लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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सफल रहा आरएसएस का ‘नरेंद्र मोदी प्रयोग’
-संजय द्विवेदी

imagesइस बात पर बहस हो सकती है कि भारतीय जनता पार्टी की इस ऐतिहासिक विजय का सूत्रधार कौन है। टीवी चैनलों की अनंत और निष्कर्षहीन बहसें भी इस सत्य को पूरा उजागर नहीं कर सकतीं। किंतु राजनीति के पंडितों को नरेंद्र मोदी ने 16 मई के अपने बडोदरा और अहमदाबाद के भाषणों में विश्लेषण के अनेक सूत्र दिए। जिसमें सबसे प्रमुख यह कि कांग्रेस पार्टी छोड़कर यह पहली ऐसी सरकार है, जिसमें किसी दल ने अकेले दम पर बहुमत पाया है। वे याद दिलाते हैं कि 1977 की जनता पार्टी की सरकार भी अनेक कांग्रेस विरोधी दलों का गठबंधन ही थी। किंतु परदे के पीछे के नायकों को देखें तो इस जीत ने उन्हें भी मुस्कराने का अवसर दिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए शायद यह क्षण सबसे अधिक प्रसन्नता का है, जब वह दूसरी बार किसी स्वयंसेवक को भारत जैसे विशाल राष्ट्र का नेतृत्व करता हुआ देख रहा है। किंतु संघ परिवार की खुशी का सबसे बड़ा कारण यह है कि उसके विचार परिवार से जुड़े एक दल ने अपने दम पहली बार बहुमत पाया है।
संघ एक ऐसा संगठन है जो राजनीतिक क्रियाकलापों पर मर्यादा में रहते हुए ही अपनी सक्रियता का प्रदर्शन करता है। आप ध्यान दें कि इस चुनाव में अपनी अतिसक्रियता के बावजूद आरएसएस के सरसंघचालक को एक बार कहना पड़ा कि “हमारा काम नमो- नमो करना नहीं हैं।” यह साधारण वक्तव्य नहीं था और यह ध्यान दिलाने के लिए था कि उसके स्वयंसेवक अपनी सीमाएं और मर्यादाएं न भूलें। बावजूद इसके यह मानना पड़ेगा कि इस चुनाव में जैसी सक्रियता संघ और उसके सहयोगी संगठनों ने दिखाई वह अभूतपूर्व थी। इसका श्रेय लेने से वे बचने की कोशिश भी करेंगें और टीवी पर दिखने वाले उनके प्रवक्ताओं में एक वीतरागी विचार भी दिखेगा। किंतु यह तय मानिए कि यह चुनाव दरअसल संघ का खुद का रचा हुआ प्रयोग था जिसमें वह सफल हुआ।
भारतीय जनता पार्टी 2004 और 2009 की पराजय से निष्प्राण होकर पड़ी थी। संघ अपनी सीमित राजनीतिक आकांक्षाओं के बावजूद अपने सम्मान और शुचिता को लेकर बेहद सजग संगठन है। कांग्रेस के वाचाल नेताओं द्वारा उस पर किए जा रहे हमले और ‘हिंदू आतंकवाद’ जैसे गढ़े गए नए शब्दों से वह निरंतर आहत हो रहा था। कांग्रेस की इस संघ विरोधी फौज को लगता था कि इससे कांग्रेस अध्यक्षा प्रसन्न होंगीं। जबकि इतिहास की ओर नजर डालें तो जवाहरलाल नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक संघ नेतृत्व का संवाद कांग्रेस से कभी इतना कड़वाहट भरा नहीं था। संघ परिवार ने कभी सीधे तौर पर नेहरू-गांधी परिवार पर हमले नहीं बोले। जबकि कांग्रेस के ‘सोनिया समय’ में यह सारा कुछ बिगड़ता दिखा।पस्तहाल भाजपा कांग्रेस की ‘बी टीम’ सरीखा व्यवहार कर रही थी। भाजपा नेतृत्व एक गहरी दिशाहीनता का शिकार था और सत्ता जाने की व्याकुलता उसमें साफ दिखती थी। लालकृष्ण आडवानी जैसे शीर्ष नेता उसके कांग्रेसीकरण पर चिंताएं तो जता रहे थे पर बिखर रहे परिवार को लामबंद कर पुनः खड़ा करने के आत्मविश्वास से वे खाली थे। ऐसे में संघ प्रमुख मोहन भागवत का एक वक्तव्य आता है कि भाजपा का अगला अध्यक्ष दिल्ली से नहीं होगा जिसे उन्होंने डी-4 नाम दिया था। यह दरअसल संघ के मैदान में उतरकर खड़े होने और देश को सरकारविहीनता और अराजकता से मुक्त कराकर एक समर्थ नेतृत्व एवं सरकार देने की दिशा में एक शुरूआत थी। इसके पूर्व 1975 के आपातकाल विरोधी आंदोलन में अपनी सक्रियता से संघ ने 1977 में जनता पार्टी सरकार बनाने में योगदान दिया था। लंबे समय बाद उसकी