल गांधी अभी भी दुविधा में दिखाई दे रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि अगर कांग्रेस केजरीवाल के खिलाफ गंभीरता से लड़ती है तो इसका फायदा भाजपा को मिल सकता है। राहुल गांधी को कांग्रेस का आगे बढ़ना तो अच्छा लगता है लेकिन इससे भाजपा को थोड़ा सा भी फायदा नहीं होना चाहिए। राहुल गांधी की यह समस्या दिल्ली तक सीमित नहीं है बल्कि कई प्रदेशों में यही हालात हैं। बंगाल में ममता बनर्जी ने कांग्रेस का सफाया कर दिया है और गठबंधन में होने के बावजूद बंगाल में कांग्रेस को कोई जगह देने को तैयार नहीं हैं। कहने को तो बंगाल में कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा था लेकिन ममता बनर्जी के खिलाफ राहुल गांधी ने बोलते दिखाई नहीं दिये। राहुल गांधी यह समझने को तैयार नहीं हैं कि विपक्षी दलों ने राज्यों की राजनीति से कांग्रेस को बाहर किया है । जहां भाजपा से कांग्रेस से सत्ता छीनी है, वहां कांग्रेस विपक्ष में बनी हुई है लेकिन जहां विपक्षी दलों ने कांग्रेस से सत्ता छीनी है, वहां तो कांग्रेस विपक्ष से भी बाहर हो गई है। विपक्षी दलों के पास जो जनाधार है, वो उन्होंने कांग्रेस से ही छीना है । कांग्रेस को अपना जनाधार वापिस लेने के लिए भाजपा के साथ-साथ विपक्षी दलों से भी लड़ना है। अब कांग्रेस के लिए जरूरी हो गया है कि अगर उसे अपनी राजनीति बचानी है तो विपक्षी दलों के खिलाफ भी उसी गंभीरता से लड़ना होगा जितनी गंभीरता से भाजपा से लड़ रही है। दिल्ली में अगर आम आदमी पार्टी चुनाव हार जाती है तो उसके लिए पंजाब और दूसरे प्रदेशों में मुश्किल खड़ी हो जाएगी । पंजाब में भाजपा ने नहीं बल्कि आप ने कांग्रेस से सत्ता छीनी है। अगर आप दिल्ली में हारती है तो इसका फायदा पंजाब में कांग्रेस को मिलेगा। राहुल गांधी को समझना होगा कि केजरीवाल ने कांग्रेस को सिर्फ दिल्ली और पंजाब में ही नहीं बल्कि गुजरात, हिमाचल प्रदेश, गोआ और हरियाणा में भी नुकसान पहुंचाया है । कांग्रेस को अपनी इस दुविधा से बाहर निकलने की जरूरत है कि उसे सिर्फ भाजपा से लड़ना है। उसकी लड़ायी सिर्फ भाजपा से नहीं बल्कि दूसरे विपक्षी दलों से भी है । उसे क्षेत्रीय दलों का पिछलग्गू बनना छोड़ना होगा और अपनी वास्तविक ताकत को समझना होगा। उसे अपना मुस्लिम और दलित वोटबैंक वापिस पाना है तो उसे सिर्फ भाजपा से नहीं बल्कि उन क्षेत्रीय दलों के खिलाफ भी लड़ना होगा जिन्होंने उसके जनाधार पर कब्जा किया हुआ है। अगर कांग्रेस अपनी दुविधा से बाहर निकल आती है तो उसके पुनरुत्थान का रास्ता साफ हो जाएगा। राजेश कुमार पासी Read more » दिल्ली चुनाव
राजनीति राहुल की हताशा-निराशा कांग्रेस को डुबो रही है January 17, 2025 / January 17, 2025 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी राहुल गांधी जब बोलते हैं तो लगता है कि बहुत विचार करने के बाद गंभीरता से बोल रहे हैं लेकिन उनके बयान कांग्रेस को ही नुकसान पहुंचाते हैं। आजकल बोलते समय उनके चेहरे से उनकी हताशा-निराशा की झलक देखने को मिल रही है क्योंकि उनके चेहरे पर बेवजह का गुस्सा नजर आता है। अकसर देखा गया है कि उनके बयान कांग्रेस को ही भारी पड़ते हैं लेकिन कांग्रेसी उनके बयान का विरोध नहीं कर पाते। वास्तव में कांग्रेस के नेताओं के लिए समस्या यह है कि राहुल गांधी जो बोलते हैं वो पार्टी की सोच और विचारधारा मानी जाती है । यही कारण है कि कांग्रेस के नेता राहुल के बयानों को दूसरा रूप देने की कोशिश करते हैं और उनके शब्दों की नई-नई परिभाषा निकालते हैं । 15 जनवरी को कांग्रेस को नया मुख्यालय मिला है और उसके उद्घाटन पर राहुल गांधी बयान दे रहे थे। उन्होंने कहा कि उनकी लड़ाई सिर्फ भाजपा और संघ से नहीं है बल्कि उनकी लड़ाई भारतीय स्टेट से है । उन्होंने यह बयान बहुत गंभीरता से दिया है इसलिये इसे भूलवश मुंह से निकली हुई बात नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि भाजपा धीरे-धीरे पूरी व्यवस्था पर कब्जा कर रही है इसलिए उनकी लड़ाई भारतीय स्टेट से है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, इससे पहले कई बार वो विदेशी धरती पर इससे मिलता-जुलता बयान दे चुके हैं। उन्होंने कई बार कहा है कि भारत में हालात बहुत खराब हैं । उन्होंने कहा था कि भाजपा ने पूरे देश में केरोसिन डाला हुआ है. एक छोटी सी चिंगारी से आग भड़क सकती है। वास्तव में जब आदमी निराश हो जाता है तो वो नकारात्मकता से भर जाता है और उसे सब तरफ सिवाये बर्बादी के कुछ नजर नहीं आता । उसे लगता है कि अब कुछ अच्छा होने वाला नहीं है क्योंकि उसके साथ कुछ अच्छा नहीं हो रहा होता है। राहुल गांधी कांग्रेस के सबसे बुरे दौर के नेता हैं लेकिन इस दौर को लाने के लिए वो पूरी तरह जिम्मेदार नहीं हैं। यूपीए सरकार के कारनामों के कारण 