राजनीति

लहूलुहान लोकतंत्र: क्या नई सरकार बदलेगी बंगाल का हिंसक इतिहास?


ओ.पी.पाल 
पश्चिम बंगाल की जनता ने भाजपा को प्रचंड बहुमत देकर एक बदलाव की उम्मीद जताई है लेकिन यदि यह बदलाव केवल ‘चेहरों’ का है और ‘संस्कृति’ वही हिंसक रही, तो बंगाल के विकास की राह फिर से अवरुद्ध हो जाएगी। हिंसा का असली कारण केवल ‘हताशा’ या ‘अहंकार’ नहीं है बल्कि वह राजनीतिक व्यवस्था है, जहाँ असहमति के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। हालांकि पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा कोई नई घटना नहीं है। 1970 के दशक से लेकर वामपंथी शासन और फिर टीएमसी के कार्यकाल तक, सत्ता का रास्ता हमेशा संघर्षों से होकर गुजरा है। मसलन पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘सत्ता’ और ‘हिंसा’ का रिश्ता दशकों पुराना है यानी पश्चिम बंगाल की का शोर अक्सर हिंसा की गूंज के राजनीति में ‘सत्ता परिवर्तन’ साथ सुनाई देता है लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद जो मंजर दिखा, उसने राज्य के लोकतांत्रिक इतिहास में एक और काला अध्याय जोड़ दिया है।

राज्य के विभिन्न हिस्सों से हिंसा की जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे लोकतंत्र के लिए सुखद नहीं हैं। यहां राजनैतिक दल का कार्यकर्ता केवल समर्थक नहीं, बल्कि एक योद्धा की भूमिका में होता है। शायद यही कारण है कि भाजपा और टीएमसी के शीर्ष नेतृत्व के बीच संवाद की कमी और एक-दूसरे के प्रति ‘शत्रुतापूर्ण’ भाषा ने निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को और उग्र कर दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि लोकतंत्र में हिंसा का कोई औचित्य नहीं हो सकता। यदि भाजपा को राज्य में सुशासन स्थापित करना है, तो उसे ‘प्रतिशोध की राजनीति’ से ऊपर उठकर कानून का शासन स्थापित करना होगा। वहीं टीएमसी को एक जिम्मेदार विपक्ष के रूप में जनादेश को स्वीकार कर अपने कार्यकर्ताओं को शांत करना होगा। प्रशासन को चाहिए कि वह दोषियों की पहचान दलगत राजनीति से ऊपर उठकर करे ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

प्रशासनिक विफलता और चुनाव आयोग की भूमिका
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव, डीजीपी और पुलिस कमिश्नर को सख्त निर्देश दिए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि उपद्रवियों को किसी भी राजनीतिक संरक्षण के बावजूद जेल भेजा जाए। चुनाव खत्म होने के बावजूद 700 से अधिक कंपनियां राज्य में रोकी गई हैं, ताकि स्थिति को नियंत्रित किया जा सके। अक्सर पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान तो सुरक्षा बल तैनात रहते हैं, लेकिन परिणामों के बाद स्थानीय पुलिस पर अक्सर ‘मूकदर्शक’ होने के आरोप लगते हैं। इस बार चुनाव आयोग ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। शायद आयोग राज्य में स्थिति की गंभीरता को समझ रहा है। इसी कारण केंद्रीय बलों को तैनात रखना और उपद्रवियों को सीधे जेल भेजने का फरमान प्रशासन की साख बचाने की आखिरी कोशिश है।

