प्रमोद कुमार

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लेख स्‍वास्‍थ्‍य-योग

कुष्ठ रोगियों से करें आत्मीयता एवं प्रेमभरा व्यवहार

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कुष्ठरोग दिवस 30 जनवरी प्रमोद दीक्षित मलय मई 1974 में संजीव कुमार तथा जया भादुड़ी अभिनीत एक फिल्म प्रदर्शित हुई थी ‘नया दिन नई रात’। इस फिल्म में साहित्य के नौ रसों यथा श्रंगार, हास्य, करुण, वीर, रौद्र, भयानक, वीभत्स,अद्भुत एवं शांत रसों पर आधारित नौ प्रकार की भूमिकाएं नायक संजीव कुमार द्वारा अभिनीत की गई थी। ये नौ भूमिकाएं सामाजिक जीवन के नौ व्यवहारों की झलक दिखा रहे थे। संत, डकैत, गायक, नशेड़ी, डाक्टर, साहूकार आदि छवियों के साथ ही इसमें एक दृश्य कुष्ठ रोग से ग्रस्त एक व्यक्ति से भी संबंधित था। संजीव कुमार के भाव प्रवण अभिनय ने कुष्ठ रोगी के पात्र  को जीवंत कर दिया और समाज में कुष्ठ रोगियों के प्रति उपेक्षा, अलगाव एवं तिरस्कार की बजाय प्रेम, सहानुभूति एवं अपनेपन के भाव एवं मानवीय दृष्टिकोण के अंकुर फूटे। इसके साथ ही उस दौर की कुछ अन्य फिल्मों में भी कोढ एवं कोढ़ी पर दृश्य दिखायी देते हैं। इन सभी में कुष्ठ रोगी का अभिनय कर रहे पात्र ने उसके प्रति सहानुभूति एवं दया दिखाने वाले व्यक्तियों को उससे दूर रहने को कहते हुए इस रोग को उसके पापकर्मों का परिणाम बताया गया तो वहीं उसके समुचित इलाज एवं भोजन पोषण के प्रेरक दृश्य भी खींचे गये। एक प्रकार से यह तत्कालीन सामाजिक नजरिए को व्यक्त करता है। यह धारणा उस समय व्याप्त थी कि कोढ़ व्यक्ति के इस जन्म या पूर्व जन्मों के पाप कर्मों का कुफल है जिसे उस व्यक्ति को भोगना ही है। हम सभी ने इस सामाजिक व्यवहार को बहुत करीब से देखा, सुना और समझा है। बड़े-बुजुर्गों द्वारा बच्चों को कुष्ठ रोगियों से बिल्कुल दूर रहने की सख्त हिदायत दी जाती थी। रोगी को समाज का कलंक माना जाता था। इसलिए रोगी गांव से बाहर कर दिये जाते थे, परिवार वालों का भी सहयोग-सम्बल नहीं मिलता था। बड़ी संख्या में रोगी हरिद्वार का रूख कर लेते थे। या फिर शहरों में बाजार, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और मंदिरों के बाहर भीख मांगकर बहिष्कृत, तिरस्कृत एवं अपमानित निकृष्ट जीवन जीने को विवश होते थे। लेकिन सरकारी और स्वैच्छिक संस्थाओं के प्रयासों से कुष्ठ रोगियों को न केवल उपचार और आश्रय मिला बल्कि जीने की सम्मानजनक राह भी मिली।  इसका श्रेय फ्रांसीसी मानवतावादी विचारक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक राउल फोलेरो को जाता है जिन्होंने 1954 में कुष्ठ रोग दिवस मनाने की पहल कर जन सामान्य में जागरूकता लाने एवं रोग का उपचार कर रोकथाम करने की ओर विश्व का ध्यान खींचा। तब से  प्रत्येक वर्ष जनवरी के अंतिम रविवार को विश्व कुष्ठ रोग दिवस मनाया जाता है।             