मोदी की विदेश नीति का हिस्सा बनी धार्मिक कूटनीति 

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The Prime Minister, Shri Narendra Modi being received by the Prime Minister of Nepal, Shri Sushil Koirala on his arrival, at Tribhuvan International Airport, Kathmandu, in Nepal on August 3, 2014.

 

प्रभुनाथ शुक्ल

प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति में धर्म और संस्कृति एक कूटनीतिक हिस्सा रहा है। जब भी वह विदेश यात्रा पर होते हैं तो संबंधित मुल्कों के धार्मिक और पर्यटक स्थलों पर जरुर जाते हैं और चाय पर विदेशी नेताओं से आपसी संबधों पर बात करते हैं। अपनी कूटनीति में सफलता हासिल करते हैं। चीनी राष्ट्रपति  जिन पिंग के साथ गुजरात के स्वामीनारायण मंदिर का भ्रमण, जापानी पीएम के साथ काशी के धार्मिक स्थलों और गंगा दर्शन। अमेरिका के पूर्व राष्टपति ओबामा के साथ ताजमहल का जाना साथ में फोटो सूट करना। फ्रांस के पीएम के साथ गंगा में नाव में बैठ कर अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के घाटों की कूटनीति अहम रही है। जिसकी वजह रही है वह जहां भी जाते हैं उन्हें लोग राजनयिक और सार्वजनिक स्तर पर हाथों-हाथ लेंते हैं। जिसकी वजह है कि आज वह दुनिया के शक्तिशाली राजनीतिक हस्तियों में से एक हैं। शुक्रवार को पड़ोसी मुल्क नेपाल के जनपुर से शुरु हुई उनकी यह यात्रा इसी कूटनीति का एक हिस्सा है।

The Prime Minister, Shri Narendra Modi being received by the Prime Minister of Nepal, Shri Sushil Koirala on his arrival, at Tribhuvan International Airport, Kathmandu, in Nepal on August 3, 2014.

