बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम पर परिचर्चा

राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, जिसमें जदयू और भाजपा शामिल है, ने बिहार विधानसभा चुनाव में लगातार दूसरी बार जीत का परचम लहरा दिया है। 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में राजग को तीन चौथाई बहुमत मिला है। उसके 206 उम्मीदवार जीत गये हैं। चुनाव आयोग की ओर से घोषित नतीजों के अनुसार, जनता दल यूनाइटेड 115 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। उसकी सहयोगी भारतीय जनता पार्टी को 91 सीटें मिली हैं। 2005 के विधानसभा चुनाव के हिसाब से सबसे ज्यादा फायदे में भारतीय जनता पार्टी रही। उसे पिछली विधानसभा के 55 सीटों के मुकाबले 36 अतिरिक्त सीटें मिली हैं। पिछली बार के मुकाबले नीतीश कुमार की पार्टी जदयू ने अपनी सीटों में 27 की बढ़ोतरी की। लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल की सीटें 54 से घटकर 22 हो गई हैं। राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी को 7 सीटों का नुकसान हुआ और वह 10 से 3 पर आ गए। कांग्रेस 9 से 4 पर आ गई जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी अपने दो विधायकों से हाथ धो बैठी. उसे सिर्फ 1 सीट मिली है।

बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम की कुछ विशेष बातें-

-गुजरात के बाद दूसरी बार जनता ने विकास के लिए मतदान किया।

-बिहार चुनाव का संदेश-जो विकास करेगा, वही जीतेगा।

-बिहार के महारोग जातिवाद को ध्‍वस्‍त करते हुए जात-पांत से ऊपर उठकर मतदान किया।

-पिछले बार के चुनाव में ‘लालू हटाओ’ का नारा था यानी नकारात्‍क प्रचार अभियान, लेकिन इस बार सकारात्‍मक प्रचार अभियान था,’एनडीए ने विकास किया, इन्‍हें फिर से मौका दो।’

-मतदाताओं ने बाहुबलियों को नकार दिया।

-हिंसामुक्‍त चुनाव प्रक्रिया संपन्‍न हुए।

-राहुल गांधी का जादू नहीं चला। राहुल ने जिन 19 विधानसभा क्षेत्रों में जनसभाएं कीं, वहां केवल 1 स्‍थान पर कांग्रेस की जीत हुई। कांग्रेस को पिछले चुनाव में आए 9 के मुकाबले में सिर्फ 4 सीटों से संतोष करना पड़ा।

-बिहार में वामपंथी ताकतें अच्‍छी स्थिति में रहती थी, लेकिन इस बार उसकी झोली में भी पिछले चुनाव में आए 9 के मुकाबले में सिर्फ 4 सीटें ही आईं।

क्‍या बिहार चुनाव ने भारतीय राजनीति की दिशा तय कर दी है। बिहार चुनाव को लेकर आप क्‍या सोचते हैं, कृपया अपने विचार से सबको अवश्‍य अवगत कराएं।

43 thoughts on “बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम पर परिचर्चा

  1. सर, थिस टाइम पब्लिक ऑफ़ बिहार सेलेक्टेड राईट चीएफ़ मिनिस्टर एंड गुड गवर्मेन्ट, आल पब्लिक ऑफ़ बिहार पार्ट ऑफ़ बधाई और बिहार ने पूरे भारत वर्ष को एक मेसेज दिया की इलेक्शन मैं जीत उसकी होगी जो जनता के हित और इमानदारी से काम करेगा . चुनाव जाती, धरम और रेगिओनलिस्म से नहीं जीत सकते , जीतने के लिए जनता के लिए समर्पित पोलितिसिंस और इमानदार राजनेता की जरूरत है . विहार चुनाव पूरे भारत वर्ष के लिए एक उदहारण पेश करता है की जो काम करेगा वोही जीतेगा . धन्यवाद, सुनीता रेजा, मुंबई

  2. भारत में आजादी के छह दसक बाद तीन राज्य गुजरात , छत्तीसगढ़ , और अब बिहार के जनता ने अपना अभिमत वोट के माध्यम से रखा है की जो राजनैतिक पार्टी राज्य और रास्ट्र के विकाश के लिए अपना १००% देगा केवल उन्ही को राज करने का मोका जनता देगी ! लेकिन पुरे भारत को इस विषय को स्वीकारना होगा जैसे बिहार ने स्वीकार किया है बिहार चुनाव भारत को दो भारत १ गरीबो का भारत तो २ अमीरों का भारत कहने वालो के मुह पर करारा तमाचा है की भारत एक है वो है विकाश शील भारत न की सोनिया की भारत और न ही राहुल की भारत……? रास्ट्र के सबसे बड़े लोकतंत्र को अब हम सामन्ती प्रथा के रूप में नहीं स्वीकार्य कर सकते ६५ वर्ष से कांग्रेस के लोग देश को आजादी दिलाने के नाम आज तक आजादी की रायल्टी खा सत्ता सुख भोग रहे है ये जन मत है इसे दिल से सभी भारतीयों को अपना कर अपने अपने राज्य के लिए कटिबद्ध होना चाहिए ……….

  3. बिहार के चुनाव परिणाम देश के लिए दिशा निर्धारक प्रतीत होते हैं. लगता है जातीय समीकरणों की बरसों से चली आ रही चुनावी राजनीती के लिए यह एक चेतावनी भरी चुनौती है. यह चुनौती बिहार कि जनता ने दी है और सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को अपनी अपनी अपनी रीति नीति पर अब नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता महसूस होनी चाहिए. इसे विकास की जीत बताया जा रहा है. कुशल प्रशासक-द्वय नीतीश कुमार और सुशील मोदी की जीत. इसी दृष्टि से यदि गुजरात की संतुलित एवं जनहित परक नीतियों के निर्धारक नरेन्द्र मोदी की उपलब्धियों का बिना पूर्वाग्रहों के मूल्यांकन किया जाये तो वह भी विकास की ही जीत रही है. शीशे की तरह से स्पष्ट हो रहा है भारत की जनता अब क्या चाहती है.

    यदि इस दिशा संकेत की सत्ताकांक्षी दलों ने उपेक्षा करने की गलती की और पूर्ववत सामाजिक विभाजन विखंडन की घृणित रणनीति से बाज़ नहीं आये तो यह राष्ट्रहित के विरुद्ध उनकी हठधर्मिता मानी जा कर जनता के कोपभाजन का कारण बन सकते हैं. सीधे अर्थों में देश की समस्त जनता के लिए बिहार और गुजरात श्रेष्ठ उदहारण बन कर खड़े हो रहे हैं. जन उद्बोधन और भविष्य में आम लोगों को मूर्ख बनाने वाले नेताओं का साहस के साथ सामना करने का यह विकासास्त्र, भारत को अनेक समस्याओं से मुक्ति दिलाने का अमोघ अस्त्र सिद्ध हो सकता है. आशा की जानी चाहिए कि इसका अगला वार भ्रष्टाचार से देश को मुक्ति दिलाने के लिए होगा, क्योंकि विकास प्रक्रिया को स्थायित्व तभी मिलने की सम्भावना हो सकती है यदि भ्रष्टाचार मुक्त वातावरण का साथ उसे मिले. उसके उन्मूलन के बिना आज भारत विश्व की एक महाशक्ति बन सकने की क्षमता का दावा करते हुए भी अनेक देशों द्वारा शंका की दृष्टि से देखा जाता है. देश की जनता इस रूकावट को भी दूर करने का साहस कर दिखायेगी उन्हें ऑंखें दिखा कर जो अपनी जबें भरने में लगे हैं तो भारत का और अपना बहुत बड़ा हित करेगी.

