बाबा रामदेव न संत बन पाये न लीडर

शादाब जफर ”शादाब”

एक बहुत पुराना और बहुत ही मशहूर है शेर ”ना खुदा ही मिला ना विसाल-ए-सनम,ना इधर के रहे न उधर के रहे। आज ये शेर बाबा रामदेव के जीवन पर कितना सटीक बैठ रहा है। स्वदेशी के मुद्दे को लेकर चले बाबा रामदेव ने गंगा, काले धन और फिर भ्रष्टाचार पर जिस प्रकार आन्दोलन चलाने का ढोंग कर देश की जनता और अपने भक्तो को गुमराह किया उस का नतीजा ये है कि आज बाबा की अपनी, पंतजलि पीठ और योगी बालकृष्ण की छवि पूरे देश में धूमिल हो गर्इ है। केवल सत्रह साल में 1177 करोड रूपये का एक बडा साम्राज्य खडा करने वाला एक बाबा सरकार से आखिर किस मुह से काले धन और भ्रष्टचार का सवाल कर सकता है। जिस प्रकार आज बाबा और आचार्य बालकृष्ण उल्टे लपेटे में आये है ये कह सकते है कि ”जिन के घर शीशे के होते है वो दूसरो पर पत्थर नही फेका करते। आचार्य बाल कृष्ण का पासपोर्ट, स्कूल की मार्कशीट डिगि्रया और यहा तक कि उन का अपना नाम भी फर्जी है। वही बाबा पर प्रर्वतन निर्देषालय को बाबा द्वारा स्थापित पतंजलि पीठ के रिकार्ड खगालने के बाद ये जानकारी हासिल हुर्इ है कि बाबा ने हिन्दुस्तान से तीन लाख डालर विदेश भेजे थे। इस के आलावा र्इडी ने बि्रटेन के अधिकारियो से भी सम्पर्क किया है। इन अधिकारियो से स्कार्टलैण्ड के एक द्वीप से जुडी जानकारी मांगी गर्इ है। जो योग गुरू रामदेव के अनुसार उन्हे उपहार में मिला है। वास्तव में बाबा रामदेव से जुडी ये बाते एकदम चौकाने वाली है आष्चर्यजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है। इस पूरी घटना ने केवल बाबा रामदेव को ही नही बलिक देश के सभी संत-महात्माओ को शंका के दायरे में लाकर खडा कर दिया। यदि प्रर्वतन निर्देषालय का शंका और जाच सही सही हो गर्इ तो बाबा अपने इस पाप का प्रायश्रित किस प्रकार करेगे कहा नही जा सकता। सचमुच बाबा योग की आड में अतिमहत्वाकांषा के जाल में फंसते चले गये। में यहा ये बात सोच रहा हू कि अगर बाबा खुद भ्रष्टचार में गले गले तक डूबे थे तो फिर उन्होने विदेशों में जमा भारतीय लोगो के काले धन का मुद्दा क्यो उठाया। बाबा रामदेव ने शायद प्रधानमंत्री बनने का खवाब देख लिया था पर इस ख्वाब के चक्कर में वो अपनी योग गुरू की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगा बैठे।

दूसरा सब से बडा सवाल ये उठता है कि इस बात को अगर दूसरी निगाह से देखा जाये तो यू भी कह सकते है कि कुछ सियासी लोगो ने बाबा के करीब पहुच कर उन की सारी कमजोरिया जानकर उन्हे देश की जनता के सामने इस प्रकार लाकर खडा कर दिया कि आज बाबा रामदेव न तो संत ही रह गये और न लीडर बन पायें। बाबा का अन्जाम वो ही हुआ जो इन सियासी लोगो ने सोचा था। कांग्रेस की भ्रष्ट यूपीए और दिल्ली सरकार ने चाणक्य नीति साम, दाम, दण्ड, भेद अपनाते हुए बाबा रामदेव को रामलीला मैदान में भेद ही दिया होता यदि समय रहते बाबा रामदेव मंच से कूदकर न भागते। बाबा रामदेव ने जिस जोश के साथ भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ दिल्ली के रामलीला मैदान में आन्दोलन शुरू किया था। भ्रष्टाचार के खिलाफ तैयार किये गये अनशन स्थल के पंडाल को पूरी तरह एक फाइव स्टार होटल जैसी सुविधाए प्रदान की गर्इ थी। मिसाल के तौर पर पंडाल में सैकडो एसी लगाये गये थें। अनशनकारियो के बैठने के लिये गद्दे डाले गये थे, बाबा ने अपने लिये खुद वातानुकूलित स्टेज बनावाया था। पंडाल में स्टेज तक पहुचने के लिये बीच में एक गाडी के गुजरने की जगह छोडी गर्इ थी। आन्दोलन शुरू करने के पहले उनकी सोच क्या थी ? क्या वो इस आन्दोलन की आड़ में किसी राजनीतिक दल की घोशणा करना चाहते थे। क्यो की तमाम मांगो के बीच सरकार से बाबा की एक मांग और थी जो काफी चौकाने वाली है बाबा चाहते थे कि देश में प्रधानमंत्री का चुनाव सीधे जनता द्वारा किया जायें। इस से ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाबा अनशन के बहाने जनता कि नब्ज टटोलकर देखना चाहते थे कि क्या उन्हे राजनीति में आना चाहिये या नही। जिस कारण बाबा का ये आन्दोलन पूरी तरह से सियासी हो गया और अन्दरखाने आरएसएस और उस के सहयोगी दलो ने जिस प्रकार बाबा की हा मैं हा मिलार्इ लोगो को लगने लगा कि बाबा भाजपा और आरएसएस के इशारो पर नाच रहे है। जब कि बाबा के इस अनशन से न तो भाजपा को कोर्इ फायदा हुआ और न ही आरएसएस को उल्टे बाबा खुद ही पूरी तरह से राजनीति का शिकार हो गये। और अन्त में बाबा के काम बाबा ही आये। श्री श्री रवि शंकार और मुरारी बापू ने बाबा को अगर समय रहते अनशन न तुडवाया होता तो बाबा आज कहा होते भगवान ही जाने।

बाबा पर खार खार्इ केंन्द्र सरकार इस वक्त बाबा पर पूरा शिकजा कसना चाहती है। वित्त मंत्रालय को बाबा के खिलाफ शिकायत की आड़ लेकर सरकार द्वारा बाबा के खिलाफ कर्इ प्रकार की जाच शुरू की जा चुकी है। इस वक्त र्इडी और सरकार के निषाने पर बाबा की दिव्य फार्मोसी है। जो सालाना करोडो रूपये की आयुर्वेदिक दवार्इया विदेशो को निर्यात करती है। बाबा पर सरकार ये आरोप लगा रही है कि दिव्य फार्मेसी द्वारा विदेशों में निर्यात की गर्इ दवाओ की कीमत जानबूझ कर काफी अधिक दिखार्इ जाती है। जिस की आड़ में बाबा विदेश में जमा अपने काले धन को वापस सफेद कर लेते है। र्इडी अब तक दिव्य फार्मेसी द्वारा विदेशो में भेजी दवाओ का विस्तृत ब्योरा और आय की जानकारी भी बाबा से मांगने की तैयारी कर रही है। यही नही र्इडी बाबा रामदेव की पतंजलि योगपीठ द्वारा कितने शिविर विदेशों में लगाये गये व इन से कितनी आमदनी हुर्इ इस भी जाच करने में जुट गर्इ है।