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस सिर्फ 44 सीटों तक सीमित हो गई थी। इसकी सबसे बड़ी वजह कांग्रेस के सहयोगी दलों द्वारा किया गया भ्र्ष्टाचार था जिस पर गठबंधन सरकार होने के कारण सरकार काबू नहीं कर पाई थी । दूसरी बदकिस्मती राहुल गांधी की यह रही कि उनका सामना राजनीति के दो धुरंधर खिलाड़ी मोदी-शाह की जोड़ी से हो रहा है । मोदी जी का कुशल नेतृत्व और शाह का राजनीतिक प्रबंधन कांग्रेस को बहुत भारी पड़ रहा है। कांग्रेस की कमजोरी के लिए सिर्फ कांग्रेस का नेतृत्व ही जिम्मेदार नहीं है बल्कि भाजपा के वर्तमान नेतृत्व का रणनीतिक कौशल भी है। भारतीय राजनीति के इतिहास में कांग्रेस को ऐसी चुनौती का सामना कभी नहीं करना पड़ा है। भारतीय जनता में राजनीतिक जागरूकता बढ़ती जा रही है जिसके कारण उसकी उम्मीदों पर खरा उतरना राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए बहुत मुश्किल होता जा रहा है। राहुल गांधी की समस्या सिर्फ भाजपा नहीं है बल्कि दूसरे विपक्षी दल भी उनके लिए बड़ी समस्या बन गए हैं। कहने को तो गठबंधन के सहयोगी दल कांग्रेस के साथ हैं लेकिन वो सिर्फ भाजपा के खिलाफ कांग्रेस के साथ खड़े हैं। वास्तव में विपक्षी दल कांग्रेस के उतने ही बड़े विरोधी हैं जितने वो भाजपा के हैं बल्कि कहना चाहिए कि वो भाजपा से ज्यादा कांग्रेस के विरोधी हैं। विपक्षी दल चाहते हैं कि कांग्रेस अपने प्रभाव क्षेत्र में उन्हें जगह बनाने का मौका दे लेकिन वो उनके प्रभाव क्षेत्र से दूर रहे । राहुल गांधी के सामने ऐसी समस्या है जिसका सामना कांग्रेस को पहली बार करना पड़ रहा है। उन्हें यह फैसला करना है कि वो पहले भाजपा से लड़े या अपने ही सहयोगी दलों से लड़े । ऐसा लगता है कि राहुल गांधी ने यह फैसला कर लिया है कि उन्हें विपक्षी दलों से अपना वोटबैंक वापिस पाना है । 2024 के लोकसभा चुनाव से कांग्रेस को यह संकेत मिला है कि उसका मुस्लिम और दलित वोट बैंक उसके पास वापिस लौट रहा है । कांग्रेस मुस्लिम वोटबैंक पाने के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण से आगे बढ़कर हिन्दू विरोध की राजनीति की ओर चल पड़ी है। वास्तव में मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर पूरा विपक्ष चल रहा है इसलिये सिर्फ इस नीति पर चलकर मुस्लिमों को कांग्रेस से जोड़ना आसान नहीं लग रहा है । राहुल गांधी को लगता है कि वो अगर हिन्दू विरोध की राजनीति करेंगे तो मुस्लिम उनके साथ जुड़ सकते हैं। राहुल गांधी को लगता है कि मुस्लिमों को लुभाने के लिए देश का विरोध भी किया जाए तो बेहतर परिणाम हासिल हो सकते हैं। राहुल गांधी ने कहा है कि उनकी लड़ाई इंडियन स्टेट के साथ है । कांग्रेस समर्थक इस बयान का बचाव यह कहकर कर रहे हैं कि इंडियन स्टेट से उनका मतलब भारत सरकार है और भारत सरकार का मतलब मोदी सरकार है। राजनीति शास्त्र के अनुसार लोकतंत्र में स्टेट का मतलब सिर्फ सरकार नहीं होता है बल्कि पूरी सरकारी व्यवस्था होती है। इस सरकारी व्यवस्था में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका शामिल हैं। इंडियन स्टेट में भारत का संविधान भी शामिल है जिसे राहुल गांधी खतरे में बताते हैं। उन्हें बताना चाहिए कि क्या वो खुद ही संविधान के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इस देश की पूरी व्यवस्था संविधान के अनुसार ही चल रही है, जो व्यक्ति व्यवस्था से लड़ने का दावा करता है, इसका मतलब है कि वो संविधान को खत्म करना चाहता है। माओवादी, नक्सलवादी, आतंकवादी और अलगाववादी इंडियन स्टेट से लड़ने का दावा करते हैं और वो लोग संविधान को नहीं मानते हैं। अपने बयान से राहुल गांधी उनके साथ खड़े हो गए हैं। इंडियन स्टेट में भारतीय सेना, पुलिस और पूरी नौकरशाही आती है जिसमें हमारे देश के युवा काम कर रहे हैं। इंडियन स्टेट में सारे राज्य और उनकी पूरी व्यवस्था आती है, जिसमें कांग्रेस और विपक्षी दलों की सरकारें भी शामिल हैं। कांग्रेस के नेता और समर्थक इतनी सी बात नहीं समझ रहे हैं कि राहुल गांधी देश विरोधी बनते जा रहे हैं। मुस्लिमों को कांग्रेस के साथ लाने के चक्कर में राहुल गांधी धर्म विरोधी होने के बाद देश विरोधी बनते जा रहे हैं। राहुल गांधी सोचते हैं कि भाजपा सत्ता में होने के कारण पूरी व्यवस्था पर काबिज होती जा रही है तो व्यवस्था को ही खत्म कर दिया जाए । वो भूल गए हैं कि कांग्रेस ने 55 साल देश पर राज किया है और पूरी व्यवस्था उसके कब्जे में थी, इसके बावजूद भाजपा से उसे सत्ता से हटाने में कामयाब रही । इस देश की जनता संवैधानिक तरीके से अपने हक हासिल करती है और व्यवस्था से भी लड़ती है लेकिन व्यवस्था परिवर्तन की बात नहीं करती है। आज़ादी की लड़ाई के दौरान भी हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने इंडियन स्टेट से