भारत आने वाले राजनेताओं के साथ भी वह इसी नीति का खुले तौर पर इस्तेमाल करते हैं।ं जिसकी वजह से वह सीधे लोगों से जुड़ जाते हैं और भीड़ से मोदी-मोदी के गगन भेदी नोरे गूंजते हैं। यही वजह से है वह इजरायल जैसे देशों में भी पहुंच कर भारत की कूटनीति का नया इतिहास लिखते हैं जहां की आम तौर पर भारतीय राजनेता आज तक जाने से घबराते रहे हैं। विदेश नीति को उन्होंने बिल्कुल खुला रखा है। वह जहां अमेरिका से अच्छे संबंध चाहते हैं तो पीएम बनने के बाद पाकिस्तान से भी संबंध सुधारना चाहते हैं। वह चीन से दोस्ताना चाहते हैं तो नेपाल से दोस्ती का इतिहास कायम रखना चाहते हैं। अमेरिका , रुस और चीन की तिलस्मी तिकड़ी के बाद भी रुस और भारत के संबंधों में जीम बर्फ को रक्षा सौदे के जरिए हटाने में कामयाब दिखते हैं। वह कश्मीर की तरह अफगानिस्तान को भी आतंक से मुक्त रखना चाहते हैं। मोदी बौद्ध की नीति से विश्वशांति की बात करते हैं।
पीएम मोदी की चार साल में यह तीसरी सबसे बड़ी नेपाल यात्रा है। भारत और पड़ोसी मुल्क के संबंधों में यह अहम पड़ाव है। हाल के सालों में दोनों देशों के बीच संबंधों में काफी तल्खी आ गयी थी। नेपाल में कम्युनिज्म विचारधारा वाली ओली सरकार आने के बाद स्थितियां बदल गयी थीं। मद्धेसिया और दूसरों मसलों पर दोनों देशों के बीच काफी मतभेद उभर आए थे। जिसका फायदा चीन उठा रहा था। लेकिन मोदी की कूटनीति की दाद देनी होगी जो नेपाल कल तक भारत की नीति का विरोध कर रहा था वह आज स्वागत में फूलों की वर्षा कर रहा है।नेपाल में चीन की तरफ से कई क्षेत्रों में भारी निवेश किया गया है। नेपाल में बढ़ता चीन का निवेश भारत की चिंताएं बढ़ा रहा था। जिसकी वजह से नेपाल की यात्रा भारत के लिए बेहद जरुरी थी। जिसकी मूल वजह रही की नेपाल को विश्वास में लेने के लिए मोदी ने नेपाल से पहले चीन की यात्रा किया और नेपाल को विश्वास में लेने के बाद वहां की यात्रा पर गये।
अचानक डोकलाम के विवाद के बाद चीन यात्रा की कूटनीति से जहां पाकिस्तान अवाक रह गया वहीं नेपाल पर भी इसका खासा असर हुआ। प्रधानमंत्री ने नेपाल यात्रा का सही वक्त चुना। इकसे लिए उन्होंने रामायण सकिर्टक के लिए जनकपुर का जो स्थान चुना और भारत-नेपाल संबंधों के लिए खास हैं। क्योंकि दोनों स्थान लोगों की धार्मिक आस्था से जुड़े हैं। नेपाल के साथ धार्मिक कूटनीति के जरिए संबंधों को बढ़ाने का फैसला अपने आप में उचित और समय की मांग है। क्योंकि चीन के मामले में यह भ्रांति है कि वह अपने हितों के खिलाफ कभी कोई समझौता नहीं कर सकता है। पड़ोसी मुल्क चाहे वह नेपाल हो या फिर बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, या म्यांमार वह चीन के बजाय भारत को अधिक भरोसेमंद मानते हैं।
मोदी जनकपुर और नेपाल के लोगों यह विश्वास दिलाने में पूरी तरफ कामयाब रहे की भारत और नेपाल के संबंध परिभाषा से नहीं भाषा से हैं। उन्होंने धार्मिक और सांस्कृतिक कूटनीति को मजबूत करने के लिए भाषण की शुरुवात और समापन जय सिया राम से किया और नेपाली में भी संबोधन किया। क्योंकि नेपाल एक हिदुत्वराष्ट रहा है। अपनी नेपाल यात्रा  मोदी ने जनकपुर और अयोध्या से सीधी बस सेवा शुरु कर कूटनीतिक तौर पर पहली जीत हासिल कर लिया। सैद्धांतिक तौर पर यह बात सच है कि हम पड़ोसियों को नाराज कर अपनी स्थिति मजबूत नहीं कर सकते हैं। क्योंकि चीन और पाकिस्तान हमारे लिए सबसे बड़े दुश्मन है। जिसकी वजह हमें नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमार जैसे देशों से राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक संबंधों का मजबूत करना बेहद जरुरी है। हम चीन पर आंख बंद कर भरोसा नहीं कर सकते हैं। पीएम मोदी ने भारत और नेपाल में विकास से छट टी का सिद्धांत सुझाया। जिसमें परंपरा, पर्यटन, यातायात, जलमार्ग और तकनीक जैसे विषय शामिल हैं। दोनों देशों के मध्य समुद्रमार्ग से व्यापार बढ़ाने की बात रखी गयी। इसके अलावा सीमा पर आवाजाहीं को और सरल बनाने की बात कहीं। इससे दोनों देशों के सीमावर्ती लोगों को काफी लाभ होगा।
रामायण सर्किट दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों में जहां इतिहास रचेगा। वहीं पर्यटन विकास में भारत और नेपाल अहम पड़ाव तय करेगा। भारत रामायण सर्किट पर 223 करोड़ से अधिक की राशि खर्च कर रहा है। दुनिया में भर में रामायण काल से जिन-जिन देशों का संबंध रहा है उसे एक परिपथ के जरिए जोड़ा जाएगा। इसके अलावा जैन और बौद्ध सर्किट पर भी काम किया जा रहा है। नेपाल के सांस्कृतिक और धार्मिक विकास के लिए भारत 100 एकड़ जमींन उपलब्ध कराएगा। इसके अलावा जनकपुर में रामायाण सर्किट के लिए 100 करोड़ रुपये के निवेश का भी ऐलान किया। मैथली कला और संस्कृति की चर्चा कर वहां की लोककला और साहित्य से जुड़े लोगों की नब्ज टटोलने की कोशिश किया। मिथिला की पेटिंग की भी चर्चा किया। नेपाल की जनता को कूटनीतिक तौर पर भारत के और करीब लाने के लिए उन्होंने कहा कि जिस तरह यहां मैथली बोली जाती है वैसे ही भारत में नेपाली बोली जाती है। पर्यटन के साथ फिल्म निर्माण को बढ़ावा देन की पहल किया जिसमें मैथली फिल्म निर्माण को बढ़ावा दिये जाने को खूब सराहा। भाषाई कूटनीति का भी इस्तेमाल किया। भारत-नेपाल दो देश होने के बाद भी धर्म और संस्कृति से एक साथ जुड़े हैं। जिसकी वजह है कि हर रोज एक दूसरे मुल्कों में हजारों की संख्या में लोग आते जाते हैं। बिहार राज्य से और नेपाल का रोटी और बेटी का जुड़ाव है। जनकपुर के बिना अयोध्या अधूरी है। मोदी कहा कि हमारे राम का सम्मान जनकपुर से है, यह बात रख उन्होंने नेपालवासियों का विश्वास भारत के प्रति और बढ़ा दिया। निश्चित तौर पर पीएम मोदी की यह यात्रा दोनों देश की चुनौतियों को समझने में कामयाब होगी और पड़ोसी मुल्कों की बीच संबंधों की नयी जमींन तैयार होगी।

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