उधर राखी सावंत ने बाबा से शादी का प्रस्ताव रख एक नया मुद्दा छेड दिया है। राखी सावंत ने ये धमकी तक दे डाली है कि अगर बाबा रामदेव ने उन की शादी का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तो वो इस मुद्दे पर अनशन भी कर सकती है। राखी सावंत का कहना है कि बाबा ने पिछले दिनो एक टीवी शो में आर्इटम गल्र्स के बारे में एक अपमानजनक वक्तव्य दिया था। वो बाबा की पत्नी बन कर ये साबित कर देगी की आर्इटम गल्र्स होते हुए भी वो पति की सेवा करने वाली एक आदर्श पत्नी हो सकती है। अब देखना ये है कि ऊठ किस करवट बैठता है। बाबा राखी के स्वामी बनते है या नही ये तो बक्त बतायेगा पर राखी को उन का इस तरह का आचरण हमेषा सुर्खियो में जरूर रखता है जिस से उन्हे नाम भी मिलता है और दाम भी।

 

32 thoughts on “बाबा रामदेव न संत बन पाये न लीडर

  1. बाबा ने इस बटे हुये देश मे हिंदू और मुस्लिम को एक करने का सफल प्रयास किया है , पुरानी बातो को छोड़कर नई सुरुआत की , सभी को एक मंच पर ला दिया ,यह बात कांग्रेसियो को नही पची ,क्योकि अँग्रेज़ की जो औलाद ठहरी, फुट डालो और राज करो की नीति को अपनाते है ये कलंकी, भारत का दुर्भाग्य है येसे पापीयो का समूल अंत नही हो रहा है ,इनके जैसी गंदी नीति अपनाना पड़ेगा. 121 करोड़ भारतीयो की हाए इन कांग्रेसियो को लगी है इसलिय अब इनका पागलपन चालू हो गया है मतलब अंत नज़दीक है.
    बाबा रामदेव की एकता की बात को हर मंच पर ज़ोर शोर से उठाया जाना चाहिया. यही कांग्रेस को मजबूत जबाब होगा.

  2. —–‘‘श्री कौशलेन्द्र जी यदि आपकी आत्मा जिन्दा हो तो अपनी अंतरात्मा से पूछिए कि आप कितने न्याय प्रिय हैं?’’——

    श्री कौशलेन्द्र जी आपकी अनेक टिप्पणियों को पढने के बाद लगता है कि………आप भारत के जिम्मेदार नागरिक हैं| हालांकि पहले-पहले मुझे कुछ और लोगों के बारे में भी प्रवक्ता पर यही लगता था, लेकिन बाद में पता लगा कि उनके मुखौटों की अनगिनत संख्या है|

    इस सबके उपरान्त भी आपकी एक पक्षीय और पूर्वाग्रही टिप्पणी दि. २०.०८.११ को पढकर मैं लिखने को विवश हूँ कि-‘‘यदि आपकी आत्मा जिन्दा हो तो अपनी अंतरात्मा से पूछिए कि आप कितने न्याय प्रिय हैं?’’

    १-क्या आपको सिर्फ मेरी ही टिप्पणी असंतुलित लगी? दूसरे अभद्र और रुग्ण टिप्पणीकार क्या आपके माथे पर डंडा मारने के लिए आपके सामने खड़े हुए हैं? या

    २-आपकी नज़र में सत्य की अनदेखी करना भी सत्य है और सत्य बोलने वालों को संयम के नाम पर चुप करवाना भी सत्य और हिन्दू धर्म के उत्थान के लिए जरूरी धार्मिक कार्य है? यदि हॉं तो कृपया इस पर भी प्रकाश डालें|

    ३-क्या आप मुझे बताने का कष्ट करेंगे कि मैंने ‘‘वर्ग विहीन या जाति विहीन समाज’’ की स्थापना के बारे में, मेरे किस लेख या मेरी किस टिप्पणी में वकालत की है?

    ४-एक बात यह भी समझने की है कि मीणावाद का विरोध और मीणाओं के विरोध में अन्तर है| इसी प्रकार से ब्राह्मणवाद के विरोध और ब्राह्मणों के विरोध में भी अन्तर है| मैं ब्राह्मणों का भी उतना ही आदर तथा सम्मान करता हूँ, जितना कि मीणा, गूजर, चमार, खटीक, भंगी, बनिया, कायस्थ या राजपूत जाति के लोगों का, लेकिन तब तक ही, जब तक वे ब्राह्मण बने रहते हैं, जैसे ही वे ब्राह्मण कुल की जन्मजातीय श्रेृष्ठता का बखान करते हुए स्वयं को पूज्यनीय और भू-देव घोषित करते हैं और दूसरी जाति के लोगों को इसी आधार पर कमतर या ब्राह्मणों हीन सिद्ध करने का कुप्रयास करने लगते हैं-वहीं से वे मनुवाद और ब्राह्मणवाद की बीमारी का शिकार हो जाते हैं और ऐसे बीमार व्यक्ति का सम्मान करना सम्भव नहीं!

    ५-जो धार्मिक साहित्य हमारे देश में हिन्दी में आसानी से और हर एक व्यक्ति को उपलब्ध है, उसे छोड़कर या उसे संदिग्ध मानकर आप किसी अनाम (किराये का कहने पर आपको एतराज है, जिसका सम्मान करते हुए) लेखक के विचारों या किसी/किन्हीं विदेशी लेखक के अन्वेषणों मेंे क्यों उलझना या मुझे उलझाना चाहते हैं? वैसे भी मुझे अंग्रेजी आती भी नहीं है! आदिवासी जो ठहरा!

    ६-जो कुछ गीता प्रेस या अन्य प्रकाशकों द्वारा हिन्दी में प्रकाशित है, उसमें यदि किसी के द्वारा तोड़-मरोड़ या छेड़छाड़ की गयी है, तो उसे सिद्ध करने के बजाय आप नई और उन बातों को ’जबरन थोपना’ (मेरे पास इसके लिए इससे निर्मल शब्द नहीं है) चाहते हैं, जिनको आप लोगों (इस विचार के समर्थकों) के अलावा ’कोई भी’ (देश के ९८ फीसदी हिन्दू) न तो जानते हैं और न हीं मानते हैं! (मेरी जानकारी के अनुसार! जरूरी नहीं कि मेरी जानकारी अंतिम सत्य हो, यदि कोई पुख्ता आधार हो तो मैं अपना कोई भी विचार एक क्षण में बदलने को तैयार हूँ)

    ७-‘‘बदले की भावना’’-‘‘क्रिया की प्रतिक्रिया की नीति’’ मेरी नहीं ये नीति तो आपके सम्मानित साथी और कथित विद्वान लेखक और संयमित टिप्पणीकार डॉ. मधुसूदन जी की है! मैं उस गांधीवाद का बिलकुल भी समर्थक नहीं जो ‘अपराधियों से नहीं अपराध से घृणा करने का झूंठा प्रचार करके समाज को दिग्भ्रमित करता हो?’ मेरा तो साफसुथरा सोच है कि-

    -अन्याय के खिलाफ चुप्पी का मतलब अन्यायी तथा अन्याय का समर्थन है!

    और बोलने की आजादी का मतलब

    -अंतिम रूप से सत्य सिद्ध नहीं हो जाने तक किसी भी संदिग्ध विषय पर असहमत होने का सम्पूर्ण अधिकार है!

    और एक बात-

    -आज के समय में मूर्खों, मुखौटे लगाकर देश और समाज को अन्धकूप में डालने वाले चालकों, चाटुकारों, धोखेबाजों और धूर्तों के दरबार में चुप्पी, संयम, असंयम और कठोरता (जहॉं और जब भी जो जरूरी हो) प्रतिकार का हर सम्भव तरीका जायज, न्यायसंगत और विधि-सम्मत हैं! आप जानते ही होंगे कि ‘‘हत्या करने को उतारू अपराधी से प्रतिरक्षा करने के लिये हमलावर की हत्या तक कर देने का अधिकार तो भारतीय दंड संहिता भी हर व्यक्ति को प्रदान करती है!’’

