भारत-नेपाल रिश्तों के कबाब में हड्डी बनता चीन

आज भी नेपाल में चीन का सालाना निवेश और व्यापार सबसे बड़ा है। वह नेपाल की सेना को प्रशिक्षण तो देता ही है साथ ही युद्ध सामग्री भी मुहैया कराता है। चीन के राष्ट्रपति भले ही नेपाल नहीं गए हों लेकिन चीन में कम्युनिस्ट पार्टी की पोलिटब्यूरो के कई सदस्य नेपाल आ चुके हैं। इस संदर्भ में नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी की यात्रा में देखना है कि क्या उनकी इस यात्रा में कुछ संधियां होंगी? संधियों पर हस्ताक्षर न भी हों पर भारत-नेपाल के बढ़ते तालमेल के कई प्रमाण दिखने की उम्मीद है।

ओंकारेश्वर पांडेय

नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी 5 दिन की राजकीय भारत यात्रा पर हैं। अक्टूबर 2015 में राष्ट्रपति पद का पदभार संभालने के बाद बिद्या देवी भंडारी की यह पहली विदेश यात्रा भी है। यह यात्रा इस मायने में महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी बीच पहली बार नेपाल और चीन ने रविवार (16 अप्रैल) से अपना पहला संयुक्त सैन्य अभ्यास शुरू किया है। इससे भारत की चिंताएं बढ़ी हैं। चीन के अभ्यास को इस हिमालयी देश के साथ उसके सैन्य कूटनीति के विस्तार के तौर पर देखा जा रहा है। वैसे तो नेपाल सेना लंबे समय से भारतीय और अमरीकी सेना के साथ ही अभ्यास करती आ रही है। इसीलिए जब राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी भारत यात्रा पर आयी हैं, तो उनसे इस मुद्दे पर भी बातचीत हो सकती है। दिल्ली के अलावा वे वाराणसी, गुजरात व उड़ीसा भी जाएंगी।

पिछले साल सन 2016 के अगस्त महीने में प्रधानमंत्री का पदभार संभालने के बाद पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने पहले छह सप्ताह में ही भारत की यात्रा की थी। इस दौरान दोनों देशों में तब कई संधियों पर हस्ताक्षर भी हुए थे। हालांकि उल्लेखनीय है कि इससे पहले ओली की भारत व चीन यात्राओं को लेकर भारत में कुछ असमंजस खड़ा हो गया था। लेकिन पुष्प कमल दहल प्रधानमंत्री का बनने के छह हफ्ते के भीतर ही भारत आए। जबकि उनकी पहली चीन यात्रा 8 महीने के बाद संभव हुई। पिछले महीने अंतत: जब वे चीन गए भी तो वह उनकी राजकीय यात्रा नहीं थी। बल्कि वे पोआओ फोरम की बैठक में भाग लेने के लिए चीन गए थे। प्रधानमंत्री प्रचंड ने अपनी चीन यात्रा में बीजिंग में चीन के नेताओं से मुलाकात भी की, लेकिन किसी भी संधि पर हस्ताक्षर नहीं हुए। कहा जाता है कि चीन अब प्रधानमंत्री प्रचंड को उनके भारतीय लगाव को देखते हुए उन्हें संदेह की नजर से देखता है। शायद इसीलिए चीन के राष्ट्रपति ने उन्हें आपसी विश्वास बढ़ाने की सलाह दी तो वहां के कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने यहां तक कह दिया कि प्रचंड को भारत की ओर बढ़ते अपने रुझान को लेकर सफाई देने की जरूरत है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के कार्यकाल के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की नेपाल यात्रा अक्टूबर 2016 में होने का निर्णय हुआ था। लेकिन, बदले हुए माहौल में न तो चीन के राष्ट्रपति नेपाल गए और न ही आने के कोई संकेत नजर आते हैं। दूसरी ओर, नवंबर 2016 में प्रचंड सरकार ने भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की नेपाल यात्रा का आयोजन किया। सन 2005-06 में प्रणब मुखर्जी भारत के विदेश मंत्री थे और नेपाल में उन्होंने माओवादियों को मुख्यधारा में लाने में अहम भूमिका निभाई थी। बदलते परिप्रेक्ष्य में देखें तो अपने प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल में के।पी। शर्मा ओली ने जहां चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजनाओं (ओबीओआर)से जुडऩे में बढ़-चढ़कर उत्साह दिखाया और संधि की थी। लेकिन, अब प्रचंड ने इस मामले पर चुप्पी साध ली है। चूंकि भारत ने ओबीओआर में शामिल होने पर विरोध जताया है इसलिए प्रचंड की इस चुप्पी में भी चीनी राजनेता, भारत का हाथ देखते हैं।

