कुमार कृष्णन
किसी भी राष्ट्र की पहचान केवल उसकी अर्थव्यवस्था, सैन्य शक्ति या वैज्ञानिक उपलब्धियों से नहीं बनती। खेल भी उसके आत्मविश्वास, अनुशासन, संस्थागत क्षमता और भविष्य की आकांक्षाओं का आईना होते हैं। जब कोई खिलाड़ी ओलंपिक के मंच पर तिरंगा लहराता है, तो वह केवल एक पदक नहीं जीतता; वह करोड़ों भारतीयों के सपनों, संघर्षों और संभावनाओं को विश्व मंच पर प्रतिष्ठित करता है। यही कारण है कि खेलों में मिली हर सफलता राष्ट्रीय गौरव का उत्सव बन जाती है। लेकिन हर पदक एक सवाल भी छोड़ जाता है—क्या यह जीत मजबूत खेल व्यवस्था का परिणाम है, या किसी असाधारण खिलाड़ी के व्यक्तिगत संघर्ष की कहानी?
पिछले एक दशक में भारत में खेलों को लेकर राष्ट्रीय सोच बदली है। कभी खेलों को पढ़ाई के विकल्प के रूप में देखा जाता था, आज उन्हें सम्मानजनक करियर, रोजगार और वैश्विक पहचान के माध्यम के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। छोटे शहरों और ग्रामीण भारत से निकलकर अनेक खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है। यह परिवर्तन अपने आप नहीं आया। इसके पीछे सरकारी योजनाएँ, निजी निवेश, कॉरपोरेट सहयोग, मीडिया की बढ़ती रुचि और खिलाड़ियों की अदम्य इच्छाशक्ति—सभी की भूमिका रही है।
इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार का यह दावा सामने आता है कि वर्ष 2014 के बाद अपनाई गई खेल नीतियों ने भारत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। हाल में केंद्रीय खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने भी कहा कि नई नीतियों, आधुनिक प्रशिक्षण और खिलाड़ियों को दी गई सुविधाओं के कारण भारत ने ओलंपिक, एशियाई खेलों और राष्ट्रमंडल खेलों में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। पहली दृष्टि में यह दावा पूरी तरह निराधार नहीं लगता। खेलो इंडिया, टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (टीओपीएस), खेल अवसंरचना का विस्तार और खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण जैसी पहलें निश्चित रूप से भारतीय खेलों के लिए महत्वपूर्ण रही हैं।
इस दौर में नीरज चोपड़ा ने एथलेटिक्स में इतिहास रचा, पी. वी. सिंधु ने बैडमिंटन में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाई, मीराबाई चानू ने भारोत्तोलन में नई मिसाल कायम की, लवलीना बोरगोहैन ने मुक्केबाज़ी में देश का नाम रोशन किया और भारतीय हॉकी टीम ने दशकों बाद ओलंपिक पदक जीतकर नई उम्मीद जगाई। पैरा खिलाड़ियों ने भी विश्व मंच पर अभूतपूर्व प्रदर्शन कर यह साबित किया कि अवसर मिलने पर भारतीय प्रतिभा किसी से कम नहीं।
लेकिन किसी भी लोकतंत्र में उपलब्धियों का उत्सव मनाने के साथ-साथ उनका विवेकपूर्ण मूल्यांकन करना भी उतना ही आवश्यक होता है। खेल नीति की सफलता केवल कुछ चमकदार उपलब्धियों से तय नहीं होती। असली कसौटी यह होती है कि क्या देश ने ऐसी संस्थागत व्यवस्था विकसित की है, जो लगातार विश्वस्तरीय खिलाड़ी तैयार कर सके। क्या खेल अब भी कुछ प्रतिभाशाली व्यक्तियों की असाधारण मेहनत पर टिके हैं, या वे एक मजबूत और टिकाऊ खेल पारिस्थितिकी तंत्र का परिणाम बन चुके हैं?