    -बेबुनियाद बातों और कहानियों की मनगढंथ रचना करके किसी का चरित्र हनन और वो भी सत्य को दबाने के लिए करना, चरित्र हत्या ही तो है और चरित्र हत्या करके ही हम वैचारिक दुश्मनों का (जो बाद में अपराधियों में भी बदल सकते हैं) निर्माण करते हैं! अत: अपराधी पैदा करने वाले अपराधियों को हलके (संयम) से लेना समझदारी नहीं, मूर्खता ही है!

    हालांकि मैं अपने मौलिक संस्कारों के अनुसार इस बात से भी सहमत हूँ कि विवाद को जितना जल्दी सम्भव हो समाप्त कर दिया जाये| लेकिन इसे मैदान छोड़कर भागना समझने वाले कमजोरी मान लेते हैं| यहीं से अशिष्टता पैदा होने लगती है!

  3. लेखक का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है, इन्हें आइन्दा से ना पढ़े इनका लिखा हुआ जहां भी देखे नज़रें फेर ले जैसा की आप लोग “मीणा” और “श्रीराम तिवारी” को देख कर करते हैं,यकीन करिए मैंने इस लेख को सरसरी निगाह से भी नहीं देखा है विद्वान् भाइयों की टिप्पणियाँ देखकर ही समझ गया था की मजमून क्या है,

  4. संजीव कुमार सिन्हा जी और डा: पुरुषोतम मीणा “निरंकुश” जी के बीच स्वस्थ “बहस” और “चर्चा” पर मत भेद में इन पन्नों से मेरी निम्नलिखित टिप्पणी लुप्त हो गई है| मैंने अपनी टिप्पणी catche में देखी है तो सोचता हूं कि अवश्य ही इसे पाठकों से छुपाने का कोई कारण होगा| देश की हालत देखते हुए मैं भारत में अब दो ही पक्ष देखता हूं, कांग्रेस के विरोधी और कांग्रेस के सहयोगी जो तदनुसार राष्ट्रवादी और राष्ट्रद्रोही होने के प्रतीक हैं| जब राष्ट्रवादी पक्ष अंगद के पग के समान अपनी धुन में दृढ है तो राष्ट्रद्रोही पक्ष तरह तरह के हथकंडे अपना कर राष्ट्रवादी पक्ष को नष्ट करने में लगा हुआ है| बाबा संत हैं इस में दो मत नहीं परन्तु उनके शक्तिशाली राष्ट्रद्रोहियों और भ्रष्टाचारियों के विरोध में चलाये अभियान में उनका नेतृत्व प्रत्यक्ष दिखाई देता है| यदि प्रस्तुत लेख राष्ट्रद्रोहियों के घिनोने प्रयास में हितकारी नहीं है तो क्या बाबा के संकल्प का प्रतिकर नहीं करता है; उन पर कीचड नहीं उछालता है?

    “कोलकाता में केन्द्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुख़र्जी नें संवाददाता सम्मेलन में बताया है कि रामदेव, अन्ना, और बीजेपी से निपटने हेतु उन पर कांग्रेस के विचारों का एक दस्तावेज तैयार किया है| उन्होंने कहा कि पार्टी जिला से लेकर प्रखंड स्तर पर वाद-विवाद, परिचर्चा, व अध्यन गोष्ठिओं द्वारा जागरूता अभियान चलाए गी| यह लेख बाबा रामदेव के ऊपर कीचड़ उछालते कांग्रेस के “जागरूकता अभियान” में मात्र एक कड़ी है और मेरा विश्वास है कि आज भारतीयों को, विशेषकर भारत की युवा पीढ़ी को अपने अच्छे बुरे की पहचान है| उन्हें कोई शादाब जाफर “शादाब” अपने लक्ष्य से विचलित नहीं कर सकता|

    पनवाडी की दुकान पर नशा करती धमाचौकड़ी में कही अपनी गप्प को यहाँ तोते की तरह उल्लिखित कर लेखक ने अपने मालिक की लाज रख ली है| रेणुका चौधरी का तोता तो शादाब जाफर “शादाब” हैं!”

  5. डॉ. मीणा जी ने कहा है,
    ”संजीव जी ने इसे ‘‘बहस’’ का मंच बनाकर ही पेश किया हुआ है| कहीं यही तो एक वजह नहीं कि यहॉं पर चर्चा कम और बहस अधिक होती है? मेरा विनम्र मत है कि बहस एक दूसरे को हराने के लिये होती है, जबकि चर्चाओं का मकसद, नतीजे निकालना या समस्याओं का निराकरण एवं समाधान करना होता है| आशा है कि हम सब और संजीव जी इस दिशा में विचार करेंगे!”

    और ‘प्रवक्‍ता डॉट कॉम’ का मानना है-
    ”स्वस्थ बहस ही लोकतंत्र का प्राण होती है। यहां आप समसामयिक प्रश्‍नों पर अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं।”

    आदरणीय मीणा जी, यदि आपने ध्‍यानपूर्वक पढ़ा होता तो आपको ‘स्‍वस्‍थ’ शब्‍द भी अवश्‍य दिखाई दिया होता।

  6. आदरणीय रेखा सिंह जी,
    आपको अधिक जानने का दावा तो मैं नहीं कर सकता, लेकिन अभी तक मैंने आपकी जितनी भी टिप्पणियॉं पढी हैं| उनके आधार पर यहॉं पर प्रस्तुत आपकी टिप्पणी के आधार पर मैं यह उपकल्पना करने को विवश हूँ कि यह टिप्पणी शायद यथार्थ नहीं, बल्कि व्यंगभरी वक्रोक्ति है|

    फिर भी आपको निवेदन कर दूँ कि ‘‘मैं न तो किसी के पूरी तरह से खिलाफ हूँ और न हीं पूरी तरह से किसी के अन्ध-समर्थन में हूँ|’’

    मेरा स्पष्ट मानना है कि उपलब्ध तथ्यों और प्रकट हालातों के आधार पर अपने विवेक का उपयोग करके किसी का समर्थन करने या विरोध करने या तटस्थ रहने का निर्णय लिया जाना चाहिये| अभी तक इसी आधार पर मैं अपने निर्णय लेता रहा हूँ| इस कारण से-

    १. मैं अलग-अलग कारणों से कॉंग्रेस, भाजपा, जनता दल एवं वामदलों का कभी न कभी समर्थक या विरोधी रह चुका हूँ, लेकिन अनेकों दलित मित्रों के परामर्श के बाद भी, आज तक बसपा का समर्थन नहीं कर सका| कल क्या होगा मुझे नहीं पता?