लड़ने की बात नहीं की बल्कि वो ब्रिटिश शासन से लड़ने की बात करते थे। एक लोकतांत्रिक देश में स्टेट से लड़ने का मतलब सिर्फ सरकार से लड़ना नहीं होता बल्कि देश की जनता से भी लड़ना होता है क्योंकि सरकार जनता द्वारा ही चुनी गई होती है। राहुल गांधी को बताना चाहिए कि क्या वो देश की जनता से लड़ने जा रहे हैं। अगर देश में किसी तानाशाह की सरकार होती तो स्टेट से लड़ना सही हो सकता था लेकिन किसी लोकतांत्रिक देश में संवैधानिक व्यबस्था के तहत जनता द्वारा चुनी गई सरकार से सिर्फ लोकतांत्रिक तरीके से लड़ा जा सकता है। राहुल गांधी को अपने बयान के लिए माफी मांगनी चाहिए क्योंकि अगर इंडियन स्टेट से लड़ रहे होते तो वो चुनाव नहीं लड़ सकते थे । स्टेट से लड़ने का दावा करने वाले नक्सलवादी, आतंकवादी और माओवादी चुनाव नहीं लड़ते हैं। राहुल गांधी सबसे पुरानी और सबसे ज्यादा शासन करने राजनीतिक पार्टी के नेता हैं. उन्हें स्टेट से नहीं लड़ना है बल्कि विपक्षी पार्टी से लड़ना है। राजेश कुमार पासी Read more » Rahul's frustration and disappointment are sinking the Congress. राहुल की हताशा-निराशा
राजनीति क्या मस्जिदों के नीचे मन्दिर ढूंढना गलत है December 24, 2024 / December 24, 2024 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी आजकल संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान चर्चा में बना हुआ है । जून, 2022 में संघ प्रमुख ने मंदिर-मस्जिद विवाद से बचने की नसीहत देते हुए कहा था कि हर दिन एक नया मुद्दा नहीं उठाना चाहिए । हम झगड़े क्यों बढ़ाएं, हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग क्यों ढूंढना चाहिए । उस समय वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे का मुद्दा काफी गरमाया हुआ था और ताजमहल को मंदिर बताते हुए उसके भी सर्वे मांग हो रही थी । अब एक बार फिर मोहन भागवत ने इस मुद्दे पर अपना बयान दिया है जिसकी सब तरफ चर्चा हो रही है । पुणे में एक कार्यक्रम के दौरान भागवत ने ‘विश्वगुरु भारत‘ विषय पर बोलते हुए कहा कि राम मंदिर बनने के बाद कुछ लोगों को लगता है कि बाकी जगहों पर भी इसी तरह का मुद्दा उठाकर वो हिन्दुओं के नेता बन जायेंगे । उन्होंने कहा कि राम मंदिर आस्था का विषय था और हिन्दुओं को लगता था कि इसका निर्माण होना चाहिए । उन्होंने कहा कि नफरत और दुश्मनी के कारण कुछ नए स्थलों के बारे में मुद्दे उठाना अस्वीकार्य है । उन्होंने कहा कि भारत को सभी धर्मों और विचारधाराओं के सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए । उनका कहना है कि उग्रवाद, आक्रामकता और दूसरों के देवताओं का अपमान करना हमारी संस्कृति नहीं है । यहां कोई बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक नहीं है, हम सब एक है । इससे मिलता-जुलता उनका यह बयान भी है कि भारत में सभी का डीएनए एक है । रविवार को उन्होंने एक बयान और दिया है जिसमें कहा है कि धर्म को समझना कठिन है । धर्म के नाम पर होने वाले सभी उत्पीड़न और अत्याचार गलतफहमी और धर्म की समझ की कमी के कारण हुए है इसलिए धर्म की सही शिक्षा सभी को मिलनी चाहिए । भागवत को यह बयान इसलिए देने पड़ रहे हैं क्योंकि देश में अलग-अलग जगहों पर नए-नए मंदिर-मस्जिद विवाद सामने आ रहे हैं । उनके बयानों के पीछे उनकी यह अच्छी मंशा हो सकती है कि इन विवादों के कारण देश का माहौल खराब न हो । आपको याद होगा कि अयोध्या में जब राम-मंदिर निर्माण के लिए आंदोलन चल रहा था तब हिन्दूवादी नेताओं की यही मांग थी कि अयोध्या, काशी और मथुरा के विवादित धर्मस्थलों को अगर मुस्लिम पक्ष उन्हें सौंप देता है तो हिन्दू पक्ष अन्य जगहों पर मंदिर तोड़कर बनाई गई मस्जिदों पर अपना दावा छोड़ देगा । तब मुस्लिम पक्ष जिद्द पर अड़ा रहा और एक कदम भी पीछे नहीं हटा । यह जानते हुए भी रामजन्मभूमि हिन्दुओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है और उनकी गहरी आस्थी उससे जुड़ी हुई है, मुस्लिम इसको सौंपने को तैयार नहीं हुए । माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हुआ है और काशी-मथुरा का मामला अदालत में लंबित है । मैंने इस सम्बन्ध में कई लेख लिखे थे और कई लोगों का भी मानना था कि अगर मुस्लिम पक्ष हिंदुओं की भावनाओं को देखते हुए रामजन्मभूमि छोड़ देता है तो ये हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे के लिए बहुत अच्छा होगा । हिन्दुओं ने संविधान के अनुसार अदालत जाकर अपना हक हासिल किया है न कि मुस्लिमों ने हिन्दुओं की आस्था का सम्मान किया है । अब हिन्दुओं को अदालत का रास्ता दिख गया है और वो अपने मंदिरों को संविधान के अनुसार अदालत के द्वारा हासिल करना चाहते हैं । जब पूरा विपक्ष संविधान को सिर पर उठा कर घूम रहा है और संविधान की रक्षा की बात कर