  4. बिहार चुनाव में नितीश को स्वीकारने वालो ने तों पूरे गठबंधन को समान वोट दिया लेकिन कट्टर भाजपाइयों ने केवल भा जा पा को वोट दिया | उनकी रणनीति थी नितीश को नीचे ले जाना | पर आंधी नितीश कि थी इसलिए वो बच गए | चुनाव परिणाम अपनी कहानी स्वयं बयान कर रहे है | नितीश को क्या इन फासिस्ट ताकतों से सावधान रहना होगा ? क्या नितीश को ये पता चल पायेगा कि भा जा पा ने उनको नीचे करने कि कोशिश कि | जो बिहार को à ��ानते है ,जो बिहार कि राजनीति को जानते है ,जो फासिस्ट ताकतों के तौर तरीको को जानते है ,उनके विचार आमंत्रित है कि वे इन बातो पर क्या सोचते है ?

    1. आप का विचार साम्प्रदायक है और बिहार की जनता के खिलाफ है. आप फिर सम्प्रदायकता को बढ़ाने की कोशिश कर रहे है शायद आप लालू या कांग्रेस के समर्थक है.आप नहीं चाहते है की बिहार की जनता जागरूक हो

  5. बिहार चुनाव राजनीती नहीं विकास का चुनाव था आज का मतदाता जाग चूका हैं एक और जहाँ जनता कोई भी व्यक्ति टीक नहीं इसलिए वोट नहीं करना चाहता हैं ऐसे समय केवल जो सरकार विकास करेगी उसे ही सत्ता मिलेगी

  6. लालूजी का भय चुनाव में दिखा, लगा की अगर लालूजी आ गए तो बंटाधार होना निश्चित है. रामविलास पासवान अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं. नितीश कुमार जी का विकल्प कोई नहीं था. सोनिया, राहुल और स्वयं प्रधानमंत्री जी ने लोगों को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन विकास जनता को अपनी आँखों के सामने दिख रहा था. नितीश कुमार और सुशील मोदी जी की नियत पर लोगों ने विश्वास किया, उन्हें लगा की अगर इन्हें मौका दिया जाय तो विकास के नए कीर्तिमान बन सकते हैं, चुनाव की खास विशेषता रही कि सम्पूर्ण समाज के लोगों ने एनडीए को विकास के लिए चुना. भाजपा के लिए नए रास्ते खुल गए हैं. क्योंकि एक खास तबके ने उससे जुड़ने की पहल कर दी है.

    चलते चलते:—
    =========
    बिहार की बुद्धिमान जनता ने कान्ग्रेस पार्टी को चार विधायक दिये हैं, अब वो विधायक आराम से कान्ग्रेस की अर्थी उठा कर “राम नाम सत्य है” बोलते हुए कान्ग्रेस पार्टी का अन्तिम संस्कार कर सकते हैं। ।।।।।जय हो।।।।।

  7. एन डी ए को बिहार में ३९.१ प्रतिशत वोट मिला है और ६१ प्रतिशत वोट विपक्ष में पर हैं
    ५२ प्रतिशत कुल मतदान हुआ है यानी २०.३३ लोगोने ने ही पक्षमे वोट दिया
    यह हमारे निर्वाचन पद्धति की कमजोरी है की हम आकासकुसुम की तरह सोचने लगते हैं
    बिहार का विकास कुछ इसी तरह का है
    थोड़े काम में बहुत परिणाम पा जाते हैं
    पर चुनावों से परिवर्तन नहीं होता न ही यह जयप्रकाश नारायण की ही अवधारणा थी जिनकी असफलता का कारण भी चुनावी सफलता रही .
    आखिर इस चुनाव फल से जयप्रकाश के एक चेले ने दुसरे को परास्त ही किया है और कुछ नहीं
    कोई यह क्यों नहीं बताते की विकास पुरुष नीतीश ने कितने करोडपति और अपराधियों को टिकट दिया?
    कितने गरीब कार्यकर्त्ता चुनाव में जीते हैं?
    कितने खर्च सरकारी विग्यापनोमे विकास के नाम पर अखबारों में किये गए?
    वैसे पटना का कुछ विकास जरुर हुआ है पर यह मिथिला के पिछड़ेपन के आधार पर हो रहा है वैसे भी इस चुनाव परिणाम में भी मधुबनी -दरभंगामे विरोध के स्वर पहचाने जा सकते हैं
    जातीय समीकरण के माहिर विविध नामों से समाज को बाँटनेवाले गद्दी तो पा सकते हैं पर स्वस्थ समाज की रचना नहीं कर सकते
    पोस्ट मंडल और पोस्ट कमंडल क्या कैश कास्ट क्रिमिनल विधायकों का जमाना होगा ?
    मैं लालू का समर्थक कभी नहीं रहा , लालू खराब थे , पर तीसरा अच्छा विकल्प क्यों नहीं बना ?
    कमजोर विपक्ष से तानाशाही हे आती है.
    सही बात यह है की लालू के जिन ने अगड़ों का वोट महादलितों के मसीहा को बिना मांगे दिला दिया है, और बी जे पी ने जमीनी कार्यकर्ताओं से अपने को दूर कर लिया है – जीतनेवालोंमे संघ के स्वयमसेवक तो नगण्य हैं हाँ दल्बलुओं से दल भरा है किसी ने हाल में बदला पला तो किसीने कुछ वर्ष पहले जिसमे प्रदेश अद्याक्ष भी हैं जिनका इस्तीफ़ा बेटे के परिशाद्मे भेजने पर वापस हुआ अब आगे देखें होता है क्या?
    डॉ. धनाकर ठाकुर ९४७०१९३६९४
    श्यामली, रांची

  8. बिहार चुनाव ने बिहार राज्य की राजनीति की भावी दिशा ज़रूर तय की है, पूरे भारत की नहीं, क्योंकि भारत के अलग-अलग राज्यों की अपनी-अपनी राजनीति है और अपने-अपने राजनीतिक समीकरण । अभी देश से प्रान्तवाद, पाखंडपूर्ण जनवाद, भ्रष्टाचार, बाहुबलीवाद और नक़ली पन्थनिरपेक्षतावाद समाप्त नहीं हुए हैं । उनकी जड़ें कैंसर की तरह बहुत दूर तक फैली हुई हैं । हाँ, अन्य राज्य बिहार से सबक़ ज़रूर लेंगे कि चुनाव केवल जातिवाद या वंशवाद या झूठे वायदों से नहीं जीते जा सकेंगे । राजनीतिज्ञों को कुछ ठोस काम करके दिखाने होंगे । सीमित और स्वार्थपूर्ण राजनीति से ऊपर उठकर राज्य का विकास करना होगा । मतदाता को उल्लू बनाने की बजाय सन्तुष्ट करना होगा । बिहार के मतदाताओं की प्रशंसा की जानी चाहिये, जिन्होंने पुराने खिलाड़ियों और भ्रष्ट जातिवादियों तथा वंशवादियों की धमकियों और प्रलोभनों से ऊपर उठकर व्यापक हितों को महत्त्व दिया है, लेकिन साथ ही उससे यह भी पूछना चाहिये कि उसने दाग़ी और गम्भीर आपराधिक मामलों से जुड़े 60 प्रतिशत विधायकों को क्यों चुना ?

  9. चारा चाट करनेवालों को मिली करारी चोट
    जनता ने जब चुन लिया दे नितीश को वोट
    दे नितीश को वोट बदलने को तत्पर थे सारे
    जातिवादी सोच से कबतक कब तक लड़ें बचारे
    होना था सब पहले लेकिन हुआ देर से आज
    जनता जागने को आतुर थी बदला आज समाज
    इतने दिन सहते रहे शब्द ‘ बिहारी ‘ गाली
    क्योंकि अपने अधिकारों की नहीं हुई रखवाली
    आंधी जब चलने लगी कहते जिसे विकास
    मुर्ख बनाने वालों का होना है सत्यानाश
    आये दिन सुख के चलो अपने घर की ओर
    वर्ना फिर से घुश आयेगा वही पुराना चोर ||

  10. बिहार में विकास की जीत निश्चय ही नितीश कुमार की जीत बिहार की जनता की आशावादी सोच का परिचायक है | जिस विकाश पुरुष का इंतज़ार बिहार को पिछले कई दशकों से था शायद पूरा हुआ | बीते पांच वर्षों में तो कुछ हुआ किसी से छुपा हुआ नहीं है | चौड़ी सड़कें अपराध का निरंतर गिरता ग्राफ और भय मुक्त समाज, और क्या चाहिए | उधर लालू राबड़ी का राज अजाजकता जातिवाद मसखरापन कबतक विकास के आगे टिक पाता ? राहुल की गलतबयानी नितीश के लिए निश्चय ही सहायक साबित हुए | आने वाला समय बताएगा की नितीश आगे भी विकाश की हिन् बातें कर के बिहार के मुख्या मंत्री के बाद भारत के प्रधान मंत्री की भी कुर्शी सम्हालेंगे या फिर भारतीय जनता पार्टी द्वारा संचालित सरकार की भांति गलतियां कर के असफलता को वरण करेंगे | बिहार के नव निर्वाचित मुख्य मंत्री को साधुवाद एवं शुभ कामनाएं |

  11. लंबी चौडी बातों में वक्त जाया ना करते हुए चार लाइन – केन्द्र सरकार का निकम्मापन, नकारात्मक कार्यशैली, भ्रष्टाचारी सोच, आंतकियो को पनाह देती करतूत, हिंदुत्व विचारधाराओं के प्रति घृणात्मक रवैय्या, जाति धर्म के बदले वोट करने की राजनीती ।

    कुल मिलाकर – बिहार की जनता के हाथ में दी गई वोटिंग मशीन से निकला विकास और सद्भावना का जिन्न ये बताता है कि अब हम समोसा पसंद करते हैं इटली नही

  12. जातिवाद के आधार पर इतनी बड़ी जीत संभव ही नही थी. बिहार को जब नितीश जी ने संभाला था तब जैसी सामाजिक स्थितियां थीं, अपहरण था गुण्डाराज था, देर रात की तो बात ही छोड़ें शाम से ही सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था, महिलाएं, ग़रीब असुरक्षित थे, सड़कों के हालात खराब थे. इन सबमें जो बुनियादी परिवर्तन विगत वर्षो में जनता ने देखे हैं, उसी के चलते नीतीश पुनः सत्ता में आये हैं.

  13. राहुल और सोनिया को परिवारवाद के नाम पर नीचा दिखाने का फैशन चल पड़ा है. राहुल यदि गांव गांव घूमकर भारत को समझने की कोशिश कर रहे हैं तो इसमें लोगों की छाती क्यों फटती है. वे कूदकर राजगद्दी पर तो नही बैठ गये, विपक्षी नेताओं के बारे में बोलते वक्त जितनी संयत भाषा का प्रयोग राहुल करते हैं, क्या उसका एक चौथाई भी विपक्ष उनके लिये कर पाता है. सोनिया ने मृतप्राय कांग्रेस को अपने बल पर जिन्दा किया, राहुल उसे मजबूत बनाने की कोशिश कर रहे हैं तो क्या बुरा कर रहे हैं. कांग्रेस एक विचार धारा है, उत्तर और दक्षिण के बीच, सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता के बीच, विभिन्न धर्मों के बीच, जातियों के बीच समन्वय और मध्यमार्ग का प्रतीक. ऐसी कांग्रेस का लुप्त हो जाना देश के लिये हितकारी नहीं, सोनिया उअर राहुल का मजाक बनाने की जगह, उनसे बड़ी लकीर खींचने की कोशिश कीजिये, उनकी तरह सभ्य भाषा में बोलना शुरू कीजिये. अभी तो लालू ही गये हैं, अब मुलायम और शरद जैसों की पारी है

  14. बिहार में चुनाव परिणाम आशानुकूल हुए हैं, हां राजग को 20-30 सीटें अधिक मिली हैं. परिणामों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि यहां की जनता समझदार हो गयी है, जातिवाद की राजनीति से दूर आ गयी है. सभी पार्टियों ने क्षेत्रवार जाति के आधार पर ही टिकट दिये थे, लोगों ने भी अपनी जातियों के लोगों को ही जिताया. यादव बहुल क्षेत्र से हर पार्टी ने यादव को ही टिकट दिया, यह अलग बात है कि नितीश का यादव प्रत्याशी जीत गया, लालू का हार गया. बिहारियों की सबसे बड़ी समस्या जाति. दूसरी समस्या अपना जिला, तीसरी अपनी भाषा, चौथी है सब कामों के लिये पैरवी. पैरवी के आधार भी पहले तीन होते हैं और उनमें से कोई नही मिला तो, रिश्वत का बटखरा चढ़ा दिया. बिहारियों को तबतक सम्मान नही मिलेगा जबतक वे कम से कम हिन्दी शुद्ध नहीं बोल लेते. परिणाम वाले दिन टी वी के हर चैनल पर पूरे दिन बिहारी नेताओं लालू-हिन्दी सुन सुनकर माथा भन्ना गया, ऊपर से थेथरई वाले तर्क. पता नही कब सुधरेंगे ये लोग. भोजपुरी बोलना है तो बोलिये, मैथिली बोलना है तो बोलिये, लेकिन जब हिन्दी बोल रहे हैं , तब तो शुद्ध हिन्दी बोलिये, उसमे भोजपुरी और मैथिली तो मत मिलाइये. व को ब, य को ज, ड़ को र, लिंग उलटे-पुल्टे, सर्वनामों का बंटाधार, वचन की छुट्टी – अंग्रेजियत नहीं अपना रहे, ठीक है, हिन्दी पर तो रहम कीजिये.
    लालू ने बिहार को इतने गहरे गर्त में गिरा दिया था कि उसके बाद थोड़ा काम करके भी अधिक नजर आने को था, नितीश ने ईमानदार कोशिशें कीं, समझौते करना उन्हें रास नहीं आता, लेकिन तमाम समझौते उन्हें भी करने पड़े, जनता ने अब उन्हे इतनी ताकत दे दी है कि, अब वे बिना समझौतों के अपने आदर्शों ओर नीतियों को लागू करने की निडर कोशिश कर सकते हैं. यदि ऐसा कर पाए तो इतिहास पुरुष बन जाएंगे, अभी तक तो नही बने हैं.

  15. समाचार एवं सारी टिप्पणियां पढी। क्रम २५,और १३ श्री. आर सिंघ की टिप्पणियों से पूर्णतः सहमति व्यक्त करता हूं।
    केवल एक ही बात जोडना चाहता हूं।
    नीतिश कुमार और नरेंद्र मोदी साथ आए बिना जो गुजरातमें चमत्कार हुआ है, अतुल्य(शक हो तो जाकर देख आइए।) विकास हुआ है, और बिहारमें जो विकास प्रक्रिया प्रारंभ हुयी है, इन प्रतिमानों के आधारपर समग्र संपूर्ण भारतका विकास होना, असंभव नहीं, तो कठिन निश्चित ही है।देशहित में आप दोनोको जुडना ही होगा। जब जयप्रकाश जी नाना जी देशमुखके साथ हुए तब आपात्काल का अंत हुआ था।आपको चाणक्य बनना होगा। फिरसे पाटलिपुत्र के पुत्र से क्या यह अपेक्षा की जा सकती है?
    यह मत्स्यकी आंख को जो देख सकता है, वही शर संधान कर पाएगा। देशकी उन्नति, देशकी उन्नति, देशकी उन्नति यही है वह मत्स्यकी आंख।
    नरेंद्रजी और नीतिश जी साथ होकर ही इसका शर संधान कर पाएंगे। अन्यथा आपसी मतभेदमें शक्तिया बांटकर फिरसे भारतको आगे बढाने में असफल हो जाएंगे। क्या यह विवेक यह समझदारी की अपेक्षा की जा सकती है। स्वर्ण अवसर आया है।