    २. इसी प्रकार से मैं विश्‍व हिन्दू परिषद, संघ जैसे हिन्दूवादी संगठनों द्वारा मनुवाद का समर्थक होने के कारण शुरू से ही कड़ा विरोधी होते हुए भी आतंकी घटनाओं से निपटने के मामलों में, मैंने कई बार इनके विचारों का समर्थन किया था, लेकिन कुछ कारणों से अब इस विषय पर भी इनका समर्थन करना सम्भव नहीं है-प्रथम गुजरात में मुसलमानों का कत्लेआम, दूसरा-कंधार काण्ड| तीसरा-प्रज्ञासिंह, असीमानन्द जैसों का बचाव एवं समर्थन|

    ३. इसी प्रकार से बाबा रामदेव की योग नीति का मैं समर्थक हूँ, लेकिन दवा बेचने की उनकी नीति का समर्थन नहीं करता| विरोध भी नहीं करता, क्योंकि शुद्ध एवं सही दवाई उपलब्ध करवाने का उनका दावा है, यह तर्क ठीक होकर भी इसे मुनाफे से जोड़ दिया गया है, इस कारण यह आलोच्य है| जब बाबा कहते हैं कि वे भारत को धर्म-निरपेक्षतावादी राष्ट्र के बजाय आध्यात्मवादी राष्ट्र बनायेंगे तो उनकी सोच पर तरस आता है| इसी प्रकार बाबा भ्रष्टाचार (कालेधन) से निपटने के लिये जो जो भी तर्क देते हैं, वे सब हास्यास्पद हैं| हम भी चाहते हैं कि भ्रष्टाचार से निपटने के मामले में हम उनका समर्थन करें, लेकिन उनके कुतर्कों का समर्थन करना और वो भी तब जबकि बाबा को संघ तथा भाजपा जैसी साम्प्रदायिक ताकतों का खुला समर्थन हो, उनको सक्रिय रूप से साथ देना हमारी नीति के अनुरूप नहीं है? फिर भी बाबा के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के हम समर्थक हैं और आगे भी रहेंगे|

    ४. जहॉं तक अन्ना की बात है तो हम अन्ना के न तो समर्थक हैं और न हीं विरोधी, लेकिन अन्ना ने जिस प्रकार से भ्रष्टाचार के विरुद्ध देशभर में अभियान चलाया है और उससे निपटने के लिये जन लोकपाल बिल प्रस्तुत करके समाधान सुझाया है, तो प्रारम्भ में हम कुछ कारणों से पूरी तरह से सहमत नहीं थे, आज भी वे कारण अपनी जगह पर जिन्दा हैं, लेकिन अब इस मुद्दे पर हम समर्थन करते हैं| जबकि दूसरी ओर अन्ना हजारे, हिन्दी भाषी लोगों को मुम्बई से खदेड़ने के राज ठाकरे के अभियान के समर्थक हैं और इस कार्य के लिये अन्ना ने राज ठाकरे को खुला समर्थन तथा आशीर्वाद भी दिया था| अन्ना के इस कृत्य की हम भर्त्सना और निन्दा ही नहीं करते, बल्कि इसे हम राष्ट्र विरोधी कृत्य भी करार देते हैं| अत: हम ‘‘अन्ना का नहीं भ्रष्टाचार के विरोध में अन्ना के अभी तक ज्ञात विचारों और जन लोकपाल बिल को संसद में विचारार्थ पेश किये जाने का पुरजोर समर्थन करते हैं|’’ जिसका सबूत हम आपकी उक्त टिप्पणी से पूर्व ही १८.०८.११ को जयपुर में सार्वजनिक रूप से रैली आयोजित करके दे चुके हैं| विस्तार से पढने के लिये नीचे दिये लिंक पर क्लिक करके पढा और देखा जा सकता है :-

    ५. मोहन दास कर्मचन्द गॉंधी तथा डॉ. भीमराव अम्बेड़कर के मामले में भी इसी प्रकार से मेरे अपने विचार हैं| गॉंधी ने दलितों और आदिवासियों को प्रदान किये जा चुके, पृथक निर्वाचक प्राधिकार को छीनने के लिये आमरण अनशन करके डॉ. अम्बेड़कर के ऊपर जबरन पूना पैक्ट थोपा और इसी पूना पैक्ट ने समाज को आरक्षित एवं अनारक्षित के रूप में विभाजित कर दिया| जिसके चलते आज देश में और विशेषकर हिन्दू समाज में लगातार विघटन बढ रहा है| जिसके लिये मैं पूरी तरह से गॉंधी को जिम्मेदार ही नहीं, दोषी भी मानता हूँ| क्योंकि इसके पीछे गॉंधी का मकसद दलितों और आदिवासियों को हमेशा के लिये पंगु बनाकर रखना था| जबकि देश की आजादी के संघर्ष में गॉंधी की भूमिका का विरोध असम्भव है| हालांकि भगत सिंह को फांसी से नहीं बचाने के लिये पूर्ण प्रयास नहीं करने और सुभाष चन्द्र बोस को कॉंग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ने को विवश करके बोस को कॉंग्रेस के मुख्य मंच से अपदस्थ करके गॉंधी ने ऐसे कभी न क्षमा नहीं किये जा सकने वाले कार्य (पाप) किये हैं, जिनके चलते मेरे जैसे अनेक लोग गॉंधी को देश के राष्ट्रपिता के रूप में कॉंग्रेस द्वारा जबरन थोपा गया व्यक्ति मानते हैं|

    इसी प्रकार से डॉ. अम्बेड़कर के निम्न तबके के उत्थान के लिये किये गये संघर्ष को सारे देश के लोगों के साथ-साथ मैं भी सलाम करता हूँ, लेकिन संविधान निर्माण के समय निम्न तबकों को पूना पैक्ट के अनुसार पूर्ण अधिकार प्रदान करके लिये सरदार पटेल, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जैसे नेताओं के दबाव में आकर समुचित तथा कड़े प्रावधान नहीं करने की, मैं कड़ी निन्दा भी करता हूँ और अन्तत: हिन्दू धर्म से पलायन करके बौध्द धर्म अपना लेने के उनके नीति का मैं कतई भी समर्थन नहीं करता| केवल यही एक सबसे बड़ा कारण था कि मैंने ‘‘अजा एवं अजजा के संगठनों के अखिल भारतीय परिसंघ’’ के राष्ट्रीय महासचिव जैसे महत्वूपर्ण पद की परवाह नहीं करके परिसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. उदित राज का खुलकर भरी सभा में विरोध किया, जो उनके लिये अप्रत्याशित था| क्योंकि परिसंघ में उनकी खिलाफत करना तो दूर कोई, उनके सामने ऊँची आवाज तक में नहीं बोल सकता| लेकिन अपने सिद्धान्तों की बलि देने के बजाय उनसे साफ शब्दों में कहा कि हमको परिसंघ के मंच और कार्यक्रमों में ‘‘बुद्धम शर्णम् गच्छामि’’ बोलने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता|

    अत: रेखा सिंह जी मेरा तो साफ मानना है कि जिस किसी में भी विवेक होगा, वह किसी का भी अन्धभक्त नहीं हो सकता| आपको जानकर आश्‍चर्य होगा कि जब राजस्थान में गुर्जर आरक्षण आन्दोलन चल रहा था तो हमारे संगठन ‘‘भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)’’ के अनेक गुर्जर एवं मीणा अनेक नासमझ लोग रोड पर आकर आपस में एक दूसरे के खिलाफ आग उगल रहे थे| हिंसा हो रही थी, लेकिन तब भी और आज भी ‘बास’ के मंच पर हम सब एक हैं|

    इसी प्रकार से हमारे अनेक कार्यकर्ता राजस्थान में आरक्षित एवं अनाराक्षितों द्वारा चलाये जा रहे मिशन ७२ एवं मिशन २८ से जुड़े हुए हैं, लेकिन ‘बास’ के मंच पर सब एक हैं| कहने का अर्थ केवल यही है कि मैं जितना अपने आपको विचार व्यक्त करने के लिये आजाद मानता हूँ, उतनी ही, बल्कि उससे भी अधिक आजादी अपने ‘बास’ के कार्यकर्ताओं को देकर प्रसन्न होता हूँ| इसी को कहते हैं वैचारिक स्वतन्त्रता की आजादी| जिसे मतभिन्नता कहा जाता है, मनभिन्नता नहीं|

    इसलिये हम कभी भी व्यक्तिगत आक्षेप लगाने वाली बातें नहीं करते, लेकिन अत्यन्त खेद है कि हम सबने प्रवक्ता के मंच को व्यक्तिगत आक्षेपों का मंच बना दिया है| हम इस मंच की गरिमा को धूलधूसरित कर रहे हैं| काश हम यहॉं ‘‘बहस’’ नहीं नहीं केवल ‘‘चर्चा’’ करते, परन्तु संजीव जी ने इसे ‘‘बहस’’ का मंच बनाकर ही पेश किया हुआ है| कहीं यही तो एक वजह नहीं कि यहॉं पर चर्चा कम और बहस अधिक होती है? मेरा विनम्र मत है कि बहस एक दूसरे को हराने के लिये होती है, जबकि चर्चाओं का मकसद, नतीजे निकालना या समस्याओं का निराकरण एवं समाधान करना होता है| आशा है कि हम सब और संजीव जी इस दिशा में विचार करेंगे!