रहा है तो अदालत में जाकर अपना हक हासिल करना कैसे गलत कहा जा सकता है। संविधान के अनुसार हो रहे काम से भागवत क्यों परेशान हो रहे हैं । जब राम जन्मभूमि के लिए मुस्लिम अड़े हुए थे तब ही यह कहा गया था कि अगर मुस्लिम पक्ष बातचीत से मामला हल कर लेता है तो धार्मिक सौहार्द के लिए बहुत अच्छा होगा । जिसका डर था, आज वही हो रहा है, हिन्दू समाज अपने मंदिरों की मांग कर रहा है । इसके लिए हिन्दू समाज किसी हिंसा का सहारा नहीं ले रहा है, वो अपने संवैधानिक हक का इस्तेमाल कर रहा है । मोहन भागवत पहले भी ऐसे बयान दे चुके हैं जिसे भाजपा और संघ के खिलाफ माना जा सकता है, ये बयान तो हिंदुओं के खिलाफ दिखाई दे रहा है। आजकल जो मस्जिदों के नीचे हिन्दू मंदिर ढूंढे जा रहे हैं, उन्हें भाजपा, संघ या कोई हिन्दू संगठन नहीं ढूंढ रहा है बल्कि हिन्दू समाज ढूंढ रहा है । इस मुहिम का मजाक उड़ाया जा रहा है कि हिंदुओं को कोई और काम नहीं बचा है । वो सारे काम छोड़कर सिर्फ मस्जिदों के नीचे मंदिर ढूंढ रहे हैं जबकि यह सच्चाई नहीं है । वास्तव में मस्जिदों के नीचे मंदिर कोई नहीं ढूंढ रहा है बल्कि मस्जिदों के नीचे मन्दिर निकल रहे हैं। जहां भी मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाये जाने की बात की जा रही है, वो सभी जगहें प्राचीन मंदिरों के स्थल हैं और उनके बारे में हिन्दु धर्म की मान्यताएं भी हैं कि वहां प्राचीन मंदिर थे । इसके अलावा हिन्दू समाज मस्जिदों को तोड़कर मंदिर बनाने की बात नहीं कर रहा है बल्कि मस्जिदों के सर्वे के लिए अदालतों के दरवाजे पर खड़ा है । हिन्दू समाज किसी किस्म की जबरदस्ती नहीं कर रहा है बल्कि वो चाहता है कि संविधान के अनुसार अगर वहां मंदिर है तो वो उसे दिया जाए । केन्द्र की नरसिम्हा राव की सरकार ने 1991 में प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट पास किया था, जिसके अनुसार 15 अगस्त 1947 को किसी धर्मस्थल की जो स्थिति थी, वही स्थिति मान्य होगी । इस एक्ट के अनुसार इस मामले पर अदालत भी नहीं जाया जा सकता था । हिन्दू समाज यह कह रहा है कि 1947 को जो स्थिति थी, वो भी पता होनी चाहिए । अगर यह साबित हो जाता है कि उस जगह मस्जिद की जगह मंदिर है और जो मस्जिद है वो मंदिर की जगह बनाई गई है तो वो जगह हिन्दुओं को मिलनी चाहिए । इसी आधार पर अदालतें मस्जिदों के सर्वेक्षण के आदेश जारी कर रही हैं ताकि स्थिति का पता लगाया जा सके । ये एक्ट धार्मिक स्थल की वास्तविक स्थिति की जांच करने से नहीं रोकता है इसलिये अदालतें सर्वे के आदेश जारी कर रही हैं। आज हमारा देश आजादी के बाद की गई गलतियों की सजा भुगत रहा है । यह काम आजादी के बाद होना चाहिए था । मुस्लिम आक्रमणकारियों के पास जगह की कमी नहीं थी, वो चाहते तो किसी भी जगह मस्जिदों का निर्माण कर सकते थे लेकिन उन्होंने जानबूझकर मंदिरों को तोड़कर उनके मलबे से उसी स्थान पर मस्जिदों का निर्माण करवाया । इन ढांचों को देखकर कोई भी कह सकता है कि यह पुराने मंदिरों को तोड़कर बनाए गए हैं । ऐसा इसलिए किया गया ताकि हिन्दू समाज इन्हें देखकर अपमानित हो और वो याद करे कि कैसे उसके आस्था स्थलों को तोड़कर अपने बाहुबल से इस्लामिक शासकों ने मस्जिदों का निर्माण किया होगा । इस्लाम कहता है कि किसी दूसरे के धार्मिक स्थल को तोड़कर उस पर मस्जिद नहीं बनाई जा सकती और अगर ऐसा किया जाता है तो उस मस्जिद में की गई नमाज अल्लाह को कबूल नहीं होगी । इस देश का मुस्लिम समाज कहीं और से नहीं आया है, इसी देश का है । आपसी भाईचारा एकतरफा नहीं हो सकता, इसके लिए दोनों समुदायों को कोशिश करनी होगी । उत्तर प्रदेश के संभल जिले में जो मंदिर मिल रहे हैं वो तो चालीस साल पहले ही कब्जा किये गये हैं । यह ठीक है कि दंगे के कारण हिन्दू समाज ने वहां से पलायन कर लिया लेकिन मंदिर तो सार्वजनिक संपत्ति होते हैं तो वहां कैसे कब्जा हो गया । जिन्होंने पलायन किया होगा, उनमें से कुछ लोगों ने वैसे ही घर छोड़ दिया होगा और कुछ ने बेच दिया होगा लेकिन मंदिर बेचा नहीं जा सकता तो इन मंदिरों और उनकी भूमि को कैसे अपने घरों में शामिल कर लिया गया । देश के हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे के लिए जरूरी है कि जो गलतियां हुई, उन्हें स्वीकार किया जाये । जिन गलतियों को सुधारा जा सकता है, उन्हें सुधारा जाए । जहां कुछ नहीं हो सकता तो वहां कम से कम गलती को माना जाए । भागवत के कहने से कुछ होने वाला नहीं है । उन्हें राजनीतिक बयान देने का हक हासिल नहीं है । इसके लिए संघ की राजनीतिक शाखा भाजपा है और उसके नेता प्रधानमंत्री मोदी हैं । ऐसे बयान देकर भागवत अपना मान-सम्मान को घटा रहे हैं । वैसे भी हिन्दू समाज अपनी लड़ाई लड़ रहा है, वो किसी दूसरे की सलाह पर चलने वाला नहीं है । मंदिरों की लड़ाई किसी राजनीतिक दल, संगठन और नेता की नहीं है, अब ये जनता की लड़ाई बन चुकी है । ये आपसी बातचीत से ही खत्म हो सकती है, किसी की सलाह पर खत्म नहीं होगी । राजेश कुमार पासी Read more » Is it wrong to locate temples beneath mosques\ मस्जिदों के नीचे मन्दिर