सक्रियता राममंदिर आंदोलन में नजर आई जब अटलजी को सरकार बनाने का अवसर मिला। किंतु राजग ने उसके सपनों पर पानी फेर दिया। वाजपेयी की सरकार से संघ के मतभेद आर्थिक नीतियों सहित अनेक मामलों पर सामने दिखने लगे थे। ऐसे में संघ ने अपने को अपनी गतिविधियों तक सीमित कर लिया और राजनीतिक विमर्शों से एक मर्यादित दूरी दिखाने लगा। एक अराजनैतिक और सांस्कृतिक संगठन होने के नाते उसकी गतिविधियों का समाज जीवन पर व्यापक प्रभाव है। इसे देखते हुए कमजोर भाजपा के बजाए कांग्रेस के कुछ नेता संघ को ही निशाने पर लेने लगे। इसी दौर में ‘हिंदू आतंकवाद’ शब्द को प्रायोजित किया गया और संघ को एक ऐसे खतरे की तरह प्रस्तुत किया जाने लगा कि जिसके बढ़ते प्रभाव से देश टूट जाएगा। संघ की ओर से मुस्लिम संपर्क का काम देखने वाले इंद्रेश कुमार जैसे प्रचारकों पर आरोप लगाने के प्रयास हुए और बम धमाकों में अनेक निर्दोष स्वयंसेवकों को फंसाने की कोशिशें हुयीं। यह सारा कुछ इतने सधे हुए अंदाज में हो रहा था कि लगने लगा कि गृह मंत्रालय एक गलत विषय को जनता के बीच स्थापित कर ले जाएगा। राजनीति के इस घिनौने स्वरूप के खिलाफ संघ की चिंताएं सामने आ रही थीं किंतु उसका स्वयं का पोषित संगठन भाजपा पस्तहाल था। काडर निराश था और ऐसे समय में दिल्ली में नितिन गडकरी की ताजपोशी के माध्यम से संघ ने एक नया मार्ग पकड़ने के लिए भाजपा को प्रेरित किया। बाद में नितिन गडकरी को कुछ आरोपों के चलते दूसरा कार्यकाल न मिल सका और राजनाथ सिंह को यह काम सौंपा गया। आप देखें तो भाजपा में यह करना साधारण नहीं था। दिल्ली की राजनीति में अरसे काबिज राजनेता नए नेतृत्व को स्वीकारने को तैयार नहीं थे। कांग्रेस पर हमला करने और स्वयं को वास्तविक प्रतिपक्ष साबित करने में भाजपा विफल हो चुकी थी।
भाजपा संगठन में बदलाव के बाद एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो संघ के प्रयोग को अंजाम तक ले जा सके। तमाम असहमतियों के बावजूद संघ ने साहस दिखाकर नरेंद्र मोदी को भाजपा के केंद्र में स्थापित कर दिया। भाजपा के भीतर रूठने-मनाने और पत्र लेखन के सिलसिले के बावजूद संघ ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की सलाह भाजपा को दी। समय ने साबित किया संघ ने जो निर्णय लिया था वह कितना सकारात्मक और भाजपा के लिए वरदान साबित हुआ। इस बीच दिल्ली में हुए बाबा रामदेव, अन्ना हजारे के आंदोलनों ने एक नई उर्जा का संचार किया और देश में व्यापक असंतोष का सृजन हुआ। कांग्रेस की सरकार की विफलताएं, मंत्रियों के बड़बोलेपन और अहंकारजन्य प्रस्तुति ने इस असंतोष को बढ़ाने का ही काम किया। नरेंद्र मोदी का नेतृत्व पाकर भाजपा का सोया हुआ काडर जाग उठा। उसमें उम्मीदें हिलोरें लेने लगीं।
संघ ने अपने रणनीतिकारों भैया जी जोशी, सुरेश सोनी, दत्तात्रेय होसबाले, डा.कृष्णगोपाल, मनमोहन वैद्य,राम माधव की क्षमताओं का पूरा उपयोग करते हुए विविध क्षेत्रों की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी। संघ के क्षेत्र प्रचारकों ने अपने-अपने राज्यों में तगड़ी व्यूह रचना की और माइक्रो मानिटरिंग से एक अभूतपूर्व वातावरण का सृजन किया। चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़ाने और शत प्रतिशत मतदान के लिए संपर्क का तानाबाना रचा गया। जिसका परिणाम है कि सूदूर कन्याकुमारी से लेकर लद्दाख से भी भाजपा के सांसद चुनकर संसद में पहुंचे हैं। संघ के काडर की सक्रियता ने देश में जहां मत प्रतिशत बढ़ाने में मदद की, वहीं नरेंद्र मोदी के समझौताविहीन और आक्रामक तेवरों ने सामान्य मतदाताओं के भीतर भरोसा जगाया। नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व को गढ़नेवाला संघ ही उन्हें अब एक नायक के रूप में पेश कर रहा था, जिसके पास आधुनिक भारत की चुनौतियों और समस्याओं का समाधान था। 