यहीं से चर्चा का दूसरा पक्ष शुरू होता है। यदि भारत वास्तव में खेल महाशक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो केवल पदकों की संख्या गिनना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी देखना होगा कि कितने बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण मिल रहा है, कितने विद्यालयों में खेल शिक्षा प्रभावी है, कितने जिलों में आधुनिक खेल सुविधाएँ उपलब्ध हैं, खिलाड़ियों तक संसाधन कितनी समानता से पहुँच रहे हैं और खेल प्रशासन कितना पारदर्शी एवं जवाबदेह है क्योंकि खेलों की वास्तविक ताकत पदक तालिका में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था में दिखाई देती है जो हर वर्ष नई प्रतिभाओं को जन्म देती है।
भारत आज दुनिया का सबसे युवा देशों में से एक है। यह जनसांख्यिकीय शक्ति खेलों के क्षेत्र में भी हमारी सबसे बड़ी पूँजी हो सकती है लेकिन प्रतिभा अपने आप पदक नहीं बनती। उसे खोजने, सँवारने और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने के लिए दीर्घकालिक नीति, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, पर्याप्त निवेश और जवाबदेह संस्थाओं की आवश्यकता होती है। जिन देशों ने खेलों में स्थायी सफलता हासिल की है, उन्होंने खिलाड़ियों से पहले व्यवस्था को मजबूत किया है।
यही कारण है कि भारत की खेल यात्रा को केवल उत्सव या आलोचना के दो छोरों पर रखकर नहीं देखा जा सकता। पिछले दशक में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, लेकिन उतना ही सच यह भी है कि अभी कई महत्वपूर्ण चुनौतियाँ शेष हैं। खेलों की असली परीक्षा पदक जीतने में नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने में है जहाँ किसी खिलाड़ी की सफलता अपवाद नहीं, बल्कि स्वाभाविक परिणाम बन जाए। भारत के सामने आज यही सबसे बड़ा प्रश्न है—क्या हम पदकों से आगे बढ़कर एक सशक्त खेल संस्कृति का निर्माण कर पा रहे हैं, या अभी भी हमारी सबसे बड़ी जीत कुछ असाधारण खिलाड़ियों के असाधारण संघर्ष पर ही टिकी हुई है?
यदि केवल पदकों की संख्या को ही किसी खेल नीति की सफलता मान लिया जाए, तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी। खेलों में किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति किसी एक प्रतियोगिता के परिणामों से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से तय होती है, जो लगातार नई प्रतिभाएँ तैयार करती है। यही कारण है कि ओलंपिक को खेलों की सबसे कठिन और सबसे विश्वसनीय परीक्षा माना जाता है।
भारत के हालिया प्रदर्शन पर नज़र डालें तो तस्वीर उम्मीद भी जगाती है और सावधान भी करती है। 2016 के रियो ओलंपिक में भारत दो पदकों तक सीमित रहा। टोक्यो ओलंपिक में यह संख्या बढ़कर सात हुई और इसे स्वतंत्र भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन माना गया। नीरज चोपड़ा का स्वर्ण पदक भारतीय खेल इतिहास का स्वर्णिम अध्याय बना। लेकिन पेरिस ओलंपिक में पदकों की संख्या फिर घटकर छह रह गई और पदक तालिका में भारत की स्थिति भी पीछे चली गई। यह उतार-चढ़ाव बताता है कि भारत आगे बढ़ा अवश्य है, किंतु अभी उस निरंतरता तक नहीं पहुँचा है, जो किसी खेल महाशक्ति की पहचान होती है।
