इंशा अल्लाह अब मेरे नाम के आगे भी लिखा जाएगा ‘‘बाबाजी का ठुल्लू एवार्ड प्राप्त’’

आज सुलेमान काफी संजीदा लग रहा था। मेरे लेखन कक्ष में सामने बैठा पता नहीं कुछ सोच रहा था, मैंने उसे डिस्टर्ब करना भी उचित नहीं समझा था। वह सोच रहा था और मैं लिख रहा था। कुछ देर उपरान्त वह बोल पड़ा- भाई कलमघसीट अब देर मत करो- ऐक्शन में आवो वर्ना……..कुछ हासिल नहीं होगा सिवाय ‘बाबा जी के ठुल्लू के’। मैंने चश्मा उतार कलम बन्द किया और पूंछा ब्रदर सुलेमान यह सब क्या कह रहे हो मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है- वह बोला- तभी तो कह रहा हूँ, कि समझदानी कमजोर हो गई है। दिमागीन खावो। सुनों ध्यान से सुनो- मैं भी गम्भीर हो गया। उसने जारी रखा-
देखो भारतरत्न, दादा साहेब फाल्के, पद्मश्री, पद्मभूषण, यशभारती, साहित्य रत्न और अन्य अनेकों सम्मान ऐसे लोग भी पा गए हैं जो पात्रता की श्रेणी में नहीं आते हैं। एक तुम हो कि ठेल ठालि के 65 पार तब भी अक्ल नहीं आ रही है। अपने यहाँ के ईना-मीना-डीका वाले डागू को ही ले लो दो-तीन वर्षों में दर्जनों शील्ड/शॉल और पता नहीं क्या-क्या प्राप्त कर लिया। आई.ए.एस./पी.सी.एस. के अलावा हाईस्कूल, इण्टर, बी.ए., एम.ए. उत्तीर्ण करने वाले छात्रों का जो यशोगान किया है पढ़ने वालों को बुरा भले लगा हो लेकिन उसकी अपनी जरूरत तो पूरी हुई होगी। खाना/पीना और नगद नारायण देकर अपनी यशोगाथा लिखवाने वालों की कमी थोड़े ही है।
डागू ने सम्मान बटोरने का जो रिकार्ड बनाया है वैसा कोई नहीं कर सकता। अब तो अपने नाम के आगे (अवार्ड प्राप्त) लिखता है। कलमघसीट देखो क्षत्रित्व का परित्याग कर दो। विशुद्धरूप से चाटुकारिता करो फिर देखो कितनी शील्ड/शॉल और आई.एन.आर. की प्राप्ति होगी। माना कि तुम भूखे नहीं हो- भूखे होते तो भोजन की थाली पर झपट्टा मारने का तुम्हारा भी मन करता परन्तु हे मेरे लंगोटिया यार कलमघसीट मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे नाम के आगे अवार्ड प्राप्त लिखा जाए।
हमारे यहाँ देहाती कहावत है- नाचै, गावै, तोरै तान, वही कै दुनिया राखै मान। करो वैसा ही करो पैसा नहीं तो कुछ नहीं- स्वाभिमानी बनकर भूखों मरो। अरे मैं तो मशवरा दूंगा कि इसे ताक पर रखो और हर उस संस्था/व्यक्ति के साथ चिपक जावो जिसे अपनी चमचागीरी पसन्द हो- तारीफ सभी को पसन्द होती है। वही करो, एवज में जरूर कुछ न कुछ की प्राप्ति होगी। बन जावो चन्द्रबरदाई, भाँटगीरी करो- बड़े लोग यानि पैसे वाले लोग तुम्हारी तंगहाली दूर कर देंगे। माँस-मदिरा का सेवन करो- नकद नारायण को घर-खर्च के लिए रखो। यह सोचना छोड़ो कि लोग क्या कहेंगे। यहाँ तो लोग सीता और राम जी पर लाँछन लगा चुके हैं- तुम तो एक साधारण मनुष्य हो।
देखो वह अपने चन्द्रलोकी हैं 60 साला उम्र में कोई एवार्ड पाए हैं जो तुमसे कितने जूनियर हैं। एक नहीं अनेकों नाम लूँगा जो प्रायोजित कराके सम्मान बटोर रहे हैं। सम्मान देने वाले लोग कैसे हैं- संस्था कैसी है? इस पर ज्यादा ध्यान मत दो, बस तोड़ दो अपने वसूलों की डोर को, जवानी में न सही बुढ़ापे में ही कुछ धन/सम्मान प्राप्त कर लो। कलमघसीट बोल नहीं रहे हो- अब समय नहीं है जल्दी करो वर्ना अपात्र चमचे किस्म के लोग सम्मान, शील्ड, पैसा लूट लेंगे। सुलेमान का प्रवचन खत्म हुआ तो मैंने उसे एक गिलास पानी हलक तर करने के लिए दिया। फिर मैंने कलमघसीट से पूंछा-