  16. आचार्य विष्णु गुप्त (चाणक्य) व सम्राट चन्द्रगुप्त की जन्म भूमि मगध (वर्तमान में बिहार) में जनता ने राष्ट्रविरोधी ताकतों को मूंह तोड़ जवाब दिया है, इसके लिए बिहार की जनता सबसे अधिक बधाई की पात्र है| जहाँ तक कांग्रेस, वामपंथ, लालू और पासवान का सवाल है, तो उनका तो पत्ता ही साफ़ कर दिया बिहारियों ने| अब इन्हें खुजली मचना स्वाभाविक ही है| मै आशा करता हूँ की चतुर्वेदी जी व निर्मल रानी जी भी यहाँ इस चर्चा पर अपने विचार रखें|
    बिहार का चुनाव परिणाम देश के लिए एक सुखद संकेत है| आने वाले समय में अब कांग्रेस और वामपंथ की नस्ल इस देश में ख़त्म होने वाली है जो कि समस्त भारतीयों के लिए एक शुभ सन्देश होगा|
    जय भारत…
    जय मगध…

  17. बस अब एक ही बात का डर सता रहा है की भाजपा और जदयू कहीं सत्ता के मद में आकर अपना विकास का एजेंडा न छोड़ बेठे…
    अक्सर भारत की राजनीती में यही होता है. जब-जब सरकारें मजबूत होती हैं वो विकास और जनकल्याण को भूलकर जनता से दूरी बना लेती हैं. (पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी, यूपी में बसपा और केंद्र की राजीव गाँधी की ४०१ सीटें पाने वाली कांग्रेस की अराजकता को कौन भूल सकता है.) ये स्तिथि बिहार में न हो जाये क्योंकि अगर ये दोनों दल अपनी राह भटक गए तो बिहार को नोचने वाले तो बहुत हैं पर सँभालने वाला कोई नहीं दिखयी पड़ता.

  18. बिहार की जनता को बधाई ….जनादेश में सार्थकता है …. नितीश .शरद .सुशील जैसे ईमानदार सुलझे हुए नेताओं को न केवल बिहार अपितु बिहार के बाहर के लोग भी जो इन्हें जानते हैं ,इनका आदर करते हैं …सुशील मोदी की छवि अटलजी जैसी धर्मनिरपेक्षता वादी है .नितीश और शरद यादव तो घोषित समाजवादी हैं ही सो उनकी छवि भी कट्टर जातेय्तावादी नहीं है .बिहार में अभी कोई खास विकाश नहींहुआ और न ही कोई भूमि सुधार ,क़ानून लागु हुआ ,न सड़कें बनी न गाँवों में स्वच्छ पेय जल सुविधा है .न sarkari चिकित्सा और न शिक्षा का ठिकाना है …फिर भी लालू जी ने पासवान जी ने और pappu yadwon ने vihar की जनता par जो कहर ढाया था ये उसका सवर्ण वादी ,पुनर उत्थान वादी
    तात्कालिक जबाब है …मरता क्या न करता …भले ही राहुल जी ईमानदार हों .युवाओं .गरीवों के लिए गाँव गाँव में मारे मारे फिरें किन्तु बिहारियों में यदि मसखरों को मुख्यमंत्री वनाने की ललक होते है तो वे संजीदा लोगों को भी दुबारा कमान सौंप सकने में सक्षम हैं . इसीलिए-कुर्मियों .भूमिहारों .ब्राम्हणों .राजपूतों ने पूरी एकजुट ता से कांग्रेस और वाम को निराश करते हुए – भाजपा और जदयू को प्रचंड बहुमत दिया की कहीं सवर्ण वोटों के बिखराव से भृष्ट महाबलियों और असहिष्णु जातीयतावादीयों का बिहार की जनता पर दुबारा कहर न टूटे .
    बिहार जहां था वहीँ है ..कहीं नहीं जाने वाला ….भृष्टाचार के अड्डे इतने मजबूत हैं की उसमें सेंध मारना भी नितीश को मुश्किल हो रहा है किन्तु फिर भी यदि वे ऐसा कर पाते हैं तो यह देश के लिए बाकई सुखद दिशा निर्देश होगा …यह कठिन डगर है …..बिहार में आज भी जातीयता से ही लोकतंत्र का निर्धारण हुआ है .सकारात्मक व्यक्तियों की छवि से चुनाव जीता जा सकता है .व्यवस्था परिवर्तन के लिए जनांदोलन की दरकार है और इसके लिए वर्गीय चेतना परम आवश्यक है …..आशा की जानी चाहिए की बिहार की जनता और नेत्रत्व धीरे -धीरे इस जात धर्म के गठजोड़ से परे विकाश के वैज्ञानिक मापदंडों और वास्तविक लोकतंत्रात्मक मूल्यों को स्थापित करने में कामयाब होगी .

  19. waise yah janadesh desh ke tamaam rajnitigyon tatha aamjano ke liye sachetak hai…raajneta yah samajh len ki aamjan apne neta se kya chahte hain aur deshvaasee samajh len ki unhe raajnetaon ko kis aadhaar par chunna hai…

    agar janta jaag jaaye to loktantra ka nirnaayak sachmuch me wahi hogee..

  20. रुक गई थी ट्रेन, लो! अब बुझ गयी है लालटेन,
    ‘चारागर’* को किसने ये आखिर बिचारा कर दिया.

  21. जो बिहार aadhe भारत को अकेले अन्न खिला पाने की क्षमता रखता हो,जिस बिहार ने शताब्दियों से धार्मिक राजनितिक और सांस्कृतिक अगुआई का काम किया हो, जहाँ हर धर्म आस्था को आत्मसात करने की विराट क्षमता हो,जो दुनिया को सिखा सकता हो कि अतिथि का सत्कार कैसे किया जाता है,जहाँ की प्रतिभा दुनिया भर में अपना लोहा सदा से मनवाती आ रही हो,उस बिहार को डेढ़ दशक में लालू जी ने जिस प्रकार जात पांत, बोली भाषा और धर्म के नाम खंड खंड कर दिया, जहाँ डेढ़ दशक पल पल लोग दहशत में जीते रहे कि कब कौन गुंडा मवाली आकर उनसे क्या छीन जाएगा,जहाँ बिजली और सड़क का सपना देखना तक लोग भूल गए, जहाँ सरकारी महकमे में कुर्सी पर बैठा हर कर्मचारी लुटेरा बन गया,जहाँ शहरों गाँवों में लोग अँधेरा होने के बाद घर से निकलने में डरते थे,जहाँ पुलिस और डकैत में कोई फर्क नहीं बच गया था,जहाँ क़ानून को गुंडे जेब में लेकर घुमते थे,जहाँ स्त्रियाँ सोच नहीं सकती थी कि अकेले एक स्थान से दुसरे स्थान को बस ट्रेन से जा सकती हैं,जहाँ सारी कल्याणकारी योजनाये वर्षों तक केवल कागज़ पर ही पूरी होती रहीं,जो बिहार पिछड़ेपन का पर्याय बन गया था,जहाँ अन्यत्र कहीं भी बस रहा बिहारी खुद को बिहारी कहने में लज्जा महसूस करता था,जहाँ एक एक आदमी इस स्थिति से दुखी हो हताशा में जी रहा था….
    सांप्रदायिक सांप्रदायिक चिल्ला रहे और लोगों को ठग रहे वैसे दीमक लगे राज्य को नितीश जी ने पांच साल में जो दिया, जनता ने दिखा दिया कि वह क्या चाहती है ,उसकी प्रकृति क्या है,वह राजनीती और राजनेता को किस रूप में देखना पसंद करती है..