राष्ट्रमंडल खेलों के परिणाम भी इसी संतुलित दृष्टि से देखे जाने चाहिए। भारत ने वर्षों से वहाँ उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है, लेकिन यह भी याद रखना होगा कि इस प्रतियोगिता में अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी और कई अन्य बड़ी खेल शक्तियाँ भाग नहीं लेतीं। इसलिए राष्ट्रमंडल खेलों की उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण अवश्य हैं, पर उन्हें ओलंपिक जैसी वैश्विक प्रतिस्पर्धा का विकल्प नहीं माना जा सकता। किसी भी खेल नीति की अंतिम परीक्षा वहीं होती है, जहाँ दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी आमने-सामने होते हैं।
यहीं से खेल नीति का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—क्या भारत अपने खिलाड़ियों पर उतना निवेश कर रहा है, जितना एक उभरती खेल शक्ति से अपेक्षित है? उपलब्ध आँकड़े बताते हैं कि उच्च प्रदर्शन वाले खिलाड़ियों के लिए वित्तीय सहायता के स्वरूप पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है। राष्ट्रीय खेल विकास कोष (एनएसडीएफ) में सरकारी योगदान और निजी क्षेत्र की भागीदारी में हाल के वर्षों में आई कमी ने इस बहस को और महत्वपूर्ण बना दिया है। खेल केवल प्रतियोगिता के दिनों में याद किए जाने वाला विषय नहीं हो सकते; उन्हें पूरे वर्ष निरंतर निवेश, शोध और संस्थागत सहयोग की आवश्यकता होती है।
यह भी सच है कि टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (टीओपीएस) और खेलो इंडिया जैसी योजनाओं ने अनेक खिलाड़ियों को नई ऊर्जा दी है। विदेशी प्रशिक्षण, खेल विज्ञान, पोषण विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक सहायता और आधुनिक उपकरण जैसी सुविधाएँ पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित हुई हैं। अनेक ओलंपियन और पैरा एथलीटों ने स्वीकार किया है कि इन योजनाओं ने उनकी तैयारी को बेहतर बनाया। लेकिन भारत जैसे विशाल देश में कुछ सौ खिलाड़ियों तक सीमित सहायता पर्याप्त नहीं कही जा सकती। यदि खेलों का आधार व्यापक नहीं होगा, तो शिखर भी मजबूत नहीं बन पाएगा।
एक और गंभीर प्रश्न खेल प्रशासन का है। वर्षों से विभिन्न खेल महासंघों में पारदर्शिता, जवाबदेही और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। खिलाड़ियों की उपलब्धियों से अधिक यदि पदाधिकारियों की राजनीति चर्चा का विषय बनने लगे, तो यह किसी भी खेल व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है। आधुनिक खेल जगत में संस्थाओं का संचालन पेशेवर दृष्टिकोण, पारदर्शिता और खिलाड़ियों की प्राथमिकता के आधार पर होना चाहिए। खेल संघ यदि खिलाड़ियों के बजाय पदों की राजनीति में उलझे रहेंगे, तो प्रतिभा का विकास प्रभावित होना स्वाभाविक है।
देश की दूसरी बड़ी चुनौती खेलों का असमान भूगोल है। महानगरों और कुछ चुनिंदा राज्यों में सुविधाएँ अपेक्षाकृत बेहतर हैं, जबकि अनेक ग्रामीण, आदिवासी और सीमावर्ती क्षेत्रों में आज भी प्रतिभाएँ संसाधनों के अभाव में दम तोड़ देती हैं। लाखों बच्चों के पास न उचित मैदान हैं, न प्रशिक्षित कोच, न खेल विज्ञान की सुविधा और न ही संतुलित पोषण। ऐसे में केवल पदकों की संख्या बढ़ जाने से यह नहीं माना जा सकता कि खेल व्यवस्था पूरी तरह मजबूत हो चुकी है।