  7. (१) शैलेंद्र जी , आपके विचार जानकर खुशी हुयी, कि, “मेरा भाई कितना भी ख़राब हो मैं घर में उससे लडूंगा लेकिन इसमें पडोसी का साथ कभी न लूँगा।”
    (२) आपने विवेकानन्द जी के विचारों को ही दोहराया है। छोटा सुधार : विवेकानन्द जी का सुझाव रचनात्मक है, संघर्षात्मक नहीं है।
    (३) उन्होंने कुछ ऐसा कहा था। कोई भी समस्या को “अपनी समस्या” कहो (मानो), “हमारी कहो, “अपनी” कहो। ना सोचो कि आप और हम अलग हैं।
    (४) इतिहास में बहुत आंदोलन इसी विचार से सफल हुए। ऐसे विचारसे “शत्रुता” नहीं जगती। और सहकार प्राप्त होता है।
    (५) पर कोई कहे, कि, समस्या आप की है;मेरी नहीं। उसे स्वामी जी पूछते हैं, तो आप कौनसे अधिकारसे यह कहते हैं? उसे विवेकानन्द जी कहते हैं, कि, आप अगर पराए हैं, तो आपको उत्तर देने हम बाध्य नहीं है। आपके नौकर है क्या? या हमने ठेका ले कर रखा है?
    (६) पर आप यदि अपने हैं, और मानते है, कि, देश की समस्याएं आपकी-हमारी-सभीकी है। तो विवेकानन्दजी हर्षसे कहते हैं, बहुत अच्छा आप और हम साथ मिलकर समस्याएं सुलझाएंगे। आइए कंधे से कंधा मिलाकर समस्याएं सुलझाते हैं।
    (७) अंत में दूसरों ने क्या करना चाहिए, यह कहने के बजाय, मीणा जी जिस में जैसा भी विश्वास करते हैं, वैसा करने से उन्हें क्या संघ ने रोका है?
    शैलेंद्र जी साधुवाद।

  8. “आरक्षण का आधार क्या होना चाहिए?”
    प्रवक्ता पर ये सवाल पुछा गया है और इस पर मत विभाजन कराया गया है
    मैंने अपना मत जातिगत को दिया है इसकी पुष्टि संपादक महोदय कर सकते है लेकिन मैं जातिगत विरोध में अँधा नहीं हो गया हूँ

  9. अरे मधुसुदन जी कोटा सिर्फ मीणा जी का ही नहीं है कोटे में तो अपना भी नाम है हार कैसे मान ले इन विदेशी पिट्ठुओं से
    मेरा भाई कितना भी ख़राब हो मैं घर में उससे लडूंगा लेकिन इसमें पडोसी का साथ कभी न लूँगा ये तो गद्दार है घर की लड़ाई में बाहरी को शामिल करते है
    जातिगत समस्याए मैंने झेली भी है और देखी भी है, हो सकता है वाराणसी जैसे शहर में रहने की वजह से मेरे अनुभव कम और मीणा जी का अनुभव ज्यादा कडुवा हो लेकिन विदेशियों का साथ अक्षम्य है

  10. आरक्षण के कोटा के अंतर्गत आप की जीत हुयी है, ऐसा, मान लिजिए, डॉ. मीणा जी, और बहस छोडिए। गौर गरिमा बनाए रखिए।

  11. यह बाबा रामदेव और अन्ना में फूट डालने की तकनीक है|
    समय एकजुट होनेका है, भ्रष्टाचार के विरोध में|

  12. मीड़ा जी ,
    इस समय तो आपको टीम अन्ना के साथ व्यस्त होगे |भ्रष्टाचार के मुद्दे पर|बाबा रामदेव के साथ ४ जून ११ को रामलीला मैदान में तो नहीं थे लेकिन अब तो अन्ना टीम के साथ जरूर होगे ?

  13. अभी तक तो हिन्दू धर्म की आड़ लेकर हिंदुत्व को बेचेन और बदनाम करने वालों के आर्थिक घोटाले ही सामने आये हैं! अभी तो ऐसे लोगों के चेहरों के कई नकाब उतरने बाकी हैं! देखते जाएँ आगे-आगे होता क्या है? पवित्रता मूर्ती बने लोगों के मन और तन तथा चरित्र कितने मैले हैं, ये यहाँ प्रवक्ता पर भी खूब देखने को मिल रहा है! मुझे जितने भी आर एस एस के लोग आज तक मिले हैं वे प्रवक्ता पर टिप्पणी करने वाले या भोंकने वालों से तो अधिक ही सभ्य दीखते थे! अब सोचता हूँ कि कहीं वे सब अच्छे और सभ्य दिखने का नाटक तो नहीं करते हैं? क्योंकि अपने आपको बुद्धिमान और विद्वान कहने वाले संघियों का संघ ने ये हाल बना दिया है कि उन्हें अपने अलावा सबके सब गद्दार नजर आते हैं! कम से कम हिंदुत्व के नाम पर जो कुकर्म इनके पूर्वजों ने किये हैं, उनके खिलाफ बोलने वाले लोग तो इन्हें सबसे बड़े गद्दार नज़र आते हैं! जबकि यही वो बिंदु है जो इनको इस देश में खलनायक बना रहा है! काश इनको ये बात समझ में आ जाती? अपने पूर्वजों के कुकर्मों को कुतर्कों के सहारे सही सिद्ध करने के असफल चक्कर में ये अपना वर्तमान तो बिगाड़ ही रहे हैं, अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी बर्बाद कर रहे हैं! अब देश जग रहा है किन्तु ये लोग गहन निद्रा में हैं!

  14. http://www.dalitnetwork.org/go?/dfn/about/C31/
    ये सही लिंक है
    All-India Confederation of Scheduled Caste and Scheduled Tribe Organizations (SC-ST Confederation).
    मीणा जी के इस संगठन से सम्बन्ध क्या है ये भी जान लीजिये
    १. http://www.merikhabar.com/News/_N39962.html
    २. http://www.pravakta.com/archives/author/dr-purushottammeena
    अभी तीन दिन पहले मैं इनके ब्लॉग http://presspalika.blogspot.com/
    पर गया था वहां इनके परिचय में इनका ये पद (पूर्व राष्ट्रीय महासचिव : अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ) भी उल्लिखित था लेकिन अब वो वहां से हटा लिया गया है बाकि सब सुधी पाठकों के भरोसे छोड़ दे रहा हूँ
    यह टिप्पणी मैं मीणा जी के पिछले लेख पर कर चुका हूँ यहाँ पर ये यह बताने के लिए है कि विदेशी पैसे से चलने वाले चर्च के पिट्ठुओं के से हमें देशभक्ति का प्रमाणपत्र लेने कि जरूरत नहीं है
    और हाँ मीणा जी ने आपने देशभक्त भारतीयों का पता माँगा था कोई दे न दे मैं दे रहा हूँ
    शैलेन्द्र कुमार
    पता – जे ८/९१ ए-२ जैतपुरा, वाराणसी, यू.पी
    फ़ोन – ८००४३६७४३५
    मेल – gopiait@gmail.com

  15. बाबा राम देव बिलकुल अपनी और जनता की नजरो में बिलकुल सत्ये हे दोसी सर्कार को तओ दूसरा आदमी दोसी ही देखेगा

  16. जबसे मीणा की असलियत सामने आई है, उसके तेवर ही बदल गए हैं|
    देश की अखंडता को तोड़ने वाले की भाषा आज अलग ही है| लिखता है
    “मधुसूदन जी इंतजार करो आप जैसों को शीघ्र ही इस देश में अपनी वास्तविक औकात क़ा पता चल जायेगी!”
    अब इन जैसों की औकात सामने आने वाली है| बल्कि आ ही गयी है|

  17. शादाब जी आदाब
    आपका लेख पद कर थोडा अचरज हुआ क्योकि आपने जो तथ्य दिए ये सब मिडिया के भडुओ द्वारा पहले ही दी जा चुकी है .