  22. एक बात राहुल गाँधी के बारे में करना भूल गए…….. बिहारी समाज ने राजमाता और युवराज को भी आइना दिखाया है……. आप गोरे हैं (हम लोग अब भी गोरे लोगों को काबिल और महान मानते हैं) आपका पढ़ हुवा भाषण अच्छा लगता है….. आप हमरे घर आके खाना खाते है …. बढिया लगता है………

    पर केन्द्र में आप क्या कर रहे हैं……..
    घोटाले पर घोटाला …

    बिहार को ये नहीं चाहिए……

    दूसरे हैं : महा विद्वान श्री लालू प्रसाद जी. विदेश में जाकर लेक्चर दे आये…… बड़े बड़े विश्व विद्यालय में बुलाया गया था…. पर बिहारिओं ने कह दिया ……. “अब मजाक का वक्त नहीं है..” पिछले १५ सालों में आपका बहुत मजाक देख लिया.

  23. नितीश ने समस्त बिहारी समाज के स्वाभिमान को मुखार कर विकास का रास्ता भर दिखाया है …. और विकास को दिशा भी प्रदान की है. बिहार की जनता ने नितीश और मोदी की जोड़ी को दुबारा मौका देकर विकास के प्रति अपनी प्रतिबधता प्रकट की है…… यानी अब समाज कोई जात पात की बात नहीं करना चाहता…. उसे चाहिए बिजली और सड़क …. ये मिल जाए तो जीवट आदमी अपनी उन्नति करना जानता है और बिहारी समाज में वो जीवटता शुरू से रही है.

  24. बिहार चुनाव इस बात के प्रमाण हैं :समाज में कांग्रेस द्वारा फैलाई जा रही साम्प्रदायिकता को भारतीय समाज खतरनाक मान रहा है .मुसलामानों ने भी इस खतरे को पहचान लिया है ;वे बहकावे में आने को तैयार नहीं है .विकास की बात तो हर पार्टी करटी है .जनता दलों के नारे पर नहीं जाती .काम देखती है .भारतीय समाज मुस्लिम और नाक्साली आतंकवाद को बढ़ावा देने की कांग्रेस राजनीति को भयावह मानता है .इसलिए भाजपा जनता दल मंच को उसने चुना.

  25. जीत के लिए नितीश जी और उनके जनता दल को बधाई !
    नितीश जी बस्ताब में एक अच्छा नेता है, बीजेपी के साथ गठजोड़ के बगैर भी उनका दल बिजयी हो सकता था, राज्य में बीजेपी भी आगे गठजोड़ का धर्म निभाए यही उम्मीद है,

  26. हाँ ,ये बेहद संतोष कि बात हें बिहार कि जनता ने लोकतंत्र की वास्तविक भावना के अनुरूप मतदान किया और इस अवधारणा को ध्वस्त कर दिया क़ि
    वहां जाति, धर्मं , आदि के आधार पर मतदान होता हें /बिहार क़ि जनता शायद पहला उदहारण पेश किया हें क़ि यदि कोई राजनितिक दल निष्ठापूर्वक केवल विकास कार्यों को प्राथमिकता देते हुए सत्तसीन रहता हें तो जनता पुनः -पुनः उसे सत्ता प्रदान करना चाहेगी / लालू प्रसाद यादव ने 15 वर्षों तक केवल चुटकुले सुनकर बिहार को बर्बाद कर दिया और अपने परिवारजनों के विकास पर ध्यान दिया /हेरात क़ि बात हें क़ि बिहार क़ि जनता को लगातार मुर्ख बनानेवाला व्यक्ति फिर से सत्ता क़ि आस लगाये बैठा हें ,
    बिहार क़ि जनता को बधाई देते हुए इतना ही कहना चाहूँगा क़ि झारखण्ड जेसे राज्यों क़ि जनता को कम से कम अवश्य सिख लेना चाहिए क़ि वे एकजुट होकर किसी सही पार्टी को अपना मत दान करें ताकि खंडित जनादेश के कारन होने वाले घोटानों (केंद्र क़ि कांग्रेस सरकार क़ी तरह )से भी बचाव हो सके.मुझे पूर्ण विश्वास हें क़ि आने वाले वर्षों में बिहार से न केवल पलायन रुकेगा अपितु बहरी व्यापारी भी वहां निवेश करना अवश्य चाहेंगे /

  27. संदेह नहीं कि विकास के आधार पर बिहार में नितीश की पुनर्रावृत्ति हुई
    है। अगर तीन चौथाई बहुमत को पचा गए और बौराए नहीं तब विकास का असल काम कर
    पाएंगे। मुझे इस बात का अंदेशा अधिक है कि पार्टी, विचार और प्रक्रियाओं
    की प्राथमिकता में वे अब स्वयं पर अधिक फोकस करेंगे, गठबंधन पर कम। यही
    बिखराव का कारण बन मकड़जाल बुन देगा जिसमें से बाहर निकल, कुछ कर गुजरने
    का मादा मंदा करेगा।

  28. हाँ भारतीय लोकतंत्र अब तेजी से परिपक्वता की और बढ़ रहा है. इसे गुलाम बनाये रखने के लिए हमारे आज के राजा फिर से जाती की गणना कर के बंधे रखना चaहते है. bihar के मतदाताओ ने इसे राजाओ के सर पर जूता मारा है.

  29. बिहार के चुनाव के पहले प्रवक्ता में एक बार इस पर चर्चा हुई थी.तब मैंने लिखा था की अगर बिहार की जनता ने नितीश को नकार दिया तो बिहार के लिए बहुत बुरा होगा,पर मैं नहीं समझता की बिहार की जनता इतनी मुर्ख है. आज बिहार की जनता ने दिखा दिया की वह मुर्ख नहीं है.जैसा नितीश अपने गठ्वंधन की जीत के बाद बोले की यह बिहार की जनता की जीत है ,उसके स्मिता की जीत है तो वास्तव में उन्होंने बिहार और बिहारियों का सही मूल्यांकन किया.लगता है की बिहार अपने आपको पहचानने लगा है.यह परिक्रिया तो ऐसे २००५ से ही शुरू हो गयी थी, जब बिहार की जनता को लग गया था की एनफ इज एनफ.इस बार तो बिहार के मतदाताओं ने जिस परिपक्वता का प्रदर्शन किया है वह वाकई काबिलेतारीफ है.अब नितीश कुमार और उनकी टीम पर बिहार की जनता ने एक बहुत बड़ी जिम्मेवारी सौंपी है और इसको बखूबी निभाने में ही न केवल बिहार बल्कि पूरे देश का भविष्य निर्भर करता है.अभी भी विकास का पुरौधा और उसका वास्तविक संदेशवाहक मैं नरेन्द्र मोदी को मानता हूँ पर नितीश की चुनौतियाँ नरेन्द्र मोदी से बड़ी है,पर उनके साथ सुशील मोदी जैसा सहयोगी भी है,जो अपने ढंग से हर वक्त उनके कदम से कदम मिला कर चलता रहा है.मुझे विश्वास सा होने लगा है की यह जोड़ी बिहार को संभवतः उसके गौरवशाली दिनों तक पंहुचा दे.कार्य तो बहुत बड़ा है और रास्ते में कठिनाइयाँ भी बहुतहै ,पर अगर यह संभव हो जाये तो बिहार जो भारत की उन्नति के मार्ग में बाधा स्वरुप दीखता रहा है,वह भारत की उन्नति का अगुआ बन जाये,क्यों की जो पिछली पंक्ति से आगे आता है वही वास्तविक पथ प्रदर्शक होता है.आज के दिन है तो यह मात्र एक कल्पना,पर कल का परिणाम और उसके बाद के नितीश के प्रेस कांफ्रेंस के बाद ऐसी कल्पना करने का मन करने लगा है.