दरअसल, खेल केवल मंत्रालयों की योजनाओं से नहीं बदलते; वे तब बदलते हैं, जब समाज खेलों को शिक्षा और संस्कृति का स्वाभाविक हिस्सा मानने लगे। विद्यालयों में खेल पीरियड औपचारिकता न रहकर सीखने की प्रक्रिया बने, विश्वविद्यालय प्रतिभा विकास के केंद्र बनें, पंचायत स्तर तक खेल अवसंरचना पहुँचे और निजी क्षेत्र प्रतिभा में दीर्घकालिक निवेश करे। जब तक यह व्यापक परिवर्तन नहीं होगा, तब तक कुछ असाधारण खिलाड़ियों की सफलता पूरे देश की खेल व्यवस्था की सफलता का पर्याय नहीं बन सकती।
यही वह मोड़ है, जहाँ भारत को आत्ममंथन करना होगा। उपलब्धियों का सम्मान होना चाहिए, क्योंकि वे खिलाड़ियों के कठिन परिश्रम का परिणाम हैं। लेकिन उपलब्धियों के उत्साह में चुनौतियों को अनदेखा करना भविष्य के साथ न्याय नहीं होगा। खेल नीति की असली सफलता पदकों की चमक में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था में छिपी होती है जो हर वर्ष हजारों नई प्रतिभाओं को अवसर देती है और उन्हें शिखर तक पहुँचने का समान अधिकार प्रदान करती है।
भारत आज उस मोड़ पर खड़ा है, जहाँ खेलों को लेकर उत्साह भी है और अपेक्षाएँ भी। दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल भारत के पास प्रतिभा का विशाल भंडार है। प्रश्न प्रतिभा का नहीं, व्यवस्था का है। कोई भी राष्ट्र केवल असाधारण खिलाड़ियों के भरोसे खेल महाशक्ति नहीं बनता; उसके पीछे दशकों तक चलने वाली नीति, वैज्ञानिक तैयारी, प्रशिक्षित कोच, आधुनिक खेल विज्ञान, पारदर्शी संस्थाएँ और सामाजिक प्रतिबद्धता होती है। पदक उसी वृक्ष के फल हैं, जिसकी जड़ें वर्षों पहले सींची गई होती हैं।
दुनिया के सफल देशों का अनुभव यही बताता है। चीन ने खेलों को राष्ट्रीय विकास की रणनीति का हिस्सा बनाया। ऑस्ट्रेलिया ने खेल विज्ञान और प्रतिभा पहचान की ऐसी प्रणाली विकसित की कि अपेक्षाकृत कम आबादी के बावजूद वह लगातार ओलंपिक की शीर्ष शक्तियों में बना रहा। ब्रिटेन ने 1996 के अटलांटा ओलंपिक की निराशा के बाद आत्ममंथन किया, अपनी पूरी खेल संरचना बदली और कुछ ही वर्षों में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हो गया। इन उदाहरणों का सार यही है कि खेलों में चमत्कार नहीं होते; वहाँ केवल दूरदर्शी नीतियाँ और निरंतर निवेश काम करते हैं।
भारत में भी बदलाव की सकारात्मक आहट सुनाई देती है। छोटे शहरों और गाँवों से खिलाड़ी निकलकर विश्व मंच पर तिरंगा फहरा रहे हैं। बेटियाँ मुक्केबाज़ी, भारोत्तोलन, कुश्ती, निशानेबाजी और एथलेटिक्स में नई पहचान बना रही हैं। पैरा खिलाड़ियों ने यह साबित किया है कि इच्छाशक्ति किसी भी शारीरिक सीमा से बड़ी होती है। यह नया भारत है, जहाँ खेल धीरे-धीरे सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त कर रहे हैं। लेकिन इस परिवर्तन को स्थायी बनाना अभी बाकी है।
