बिहार हाशिए पर क्‍यों ?

-अनिल दत्त मिश्र

बिहार का अतीत गौरवशाली रहा है। मौर्य साम्राज्य, कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’, नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय, जैन-बौद्ध धर्म का उदय, स्वतंत्रता संग्राम में राजेन्द्र प्रसाद, सच्चिदानंद सिन्हा, मौलाना मजरूल हक आदि अग्रणी नेता इसी प्रांत से आते हैं। महात्मा गांधी ने चंपारण आंदोलन बिहार से शुरू करके स्वतंत्रता का सुत्रपात किया। जयप्रकाश नारायण, आजादी के बाद भारत के प्रशासनिक दृष्टिकोण से 1962 तक बिहार सर्वोत्तम राज्य रहा है जिसकी पुष्टि पॉल एबल्वी के रिपोर्ट में लिखित है। ऐसा राज्य धीरे-धीरे हासिए पर क्यों चला गया? इसके लिए जिम्मेदार कौन है? उन्नति के सूत्रधार हैं परंतु आज भी बिहार के गांव बेहाल हैं। ये सवाल हमें सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं। समय-समय पर चिंतक-लेखक एवं पत्रकार बिहार की दशा को बदलने के लिए अपने-अपने विचार एवं व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास करते रहते हैं। बिहार हासिए पर है इसके लिए नेता पूर्णरूपेण जिम्मेदार है। कहा गया है ‘जैसा राजा वैसी प्रजा’, नेताओं ने अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाओं को प्राप्त करने के लिए साम, दाम, दंड और भेद की नीतियां अपनायी। स्वच्छ समाज को खंडित कर दिया। शैक्षणिक परिसरों में अभिक्षितों की भरमार तथा शासन-प्रशासन राजनीतिक दलों के एजेंट बन गए। जनता का राजनेताओं से विश्वास हट गया। और जनता भी जात-पात एवं कुशासन की भागीदारी बन गयी। राजनेता जनता को कोसती तथा जनता राजनेता को कोसती। मसलन कुशासन फैलने में जनता और जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि दोनों समान रूप से जिम्मेदार हैं। बिहार में रेलमार्ग का बहुत विकास हुआ। परंतु जलमार्ग एवं सड़कमार्ग का विकास जिस प्रकार होना चाहिए उस प्रकार नहीं हुआ। नहरों का विकास बहुत ही कम हुआ। अतिरिक्त पानी का सदुपयोग नहीं हुआ। बिहार मुख्यतः कृषि पर आधारित प्रांत है ज्यादातर लोगों का जीवन खेती पर निर्भर है। खेती कर विकास न होने के कारण खेती हानि का सौदा समुचित बन गया, मजदूरों का पलायन शुरू हो गया तथा हालत बद से बदतर होती चली गई। पटना विश्वविद्यालय के सभी कॉलेजों का एक राष्ट्रीय महत्व था। खासकर साइंस कॉलेज, पी. एम. सी. एच. लंगट सिंह कॉलेज आदि दिल्ली के सर्वश्रेष्ठ कॉलेजों में से एक थे। परंतु शैक्षणिक कैलेंडर न लागू होने के कारण ये कॉलेज हासिए पर चले गए, पिछले 60 सालों में नेतरहाट विद्यालय जैसा दूसरा कोई विद्यालय सरकार नहीं बना पायी। नतीजा यह हुआ कि बिहार से विद्यार्थियों का निर्यात हुआ। दिल्ली विश्वविद्यालय, जे एन यू के अधिकांश विद्यार्थी बिहार से आते हैं। दूसरे शब्दों में बिहार से प्रतिमाह करोड़ों रुपये शिक्षा पर बाहर जाते हैं। बिहार को ठीक करने के लिए प्राथमिक एवं उच्च शिक्षा पर ध्यान देना होगा। यहां में उद्योग-धंधों का आजादी के बाद से ही बाहुल्य रहा है। कुटीर उद्योग नहीं के बराबर हैं। वहां के मजदूर काम के अभाव में पंजाब, असम, दिल्ली, कलकत्ता, मुंबई, अहमदाबाद, आदि स्थानों पर जाते हैं। जहां उन्हें तिरस्कृत बिहारी के नाम से जाना जाता है। बिगत पांच