डियर लंगोटिया यार! यह बताओ कि शेर, गीदड़ और बकरी में अन्तर होता है-? वह बोला हाँ होता है। बस तब समझो कि मैं शेर हूँ और किसी ऐसे की नकल नहीं करता जो स्तरीय न हो। समझ रहे हो ना मैं क्या कहना चाहता हूँ। वह बोला हाँ यार समझ रहा हूँ लेकिन सोशल मीडिया पर अपात्रों की पोस्ट पढ़कर ‘जीलस’ हो उठता हूँ कि कल के युवकों द्वारा मान-सम्मान हासिल कर लिया जा रहा है और एक तुम हो कि इस सबसे अलग अपने ‘वसूलों’ पर अड़े हो और लकड़ी के तख्ते पर पड़े-पड़े सड़ रहे हो।
मैं सुलेमान को समझाता हूँ कि वह जो देख-सुन रहा है सब प्रायोजित है, माँस-मदिरा, नकद पाने वाले चाटुकार एन.जी.ओस. के दलाल हैं और उनके द्वारा वित्त पोषित हैं। इसीलिए उनके पक्ष में खबरें छापते हैं। सीधी सी बात है जो एन.जी.ओ. और लोग लाखों/करोड़ो कमा रहे हैं यदि दो-चार सौ रूप्ए और खर्च कर जरूरतमन्दों से अपने पक्ष में लिखवाकर अपनी पीठ थपथपवा लें तो हर्ज ही क्या है।
मैंने अपने लंगोटिया यार सुलेमान को समझाया देखो मियाँ सुलेमान- देश की प्रतिभाओं को उस समय सर्वोच्च एवार्ड मिले हैं जब वह काफी बुजुर्ग हो चुके थे। मसलन सिनेमा के सर्वोच्च एवार्ड दादा साहेब फाल्के सम्मान से ऐसे कलमकार तब सम्मानित हुए जब वह अन्तिम साँसे गिन रहे थे। उनमें जो कुछ बचे हैं वह जिन्दगी ढो रहे हैं, अब मरें कि तब मरें। अब बिग बी को ही देख लो सम्पूर्ण विश्व में उनका नाम है फिर भी ‘सम्मान’ से दूर हैं। अब यह मत कहना कि वे लोग जो एन.जी.ओस. के माध्यम से सम्मान पा रहे हैं वाकई में उन्हें यह मिलना ही चाहिए था।
मैं इतना ही कह पाया था कि तभी सुलेमान एकाएक उठा और बोला लिखो और सड़कर जिन्दगी जीवो। वहाँ अपात्रों को सम्मान मिल रहा है यदि अपने को नहीं बदलोगे तो तुम्हे लोग बाबा जी का ठुल्लू सम्मान से नवाजेंगे। मैंने कहा चलो ठीक है जब तुम कह ही रहे हो तब यदि कोई संस्था मुझे ‘‘बाबा जी का ठुल्लू’ सम्मान से सम्मानित करने का मन बनाएगी तो मैं तैयार हूँ। इस सम्मान को अवश्य ही ग्रहण करूँगा, क्योंकि यह सम्मान पाने वाला देश और विश्व ही नहीं ब्रम्हाड का प्रथम व्यक्ति मैं ही हूँगा जो मेरे लिए गर्व की बात होगी। तुम्हारी बात सुनकर मेरा भी मन कहने लगा है कि वह कौन सी एन.जी.ओ. है जो मुझे यथा शीघ्र ‘बाब जी का ठुल्लू’ जैसा सम्मान देगी। वह बोला फेसबुक पर इश्तेहार दे डालो। मैंने सुलेमान की बात पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दी, फिर भी चाहता हूँ कि वह दिन कब आएगा जब मैं अपने नाम के साथ ‘‘बाबा जी का ठुल्लू एवार्ड प्राप्त’’ लिखूँगा। पाठकों आप के मदद की दरकार है।

– डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

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