    एक मुर्ख व्यक्ति भी ये अच्छी तरह से जनता है की चोर को चोर कहना सबसे बड़ा गुनाह है

    फिर कम से कम बाबा मुर्ख तो है नहीं ये बिलकुल सास्वत सत्य है की बाबा के पास कोई ब्लैक मनी नहीं है
    अन्यथा भ्रस्ताचार की जननी पूज्यनीय राजमाता सोनिया गधी बाबा का तम्बू उखाडावती नहीं उलटे उनकी गाड में बम्बू घुसवा देती इसीलिए हर संभव कोशिस की.जा रही है

    सीबीआई ई डी IB इन सब के पास केवल एक ही काम बचा है जिसे सारा देश जनता है वो क्या है

    किन्तु आप जैसे पदेलिखे लोगो को पता ही नहीं है

    अन्यथा अगर कोई कहता है की मै मर्द हू तो किसी पुलिस थाने में जाकर थानेदार को बोलो की तू चोर है ,

    तब कही जा कर बाबा को समझने जैसा ज्ञान आपको मिलेगा
    .
    बाबा के खिलाफ लिखने वालो की कोई कमी नहीं है फिर सुनी सुनाई बाते लिख कर आप कुछ साबित नहीं कर सकते .

    आलोचना लिखना अच्छी बात है सभी उसका सम्मान भी करते है किन्तु तथ्यपरक सत्य को सभी इज्जत देते है
    अन्यथा आप भी इस मिडिया में सामिल हो जाय सब चाँदी ही चाँदी है .

    शेष जो कुछ नहीं लिख रहा हु वह सब मीना की टिप्पणी पूरी कर देगी

    बहुत पहुचे हुए संत है डॉ मीना

  18. विद्वता का ढोंग करने वाले और दूसरों को बेवकूफ बनाने की मनुवादी कला में माहिर मानव के वेश में आतंकियों को बढ़ावा देने वाले अमरीका में बैठकर डॉ. मधुसूदन प्रवक्ता पर शान से लिखते हैं-

    “आपका कोई छुपा एजंडा, तो, नहीं ना? जैसा मीणा जी का है।”

    कितने विश्वास के लिख है, जैसे कि ‘मीणा’ प्रज्ञा सिंह, असीमानंद या अन्य संघ समर्थित आतंकियों की भांति कोई आतंकी कारनामों में लिप्त व्यक्ति हो?

    न तो अपनी उम्र का लिहाज और न देश के कानून की परवाह और तो और अपने देश की तथा मानव समाज की शिक्षा तथा सभ्यता की भी चिंता नहीं!

    किसी के बारे में मंगढ़ंथ टिप्पणी करने से पूर्व इन्हें जरा सी भी शर्म नहीं आती! शर्म होती तो आती? आप खुद आतंकवाद तक को तो जायज ठहरा चुके हैं और दूसरों पर आरोप गढ़ते और थोपते रहते हैं!

    अपने आपको असभ्य और अज्ञानी होकर भी दो चार लेख प्रवक्ता पर छप जाने के कारण लेखक समझने वाले मूर्खों को तो अनदेखा किया जा सकता है, लेकिन जब प्रवक्ता के संपादक की नजर में संयमित टिप्पणी करने वाले मधुसूदन तथा राजेश कपूर जैसे लोग भी इनकी हाँ में हाँ मिलाने लगें और उसी भाषा में बोलने लगें तो जवाब देना लाजिमी है और ऐसे लोगों को कानून के कठघरे में भी खड़ा किया जाना चाहिए! यदि किसी माई के लाल में दम है तो अपनी अशिष्ट और अपमानकारी टिप्पणी के साथ अपना साथी पता दर्ज करें! फिर देखें कि आप कितने बढे देशभक्त हैं? फिर आपको दलितों-आदिवासियों का अपमान करने का असली मतलब समझ में आएगा!

    देश में सत्रहवीं शदाब्दी के कानूनों के थोपना चाहते हैं कहने को तो अमरीका में रहते हैं और देश भक्ति की बात करते हैं, जिस देश का खाते हैं उसके खिलाफ बोलते हैं और जिस देश को छोड़ भागे उसकी चिंता करने का नाटक करते हैं! धर्म पाल जैसे किराये के लेखकों से देश के प्रमाणिक इतिहास के खिलाफ किताब लिखवाकर इस देश के मूल निवासियों को वनवासी और विदेशी एजेंट लिखते हो शर्म करो और सच्चाई नहीं पढी जाती तो बौखालाओ मत आज की सच्चाई यही है कि इस देश के लोग जग रहे हैं! अब देश में मनु क़ा नहीं जनता क़ा शासन है! आज भू-देवों का नहीं भू-मालिकों का जमाना है!

    जय तो भारत माता की बोलते हो और धरती माता को बेचने की दलाली करने वालों का गुणगान करते हो! शर्म है ही नहीं! ऊपर से ये और कि “आपका कोई छुपा एजंडा, तो, नहीं ना? जैसा मीणा जी का है।” हमारा एजेंडा खुला और साफ है!-“देश को मनुवाद से बचाना!”

    छुपा एजेंडा तो आपका है “क्रिया की प्रतिक्रिया” के नाम पर देश में आतंक को बढ़ावा देना! मधुसूदन जी इंतजार करो आप जैसों को शीघ्र ही इस देश में अपनी वास्तविक औकात क़ा पता चल जायेगी!

    नोट : यहाँ पर ये बात लिखने में मुझे कोइ संदेह नहीं है कि जाने अनजाने में या संभवत: अपने हिट बढाने के चक्कर में प्रवक्ता के संपादक गैर-कानूनी, अपमानकारी, जातिगत वैमनस्यता पैदा अकरने वाली, देश के सौहार्द को ख़राब करने वाली, धार्मिक उन्माद पैदा करने वाली, मनुवाद को बढ़ावा देने वाली, देश के संविधान को कमजोर करने तथा लचर बताने वाली, देश की गैर-भाजपाई सरकारों को बदनामे करने वाली, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और स्त्रियों क़ा अपमान करने वाले लोगों की टिप्पणियों तथा लेखों को न मात्र प्रमुखता से प्रकाशित कर रहे हैं, बल्कि उन्हें खुद ही लेख बनाकर प्रवक्ता पर लेखक के नाम से दो-दो स्थानों पर प्रकाशित करते हैं और अन्य लोगों को भी मेल पर प्रेषित भी कर रहे हैं!

    बेहतर होगा कि प्रवक्ता पर सबसे ऊपर लिख दिया जावे कि “यह आरएसएस एवं मनुवादियों का मंच हैं, जिनके खिलाफ लिखने वालों का यहाँ अपमान करना प्रवक्ता का लेखकीय धर्म है! प्रवक्ता पर सबको इस धर्म क़ा पालन करना होगा!”