वर्षों में केंद्र सरकार को राज्य सरकार के प्रयास से आशा की किरण जगी है। जे. डी. यू. तथा भाजपा गठबंधन ने बिहारी की बदतर स्थिति को तथा सुशासन के प्रयास किए गए हैं। जिसका परिणाम यह है कि सड़कों मे गड्ढे कम नजर आते हैं। बच्चे स्कूल जा रहे हैं। पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हुयी है तथा विकास की बयार बहती नजर आ रही है। इसके लिए केंद्र सरकार व राज्य सरकार की भूमिका अहम रही है लेकिन चुनावी राजनीति नेताओं की मंशा पर प्रश्न चिह्र खड़ा करती है। बिहार में गठबंधन सरकार है फिर चुनाव प्रचार में कौन जाए तथा कौन न जाए का मुद्दा भारतीय लोकतंत्र में सिध्दांत विहीन राजनीति को दर्शाती है। बिहार के प्रत्येक राजनीतिक दलों में सिध्दांत विहीनता का अभाव है। राजद के शीर्षस्थ नेता कांग्रेस में आ गए। जिनमें ये वो लोग हैं जिन्होंने आर. जे. डी. को हासिए पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। राहुल गांधी के बिहार दौरे के बाद कांग्रेस में एक उम्मीद की लहर जागी थी। वो उम्मीद उम्मीद ही रह गयी। लोक जनशक्ति पार्टी को एवं राजद को लोगों ने उनकी औकात दिखायी। अब दोनों एक हो गए हैं। सिध्दांत विहीनता की राजनीति ने जितना बिहार को कबाड़ा करने में भूमिका अदा की, उतना किसी ने नहीं की। बिहार का कल्याण राष्ट्रीय दलों द्वारा ही संभव है चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों का एक ही इतिहास है। आज बिहार को जरूरत है कि लोगों सबकुछ भूलाकर एक ही मुद्दा हो कि बिहार का विकास कौन करेगा वह कौन-सी पार्टी कर रही है। बिहार के लोग मेहनती हैं। वहां के विद्यार्थी विषम परिस्थितियाें में किसी से भी कम नहीं हैं। बिहार के लोग समरस्ता में विश्वास रखते हैं, आधुनिकता की चकाचौंध आज भी बिहार में नहीं पहुंची है ऐसे बिहार को आगे लाने के लिए बुनियादी चिजों पर ध्यान पड़ेगा। ये बुनियादी चिजें हैं शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली तथा कुटीर उद्योग इनका समुचित विकास करना होगा। ब्यूरोक्रेसी को नैतिक, कर्तव्यनिष्ठ जवाबदेह होना पड़ेगा। नौकरशाह जनसेवक है जनभक्षक नहीं। ईमानदार नौकरशाहों को आगे बढ़ाना होगा। पटना की सड़क महाराष्ट्र और राजस्थान के जिलों की सड़कों की तुलना में ठीक नहीं हैं। इन्हें ठीक करना होगा। प्राथमिक एवं उच्च शिक्षा को दलगत राजनीति से अलग रखना होगा। अंत में बिहार में जो एक परिवर्तन दिख रहा है। उसे और अच्छा बनाने के लिए सुशासन को मुद्दा बनाना चाहिए सभी राजनीतिक दलों को स्वच्छ चरित्र वाले व्यक्तियों को ही टिकट देनी चाहिए। यह इसलिए कि वे बिहार के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकें। जिनके लोग अनुयायी या समर्थक बन सके तथा लोग गर्व से कहें कि नेता हो तो ऐसा हो। जैसे कभी पूरे उत्तर भारत में लोग डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया तथा कर्पूरी ठाकुर के नाम पर गर्व महसुस करते थे। पुनः बिहार की गौरवशाली परंपरा व इतिहास की स्थापना के लिए बिहार की जनता को युवा नेतृत्व की तलाश करनी चाहिए जो बेदाग हो।

* लेखक राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय के पूर्व उप-निदेशक तथा प्रख्यात चिंतक है।

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