हाल ही में हरियाणा के सोनीपत स्थित एक वृद्धाश्रम में रहने वाले 74 वर्षीय शिवचरण रामरतन गुप्ता की मृत्यु का समाचार सामने आया। वे कभी कपड़ा व्यवसाय से जुड़े हुए थे और उन्होंने अपनी तीनों बेटियों को पढ़ाया-लिखाया तथा जीवन में आगे बढ़ने का अवसर दिया। परंतु जब बीमारी और वृद्धावस्था ने उन्हें घेर लिया, तब उनके अंतिम समय में उनकी तीनों बेटियों में से कोई भी उनके पास नहीं पहुंची। बेटियों ने वीडियो कॉल के माध्यम से अंतिम संस्कार देखा और इसके लिए 5,100 रुपये भेजे, जबकि वृद्धाश्रम के कर्मचारियों और स्थानीय लोगों ने मिलकर उनका अंतिम संस्कार किया। यह घटना केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक संबंधों और वृद्ध माता-पिता की बढ़ती उपेक्षा का गंभीर संकेत है।
भारतीय संस्कृति में माता-पिता को देवतुल्य माना गया है। वे अपने बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए जीवनभर कठिन परिश्रम करते हैं। अनेक माता-पिता अपनी सीमित आय, निजी इच्छाओं और स्वास्थ्य की परवाह किए बिना बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाते हैं। आज बड़ी संख्या में माता-पिता अपने बेटे-बेटियों को डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक या अन्य पेशेवर बनाने के लिए विदेशों तक भेजते हैं। वे अपनी जमा पूंजी खर्च करते हैं, संपत्ति बेचते हैं और कभी-कभी कर्ज तक लेते हैं, ताकि उनके बच्चे सफल जीवन जी सकें। बच्चों की सफलता में उन्हें अपना जीवन सार्थक दिखाई देता है।
लेकिन यही बच्चे जब विदेशों या दूर-दराज के महानगरों में स्थायी रूप से बस जाते हैं, तब माता-पिता अपने ही घर में धीरे-धीरे अकेले पड़ने लगते हैं। शुरुआत में फोन, वीडियो कॉल और संदेशों के माध्यम से संपर्क बना रहता है, परंतु समय बीतने के साथ बातचीत कम हो जाती है। नौकरी, व्यवसाय, बच्चों की पढ़ाई और अपनी व्यक्तिगत व्यस्तताओं के बीच माता-पिता के लिए समय निकालना कठिन समझा जाने लगता है। कई बार माता-पिता अपनी परेशानी इसलिए भी नहीं बताते कि कहीं बच्चे चिंतित न हो जाएं या उन्हें अपनी संतान पर बोझ न लगे।
वृद्धावस्था अपने साथ अनेक शारीरिक और मानसिक समस्याएं लेकर आती है। घुटनों का दर्द, हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, भूलने की बीमारी और दृष्टि संबंधी समस्याएं बुजुर्गों को दूसरों पर निर्भर बना देती हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें केवल धन की नहीं, बल्कि साथ, देखभाल और भावनात्मक सुरक्षा की आवश्यकता होती है। अस्पताल ले जाने, दवाइयां लाने, घर की छोटी-बड़ी समस्याएं संभालने और संकट के समय निर्णय लेने के लिए किसी विश्वसनीय व्यक्ति का पास होना अत्यंत आवश्यक है।
दुर्भाग्य से, समाचार पत्रों में समय-समय पर ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती हैं कि किसी वृद्ध पुरुष या वृद्धा का शव कई दिनों या हफ्तों बाद घर से बरामद हुआ। पड़ोसियों को दुर्गंध आने पर घटना का पता चलता है। कई मामलों में बुजुर्ग अकेले रहते हैं और बीमारी, गिरने या अचानक हृदयाघात के बाद सहायता के अभाव में उनकी मृत्यु हो जाती है। यह स्थिति समाज के लिए अत्यंत पीड़ादायक और चिंताजनक है। इससे पता चलता है कि आर्थिक सहायता और तकनीकी संपर्क, प्रत्यक्ष मानवीय उपस्थिति का विकल्प नहीं बन सकते।
हालांकि हर मामले में संतान को दोषी ठहराना उचित नहीं है। विदेश में रहने वाले बच्चों के सामने वीजा, नौकरी, दूरी और पारिवारिक परिस्थितियों जैसी वास्तविक कठिनाइयां हो सकती हैं। फिर भी माता-पिता की जिम्मेदारी पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाती। नियमित वीडियो कॉल, पड़ोसियों और रिश्तेदारों से संपर्क, स्वास्थ्य संबंधी निगरानी, आपातकालीन व्यवस्था तथा समय-समय पर अपने देश आकर मुलाकात करना न्यूनतम नैतिक दायित्व होना चाहिए।
समाज और सरकार को भी इस समस्या का समाधान खोजने के लिए आगे आना होगा। वृद्धाश्रमों में चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक परामर्श और आपातकालीन सेवाएं बेहतर की जानी चाहिए। स्थानीय स्तर पर वरिष्ठ नागरिक सहायता समूह बनाए जा सकते हैं। पड़ोसियों को भी बुजुर्गों के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए और लंबे समय तक किसी वृद्ध के दिखाई न देने पर तुरंत संपर्क करना चाहिए।
शिवचरण गुप्ता की घटना हमें यह सोचने के लिए विवश करती है कि सफलता का वास्तविक अर्थ क्या है। यदि माता-पिता के अंतिम समय में उनके पास बैठने वाला कोई अपना न हो, तो केवल आर्थिक उपलब्धियां और विदेशों में बनाया गया उज्ज्वल भविष्य अधूरा प्रतीत होता है। बुजुर्ग माता-पिता को सुविधा नहीं, अपनापन चाहिए; धन नहीं, संवेदना चाहिए; और सबसे बढ़कर यह विश्वास चाहिए कि कठिन समय में उनका परिवार उनके साथ खड़ा रहेगा।
-सुरेश गोयल धूप वाला