  30. बिहार के चुनाव का सन्देश डॉ सी पी राय

    [शिक्षक एवं राजनैतिक चिन्तक ]

    क्या होगा बिहार में ,एक बड़ा सवाल था राजनीति में रूचि रखने वालो के जेहन में | फैसला तों बंद हुआ इ वि एम् मशीनों में और आ भी गया ||बिहार वो प्रदेश है जिसने आन्दोलनों कि अगुवाई किया,परन्तु कुछ सरकारों ने उसे इतना पीछे पंहुचा दिया कि वो भारत का सबसे ख़राब प्रदेश बन गया |एक ऐसा प्रदेश बन गया जिससे सबसे ज्यादा पलायन हुआ |कोई सरकार बहुत ख़राब रही हो और उसके बाद उसके मुकाबले थोड़ी भी अच्छी सरकार आ जाये ,थोडा भी ईमानदार मुखिया आ जाये ,थोडा भी काम होता दिखलाई पड़े तों निश्चित ही वो भयानक गरमी में ठंडी हवा का झोंका महसूस होता है |कुछ ऐसा बिहार कि नितीश सरकार को लेकर भी लोग महसूस कर रहे थे |वहा के लोग तों बताते ही है कि कुछ विकास होता दिख रहा है ,लेकिन बाहर या दूर बैठा आदमी भी कुछ बाते तों देख ही रहा है कि ,जहा पहली सरकार में आये दिन बच्चे किसी ना किसी अपहरण के खिलाफ सड़क पर दीखते थे और तमाम भ्रस्टाचार कि कहानी सुनने को मिलती थी ,अब वो दिखाई नही पड़ती ,अब टी वी कि सुर्खियों में बिहार के वे समाचार नही होता है |

    लेकिन सवाल ये था कि जबरदस्त जातिवाद कि जकडन का शिकार बिहार क्या करवट लेगा ?पूरे देश में लोकतंत्र कि परिपक्वता दिख रही है |जिस तरह देश ने अयोध्या के मामले में परिपक्वता का परिचय दिया और जिस तरह कुछ प्रदेशो में काम करने वालो को जनता ने कई बार मौका दिया है और देते जा रहे है वह चाहे किसी स्तर कि सरकार हो ,उसी तरह बिहार कि जनता ने भी विकास के सवाल पर निर्णय दिया है ?खबरों से ऐसा लगता था कि बिहार भी जातिवाद कि जकडन को छोड़ने को बेचैन था ,वो भी देश के साथ दौड़ना चाहता था ,बिहार भी २१वी सदी कि दौड़ में शामिल होने को आतुर हो रहा था | हवा जो दिख रही थी उसकी सच्चाई सामने आ गयी कि बिहार का १८ साल तक का नौजवान जिसकी संख्या ५५% हो गयी है और वो महिलाएं जो गरीबी और ख़राब कानून व्यवस्था का सबसे बड़ा शिकार होती है ,इन सबने मिल कर बिहार का चेहरा बदलने ,बिहार का एजेंडा बदलने का फैसला कर लिया था और मजबूत फैसला कर लिया था |

    इस चुनाव में फिर एक बड़ा और नया सन्देश दिया है जो देश भर के नेताओ और संगठनो कि आँख खोलने वाला है |कोई इस सन्देश को समझ पाये तों बदल जाये और अपने खास चश्मे पर ही भरोसा करे तों मिट जाये |जब ६ राज्यों का चुनाव हुआ था तब मेरा लेख छपा था कि: अब केवल विकास कि राजनीति चलेगी ,जातिवाद टूट रहा है | देश बदल रहा है तों देश का ,देश कि नयी पीढी का एजेंडा भी पैदा हुआ है | इस नयी पीढ़ी को किसी कि शक्ल ,किसी के कोरे नारे ,किसी कि जाति का नारा ,किसी का धर्म का नारा नही चाहिए ,बल्कि उसे पहले चाहिए शांति व्यवस्था ,कानून का शासन कि लोग निशचिंत होकर घर से काम पर निकले तों घर आ सके ,वे कमाए तों घर ला सके |अब कि पीढी और जागरूक महिलाएं जिन पर घर का बोझ होता है वे चाहते है विकास और रोजगार | नितीश कुमार ने बिहार कि जनता को इस तरफ कदम बढ़ा कर ये विश्वास दिलाया कि वे बिहार कि शक्ल बदलना चाहते है |नितीश ये विश्वास दिलाने में कामयाब रहे कि वे इमानदार है ,उनके पास दृष्टि ,सपना है और उन सपनों को जमीन पर लाने का संकल्प भी है |वे यह विश्वास दिलाने में कामयाब रहे कि उनके कुछ सिधांत है और सकारात्मक दिशा में चलने वाले सिद्धांत है |उसका परिणाम है बिहार में तीन चौथाई बहुमत का मिलना.और मोदी को बिहार में नही आने देकर तथा अति पिछडो और अति दलितों में जो भूख जगाने का काम नीतीश ने किया वो भी उनका कारगर हथियार साबित हुआ |लालू ने तों अपने कर्मो से अपनी विश्वसनीयता और पकड़ खो ही दिया है पासवान भी पूरी तरह किसी डूबते हुए आदमी का हाथ पकड़ने कि गलती का पहली बार शिकार हुए है |

    जनता ने यह सन्देश दे दिया है कि वह केवल विकास चाहती है ,उसका एजेंडा और वादा चाहती है | देश और प्रदेश में शांति चाहती | मजबूत और साफ छवि का नेता चाहती है लेकिन साथ ही नेता को एक विनम्र नेता के रूप में देखना चाहती है और यह भी चाहती है कि नेता कि व्यक्तिगत छवि साफ सुथरी दिखाई पड़े |कई प्रदेशो में ये जनता पहले भी दिखा चुकी है जहा भी नेता काम करते हुए दिखे और छवि भी ठीक हो जनता उसे बार बार मौका देना चाहती है | लालू ने रेल मंत्री के रूप में कुछ छवि बनाने कि कोशिश किया लेकिन चुनाव के मौके पर कांग्रेस को धोखा देकर फिर ये सिद्ध कर दिया कि वो क्या है और बिलकुल भी बिना किसी शिक्षा ,ज्ञान और अनुभव के जिस तरह रबड़ी देवी को नेता बना दिया और पिछले १५ सालो का उनका किया भी उनका पीछा नही छोड़ पाया |उनके सभी समझदार और संघर्ष के साथी उनका साथ छोड़ गए जिसको लालू ने गंभीरता से नही लिया | कांग्रेस ने भी केवल दिल्ली के नेताओ पर भरोसा किया |स्थानीय संगठन और नेतृत्व को ना पैदा करना उसे भारी पड़ा और ये रास्ता सभी प्रदेशो में भारी पड़ता रहेगा |यदि कांग्रेस ने प्रदेश का नेतृत्व संगठन और विधान सभा में मजबूत लोगो को दिया होता और मीरा कुमार को भावी मुख्य मंत्री घोषित कर चुनाव लड़ा होता तों यह तों नही कहा जा सकता कि सरकार बन गयी होती लेकिन परिणाम कही बहुत ज्यादा अलग होता |लेकिन कांग्रेस का जहा अनिर्णय उसके पतन का कारण होता है ,वही दूसरे दलों के बजाय कालिदास बन कर अपनों को ही काटने में समय बर्बाद करना भी उसको पतन कि तरफ ले जाता है | दूसरे प्रदेशो के नेता जो इस प्रदेश कि भाषा ,भूषा और भोजन नही जानते ,यहाँ कि संस्कृति नही जानते यहाँ कि जमीनी हकीकत नही जानते वे कभी प्रभारी होकर और कभी टिकेट बांटने वाला बन कर बंटाधार करते रहते है |इसी तरह के नेताओ के गलत आकलन के कारण उच्च नेतृत्व पर सवाल उठने लगे है |एक और बड़ी दिक्कत है कि इस दल में ५ साल सतत काम नही होता रणनीति नही बनती सब चुनाव के समय शुरू होता है |जबकि जनता त्याग करने वालो कि तरफ आकर्षित होती है पर रणनीति कि कमी और हवाई नेताओ कि भाषा बोली और चालें सब बर्बाद कर देती है |ऐसा भी लगता है कि कांग्रेस में भी उच्च स्तर पर कुछ ऐसे लोग है जो नही चाहते कि बिहार और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस मजबूत हो और राहुल या सोनिया इतने मजबूत हो जाये कि उन पर निर्भरता ख़त्म हो जाये |दूसरी दिक्कत ये है कि जो जमीनी नेता होते है उन्हें आसमानी नेता किनारे रख कर अपमानित करते रहते है और सम्मान देने के बजाय उन्हें चपरासियों से मिलने और अपनी बात कहने का सन्देश दे देते है ,वही नेता जब अलग दल बना कर मजबूत हो जाते है तों सबसे बड़े लोग उनको सम्मान देने लगते है | खैर कांग्रेस को भारी झटका लगा है और इसकी धमक उत्तर प्रदेश में भी दिखाई पड़ेगी |