राजनीति अम्बेडकर के नाम पर राजनीति बंद होनी चाहिए December 20, 2024 / December 20, 2024 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी संविधान पर चर्चा के दौरान राज्यसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने एक घंटा चालीस मिनट का एक भाषण दिया । इस भाषण में उन्होंने कांग्रेस पर तंज किया कि अम्बेडकर-अम्बेडकर चिल्लाना एक फ़ैशन बन गया है। उन्होंने कहा कि इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक का स्वर्ग मिल […] Read more » अम्बेडकर के नाम पर राजनीति
राजनीति योगी की आक्रामकता पर विपक्ष खामोश क्यों December 18, 2024 / December 18, 2024 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि एक फायरब्रांड नेता की है । उन्होंने अपनी छवि के अनुरूप ही यूपी विधानसभा में 16 दिसम्बर को बेहद तल्ख लहजे में विपक्ष पर हमला किया। उनके जबरदस्त भाषण के दौरान पूरे सदन में चुप्पी छाई रही। उनके भाषण के बाद भी विपक्ष को समझ नहीं आ रहा है कि वो उनके तर्कों और तथ्यों का क्या जवाब दे। योगी जी की यही विशेषता है कि वो अपनी बात पूरे तर्क और तथ्य के साथ रखते हैं। उनकी कठोर से कठोर कार्यवाही कानून के अनुसार होती है। पूरा देश उन्हें बुलडोज़र बाबा के नाम से जानता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट भी उनके बुलडोजर को रोक नहीं पाया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी की गई गाइडलाइंस आने के बाद भी उनका बुलडोजर गरज रहा है क्योंकि उनकी सरकार अपनी सारी कार्यवाहियों को कानून के दायरे में रह कर करती है। भाजपा समर्थकों और कार्यकर्ताओं को उनमें भावी प्रधानमंत्री दिखाई देता है। देखा जाए तो वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में वो अकेले ऐसे नेता हैं जिन्हें मोदी का उत्तराधिकारी कहा जा सकता है। इसकी वजह यह है कि भाजपा एक कैडर बेस्ड पार्टी है इसलिये कैडर की भावनाओं के खिलाफ पार्टी नहीं जा सकती। इसके अलावा देश की जनभावनाओं को देखते हुए भी कहा जा सकता है कि वो मोदी के बाद देश के प्रधानमंत्री बनने वाले हैं। जैसे मोदी जी एक राज्य के मुख्यमंत्री होने के बावजूद पूरे देश में लोकप्रिय हो चुके थे, ऐसे ही योगी जी की लोकप्रियता पूरे देश में फैल चुकी है। भाजपा में चुनाव प्रचार के लिए मोदी जी के बाद सबसे ज्यादा मांग योगी जी की होती है। अगर आज मोदी जी देश के प्रधानमंत्री हैं तो इसकी सबसे बड़ी वजह भाजपा कार्यकर्ताओं में उनकी लोकप्रियता थी । भाजपा संगठन में अपने कैडर की इच्छा के विपरीत जाने की हिम्मत नहीं हुई । मुझे लगता है कि भारतीय राजनीति में इतना दबंग मुख्यमंत्री कभी नहीं आया है । जिस साफगोई से योगी अपनी बात कह रहे हैं, वो राजनीति में एक विलक्षण चीज है । वो बिना किसी लाग-लपेट के पूरी स्पष्टवादिता के साथ अपनी बात रख रहे हैं । संभल हिंसा में 5 दंगाईयों के मारे जाने पर विपक्ष उन्हें घेरना चाहता है लेकिन वो रक्षात्मक होने की जगह आक्रामक तरीके से मुकाबला कर रहे हैं । उन्होंने संभल दंगों का पूरा इतिहास सदन में रख दिया और कहा कि संभल दंगों में 209 हिन्दुओं की हत्या हो चुकी है लेकिन विपक्ष उस पर बोलने को तैयार नहीं हैं । उन्होंने संभल हिंसा के दंगाइयों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने का संदेश सदन में दे दिया । उन्होंने कहा कि बिना साक्ष्य किसी को पकड़ा नहीं जा रहा है और अपराधियों को वो छोड़ने वाले नहीं हैं । उन्होंने 46 साल पुराने मंदिर के मिलने पर कहा कि आपने मंदिर नहीं तोड़ा, आपका अहसान है लेकिन वहां 22 कुंओं को किसने पाट दिया और कुंओं में हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां क्यों मिल रही हैं । योगी ने अल्लामा इकबाल का ‘तराना-ऐ-मिल्ली’ पढ़ कर सुनाया और उन्हें जेहादी करार दिया । जो लोग इकबाल को गंगा-जमुनी तहजीब का रहनुमा घोषित करते हैं, उन पर बड़ा प्रहार किया है । एक समाजवादी नेता ने कहा कि दंगा इसलिए हुआ क्योंकि हिंदुओं ने जय श्री राम का नारा लगाया था। इस पर योगी ने कहा कि इससे आपको दिक्कत नहीं होनी चाहिए । उन्होंने कहा कि अगर मैं कहूं कि मुझे अल्लाह-हु-अकबर से दिक्कत है तो क्या आप बोलना बंद कर देंगे । उन्होंने कहा कि जब मंदिर और हिन्दू मोहल्ले से मुस्लिम जुलूस और यात्रा निकल सकती है तो मस्जिद और मुस्लिम मोहल्ले से हिन्दू यात्रा क्यों नहीं निकल सकती । उन्होंने कहा कि अगर ऐसी यात्राओं पर दंगा होता है तो सरकार उससे सख्ती से निपटेगी । उन्होंने