सबसे बड़ी आवश्यकता खेलों को शिक्षा से जोड़ने की है। आज भी देश के अधिकांश विद्यालयों में खेल पाठ्यक्रम का पूरक हैं, केंद्र नहीं। बच्चों पर परीक्षा और अंकों का दबाव इतना अधिक है कि खेल अक्सर समय की बर्बादी समझे जाते हैं। जब तक स्कूल प्रतिभा खोजने की पहली प्रयोगशाला नहीं बनेंगे और विश्वविद्यालय उत्कृष्ट खिलाड़ियों के विकास केंद्र नहीं बनेंगे, तब तक भारत की खेल यात्रा कुछ चमकदार सफलताओं तक सीमित रहने का जोखिम उठाती रहेगी।
उतना ही महत्वपूर्ण खेल प्रशासन का सुधार है। खेल संघों का उद्देश्य खिलाड़ियों का भविष्य होना चाहिए, पदाधिकारियों का नहीं। चयन प्रक्रिया पारदर्शी हो, कोचों की नियुक्ति योग्यता के आधार पर हो, खेल विज्ञान और डेटा विश्लेषण को प्रशिक्षण का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए तथा खिलाड़ियों को प्रशासनिक विवादों से मुक्त वातावरण मिले। जिस व्यवस्था में खिलाड़ी निश्चिंत होकर केवल अपने प्रदर्शन पर ध्यान दे सके, वही व्यवस्था विश्वस्तरीय परिणाम दे सकती है।
भारत को खेल विज्ञान, पोषण, मानसिक स्वास्थ्य, पुनर्वास, जैव-यांत्रिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रदर्शन विश्लेषण जैसे क्षेत्रों में भी व्यापक निवेश करना होगा। आज अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ केवल प्रतिभा से नहीं जीती जातीं; वे तैयारी की गुणवत्ता से जीती जाती हैं। यदि भारत को अगले दशक में ओलंपिक की शीर्ष खेल शक्तियों की श्रेणी में पहुँचना है, तो उसे इन क्षेत्रों में वैश्विक मानकों के अनुरूप ढाँचा विकसित करना ही होगा।
लेकिन खेलों का महत्व केवल पदकों तक सीमित नहीं है। खेल स्वस्थ समाज बनाते हैं, अनुशासन सिखाते हैं, टीम भावना विकसित करते हैं और हार से सीखकर फिर उठ खड़े होने का साहस देते हैं। जिस समाज के बच्चे खेल के मैदान में पसीना बहाते हैं, वह समाज जीवन के हर क्षेत्र में अधिक आत्मविश्वासी और सशक्त बनता है। इसलिए खेलों पर किया गया खर्च व्यय नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य में निवेश है।
यह भी उतना ही आवश्यक है कि खेलों को राजनीतिक उपलब्धियों के तराजू पर न तौला जाए। सरकारें बदलती रहेंगी, नीतियाँ भी बदलेंगी, लेकिन खेलों का विकास निरंतरता माँगता है। जिस नीति की शुरुआत एक सरकार करे, उसे अगली सरकार और आगे बढ़ाए—यही परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है। खेलों में राष्ट्रीय सहमति राजनीति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि भारत ने कितने पदक जीते। असली प्रश्न यह है कि क्या देश ने ऐसी व्यवस्था बनाई है, जहाँ किसी छोटे गाँव, आदिवासी अंचल या साधारण परिवार का प्रतिभाशाली बच्चा संसाधनों के अभाव में अपना सपना न खो दे। जिस दिन यह व्यवस्था बन जाएगी, उस दिन पदक अपने आप बढ़ेंगे; क्योंकि प्रतिभा भारत में कभी कम नहीं रही, कमी केवल अवसरों की रही है।
भारत खेल महाशक्ति उस दिन नहीं बनेगा, जब पदकों की संख्या दहाई से सैकड़ों में पहुँच जाएगी। भारत खेल महाशक्ति उस दिन बनेगा, जब हर बच्चे को यह विश्वास होगा कि उसकी मंज़िल उसकी आर्थिक स्थिति, उसके पते या उसके परिचय से नहीं, बल्कि उसके परिश्रम और प्रतिभा से तय होगी। खेलों की सबसे बड़ी जीत पदकों में नहीं, अवसरों की समानता में छिपी होती है। यही किसी भी दूरदर्शी खेल नीति की अंतिम कसौटी है और यही भारत की अगली खेल यात्रा की सबसे बड़ी चुनौती भी।