लोकतंत्र में इन घटनाओं के क्या मायने
बंगाल में के बीरभूम के नानूर में टीएमसी कार्यकर्ता अबीर शेख की गला रेतकर हत्या और कोलकाता के न्यू टाउन में भाजपा कार्यकर्ता मधु मंडल की पीट-पीटकर हत्या इस हिंसा की क्रूरता को दर्शाती है। पिछले 24 घंटों में भाजपा और टीएमसी दोनों दलों के कम से कम 2-2 कार्यकर्ताओं की जान जा चुकी है। कोलकाता के न्यू मार्केट में टीएमसी दफ्तर को बुलडोजर से गिराना और आसनसोल, सिलीगुड़ी, हावड़ा में कार्यालयों को आग के हवाले करना यह बताता है कि यह केवल कार्यकर्ताओं की झड़प नहीं, बल्कि ‘वर्चस्व’ को खत्म करने की लड़ाई है। मुर्शिदाबाद में लेनिन की प्रतिमा को गिराना वैचारिक विद्वेष का प्रतीक बनकर उभरा, जो त्रिपुरा की 2018 की घटनाओं की याद दिलाता है। ये घटनाएँ दर्शाती हैं कि चुनावी रंजिश अब व्यक्तिगत दुश्मनी में बदल चुकी है। बंगाल में राजनीतिक दल केवल विचारधारा नहीं, बल्कि ‘पाड़ा’ (इलाके) पर नियंत्रण के लिए लड़ते हैं। सत्ता बदलते ही निचले स्तर के कार्यकर्ताओं में इलाके पर कब्जा करने की होड़ मच गई। लेनिन की मूर्ति का गिराया जाना या विपक्षी दल के झंडे फाड़ना केवल संपत्ति का नुकसान नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल करने की कोशिश है।

ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन
पश्चिम बंगाल में 4 मई 2026 को आए चुनावी नतीजों ने न केवल राज्य की राजनीति को बदल दिया, बल्कि राजनीतिक संघर्ष के एक नए युग की की शुरुआत भी कर दी। जहां 2021 में भाजपा 77 सीटों पर रुकी थी, वहीं इस बार उसने दो-तिहाई बहुमत (207 सीटें) प्राप्त कर राज्य की राजनीति का ध्रुवीकरण अपनी ओर कर लिया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का अपने ही गढ़ भवानीपुर से भाजपा के सुवेंदु अधिकारी के हाथों हारना, इस हार की गंभीरता को और गहरा कर देता है। सत्ता का यह विशाल हस्तांतरण केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि यह वर्षों से चले आ रहे प्रशासनिक और जमीनी ढांचे के ढहने का संकेत भी था। लेकिन इस ऐतिहासिक जनादेश के साथ ही राज्य के हर हिस्से से आगजनी, तोड़फोड़ और हत्याओं की खबरें आने लगीं।

हार की हताशा‘ बनाम ‘जीत का अहंकार
ऐसा लगता है कि इस हिंसा के पीछे दो विपरीत मनोवैज्ञानिक स्थितियाँ काम कर रही हैं, जिन पर दोनों दलों के अपने-अपने तर्क हैं। टीएमसी की हताशा भी स्वाभाविक है जहां 15 साल तक निर्बाध शासन करने के बाद इतनी बड़ी हार को स्वीकार करना टीएमसी के जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए कठिन रहा है और निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों के खत्म होने का डर है। माना जाता है कि जब भी किसी कैडर-आधारित पार्टी की हार होती है, तो उसका निचला स्तर या तो रक्षात्मक हिंसा करता है या पलायन। कई जगहों पर हार के बाद टीएमसी के भीतर गुटबाजी उभरी है, जिसे ‘भाजपा के हमले’ का नाम देकर दबाने की कोशिश की जा रही है। वैसे भी कई दशकों से बंगाल की राजनीति ‘विजेता सब कुछ ले जाता है’ की तर्ज पर चली है। सत्ता खोने का अर्थ है कि सरकारी संरक्षण का जाना, थानों में सुनवाई बंद होना और आर्थिक प्रभाव का कम होना। वहीं भाजपा का विजय के बाद पनपे उन्माद की दृष्टि पर गौर करें तो भाजपा ने दशकों के संघर्ष के बाद बंगाल में अपनी सरकार बनाई है। कई विश्लेषकों का मानना है कि लंबे समय तक टीएमसी के दमन का सामना करने वाले भाजपा कार्यकर्ताओं में ‘बदले की भावना’ या ‘विजय का अहंकार’ दिखाई दे रहा है। विजय रैलियों के दौरान हुई झड़पें इसी आक्रामकता का परिणाम हैं।( युवराज फीचर्स )   

ओ.पी. पाल