विश्ववार्ता

बांग्लादेश पाकिस्तान के कट्टरपंथ के नक्शेकदम पर !

नव ठाकुरीया
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की नई दिल्ली में हालिया मीडिया ब्रीफिंग से उनकी वापसी की यात्रा को लेकर भले ही बहुत कम जानकारी सामने आई, लेकिन उनके बेटे सजीब वाजेद जॉय ने ढाका में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की सरकार के तहत बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति को लेकर कुछ चौंकाने वाले दावे किए हैं।
अमेरिका से वर्चुअली इस कार्यक्रम में शामिल हुए जॉय ने दावा किया कि बांग्लादेश धीरे-धीरे एक और पाकिस्तान बनता जा रहा है, जहां कट्टरपंथी इस्लामी तत्व स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं। बांग्लादेश को ‘फेल स्टेट’ यानी विफल राष्ट्र बताते हुए उन्होंने आशंका जताई कि आने वाले दिनों में यह दक्षिण एशियाई देश क्षेत्रीय आतंकवाद का गढ़ बन सकता है।
जॉय ने कहा कि हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार द्वारा गिरफ्तार कर जेल में डाले गए सैकड़ों दोषी आतंकवादियों को हाल ही में रिहा कर दिया गया है। उन्होंने यह भी दावा किया कि पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) समेत कई विदेशी खुफिया एजेंसियां बांग्लादेश में अपनी गतिविधियां चला रही हैं। उनके मुताबिक, इसी मुस्लिम बहुल देश से वैश्विक आतंकवादियों की अगली पीढ़ी सामने आ सकती है।
जॉय ने 5 अगस्त 2024 को अपनी सरकार के खिलाफ छात्र नेतृत्व में हुए बड़े पैमाने के विरोध प्रदर्शनों के बाद हसीना के ढाका छोड़ने के बाद से भारत की ओर से उनकी मां को लगातार दिए जा रहे समर्थन का भी उल्लेख किया। अपने ऑडियो संदेश में अवामी लीग प्रमुख ने घर लौटने के अपने संकल्प को दोहराया।

दावे से नॉर्थ-ईस्ट के लिए बढ़ा खतरा
78 वर्षीय हसीना फिलहाल नई दिल्ली में स्वैच्छिक निर्वासन में रह रही हैं। उन्होंने दिसंबर में वापस लौटने का फैसला जताया है, क्योंकि यह जीत का महीना है। 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना पर जीत के कारण दिसंबर बांग्लादेश के लिए विशेष महत्व रखता है।
हालांकि, हसीना की वापसी आसान नहीं होगी। एक स्थानीय अदालत ने उन्हें जुलाई-अगस्त के विरोध प्रदर्शनों के दौरान मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए मौत की सजा समेत कई सजाएं सुनाई हैं। उस दौरान सुरक्षा बलों की कार्रवाई में 1,400 लोगों के मारे जाने का दावा किया गया था।
शुरुआत से ही तारिक रहमान सरकार ने दोनों पड़ोसी देशों के बीच 2013 की प्रत्यर्पण संधि के तहत अलग-अलग तरीकों से हसीना की वापसी की कोशिश की है। यहां तक कि जब 10 अगस्त को ढाका में तारिक रहमान ने बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी से मुलाकात की, तब भी हसीना के जल्द प्रत्यर्पण का मुद्दा उठाया गया था।
नई दिल्ली ने हसीना के प्रत्यर्पण पर कोई स्पष्ट वादा नहीं किया है और कहा है कि यह मामला कानूनी जांच के दायरे में है। माना जाता है कि नई दिल्ली हसीना पर भारत छोड़ने का दबाव तब तक नहीं डालेगी, जब तक बांग्लादेश सरकार से यह पक्का नहीं हो जाता कि वहां उनके साथ कानूनी नियमों के तहत सही व्यवहार किया जाएगा।
जब 5 अगस्त की घटना पर ढाका ने तीखी प्रतिक्रिया दी—जिसमें हसीना को भारतीय धरती से कुछ ग्लोबल न्यूज एजेंसियों समेत मीडिया को संबोधित करने की इजाजत दी गई थी—तो नई दिल्ली ने स्पष्ट किया कि हसीना का कार्यक्रम एक स्वतंत्र प्रेस क्लब ने आयोजित किया था और इसमें स्थानीय अधिकारियों की कोई भूमिका नहीं थी।
एक अलग कूटनीतिक मोर्चे पर, ढाका सितंबर में होने वाले अगले BRICS शिखर सम्मेलन के लिए प्रधानमंत्री रहमान की भारत यात्रा को लेकर चुप्पी साधे हुए है। नई दिल्ली ने उन्हें BIMSTEC के मौजूदा अध्यक्ष के तौर पर BRICS शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए अलग से न्योता दिया था। हालांकि, ऐसा लगता है कि रहमान पर बांग्लादेश के राजनीतिक गुटों का दबाव है कि वे यह यात्रा न करें।
चूंकि बांग्लादेश पूर्वी भारतीय इलाकों से घिरा हुआ है, इसलिए वहां होने वाली किसी भी अप्रिय घटना का असर अंतरराष्ट्रीय सीमावर्ती इलाकों पर पड़ सकता है। बांग्लादेश की धरती पर कट्टरपंथी ताकतों का उभार भारत के लिए, खासकर 6 करोड़ से अधिक आबादी वाले उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के लिए, गंभीर सुरक्षा चिंताएं पैदा कर सकता है।
कभी प्रतिबंधित रही बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी पार्टी ने अब अपनी स्थिति मजबूत कर ली है और सत्ताधारी BNP के बाद ‘जातीय संसद’ यानी राष्ट्रीय विधानसभा में उसके सबसे अधिक चुने हुए प्रतिनिधि हैं। जमात-ए-इस्लामी समेत बांग्लादेश के कई संगठनों की भारत-विरोधी बयानबाजी से कूटनीतिक तरीके से निपटने की जरूरत है और इसके लिए नई दिल्ली के ढाका के साथ अच्छे संबंध होना जरूरी है।
हाल की घटनाओं ने निश्चित रूप से भारत और बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय संबंधों को जटिल बना दिया है, भले ही वे बहुत ज्यादा खराब न हुए हों। भारतीय इलाकों, खासकर असम और पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी प्रवासियों का लगातार आना नई दिल्ली के लिए लंबे समय से परेशानी का सबब बना हुआ है और इसका कोई खास समाधान नहीं है। अब यह बस समय की बात है कि दोनों देशों—जिनकी 1947 तक एक ही पहचान थी—के बीच आपसी समझ का माहौल कब बनता है और हमेशा कायम रहता है।