राजनीति

ममता बनर्जी के यों बौखलाने से क्या होगा? सत्ता तो गई!


रामस्वरूप रावतसरे

पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति में खलबली मचा दी है। इन चुनावों में भाजपा ने 207 सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया है। दूसरी तरफ 15 सालों से सत्ता में रही टीएमसी सिर्फ 80 सीटों पर ही सिमट कर रह गई है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी भवानीपुर सीट से चुनाव हार गई हैं।
आमतौर पर नियम यह है कि चुनाव हारने के बाद मुख्यमंत्री को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ती है लेकिन ममता बनर्जी ने मीडिया के सामने आकर साफ कह दिया है कि वह इस्तीफा नहीं देंगी। चुनाव आयोग ने नवनिर्वाचित विधायकों की सूची और परिणाम की आधिकारिक अधिसूचना राज्यपाल को सौंप दी है।
अब हर कोई यह जानना चाहता है कि क्या हार के बाद भी कोई मुख्यमंत्री जबरदस्ती पद पर बना रह सकता है। सवाल ये भी है कि अगर कोई इस्तीफा न दे तो क्या संविधान में उसे हटाने का कोई तरीका मौजूद है या नहीं। संविधान के हिसाब से मुख्यमंत्री की कुर्सी किसी की निजी जागीर नहीं होती। यह एक तय प्रक्रिया से चलती है। मुख्यमंत्री तब तक पद पर रहता है जब तक राज्यपाल की सहमति हो। इसे कानून की भाषा में ‘डॉक्ट्रिन ऑफ प्लेजर’ कहते हैं।
    जब तक मुख्यमंत्री के पास बहुमत रहता है, तब तक राज्यपाल उनके काम में दखल नहीं देते लेकिन जैसे ही चुनाव के नतीजे आते हैं और यह साफ हो जाता है कि सरकार हार गई है, तो मुख्यमंत्री की सारी ताकत खत्म हो जाती है। ऐसे में इस्तीफा न देने की बात कहना सिर्फ राजनीति का हिस्सा माना जा सकता है. कानूनन इसका कोई आधार नहीं है। यदि कोई मुख्यमंत्री चुनाव हार जाए और फिर भी कुर्सी न छोड़े तो राज्यपाल चुप नहीं बैठते। संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत उनके पास बहुत ताकत होती है। राज्यपाल सबसे पहले मुख्यमंत्री को खुद इस्तीफा देने के लिए कहते हैं। अगर मुख्यमंत्री मना कर देते हैं, तो राज्यपाल उन्हें और उनके मंत्रियों को तुरंत उनके पद से हटा यानी बर्खास्त कर सकते हैं।
ममता बनर्जी भले ही राजभवन जाने से मना कर दें लेकिन वह नई सरकार को बनने से रोक नहीं सकतीं। राज्यपाल सीधे बहुमत पाने वाली पार्टी यानी भाजपा के नेता को सरकार बनाने के लिए बुलाएँगे। कानून के मुताबिक राज्यपाल को नए मुख्यमंत्री को शपथ दिलाने का पूरा हक है। जैसे ही नया मुख्यमंत्री शपथ लेता है, पुराने मुख्यमंत्री की सारी पावर खत्म हो जाती है। पुलिस और प्रशासन की कमान भी नए मुख्यमंत्री के पास चली जाती है। इसके बाद पुरानी सरकार के पास कोई कानूनी ताकत नहीं बचती और उनका कुर्सी के लिए अड़े रहने का कोई फायदा नहीं होता।
बंगाल की विधानसभा का समय 7 मई 26 को खत्म हो रहा है। संविधान कहता है कि जैसे ही विधानसभा का समय पूरा होता है, वह अपने आप खत्म यानी भंग हो जाती है। इसका मतलब है कि 8 मई की सुबह होते ही ममता बनर्जी कानूनी रूप से मुख्यमंत्री नहीं रहेंगी। भले ही वह इस्तीफा दें या न दें, 8 मई से नई सरकार बनाने का काम शुरू करना ही होगा। भाजपा ने पहले ही बता दिया है कि 9 मई को नए मुख्यमंत्री शपथ ले सकते हैं। ऐसी स्थिति में इस्तीफा देने की जिद का कोई मतलब नहीं रह जाएगा क्योंकि कानून की नजर में उनकी सरकार की ताकत पहले ही खत्म हो चुकी होगी।
जानकारों के अनुसार यदि हारने के बाद भी मुख्यमंत्री कुर्सी न छोड़ें और सरकारी काम में अड़ंगा डालने लगें, तो राज्यपाल के पास एक बहुत सख्त कानून होता है। वह केंद्र सरकार से राज्य में ‘राष्ट्रपति शासन‘ (अनुच्छेद 356) लगाने की सिफारिश कर सकते हैं। यह कदम तब उठाया जाता है जब राज्य की कानून-व्यवस्था पूरी तरह फेल हो जाए। हालाँकि, बंगाल के मामले में भाजपा को साफ बहुमत मिला है, इसलिए इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। राज्यपाल सीधे नए मुख्यमंत्री को शपथ दिलाकर सरकार बनवा सकते हैं। सीधी बात यह है कि लोकतंत्र में जनता का फैसला ही सबसे बड़ा होता है। कोई भी नेता बहुमत खोने के बाद जबरदस्ती सत्ता में नहीं बना रह सकता
लेकिन जो ड्रामा बंगाल चुनाव के बाद ममता बनर्जी ने किया, वो अभी तक किसी ने नहीं किया था। अपनी हार को ममता बनर्जी पचा नहीं पा रही है और मुख्यमंत्री पद पर बने रहने की जिद कर रही हैं।
जानकारों के अनुसार एक लड़ाका नेत्री की राजनीति का पूर्ण विराम हो गया है और उस अंदाज में किसी और नेता में सड़क पर संग्राम की देश भर में कुव्वत भी नहीं। विश्लेषकों के मुताबिक अब कांग्रेस के लिए बंगाल में संभावनाओं के द्वार खुलेंगे। लेकिन , अपना आकलन है कि बंगाल अब गुजरात ,असम की तर्ज पर सिर्फ और सिर्फ भाजपा की जागीर होगा और उसके हाथों से सत्ता हथियाना अब असंभव होगा। हां ,तृणमूल महुआ मोइत्रा ,सायोनी घोष जैसे चेहरों को आगे बढ़ाकर कुछ परफॉर्म कर सकती है ,बशर्ते पार्टी  अभिषेक के मोह से मुक्त हो। ऐसा होना संभव नहीं लगता। ममता बनर्जी सत्ता से सड़क की ओर आती थी बड़ा सहज था, लेकिन अब सड़क से सत्ता की ओर बढना बहुत मुश्किल लगता है।