बावजूद इसके चीन-नेपाल सैन्य अभ्यास की नयी खबरें अंदर पक रही नयी खिचड़ी की ओर इशारा करती हैं। यह पहला मौका है, जब वह चीन के साथ सैन्य अभ्यास कर रही है। नेपाली सेना के प्रवक्ता झंकार बहादुर के अनुसार चीनी सैनिकों का एक छोटा दल और उतने ही नेपाली सैनिक पहली बार सैन्य अभ्यास में हिस्सा ले रहे हैं। ‘सागरमाथा फ्रेंडशिप-2017’ नामक ये अभ्यास 25 अप्रैल तक चलेगा। सागरमाथा माउंट एवरेस्ट का नेपाली नाम है। माउंट एवरेस्ट दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है जो नेपाल और चीन के बीच की सीमा पर है। कहने को तो दोनों देश 10 दिन तक चलने वाला यह अभ्यास दुनिया के लिए खतरा बने आतंकवाद से मुकाबले में अपनी तैयारी के लिए कर रहे हैं। लेकिन चीन की सेना के साथ नेपाली सेना के बढ़ते रिश्ते भारत के लिए चिंता का सबब जरूर हैं। संयुक्त सैन्य अभ्यास में हिस्सा लेने के लिए चाइनीज पीपल्स लिबरेशन आर्मी का दस्ता पहुंचा है। गौरतलब है कि नेपाल ने संयुक्त सैन्य अभ्यास का प्रस्ताव 24 मार्च को काठमांडू आए चीन के रक्षा मंत्री जनरल चांग वांक्यूआन के समक्ष किया था।

आज भी नेपाल में चीन का सालाना निवेश और व्यापार सबसे बड़ा है। वह नेपाल की सेना को प्रशिक्षण तो देता ही है साथ ही युद्ध सामग्री भी मुहैया कराता है। चीन के राष्ट्रपति भले ही नेपाल नहीं गए हों लेकिन चीन में कम्युनिस्ट पार्टी की पोलिटब्यूरो के कई सदस्य नेपाल आ चुके हैं। इस संदर्भ में नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी की यात्रा में देखना है कि क्या उनकी इस यात्रा में कुछ संधियां होंगी? संधियों पर हस्ताक्षर न भी हों पर भारत-नेपाल के बढ़ते तालमेल के कई प्रमाण दिखने की उम्मीद है।

उनकी यह यात्रा मई, 2016 में होनी थी पर यह भारत-नेपाल संबंधों में अड़चनों और नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से अचानक रद्द कर दी गई थी। क्योंकि तब पिछले साल नेपाल के नए संविधान को अपनाने के बाद, वहां के मधेसी लोगों ने आंदोलन छेड़ दिया था।

उनकी मांगें थीं कि संविधान में संशोधन हो और संघीय सीमाओं को बदला जाए ताकि मधेसियों को सरकार में उचित प्रतिनिधित्व मिले। चूंकि ज्यादातर मधेसी भारतीय मूल के हैं इसलिए नेपाल की तत्कालीन सरकार को आंदोलन के पीछे भारत का हाथ होने का अंदेशा था। और, जब आंदोलन के चलते भारत-नेपाल व्यापार ठप हो गया तो ओली ने चीन से हाथ मिलाया और वहां से अन्य वस्तुओं के साथ पेट्रोलियम उत्पादों का भी आयात हुआ तो इस पर भारत की प्रतिक्रिया नाराजगी भरी थी। बाद में जब यूनाइटेड नेपालीज कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने ओली सरकार से समर्थन वापस लिया। और ओली को इस्तीफा देना पड़ा। उसके बाद से भारत-नेपाल संबंधों में बदलाव नजर आ रहा है।

भारत में नोटबंदी का असर नेपाल पर भी पड़ा था। पर भारत सरकार ने उन्हें विशेष सुविधा देते हुए नेपाली नागरिक 4500 रुपए तक पुराने भारतीय नोटों को बदलने और 25 हजार रुपए तक रखने का अधिकार दिया है। इसलिए नेपाल के वित्त मंत्रालय ने नेपाल राष्ट्र बैंक से भारतीय रिजर्व बैंक से बात करने और 25 हजार रुपए तक बदलने की सहूलियत देने के लिए कहा है। इन सभी विषयों पर नेपाल की राष्ट्रपति और उनके प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत होगी। उम्मीद का जानी चाहिए कि उनकी इस यात्रा से दोनों देशों के बीच आपसी समझ बढ़ेगी। बावजूद इसके सच ये भी है कि भारत नेपाल रिश्तों के कबाब में चीन एक हड्डी की तरह घुसता ही जा रहा है। भारत को इससे सतर्क रहने की जरूरत है।

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