कुष्ठ रोग दिवस के माध्यम से इस घातक रोग के बारे में वैश्विक जागरूकता का प्रसार करने, रोग से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने और समुचित चिकित्सा के उपलब्ध होने का संदेश दिया जाता है। उल्लेखनीय है कि कुष्ठ रोगियों के प्रति महात्मा गांधी के हृदय में न केवल असीम प्यार एवं अपनापन था बल्कि उनके लिए वे सम्मानजनक सामाजिक व्यवहार करने के भी पक्षधर थे। इसीलिए राउल फोलेरो ने महात्मा गांधी के प्रति श्रद्धा निवेदित करते हुए उनकी पुण्यतिथि 30 जनवरी को कुष्ठ रोग दिवस मनाने को समर्पित किया। तब से भारत में  कुष्ठ रोग दिवस मनाकर गांधी जी के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करते हैं। जबकि वैश्विक स्तर पर यह आयोजन जनवरी महीने के अंतिम रविवार को किया जाता है।          कुष्ठ रोग एक संक्रामक रोग के रूप में समाज में माना जाता है। यह पाप कर्म का फल नहीं बल्कि एक जीवाणु जनित रोग है। वर्ष 1873 में चिकित्सक गेरार्ड हेनरिक आर्मोर हैन्सेन ने कुष्ठ रोग के उत्तरदायी जीवाणु माइक्रो बैक्टीरियम लैप्री और माइक्रो बैक्टीरियम लेप्रोमेटासिस को खोजा। उनके नाम पर इसे हैन्सेन रोग भी कहा जाता है। रोगी में इस रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई नहीं पड़ते। पांच साल तक यह जीवाणु बहुत धीरे-धीरे बढ़ता है। लेकिन बाद में गम्भीर रूप धारण कर त्वचा, नसों, हाथ-पैर और आंखों को प्रभावित करता है। यह प्रभावित अंगों में घाव कर देता है। बहुत समय पहले से ही यह भारत में पहचान लिया गया था। सुश्रुत एवं चरक संहिता में कुष्ठ रोग के लक्षण एवं उपचार का वर्णन मिलता है। इसके अलावा चीन और मिस्र में भी रोग के बारे में प्राचीन काल से जानते थे।           कुष्ठ रोग के जागतिक प्रसार की बात करें तो दक्षिण-पूर्वी एशिया, भारत इंडोनेशिया, अफ्रीका, और ब्राजील में इस रोग की बहुतायत है। 2019-20 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक आंकड़े के अनुसार भारत में दुनिया के 57 प्रतिशत रोगी पाये गये थे। तब विश्व स्वास्थ्य संगठन भारत ने अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर हिंदी, गुजराती, बांग्ला, उड़िया भाषा में फ्लिप चार्ट तैयार कर आशा बहुओं को वितरित किया था। जिसका प्रयोग छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, गुजरात, पश्चिमी बंगाल में लोगों को जागरूक करने के लिए किया गया था। इसके साथ ही एक एनीमेशन फिल्म भी बनायी गयी थी जिसमें रोग के लक्षण, जरूरी उपचार एवं सावधानियों का वर्णन था। भारत सरकार ने 1955 में राष्ट्रीय कुष्ठरोग नियंत्रण कार्यक्रम बनाया जो 1983 में राष्ट्रीय कुष्ठरोग उन्मूलन कार्यक्रम के नाम से काम कर रहा है। 1980 के दशक में बहु औषधि उपचार के माध्यम से रोगी को चिकित्सा दी जाने लगी जो लाभप्रद रहा। आज सम्पूर्ण विश्व में कुष्ठरोग का निदान बहु औषधि उपचार द्वारा ही किया जा रहा है। भारत में कुष्ठ रोगियों के इलाज के लिए 1840 में ब्रिटिश सैन्य अधिकारी हैरी रैम्जे ने अल्मोड़ा में सर्व प्रथम प्रयास किये। विश्व में कुष्ठरोग के समूल निर्मूलन के लिए 1874 में मिशन टू लैपर्स नामक अन्तरराष्ट्रीय संगठन की शुरुआत हुई। कुष्ठरोग का पहला टीका भारत में बनाया गया। इसके अतिरिक्त भारत माता कुष्ठ आश्रम फरीदाबाद, विश्वनाथ आश्रम वाराणसी, कुष्ठ सेवाश्रम गोरखपुर, राजकीय कुष्ठ आश्रम रिठानी (मेरठ) सहित देश भर में राज्य सरकारों एवं स्वप्रेरित स्वैच्छिक संस्थाओं ने कुष्ठ रोगियों के लिए उपचार एवं निवास हेतु संगठित प्रयास किये हैं। आज भारत, चीन, रोमानिया, मिस्र, नेपाल, सोमालिया, लाइबेरिया, वियतनाम एवं जापान में कुष्ठ रोगियों की बस्तियां या आश्रम हैं, जहां कुष्ठ रोगियों को इलाज हेतु रखा जाता है और इलाज बाद उनके रोजगार एवं पुनर्वास के बेहतर प्रबंध किये जाते हैं।          महात्मा गांधी सामाजिक जीवन में मानवता एवं समानता के पक्षधर रहे हैं। वह मनुष्यों में छुआछूत, गैरबराबरी के व्यवहार के सख्त खिलाफ थे।। कुष्ठ रोगियों के प्रति सेवा को मानवता की सेवा मानते थे। उनकी पुण्यतिथि के अवसर हम संकल्प लें कि कुष्ठरोगियों के प्रति सहानुभूति, संवेदनशीलता,  समता एवं स्नेहसिक्त व्यवहार करते हुए कुष्ठरोगियों को मानवीय गरिमा अनुकूल सम्मानजनक जीवन जीने में अपनी यथेष्ट भूमिका निर्वहन करेंगे। प्रमोद दीक्षित मलय

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समाज

सुभाष चन्द्र बोस : जिनके नाम से अंग्रेजों के हृदय कांपते थे 

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प्रमोद दीक्षित मलय ब्रिटिश शासन सत्ता की बेड़ियों में जकड़ी भारत माता की मुक्ति के लिए हुए स्वाधीनता समर की बलिवेदी पर वीर सपूतों ने निज जीवन की आहुति दी है। अपने सुवासित जीवन-पुष्पों की माला से भारत माता का कंठ सुशोभित किया है तो रुधिर से भाल पर अभिषेक भी। उन्हीं जननायकों में से एक महानायक बनकर उभरा जिसे विश्व सुभाष चन्द्र बोस के नाम से जानता है। सुभाष का जन्म 23 जनवरी, 1897 को कटक में प्रतिष्ठित वकील जानकी नाथ बोस एवं प्रभावती के कुल में हुआ था। 1919 में बी.ए. आनर्स प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर कलकत्ता विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान प्राप्त किया। विवेकानन्द साहित्य के अध्ययन ने उनको राष्ट्रीय चेतना से समृद्ध किया और चिंतन-मनन करने की सुदृढ जमीन दी। पुत्र को आईसीएस बनाने की पिता की इच्छा का मान रखते हुए सुभाष 1919 में इंगलैण्ड के लिए रवाना हुए और आईसीएस परीक्षा न केवल उत्तीर्ण की बल्कि चौथा स्थान भी हासिल किया किन्तु हृदय में धधक रही देशप्रेम की ज्वाला के कारण अंग्रेजों की चाकरी को स्वीकार न कर भारत माता की सेवा-साधना का कंटकाकीर्ण पथ अंगीकार किया। फलतः सेवा से त्यागपत्र देकर जून 1921 में भारत वापस आकर कांग्रेस में महात्मा गांधी के सुझाव पर सुभाष जी कलकत्ता जाकर देशबंधु चितरंजन दास के साथ काम करने लगे। चितरंजन दास का उस समय बंगाल में बहुत प्रभाव था और आम जन में उनकी छवि एक उत्कृष्ट नेता की थी। दास ने कांग्रेस के अंदर ही ‘स्वराज्य दल’ बनाकर कलकत्ता महापालिका का चुनाव लड़ा और जीत अर्जित कर महापौर बने। तब उन्होंने सुभाष को महापालिका का मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाया। यह सुभाष के सार्वजनिक जीवन की शुरुआत थी। यहां पर सुभाष ने अपनी कार्यशैली और