    इस चुनाव परिणाम का असर उत्तर प्रदेश कि राजनीति पर भी जरूर पड़ेगा क्योकि अगर बिहार ने करवट लिया है तों उत्तर प्रदेश उससे और ज्यादा ही करवट लेगा |ऐसे स्थिति में ये देखना दिलचस्प होगा कि बहुत फूहड़ परिवारवाद ही नही बल्कि सम्पूर्ण परिवारवाद का शिकार लोगो को ,जंगल राज चलाने वाले लोगो को ,अपहरण को दल का मुख्य व्यवसाय बनाए वाले लोगो को ,हर जगह हस समय केवल लूट करने वाले लोगो को ,विकास का पैसा व्यक्तिगत सनक पर खर्च करने वाले लोगो ,खुद भ्रस्टाचार कि प्रतिमूर्ति बन गए लोगो ,कोई सपना नही ,कोई सिद्धांत नही ,कोई संकल्प नही केवल जाति और धर्म के नाम पर वर्षो से राजनीति कि फसल काटते और भूखी नंगी स्थिति से खरबपति बनते लोगो को उत्तर प्रदेश कि जनता क्या जवाब देती है ? और जनता के सामने विकल्प क्या आता है ?क्या कोई विकल्प ,कोई विकास का नया मॉडल नया एजेंडा ,सरकार चलाने का नया फार्मूला यहाँ कि जनता को दे पायेगा या जो दे सकते है वे आपस में लड़ने ,गणेश परिक्रमा करने और एक दूसरे का गिरेबान पकड़ने में ही खर्च हो जायेंगे |केवल चापलूसी और किसी चमत्कार का इंतजार करते रह जायेंगे या रोज मर्रा कि जिन्दगी में संघर्ष को हथियार बना कर लड़ेंगे और उत्तर प्रदेश को भी नए सूरज का दर्शन करवाएंगे |यह सवाल खड़ा है मुह बाये हुए और नितीश के रूप में उत्तर भारत में एक बड़े लेकिन विनम्र और संकल्प तथा स्वीकार्यता वाले नेता का जन्म हो चुका है ,इस पर गहराई से निगाह रख कर भी रणनीति बनानी होगी जो बढाना चाहता है ,जो लड़ना चाहता ,और जो आगे आना चाहता है | नही तों क्या कुए और खाई में से एक को चुनने कि मजबूरी फिर से केवल भ्रस्टाचार कि प्रतिमूर्ति को जनता इसलिए मौका दे देगी कि उसके राज में अपराध उद्द्योग नही है और काम से काम एक खिड़की खुली है हर गली कूचा तथा परिवार तथा रिश्तेदार का हर चमचा तक मुख्यमंत्री बन कर लूट तों नही रहा है |ये तों आने वाला समय बताएगा कि देश कि जिम्मेदारी लेने वाले और देश के नेता कहलाने वाले अपने घर के पूरे नेता है कि नही |पर बिहार ने राजनीति का नया एजेंडा भी तय कर दिया ,नयी शक्ल भी दिखा दी है और नया स्वरुप भी दिखा दिया है | भारत का लोकतंत्र नयी करवट ले रहा है इसमें अब किसी को कोई शक नही होना चाहिए और इसमे भी कोई शक नही होना चाहिए कि झोपड़ी से निकल कर और बिना किसी पूर्वज के नाम के भी नेता बना जा सकता है संघर्ष से संकल्पों से और कितना भी आगे बढ़ा जा सकता है और कितनी भी बार आगे आया जा सकता है | इशारो को अगर समझो ————–| डॉ सी पी राय

    राजनैतिक चिन्तक और समीक्षक

    शिक्षक, डॉ बी आर ए वि वि आगरा

    १३/१ एच आई जी संजय प्लेस आगरा

    cprai१९५५@ याहू.co .in

  31. मगध गणराज्‍य भारत में शीर्षस्‍थ रहा है। यहाँ चाणक्‍य से लेकर अनेक तीर्थंकर और ज्ञानी ॠषि हुए हैं। यह भूमि जहाँ एक तरफ बुद्धिमानों की है तो दूसरी तरफ इसकी जमीन में अकूत सम्‍पदा भी है। आज भी बिहार से अनेक उच्‍च शिक्षित वर्ग सम्‍पूर्ण भारत में अपनी प्रतिभा के लिए जाने जाते हैं। यहाँ के परिश्रमी लोगों ने ना केवल भारत की धरती पर अपना पसीना बहाकर उन्‍नत किया है अपितु दुनिया के कई देशों को अपनी पहचान दिलायी है। स्‍वतंत्रता के काल में भी बिहार की अग्रणी भूमिका रही है। लेकिन दुर्भाग्‍य से स्‍वतंत्रता के बाद से ही इस धरती के लोगों को छला गया। विकास के नाम पर राजनीतिज्ञों ने इस धरती को लूट लिया। जिसमें कांग्रेस की भूमिका सर्वोपरी है। इस लूट से आहत होकर जयप्रकाश नारायण ने समग्र क्रान्ति का सूत्रपात किया और सारा ही बिहार एकजुट दिखायी दिया। उसी का परिणाम था कि लालू राज का उदय हुआ लेकिन लालू ने भी बिहार को कुछ नहीं दिया अपितु लूटने का काम ही किया। अब एनडीए के शासन और नीतीश के नेतृत्‍व में बिहार ने भी विकास का स्‍वाद चखा है, उनका स्‍वाभिमान जागृत हुआ है। बिहार की जनता ने स्‍पष्‍ट बता दिया है कि परिवारवाद अब नहीं चलेगा। केवल दिल्‍ली से आकर प्रवचन देना और भारतीय सम्‍पत्ति को अपना बताना नहीं चलेगा। जिस तरह से युवराज और महारानी भारतीय सम्‍पत्ति को बिहार को देने की बात कर रही थी उससे तो ऐसा लग रहा था जैसे उन्‍होंने निजी सम्‍पत्ति दी हो। वे भूल गए कि बिहार की धरती पर जब चाणक्‍य जैसे लोग जागृत हो जाते हैं तब ऐसे धनानन्‍दों का पतन निश्च्ति ही होता है। मुझे तो उस दिन का इंतजार है जिस दिन बिहार के मतदूरों को शेष भारत में यह कहकर मांगा जाएगा कि इन जैसा मेहनतकश दूसरा नहीं है अत: किसी भी कीमत पर बिहार के श्रमिक को ही लो। आज सस्‍ते मजदूर के रूप में बिहारियों को लिया जाता है। बिहार ने सर्वाधिक पीडा सही है, अब उसे उसका प्रतिफल मिलना ही चाहिए।