कहा कि मुस्लिम जलूस और त्यौहारों पर समस्या नहीं खड़ी होगी लेकिन हिन्दू जलूस और त्यौहार पर अगर कोई समस्या खड़ी करेगा तो सरकार उससे सख्ती से निपटेगी । धर्मनिरपेक्षता पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि धर्मनिरपेक्षता पर बात करना व्यर्थ हैं क्योंकि मूल संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द नहीं है । योगी अब राजनीति का एजेंडा तय कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद उन्होंने ही ‘बटोगे तो कटोगे’ का नारा दिया जिसे बाद में पूरी भाजपा ने अपना लिया। उनका यह नारा अब धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गया है। अब ये सिर्फ भाजपा का नारा नहीं रह गया है, ये पूरे हिन्दू समाज की आवाज बन गया है। मुझे लगता है कि ये नारा बहुत दूर तक जाने वाला है । उन्होंने बांग्लादेश, संभल, ज्ञानवापी और अयोध्या के दंगाइयों की बात करते हुए कहा कि सबका डीएनए एक है । योगी ने दिखा दिया है कि हिन्दू और हिंदुत्व की बात करते हुए उन्हें किसी किस्म का डर नहीं है और न ही किसी किस्म की शर्म है । मामला अदालत में चल रहा है, इसके बावजूद वो ये कहने से नहीं हिचके कि जुमे की नमाज से पहले जो मस्जिद में तकरीर की गई, उसके कारण दंगा हुआ । यही योगी की पहचान है. जब उन्होंने राजनीति शुरू की थी, तब ही बोल दिया था कि मैं हिन्दू हूं और ईद नहीं मनाता । इसके बावजूद उनके प्रशासन की विशेषता यह है कि उन्होंने कभी धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया है । उनके शासन में यूपी सरकार की किसी भी योजना में मुस्लिमों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया गया है । लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने कहा था कि यूपी में मुस्लिमों की जनसंख्या बीस प्रतिशत है और उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ चालीस प्रतिशत के करीब मिल रहा है । योगी जब बोलते हैं तो वो राजनीतिक लाभ-हानि को देखकर नहीं बोलते क्योंकि सत्ता का मोह उनको नहीं है । योगी कहते हैं कि औरंगजेब और बाबर भारत की पहचान नहीं हैं, भारत की पहचान राम-कृष्ण और गौतम बुद्ध हैं । भारत बाबर और औरंगजेब को अपना आदर्श नहीं मान सकता, भारत तो राम-कृष्ण और गौतम बुद्ध के रास्ते पर ही चलेगा । मस्जिदों के नीचे मंदिर ढूढंने की बात पर वो कहते हैं कि मंदिरों को तोड़कर उनकी जमीन पर मंदिरो के मलबे से मस्जिदों का निर्माण क्यों हुआ, इसका जवाब मुस्लिम समुदाय और सेक्युलरों को देना चाहिए । उनके कहने का मतलब यही है कि यह करतूत इसलिए की गई है ताकि हिन्दुओं को अपमानित किया जा सके । योगी की एक विशेषता यह है कि वो अपनी बात बेहद स्पष्ट तरीके से सरल भाषा में कहते हैं ताकि उनकी बात जनता तक पहुंच सके । वो जानते हैं कि जनता जटिलताओं को नहीं समझती । वो भाजपा के नेताओं को समझा रहे हैं कि जटिल भाषा और छुपा कर बोलने से कुछ नहीं होने वाला, खुलकर बोलना होगा तभी आम जनता तक बात पहुंचेगी । योगी कानून के अनुसार काम करते हैं । उन्होंने कानूनी तरीके से सिर्फ अवैध संपत्तियों को ही गिराया है । यही कारण है कि जिन लोगों के घरों पर बुलडोजर चलाया गया है उनकी हिम्मत अदालत जाने की नहीं हुई । विपक्ष को समझ नहीं आ रहा है कि वो योगी के हमलों पर क्या प्रतिक्रिया दे और कैसे दे । उनके तर्कों और तथ्यों की काट विपक्ष के पास नहीं है इसलिये इधर-उधर की बात करके उन पर हमला किया जाता है । योगी राजनीति में एक बड़ी लकीर खींच रहे हैं, जिसके सामने दूसरे नेताओं की लकीर बहुत छोटी नजर आ रही है । उनके भाषण के दौरान पूरा विपक्ष बिल्कुल चुप था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो इसका क्या जवाब दे । इसके अलावा अगर किसी नेता ने कोई सवाल उठाया भी तो उन्होंने उसका करारा जवाब दिया । उन्होंने मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति पर करारा प्रहार किया है और स्पष्ट कर दिया है कि वो हिंदुत्व की राजनीति करेंगे, चाहे कोई कुछ भी बोलता रहे । विपक्ष के लिए समस्या यह है कि वो मोदी जी के जाने का इंतजार कर रहा है लेकिन उसे अब डर लग रहा है कि मोदी के जाने के बाद अगर योगी सत्ता में आ गए तो उसकी मुश्किल बहुत बढ़ने वाली है । मोदी विपक्ष के हमले को सहन कर लेते हैं लेकिन योगी हर हमले का जवाब देते हैं । शायद यही कारण है कि भाजपा समर्थक योगी के आने का इंतजार कर रहे हैं । वास्तव में योगी हिन्दू मन की बात कह रहे हैं। वो हिंदुओं की आवाज बन चुके हैं जिसे अभी तक धर्मनिरपेक्षता के नाम पर दबाया गया है। योगी में हर हिन्दू खुद को देख रहा है, ये आने वाले समय में विपक्ष की बड़ी समस्या बनेगी। राजेश कुमार पासी Read more » योगी की आक्रामकता योगी की आक्रामकता पर विपक्ष खामोश क्यों