2002 से हमले झेल रहे नरेंद्र मोदी का चयन वास्तव में संघ के लिए एक बहुत बड़ा जुआ था, जिसमें हारने पर भाजपा के लिए एक बड़ा संकट खड़ा होता और कम सीटें आने से भाजपा फिर उसी दौर में पहुंच जाती जहां समझौते, समर्पण और चयनित दृष्टिकोण से राजनीति की जाती है। बिहार से आए नीतिश कुमार जैसे नेताओं के विरोध को दरकिनार कर संघ ने एक नई सामाजिक अभियांत्रिकी का पूरा ताना-बाना बुना जिसमें उप्र और बिहार को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया। यह तथ्य सामने उजागर नहीं हैं कि किसने नरेंद्र मोदी को बनारस से लड़ाने का फैसला किया किंतु इस एक घटना ने भाजपा को चुनाव-युद्ध के केंद्र में ला दिया। संघ परिवार ने जहां अपने खांटी स्वयंसेवक और पूर्व प्रचारक को मैदान में उतारा वहीं भाजपा के विरोधियों के पास मोदी विरोध के किस्से तो थे किंतु विकल्प नदारद था।
नरेंद्र मोदी ने भी कांग्रेस और गांधी परिवार के प्रति रियायत न बरतते हुए अपने राजनीतिक विरोधियों की हर गलत बात पर सवाल खड़े किए। वे चुनाव अभियान के ऐसे नायक बने जिसे सुनने को लोग उमड़ रहे थे। अपने भाषणों से वे जनता को राजनीतिक तौर पर प्रशिक्षित कर रहे थे। यूं लगा कि समय का चक्र काफी पीछे घूम गया है, जब अपने नेताओं के सुनने-देखने के लिए लोग दूर-दूर जाया करते थे। मोदी को लेकर पैदा हुयी दीवानगी अकारण नहीं थी। यह संघ की कार्यशाला में पके हुए एक ऐसे व्यक्ति के प्रति जनविश्वास का प्रगटीकरण था जिसके मित्र और शत्रु प्रकट थे, जो अपने विचारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को छिपाता नहीं था, जो परंपरा और आधुनिकता को एक साथ साधते हुए 21वीं सदी के भारत का नायक बनने की क्षमता से लैस था। वह एक ऐसा नायक था जो अपनी विरासत और परंपरा को हिकारत से नहीं देख रहा था। जो मां के चरण छू-कर हर काम की शुरूआत तो करता था, किंतु परिवार के मोह से मुक्त था। जिसने उसे मिले हुए हर काम को पूरी तनदेही से पूरा किया और आगे की मंजिल पर निगाह रखी। युगों में ऐसे करिश्मे घटित होते हैं। भारतीय राजनीति में करिश्माई व्यक्तित्व के रूप में पं. नेहरू, इंदिरा गांधी, अटलबिहारी वाजपेयी और उसके बाद कौन तो आपको नरेंद्र मोदी ही याद आएंगें। नरेंद्र मोदी ने यह सब करते हुए भी अपने विचार के प्रति आग्रहों को कभी छुपाया नहीं। वे अपने विचारों के प्रति ईमानदार, कार्य के प्रति समर्पित और एक बेहद मेहनती इंसान हैं। इसलिए जब उन्होंने खुद को एक मजदूर नंबर-1 बताया तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। अपने साधारण जीवन, अप्रतिम वकृत्व कला, विचारधारा के प्रति समर्पण और टीम भावना ने उन्हें यहां तक पहुंचाया है। याद कीजिए पस्तहाल भाजपा के बारे में कभी संघ प्रमुख ने कहा था कि “भारतीय जनता पार्टी में जो कुछ हो रहा है वह ठीक नहीं है। …भाजपा का पतन नहीं हो सकता, उसमें राख से उठ खड़े होने का माद्दा है।” आज इतिहास की इस घड़ी में जब नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री चुने जा चुके हैं तो राजनीतिक पंडितों को संघ के इस ‘नरेंद्र मोदी प्रयोग’ को ठीक से समझने और व्याख्यायित करने की आवश्यकता है।

One Response to “भागवत, भाजपा और मोदी!”

  1. Aarti Upadhyay

    A sharply analytical and judiciously balanced article though smells highly of a pro RSS and BJP approach, yet speaks of nothing but truth. The writer has an astute observation. Look forward to more of such articles.

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