    1. मीणा जी ! आपसे अनुरोध है कि ब्राह्मणों के प्रकरण पर संतुलन बनाए रखें.यूँ उग्र होने से आपके विरोधियों की संख्या में वृद्धि ही होगी. जब हम किसी जाति विशेष का नाम लेकर उसे आरोपित और लांछित करते हैं तो हम जिस श्रंखला का विरोध कर रहे होते हैं उसी को अनजाने में पोषित भी कर रहे होते हैं. संज्ञा कुछ भी हो – ब्राह्मण, दलित, आदिवासी या और कुछ …किसी भी संज्ञा को आरोपित करना, स्व से इतर अन्यों को लांछित करना निश्चित ही एक सुधारात्मक और स्वस्थ्य परम्परा नहीं कही जा सकती. क्योंकि तब तो यह बदले की प्रक्रिया हो गयी न ! क्या आप इस श्रंखला को बनाए रखना चाहते हैं ? या कि इसे तोड़कर एक सर्व कल्याणकारी परम्परा की नीव डालना चाहते हैं ? एक ऐसी परम्परा जिसमें किसी को किसी से कोई शिकायत न हो ….सभी का सम्मान हो …कोई वर्ग भेद न हो …सभी को स्व विकास के अप्रतिहत साधन और अवसर उपलब्ध हों …. रही बात मनुवाद की तो मैं यही कहूंगा कि पाखंडवाद का समर्थन मूर्खों के अतिरिक्त कभी किसीने नहीं किया. जो समाज को तोड़ने वाला है उसका विरोध होना ही चाहिए पर जो समाज को बांधने वाला है उसका तो अनुकरण होना चाहिए न ! चलिए, हम आपकी वर्गविहीन व्यवस्था के बारे में जानना चाहते हैं…..शर्त यह है कि विश्व की असफल हुयी व्यवस्थाओं (साम्यवादी / कम्यूनिस्ट ) के विश्लेषण के परिपेक्ष्य में आप अपनी बात कहें. तल्ख़ टिप्पणियों की अपेक्षा गंभीर चिंतन की ओर आइये , आपका स्वागत है.
      धर्मपाल जी ने मूलतः अंगरेजी में लिखा है, अंगरेजी में आदिवासी और वनवासी दोनों के लिए ट्राइब शब्द प्रयुक्त होता है. वे किराए के लेखक नहीं थे. उनके जीवन चरित्र के बारे में जाने बिना कोई आरोप लगाना उचित नहीं होगा. पुनः आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप पहले उन्हें पढ़ें तो सही ( अनुवाद नहीं , मूल भाषा में ). उसके बाद भी उनके प्रति यदि आपके विचारों में परिवर्तन न हुआ तब आप कैसी भी टिप्पणी कर सकने के लिए स्वतन्त्र हैं.

  19. लिखने से पहले अपनी तरफ तो देख लेता बाबा के बारे मई लिख कर क्या मिला .कुछ नहीं मिल पायेगा . किसी पर उगली उठाने से पहले अपने तरफ देख लीना चाहिए .

  20. इस लेख में आपने जो काल्पनिक तथ्य अथवा आरोप डाले है उन्हें अगर आप साबित कर पाए तो अगला लेख लिखियेगा अन्यथा टिप्पणीकार बनने की इच्छा त्याग दीजिये.
    शादाब साहेब आपसे ऐसे पूर्वाग्रह और तथ्यों से रहित लेख की आशा मुझे नहीं थी. पहले के लिखे आपके कई लेख पसंद आये हैं. पर इस बार ये आपको क्या हो गया ? क्या आप सचमुच किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं ?

  21. आरोप आपकी मानसिक परवर्ती का धोतक है जारी रखिये
    क्योंकि संकुचित व् स्वार्थी परवर्ती आज लेखनी पर हावी है इसी का नाम बिकाऊ मिडिया है जो आधी भरी हुई गिलास को आधी खाली गिलास कहना अधिक उचित समझते है
    धन्यवाद

  22. आर एस एस और मनुवादियों के खुले दरबार में सत्य लिखना और बोलना या इनके विचारों के खिलाफ बोलना महापाप है!

    यदि ऐसा किया तो हजारों सालों तक पाप योनी में जन्म लेना होगा और यदि आप ईसाई, मुसलमान, दलित या आदिवासी हैं तो, ये भ्रष्ट और तानाशाह आपको विदेशों का एजेंट और देशद्रोही कहने में एक पल भी नहीं लगायेंगे! इनकी प्रवक्ता सहित हर न्यूज पोर्टल पर घटिया, अभद्र तथा स्तरहीन गाली-गंलोच युक भाषा क़ा लगातार उपयोग तथा ऐसी टिप्पणियों क़ा प्रदर्शित होना विचारणीय तो है ही, लेकिन साथ ही साथ ये सब इनके मानसिक रूप से रुग्ण होने तथा हताश व निराशा के अंधकूप में फंसकर भयंकर रूप से विषादग्रस्त होने का भी जीता जगता प्रमाण हैं!

    इनका दावा है कि ये ईश्वर के सच्चे अनुयाई हैं, बल्कि यहाँ तक कहते हैं कि ये खुद ही भू-देव हैं! इन पाखंडियों और भारत एवं हिंदुत्व के दुश्मनों को काश ईश्वर सद्बुद्धि दे सकता? तो देश का उद्धार हो गया होता!

    खुद सारे पाप, व्यभिचार, कदाचार करते हैं और दोषारोपण ईसाई, मुसलमान, दलित तथा आदिवासियों पर करके हर बात को तमाशा बना बना देते हैं!

    देश की सत्ता पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से काबिज होने के लिए इन लोगों क़ा आदिकाल से ही कुछ गैर ब्राह्मणों को ऋषी, मुनी आदि बनाते रहना इनका धंधा रहा है!

    आजादी के बाद सत्ता की चाबी आम लोगों के हाथ में जाने पर इन लोगों की हालत बिन पानी मछली जैसी हो गयी! इसलिए देश की सत्ता पर फिर से पूरी तरह कब्ज़ा करने के लिए-‘सामान नागरिक संहिता’, ‘रथ यात्रा’, ‘बावरी मस्जिद विध्वंश’, ‘कश्मीर राग’, ‘वीर सावरकर’, ‘आज़ाद चन्द्र शेखर का चरित्र हनन’, ‘दलित महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार’, ‘आदिवासी वर्ग को वनवासी घोषित करने का षड़यंत्र’, ‘शिव को दूध पिलाना’, त्रिशूल बाँटना’ आदि घोर पापाचार कर कर के थक चुके हैं और बुरी तरह से निराश हो गए हैं तो अब ये एक गैर ब्राह्मण “बाबा रामदेव” को मनुवाद की चाशनी में लपेटकर भगवान बनाने पर तुले हैं और आपने इनके भगवान की आलोचना कर दी ये तो इनकी नीति में और इनके ग्रंथों में भयंकर पाप है! कम से कम इस्लाम में प्कुनर्जन्म की अवधारणा नहीं है अन्यथा ये आपको अगला जन्म पप्योनी में मिलने क़ा श्राप दे चुके होते! मुझे तो ये लोग देख लेने और जन से मर देने की धमकियाँ तक दे चुके हैं! अभी तक तो जिन्दा हूँ, लेकिन ये बात पक्की है कि ये किसी न किसी भोले भले को नाथूराम गोडसे की भांती अपनी म्रत्यु को गले लगाने के लिए दिग्भ्रमित करके मेरी म्रत्यु करवाने के लिए जरूर फुसला रहे होंगे! क्योंकि इनका तो एक ही फार्मूला है-“चढ़ जा बेटा सूली पर, भली करेंगे राम!”