राजनीति निरर्थक चर्चा से संविधान का अपमान हुआ December 17, 2024 / December 17, 2024 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी लोकसभा में 13-14 दिसम्बर और राज्यसभा में 16-17 दिसम्बर को संविधान पर चर्चा हुई है । पक्ष-विपक्ष के सांसदों ने इस चर्चा में भाग लिया लेकिन उनके भाषणों में संविधान कहीं नहीं था । इन सांसदों ने जब भी संविधान का नाम लिया तो वो भी अपने विरोधियों पर हमला करने के […] Read more » The Constitution was insulted by meaningless discussion. निरर्थक चर्चा से संविधान का अपमान हुआ
राजनीति हताश-निराश विपक्ष को ममता से आस क्यों December 16, 2024 / December 16, 2024 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी कभी-कभी हम ऐसी समस्या से घिर जाते हैं जिससे निकलने का कोई अच्छा रास्ता नहीं सूझता तो हम हताश होकर एक नए रास्ते पर चलने लगते हैं। हालात कैसे भी हों लेकिन बिना सोचे समझे उठाया हुआ कदम नुकसान पहुंचाता है । आज हमारे देश का विपक्ष बहुत हताश और निराश हो चुका है। […] Read more » Why should the dejected opposition be given hope by affection? विपक्ष को ममता से आस क्यों
राजनीति कांग्रेस को अडानी और ईवीएम का मुद्दा छोड़ना होगा December 16, 2024 / December 16, 2024 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी अगर हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं तो देर सवेर मंजिल तक पहुँच जाएंगे, अगर हम विपरीत दिशा में जा रहे हैं तो कभी भी मंजिल तक नहीं पहुंच पाएंगे। इसका मतलब है कि अगर हम चलते जा रहे हैं और मंजिल दूर होती जा रही है तो हमें अपनी […] Read more » अडानी और ईवीएम का मुद्दा
लेख विधि-कानून समाज कानून और पत्नी से पीड़ित की आत्महत्या पर उठते सवाल December 13, 2024 / December 13, 2024 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी बेंगलुरू में कार्यरत एक एआई इंजीनियर अतुल सुभाष ने अपनी पत्नी निकिता सिंघानिया की कानूनी प्रताड़ना से तंग आकर मौत को गले लगा लिया । उसने अपनी मौत से पहले एक डेढ़ घंटे का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया में जारी कर दिया । इसके अलावा उसने एक 24 पेज का सुसाइड नोट भी लिख कर छोड़ा है । इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह व्यक्ति कितनी यातना और भावनात्मक पीड़ा से गुजरा होगा । आत्महत्या का मनोविज्ञान कहता है कि आत्महत्या करने वाले व्यक्ति की मनोदशा के सिर्फ कुछ मिनट ऐसे होते हैं जब वो मरने का फैसला करता है । अगर उन क्षणों में उसे समझा दिया जाये तो उसका फैसला बदल जाता है लेकिन यह व्यक्ति डेढ़ घंटे का वीडियो बनाता है और 24 पेज का सुसाइड नोट लिखता है । इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो न्यायिक व्यवस्था से कितना निराश और हताश हो चुका था । इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसकी पत्नी से उसे कितना तंग किया होगा जो उसने मजबूरी ने सोच समझ कर ऐसा कदम उठाया । सोशल मीडिया में उसका वीडियो वायरल होने के बाद लोगों ने वैवाहिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करने शुरू कर दिये हैं । यह विमर्श चलाने की कोशिश की जाने लगी है कि महिलाओं द्वारा पुरूषों को जबरन फंसाया जा रहा है और उनके पैसे से महिलाएं ऐश कर रही हैं । इसे एक बिजनेस मॉडल का नाम दिया जाने लगा है । यह कहा जा रहा है कि पुरूषों की कोई सुनने वाला नहीं है इसलिए पुरूषों की आत्महत्या दर महिलाओं के मुकाबले ढाई गुना ज्यादा है । मृतक अतुल सुभाष ने वीडियो में कहा है कि अगर मुझे न्याय नहीं मिलता है तो मेरी अस्थियों को गटर में बहा देना । मुझे न्याय मिलता है तो ही मेरी अस्थियों का विसर्जन गंगा में किया जाए । इसके अलावा उसने यह भी कहा है कि भारत में पुरुषों की जिन्दगी गटर बन चुकी है । उसके इस बयान को सोशल मीडिया में जबरदस्त तरीके से प्रचारित किया गया है । बेंगलुरू में कार्यरत इस इंजीनियर की शादी जौनपुर निवासी निकिता सिंघानिया से 2019 में हुई थी । 2021 में एक बच्चे के साथ उसकी पत्नी ने उसे छोड़ दिया और अलग रहने लगी । अलग रहते हुए पत्नी ने उससे 40 हजार प्रति माह मेंटेनेंस की मांग की थी. इसके अलावा वो अपने बच्चे के लिए भी 2-4 लाख रुपये प्रतिमाह की डिमांड कर रही थी । मृतक ने आरोप लगाया है कि उसकी पत्नी ने जौनपुर से उस पर मुकदमा दायर किया था । उसने पहले उससे मामला खत्म करने के लिए एक करोड़ रुपये की मांग की और फिर बाद में तीन करोड़ रुपये मांगने लगी । इसके अलावा मामले की सुनवाई कर रही जज भी उससे मामला खत्म करने के लिए पांच लाख रुपये की मांग कर रही थी । उसे बार-बार पेशी पर बुलाया जा रहा था जिसके लिए उसे बार-बार बेंगलुरू से जौनपुर आना-जाना पड़ता था । अतुल सुभाष ने अपने पत्र