दूरदृष्टि का परिचय देकर काफी नये और महत्वपूर्ण काम किए जिससे उनकी कार्यशैली और राजनीतिक सोच से सभी परिचित हुए और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। साथ ही उनकी गिनती देश के अग्रणी नेताओं में होने लगी। उनके जीवन में समय पालन, लक्ष्य के प्रति समर्पण और अनुशासन का बहुत प्रभाव रहा जिसकी पृष्ठभूमि में विद्यार्थी जीवन में ही टेरीटोरियल आर्मी में रंगरूट के रूप में प्राप्त सैन्य प्रशिक्षण था। 1929 में कांग्रेस के अधिवेशन में सुभाष खाकी सैन्य गणवेश में उपथित होकर अध्यक्ष मोतीलाल नेहरु को सलामी दी। और आगे चलकर यही सैन्य अनुशासन ‘आजाद हिन्द फौज’ के गठन का दृढ आधार भी बना। 1933 से 1936 तक स्वास्थ्य लाभ के लिए यूरोप प्रवास के दौरान आपने इटली के नेता मुसोलिनी और आयरलैण्ड के नेता डी. बलेरा से भेंट-विमर्श कर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए सहयोग का वचन लिया। इसी दौरान आस्ट्रिया में निजी टाईपिस्ट एमिली शेंकेल की सेवा, समझ और भारत के प्रति उदात्त सोच से प्रभावित हो सुभाष ने उनसे विवाह कर लिया। वह भारत वापस आये। देश में सुभाष की लोकप्रियता उफान पर थी। 1938 में हरिपुरा में आयोजित कांग्रेस के 51वें अधिवेशन में गांधी जी ने सुभाषबाबू को अध्यक्ष मनोनीत किया और सम्मान में 51 बैलों द्वारा इनके रथ को खींचा गया। उस अवसर पर अध्यक्ष के रूप में दिया गया सुभाष का ओजस्वी भाषण दुनिया के प्रमुख भाषणों में शुमार किया जाता है। अध्यक्षीय कार्यकाल में आपने जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में ‘योजना आयोग’ और विख्यात अभियंता विश्वेश्वरैया के नेतृत्व में ‘विज्ञान परिषद’ बनाई।  कांग्रेस में सुभाष के बढ़ते प्रभाव और कार्यकर्ताओं पर मजबूत होती पकड़ से कांग्रेस के अन्दर ही कुछ नेताओं का प्रभामंडल कमजोर होने लगा  और वे सुभाष को कमजोर करने की चालें चलने लगें। गांधी जी से भी मतभेद हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि 1939 के त्रिपुरा अधिवेशन में अध्यक्ष के मनोनयन की परम्परा के उलट कांग्रेस को चुनाव करवाना पड़ा। देश और कार्यकर्ताओं की पसंद सुभाष ने गांधी जी के समर्थित प्रत्याशी पट्टाभि सीतारमैया को पराजित कर दिया। जिस पर गांधी जी की टिप्पणी, ‘‘सीतारमैया की हार मेरी हार है,‘‘ से सुभाष बहुत व्यथित हुए क्योंकि उनके मन में गांधी जी के प्रति असीम आदर भाव था। देश जानता है कि विदेश प्रवास के दौरान सुभाष ने ही अपने एक रेडियो भाषण में गांधी जी को सर्वप्रथम ‘राष्ट्रपिता’ कहकर सम्बोधित किया था लेकिन मतभेद शान्त होने की जगह बढ़ता गया। गांधी जी के कहने पर कार्यकारिणी के 15 पदाधिकारियों में से दो को छोड़कर शेष ने त्यागपत्र दे दिया तो दल की एकता और देश की मजबूती के लिए सुभाष ने विवश होकर अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और कांग्रेस के अन्दर ही ‘फारवर्ड ब्लॉक’ बनाकर काम करने लगे लेकिन उन्हें कांग्रेस से निकाल दिया गया। अंग्रेजी शासन ने उनको घर पर नजरबन्द कर दिया पर सुभाष तो दूसरी ही मिट्टी के बने थे, उन्हें कैद रखना