  32. बिहार में योग्यता की कमी नहीं रही जैसे एक रिक्सा व्यवसाई को अमेरिका का प्रसीडेंट बुलाता है उसकी योग्यता से प्रभवित होकर सुपर ३० आनंद का ख्याति और भारत के आईएस के लिस्ट में अपनी उपस्थति न जाने और कई ऐसी बात है जो बिहारियों के लिए गर्वे की बात है इसके बावजूद बिहारी शब्द को अच्छे नजरिया से नहीं देखा जाता है.कारण बिहार का सामूहिक विकाश न होना.शायद इसबात की टीस बिहार के लोगों में अंदर अंदर खा रही थी.उनको तलाश थी ऐसे नेता की जो विकाश करने की क्षमता रखता हो ऐसे में नितीश का कार्य कल विकाश के मार्ग पर पहले कदम के रूप में देखा गया और बिहारी इस उम्मीद के साथ उनको उपना समर्थन दिया के आने वाले समय में नीतीश विकाश के मार्ग पर आगे बढेंगे और अपनी कमियों को दूर करेंगे.लालू व पासवान के कार्य कल को देख चुकी जनता उन्हें नकार दिया रही बात कांग्रेस की तो कांग्रेस ने तो अब बिहारियों को इस योग्य भी नहीं समझते के अपनी sarkar में कोई जिम्मेदार पद भी दे सके. शायद यह चुनाव बिहारी शब्द की परिभाषा बदलने के लिए व अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिय उठाया हुआ कदम है.मैं एक बिहारी होने के नाते यह उम्मीद करता हूँ की यह खवाब अवश्य पूरा हो. बहुत त्रिस्कर सहा है हमने अब सहा नहीं जाता.
    अब्दुल रशीद
    एस पी एन न्यूज़

  33. Atyanta aanandadaayak pariNaam hai.Yah aadarsha puure desh ke liye preraNaadaayak hai.
    Nitish aur Modi-donon badhaaii ke paatra hain aur badhaaii kaa paatra hai Bihar kii Janataa.

  34. It is proven by the result of Bihar that –
    1- Development at the grass root and honesty in implmentation of
    welfare scheme is the only issue for future.

    2- We have to come out of the castism cell and Hereditory politics-
    people need their development at the cost of non partiality, no
    corruption, time based completion of committment which political
    leaders generally makes during election.
    3- Everyone need to grow so provide equal chances for the growth of
    the marginalised and pooorest of the poor.

    4- Dont try to play with the emotions of the poor they will treat you
    like they treated with the party of sri Lalu yadav.

    Development is the only main Pillar of Democracy and Good Governance in India.

  35. Yes Voters Of Bihar Is Cleared That They Want Progress And Development Of The State Joker Brand Leaders And Corruption Is Not Accepted By The People Now Our Democrecy Is On THe Perfect Way “Goverment Of The People,For The People And By The Pople….No Excuse No Slogans No Corruption….Congretulation To THE Leaders they Wants And They Believe In Devlopments And Cogretulation To The Voter Of Bihar-Gujrat-Chhatisgarh

  36. चुनाव परिणाम नितीश कुमार की सरकार के द्वारा अपने से पूर्ववर्ती लोगों की तुलना में बेहतर काम करने की वजह से उनके पक्ष में हैं .

    यह परिणाम कांग्रेस, लालू, और पासवान के विरुद्ध भी हैं .

    परन्तु बाहुबली नेता अभी भी मौजूद हैं . भाजपा और नितीश दोनों के पास. आपराधिक मामलों वाले लोग भी हैं . जाति और सम्प्रदाय के समीकरण पर दोनों ही दल इस चुनाव में भी काम कर रहे थे . पर जनता कुछ और सन्देश दे रही है .

    राजनेता एवं उनके दल सुन रहे हैं – यह कहना अभी कठिन लगता है .

    वास्तविक मंजिल बहुत दूर है . जनतंत्र का सही रूप में भारत में आना अभी एक आशा मात्र है . फिर भी यह एक शुरुआत कही जा सकती है .

  37. यह बिहार ही नहीं भारतीय राजनीती का भी एक स्वर्णिम क्षण है .बिहार ने साबित किया है कि सही समर्पित नेत्रित्व को बृहत् जनाधार मिल सकता है . पर इसे बरक़रार रखने और इसकी मशाल और मिसाल पूरे भारत की राजनीती में पूरी समग्रता से फ़ैलाने की जरूरत है ताकि पूरे देश की दशा और दिशा बदल सके .मैं इसे बिहार की जनता और जनचेतना का एक नयी ‘ रक्तहीन ‘ क्रांति का प्रयाण बिंदु मानता हूँ.लेकिन साथ ही सावधान भी करना चाहता हूँ की इसका हश्र भी बिहार से ही शुरू हुयी ‘ सम्पूर्ण क्रांति ‘ जैसा न हो .कम से कम मैं आश्वस्त हूँ की नितीश के धैर्य पूर्ण सतत प्रयास बिहार को शर्म से निकाल गर्व की परिभाषा बना देंगे और देश दुनियाँ के लिए एक उदाहरण भी .
    अभी बड़ी लम्बी दूरी तय करनी है .राष्ट्र और जन द्रोही शक्तियां ख़त्म नहीं हुयी हैं .

  38. बिहार चुनाव ने एक बात साफ कर दी है कि जिनके पीछे पूरा मीडिया था या अखबारों में सेंटर पेज में खबरे बना कर छापी गई थी उनका सूपड़ा साफ और नितीश कुमार के विकास के कार्यों को जनता ने सराहा है। पिछले पांच वर्षों में बिहार की जनता को बिहारी होने का दंश नहीं झेलना पड़ रहा है बल्कि गर्व का अनुभव हो रहा है।

  39. त्वरित टिप्पणी :
    बिहार के मतदाता ने अपने फैसले में निम्न संकेत दिये हैं :-
    1. गुण्डाराज, हिंसा और भ्रष्टाचार को नकारा है।
    2. नीतीश के साथ-साथ भाजपा को स्वीकारा है।
    3. विकास करने वाले स्वच्छ छवि के राजनैतिक नेतृत्व को सम्मान मिला है।
    4. लालू-पासवान के सिद्धान्तों के विपरीत किये गये गठबन्धन को नकारा है।
    5. स्थानीय नेतृत्व को उभारे बिना वोट पाने की कांग्रेसी उम्मीदों को पकारा है।

  40. बिहार का चुनाव बेशर्म स्तर के भ्रष्टाचारियों तथा संतुलित भ्रष्टाचारियों के बीच था जिसमे बेशर्म स्तर के भ्रष्टाचारियों को जूते मारा है बिहार के जनता ने …अब यही हाल पूरे देश में उन बेशर्म स्तर के भ्रष्टाचारियों का होगा चाहे वह मनमोहन सिंह हो या सोनिया गाँधी ……….देश की जनता उन साले उद्योगपतियों को भी नहीं बख्सेगी अब जो बेशर्म स्तर के भ्रष्टाचारियों को फंडिंग कर इस देश और समाज को लूट रही है……..ऐसे उद्योगपतियों के सभी उत्पादों को हमें खरीदना बंद कर देना चाहिए जो इस देश और समाज के साथ गद्दारी कर रहें हैं………

  41. जहाँ तक में समझता हूँ की आज का मतदाता पहले की अपेक्षा कहीं अधिक समझदार व् विवेकशील है.फिर हम मतदाता के मन को नहीं पढ़ सकते.अब मतदाता काम को पहली प्राथमिकता देता है,बाद में संबंधों को .अगर देखा जाए तो लोग पार्टी को काम व्यक्ति को अपना मत देते हैं.बिहार में नितीश जी ने काम अब तक किया है उसका ही यह परिणाम है कि इस बार उन्हें रिकार्ड बहुमत मिला,वहीँ भा .ज .पा.का भी जनधार बढ़ा है. वह भी उनके प्रत्याशी की वजह से.कुल मिला कर इतना कहा जा सकता है कि मतदाताओं में अपने मतों के प्रति ललक बढ़ी कि वे उसका उपयोग कि तरह से व् सही ढंग से करतें है.इसी का परिणाम है बिहार का चुनाव परिणाम.
    प्रदीप श्रीवास्तव

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