में लिखा है कि एक बार उन्होंने अपनी पत्नी और सास से कहा था कि ऐसे मामलों से तंग आकर पुरूष आत्महत्या कर लेते हैं तो उन्होंने उसे कहा था कि वो कब मरने जा रहा है । सुभाष ने कहा कि वो मर गया था वो क्या करेंगी तो उन्होंने कहा कि उसके मरने के बाद उसका सारा पैसा उनको मिल जायेगा । इसके बाद सुभाष ने पूरी योजना बनाकर आत्महत्या की है । उसने यह सोचकर आत्महत्या की है कि उसके मरने के बाद उसके साथ न्याय होगा । अभी कानून उसकी बिल्कुल नहीं सुन रहा है लेकिन मरने के बाद उसकी बात सुनी जायेगी । देखा जाये तो मृतक कानून से बिल्कुल निराश हो चुका था लेकिन उसे उम्मीद थी कि उसकी मौत से कानून सुनवाई के लिए मजबूर होगा । यही सोचकर उसने अपना वीडियो और पत्र सोशल मीडिया में जारी किया है । सुभाष की आत्महत्या ने आईपीसी की धारा 498ए को हथियार बनाकर पुरूषों को प्रताड़ित करने की बात साबित कर दी है । 10 दिसम्बर को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा ही मामला खारिज कर दिया है और कहा है कि धारा 498ए पत्नी और उसके परिजनों के लिए बदला लेने का हथियार बन गई है । अब सोशल मीडिया में यह धारा खत्म करने की मांग की जा रही है । यह सच है कि भारत में पुरूषों की आत्महत्या दर महिलाओं के मुकाबले लगभग ढाई गुना है । एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2022 में 1,22,724 पुरुषों ने आत्महत्या की है जबकि आत्महत्या करने वाली महिलाओं की संख्या 48,172 है । इस तरह पुरूषों की आत्महत्या दर 72 प्रतिशत है जबकि महिलाओं की आत्महत्या दर 28 प्रतिशत है । दूसरी तरफ आत्महत्या करने वाले पुरुषों में विवाहित और अविवाहित पुरूषों की बात करें तो इनका औसत लगभग बराबर है । इसके अलावा पारिवारिक समस्याओं से तंग आकर मरने वाले पुरुषों का औसत 31.7 प्रतिशत है । वैवाहिक समस्याओं से पीड़ित आत्महत्या करने वाले पुरूषों का औसत 4.8 है । इस तरह देखा जाये तो वैवाहिक संबंधों के कारण सिर्फ 4.8 प्रतिशत पुरुषों ने आत्महत्या की है जबकि परिवार से तंग आकर मरने वाले पुरुष 31.7 प्रतिशत हैं । इसलिए पुरुषों में बढ़ती आत्महत्या कर दर के लिए न तो विवाह को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है और न ही पत्नियों के उत्पीड़न को दोष दिया जा सकता है । मेरा मानना है कि इस घटना की आड़ में वैवाहिक संस्था को बदनाम करने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए । इस सच को हम सभी जानते हैं कि कानूनों को महिलाओं के पक्ष में बनाया गया है क्योंकि सदियों से महिलाओं का उत्पीड़न होता आ रहा है । यह सच है कि धारा 498 ए का दुरुपयोग होता है लेकिन कानून के दुरुपयोग को देखते हुए उसे खत्म करने की मांग करना उचित नहीं है । जहां इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है तो दूसरी तरफ इस कानून के होते हुए भी महिलाओं का उत्पीड़न बंद नहीं हुआ है । हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब तक यह कानून नहीं था जब तक दहेज के कारण महिलाओं का उत्पीड़न बहुत ज्यादा हो रहा था और कानून बनने के बाद भी यह पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है । इस मामले में महिला जज ने पीड़ित की बात नहीं सुनी लेकिन यह पूरा सच नहीं है । वास्तव में आज पुलिस और अदालत इस कानून के दुरुपयोग से परिचित हैं इसलिए मामला सामने आने पर पुरुष की बात भी सुनते हैं । इस कानून को लेकर अदालतों द्वारा कई बार सवाल खड़े किये गये हैं । मेरा मानना है कि इस कानून में सुधार की बहुत जरूरत है । इस कानून को खत्म नहीं किया जाना चाहिए लेकिन पुरूषों के खिलाफ कार्यवाही सिर्फ महिला की शिकायत के आधार पर नहीं होनी चाहिए । आरोपी को जमानत मिलनी चाहिए और जांच के बाद ही किसी के खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिए । कानून के दुरुपयोग को रोकने की कोशिश जरूर होनी चाहिए लेकिन महिलाओं के उत्पीड़न को रोकने की कोशिश किसी भी तरह से कम नहीं होनी चाहिए । सरकार को कानून में संशोधन करके यह सुनिश्चित करना होगा कि इस कानून को पति से बदला लेने का हथियार न बनने दिया जाए जैसा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा है। राजेश कुमार पासी Read more » Questions arising on law and wife's suicide
राजनीति विश्ववार्ता सीरिया की जंग अभी खत्म नहीं हुई है December 10, 2024 / December 10, 2024 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी सीरिया से बशर अल-असद की सत्ता खत्म हो गई है. असद परिवार पिछले 50 सालों से सीरिया की सत्ता पर काबिज था । असद की सत्ता खत्म होने से पूरी दुनिया में सुन्नी मुस्लिम समुदाय में खुशी की लहर दौड़ गई है । इसके अलावा दुनिया भर में वामपंथी और लिबरल समुदाय […] Read more » सीरिया की जंग अभी खत्म नहीं हुई है