अंग्रेजों के लिए आसान न था। जनवरी 1941 में अपने घर पर नजरबंदी के दौरान ही ब्रिटिश पुलिस और जासूसों को चकमा देकर एक पठान के रूप में सुभाष निकल भागे और पेशावर, काबुल, मास्कों होते हुए जर्मनी पहुंचे। हिटलर एवं जर्मनी के अन्य नेताओं से भेंट कर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सहयोग का वचन प्राप्त किया और वहीं ‘आजाद हिन्द रेडियो’ की स्थापना की। वहां से आप जापान पहुंच कर जनरल तोजो से भेंट की और जापानी संसद को सम्बोधित किया। जापान के सहयोग से रासबिहारी बोस के मार्गदर्शन में ‘आजाद हिन्द फौज’ का गठन कर सिपाहियों और नागरिकों का आह्वान किया कि ‘तुम मूझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’। 5 जुलाई, 1943 को सिंगापुर में टाउन हॉल के सामने आजाद हिन्द फौज के वीर सिपाहियों के सम्मुख ओजस्वी भाषण देते हुए ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया था जिसे प्रत्येक सिपाही ने हृदय से स्वीकार कर बर्मा (अब म्यांमार), कोहिमा, इम्फाल के मोर्चे पर अंग्रेजी सेना से मुकाबला कर दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए। 21 अक्टूबर, 1943 को सुभाष ने आजाद हिन्दुस्तान की अंतरिम सरकार बनाई जिसमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री का दायित्व स्वयं निर्वहन किया। इस आजाद हिन्द सरकार को जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, आयरलैण्ड आदि 9 देशों ने मान्यता प्रदान की थी। और जापान सरकार द्वारा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह सुभाषबाबू की उस अस्थायी सरकार को भेंट किए गये थे जिसे सुभाष ने ‘शहीद’ और ‘स्वराज्य’ नाम दे अमर कर दिया। उस अस्थायी सरकार के गठन के 75 वर्ष पूर्ण होने के सुअवसर पर अक्टूबर 2018 में भारत के प्रधानमंत्री मा0 नरेन्द्र मोदी द्वारा लालकिले पर तिरंगा ध्वज फहराकर उसके महत्व को रेखांकित किया गया।  द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद सुभाष आजादी की लड़ाई हेतु आवश्यक संसाधन जुटाने हेतु रूस जाने का निश्चय कर 18 अगस्त, 1945 को हवाई जहाज से निकले किन्तु रास्ते में ही वे लापता हो गये। कहा गया कि उनका हवाई जहाज ताईवान में दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिसमें सुभष चन्द्र बोस की मृत्यु हो गई। हालांकि ताईवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बताया था कि उस दिन ताईवान के आकाश में कोई विमान दुर्घटना ही नहीं हुई। सुभाष जीवित रहे या विमान दुर्घटना का शिकार हुए, यह सत्य तो काल के गर्भ में है पर कोटि-कोटि भारतीयों के हृदय में वह सदा सर्वदा जीवित रहेंगे। भारत माता के प्रति उनकी अनन्य भक्ति और स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किया गया अनथक अदम्य प्रयास उन्हें चिरकाल तक अमर रखेगा। नेता जी सुभाषचन्द्र बोस की एक भव्य प्रतिमा राजपथ दिल्ली में लगाई गयी है और उनके जन्मदिवस को पराक्रम दिवस के रूप में 2021 से मनाया जा रहा है। प्रमोद दीक्षित ʺमलयʺ

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