  23. कोलकाता में केन्द्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुख़र्जी नें संवाददाता सम्मेलन में बताया है कि रामदेव, अन्ना, और बीजेपी से निपटने हेतु उन पर कांग्रेस के विचारों का एक दस्तावेज तैयार किया है| उन्होंने कहा कि पार्टी जिला से लेकर प्रखंड स्तर पर वाद-विवाद, परिचर्चा, व अध्यन गोष्ठिओं द्वारा जागरूता अभियान चलाए गी| यह लेख बाबा रामदेव के ऊपर कीचड़ उछालते कांग्रेस के “जागरूकता अभियान” में मात्र एक कड़ी है और मेरा विश्वास है कि आज भारतीयों को, विशेषकर भारत की युवा पीढ़ी को अपने अच्छे बुरे की पहचान है| उन्हें कोई शादाब जाफर “शादाब” अपने लक्ष्य से विचलित नहीं कर सकता|

    पनवाडी की दुकान पर नशा करती धमाचौकड़ी में कही अपनी गप्प को यहाँ तोते की तरह उल्लिखित कर लेखक ने अपने मालिक की लाज रख ली है| रेणुका चौधरी का तोता तो शादाब जाफर “शादाब” हैं!

  24. जाफर जी ,
    बाबा रामदेव जी का कोइ घर ही नहीं है फिर ऐ कहना निराधार ,असत्य है की जिसका घर शीशे का हो उसे दूसरे के घर पर पत्थर नहीं मारना चाहिए हां यह बात जरूर है की उनका जीवन शीशे के सामान पारदर्शी अवश्य है |जो भी चाहे अंदर या बाहर से टटोल ले |बाबा रामदेव जी को चाहने वाले ,और मानने वाले करोडो भारतीय देश एवं विदेश में रहते है और उनसे बहुत प्यार करते है , उनका आदर करते है और उनका सम्मान करते है | बाबा रामदेव जी के योग से एवं आचार्य बालकृष्ण जी के औषधी ज्ञान से करोडो लोग लाभान्वित हुए है और हो रहे है |बहुत लोगो ने उन्हे सहज धनराशी दान में दी है और इस सबकी पूर्ण जानकारी उनके तमाम वेब साईट पर उपलब्ध है| आप भी वह जानकारी प्राप्त कर सकते है |यह इन्टरनेट का ज़माना है |बाबा ने सब कुछ जानकारी रखते हुए भी एक सन्यासी होने के नाते केंद्र सरकार को इतना कमीना दुष्ट नहीं समझा था | खैर उन सब परिस्थितियों से हमने सीखा और हम और भी सावधान हो गए |आज ४ जून ११ रामलीला मैदान की घटना के कारण अन्ना का समर्थक पूरा देश फूक फूक कर एक एक कदम चल रहा है और सरकार अपने ही मकड़ जाल मे घिरती दिखाई पड़ रही है | मुरारी बापू और श्री श्री रविशंकर जी इत्यादी की बात बाबा मान गए और बाबा अब हमारे साथ है |अन्ना , बाबा रामदेव , मुरारी बापू , श्री श्री रविशंकर ,किरण बेदी आदि एक ही विचारधारा के है और सबका उदेश्य भारत को भ्रष्टाचार से मुक्ती दिलाना है |कही ऐ सब लोग एक साथ बैठे दिखाई देते है कही अलग अलग |४ जून के समय भयंकर गर्मी थी और पारा लगभग ४४ के आसपास था स्वयं उस समय मै भारत में थी |बिना पंडाल के आप वहा रामलीला मैदान में खडे भी नहीं हो सकते थे जिसमे बहुत सारे बच्चे बूढे महिलाए भी थी |बाबा ने पाप किया यह कहना ,आपकी छोटी मुह बड़ी बात ही साबित करती है |राखी सावंत बाबा के सामने वैसी ही आई जैसे की रावन की बहन सुपनखा राम के सामने आई | राखी सावंत ने अपनी नाक खुद कटाई पूरी दुनिया के सामने | जैसे पुरुषो मे राम के साथ रावण का , राम के साथ सूपड्खा का (राम -लक्ष्मण-सूपढ्खा)वैसे ही रामदेव के साथ राखी सावंत का नाम एक एतिहासिक घटना है |इसमे बाबा रामदेव अग्नी की तरह पवित्र है अभी तक |बाबा जब योग सिखाते है तो सर्व श्रेष्ट योगी और जब ज्ञान देते है तो गुरु वशिष्ट लगते है ,उनका शरीर एक क्षत्रिये का सरीर लगता है और पातंजली योग ट्रस्ट आदि के माध्यम से भारत एवं समस्त विश्व को फ्री योग औषधी आदि का ज्ञान बाट रहे है यह उनकी सेवा है | मैने बाबा रामदेव जी को आस्था चैनल , इन्टरनेट आदि पर बहुत करीब से देखा है और बहुत गर्व से कहती हूँ की उन्होने हमे जीना सिखा दिया है| , हमे अपने देश , संस्कृति एवं कर्तव्यों के प्रती सही ज्ञान देकर जगा दिया है |ॐ

  25. आप भी न टिप्पणीकार बन पाएंगे न ही कोई लेखक…शर्म कर डूब मर

  26. शादाब साहेब आपसे ऐसे पूर्वाग्रह और तथ्यों से रहित लेख की आशा मुझे नहीं थी. पहले के लिखे आपके कई लेख पसंद आये हैं. पर इस बार ये आपको क्या हो गया ? क्या आप सचमुच किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं ? कृपया विचार करिएगा. धन्यवाद.

  27. जाकर मुल्ले मौलवियोँ को प्रमाण पत्र बाँट बाबा को तेरे प्रमाणपत्र की जरुरत ना है क्या मतलब है सारे संतोँ को संदेह मेँ डालने का??काँग्रेसी भाँडोँ से ओर उम्मीद भी क्या की जा सकती है?अफसोस है एसे घटिया लोगोँ की बातेँ भी छपती है।बाबा संत है या नहीँ इसको तय करने का ठेका काँग्रेस के चमचोँ को नहीँ दिया है हिन्दु समाज ने ना ही गैर हिन्दुओँ को हमारे धार्मिक नेता के बारे मेँ बोलने का अधिकार है।

  28. इस लेख में आपने जो काल्पनिक तथ्य अथवा आरोप डाले है उन्हें अगर आप साबित कर पाए तो अगला लेख लिखियेगा अन्यथा टिप्पणीकार बनने की इच्छा त्याग दीजिये
    १. “आचार्य बाल कृष्ण का पासपोर्ट, स्कूल की मार्कशीट डिगि्रया और यहा तक कि उन का अपना नाम भी फर्जी है। वही बाबा पर प्रर्वतन निर्देषालय को बाबा द्वारा स्थापित पतंजलि पीठ के रिकार्ड खगालने के बाद ये जानकारी हासिल हुर्इ है कि बाबा ने हिन्दुस्तान से तीन लाख डालर विदेश भेजे थे।”
    २. “मिसाल के तौर पर पंडाल में सैकडो एसी लगाये गये थें। अनशनकारियो के बैठने के लिये गद्दे डाले गये थे, बाबा ने अपने लिये खुद वातानुकूलित स्टेज बनावाया था।”
    ३. “बाबा पर सरकार ये आरोप लगा रही है कि दिव्य फार्मेसी द्वारा विदेशों में निर्यात की गर्इ दवाओ की कीमत जानबूझ कर काफी अधिक दिखार्इ जाती है। ”
    केवल आरोपों से कुछ नहीं होता

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