राजनीति

ब्रिक्स समिट : भारत को क्या हुआ हासिल?

राजेश श्रीवास्तव

भारत में आयोजित ब्रिक्स 2०26 का समापन हो चुका है. इस शिखर सम्मेलन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनिपिग और ईरान के राष्ट्रपति डॉ.मसूद पेज़ेश्कियान भी शामिल हुए. वहीं संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब और मलेशिया के समेत अन्य देशों के नेताओं ने भी इसमें शिरकत की.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ़ से जहां दुनिया भर के कारोबार में उथल-पुथल मची हुई है, वहीं ईरान पर इसराइल और अमेरिका के संयुक्त हमले के बाद से मध्य-पूर्व संघर्ष के दौर से गुज़र रहा है. इससे जहां वैश्विक सप्लाई प्रभावित हुई है, वहीं तेल और गैस की क़ीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है. ऐसे समय में दुनिया की तक़रीबन आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं का एक मंच पर होना ही काफ़ी अहम है.
लेकिन क्या यह मंच किसी ठोस नतीजे तक पहुंच पाया है, या इससे भविष्य के लिए मेज़बान भारत को कोई बड़ी उपलब्धि हासिल हो पाई है. साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोçफ़ेसर धनंजय त्रिपाठी कहते हैं कि अगर आप नई दिल्ली घोषणापत्र पर गौर गरें तो इसका मुख्य संदेश यही है कि आप (दुनिया के अन्य देश) ग्लोबल साउथ को दरकिनार नहीं कर सकते.
उनका कहना है कि ब्रिक्स देशों ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि दुनिया भर की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था में बदलाव आना चाहिए.
18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के समापन सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सदस्य देशों और साझेदार राष्ट्रों की व्यापक भागीदारी ब्रिक्स की बढ़ती प्रासंगिकता, खुलेपन और समावेशी स्वरूप का प्रमाण है. उन्होंने कहा, ”ब्रिक्स अपने तीसरे दशक में प्रवेश करने जा रहा है, अब दुनिया हमसे ठोस परिणामों की अपेक्षा करती है.’’
उन्होंने कहा कि पिछले दो दिनों की चर्चाओं ने इस विश्वास को और मज़बूत किया है कि ब्रिक्स केवल देशों का समूह नहीं, बल्कि समाधान उपलब्ध कराने वाला एक प्रभावी मंच बन चुका है.
भारत के पूर्व विदेश सचिव शशांक ने बातचीत में कहा कि मेरा मानना है कि यह कुल मिलाकर सफल आयोजन रहा है. कई लोग कह रहे थे कि ब्रिक्स अब ख़त्म हो गया है, कुछ लोग कयास लगा रहे थे कि कोई घोषणा पत्र जारी नहीं होगा, पर शनिवार को साझा घोषणापत्र जारी हुआ.
शशांक का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र अब कमज़ोर पड़ चुका है और यह प्रभावी ढंग से काम नहीं कर रहा है. ऐसे में ब्रिक्स अब आगे बढ़ रहा है और दुनिया की कई समस्याओं, ख़ासकर युद्धों और फ़लस्तीन के मुद्दे को लेकर वह देख रहा है कि मौजूदा हालात में सबसे अच्छा समाधान क्या हो सकता है.
उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि अब ब्रिक्स के देश संगठन के तौर पर और निजी तौर पर भी इस पर बात करेंगे. और जब तक चीन अगले साल ब्रिक्स की अध्यक्षता नहीं ले लेता है तब तक जो भी पहल की जाएगी उसमें अध्यक्ष के तौर पर भारत का नाम रहेगा तो यह भारत के लिए अच्छा है.’’
धनंजय त्रिपाठी कहते हैं कि पीएम मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिग के बीच बातचीत में कुछ बहुत ठोस निकलकर आया हो, यह हम नहीं कह सकते, लेकिन इसे दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में एक और कदम माना जा सकता है.
नई दिल्ली में चल रहे 18वें ब्रिक्स सम्मेलन में शनिवार को जारी संयुक्त घोषणापत्र में तीन अहम मुद्दों का ज़िक्र किया गया. इसमें आतंकवाद के हर रूप की कड़ी आलोचना की गई. यह भारत के लिए हमेशा से एक अहम मुद्दा रहा है. इस लिहाज़ से देखें तो यह भारत की सफलता रही है.
ब्रिक्स ने आतंकवाद, इसकी आर्थिक मदद, सीमा पार आतंकवाद और आतंकवादियों को सुरक्षित ठिकाना दिए जाने के ख़िलाफ़ मिलकर कार्रवाई करने की प्रतिबद्धता दोहराई.
45 पन्नों और 14० बिन्दुओं के नई दिल्ली घोषणापत्र में 22 अप्रैल 2०25 को जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकवादी हमले की निदा की गई, जिसमें 26 लोगों की मौत हुई थी. भारत इसके लिए पाकिस्तान समर्थिक संगठनों को ज़िम्मेदार ठहराता है, लेकिन घोषणापत्र में पाकिस्तान का ज़िक्र नहीं किया गया है. दूसरी तरफ भारत में ऐसी घटनाओं के लिए पाकिस्तान ने हमेशा अपनी भागीदारी से इनकार किया है.
पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि पहलगाम हमले के बाद भारत ने जो ऑपरेशन सिदूर शुरू किया था, माना जाता है कि उसमें चीन ने पाकिस्तान की मदद की थी. इस लिहाज़ से देखें तो ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान शी जिनपिग से पीएम मोदी की मुलाक़ात और द्बिपक्षीय बातचीत दोनों देशों के संबंधों को सामान्य बनाने के लिहाज़ से काफ़ी अहम है.
उनका कहना है कि भारत और चीन दुनिया के दो सबसे बड़े देश हैं (आबादी के लिहाज़ से) और अंत में हमें रहना एक साथ ही है तो जो दोनों देशों के मतभेद हैं उन्हें ख़त्म करना ही होगा. भारत और चीन के बीच सबसे बड़ा विवाद, दोनों देशों के बीच सीमा विवाद है. इससे पहले भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने भी चीन की यात्रा की थी.
हालांकि कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिग के बीच हुई द्बिपक्षीय बैठक को लेकर कई सवाल उठाए हैं. सोशल मीडिया एक्स पर एक प्रेस नोट जारी करके कांग्रेस महासचिव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कई सवाल पूछे हैं.
उन्होंने कहा कि सरकार ने ‘ऑपरेशन सिदूर’ को लेकर चीन की पाकिस्तान को कथित सैन्य मदद के मुद्दे पर अपना रुख़ नरम क्यों कर लिया. साथ ही पूछा कि गलवान घाटी झड़प के बाद 19 जून 2०2० को चीन को दी गई ”क्लीन चिट’’ क्या भारत की स्थिति को कमज़ोर नहीं करती?
जयराम रमेश ने पूछा कि सरकार ने लद्दाख और अब अरुणाचल प्रदेश में चीन की कथित क्षेत्रीय बढ़त को क्यों होने दिया. ब्रिक्स घोषणापत्र में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिकी टैरिफ़ का नाम नहीं लिया गया है लेकिन कहा गया है कि कई देशों को ‘अन्यायपूर्ण और एकतरफ़ा संरक्षणवादी कदमों’ से नुकसान हो रहा है.
लेकिन माना जा रहा है कि घोषणा पत्र का इशारा डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारत, चीन समेत दुनिया के कई देशों पर लगाए गए टैरिफ़ की ओर था. ट्रंप के टैरिफ़ के बाद दुनिया भर के कई देशों के कारोबार में काफ़ी उथल-पुथल देखने को मिली है.
शशांक कहते हैं कि ब्रिक्स एक तरह का आर्थिक संगठन है इसमें अब 11 देश हो गए हैं और साथ ही पार्टनर देशों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है. उनके लिए टैरिफ़ एक अहम मुद्दा है. ब्रिक्स दुनिया की पाँच सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है. ब्रिक्स अंग्रेज़ी के अक्षर बी, आर, आई, सी, एस से बना वो शब्द है, जिसमें हर अक्षर एक देश का प्रतिनिधित्व करता है. ये देश हैं ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका.
ब्रिक्स में दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ती 11 प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं और विकासशील देश शामिल हैं- रूस, चीन, भारत, ब्राज़ील, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब, दक्षिण अफ़्रीका और संयुक्त अरब अमीरात.
शशांक ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप कहते हैं कि डॉलर को कोई चुनौती नहीं दी जानी चाहिए और इसे कमज़ोर नहीं किया जाना चाहिए. लेकिन वो तो ख़ुद डॉलर को ख़त्म कर रहे हैं. ऐसे में देखना होगा कि ब्रिक्स के देश इन हालात में कितना और कैसे आगे बढ़ते हैं.
नई दिल्ली घोषणापत्र में वर्चस्ववाद की आलोचना की गई है. वहीं शनिवार को ही चाइना डेली ने ब्रिक्स की अहमियत को रेखांकित करते हुए लिखा कि ब्रिक्स देश अब दुनिया की लगभग आधी आबादी, वैश्विक आर्थिक उत्पादन (ग्लोबल इकोनॉमिक आउटपुट) के क़रीब 3० प्रतिशत और वैश्विक व्यापार के एक-चौथाई से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं.
जबकि शुक्रवार को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स बिज़नेस फ़ोरम को संबोधित करते हुए कहा कि इस साल हम ब्रिक्स का 2०वां साल मना रहे हैं. साल 2००6 में जब इस समूह की शुरुआत हुई थी तब इसमें चार देश थे.
उन्होंने कहा कि अब ब्रिक्स पार्टनसã को मिलाकर यह 21 देशों का परिवार है. ब्रिक्स देश दुनिया की 5०% आबादी, 4०% जीडीपी, 25% से ज़्यादा व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं. यानी ब्रिक्स के देश इस संगठन की आर्थिक ताक़त और विशाल बाज़ार को सामने रखकर आगे बढ़ने और दबाव बनाने की कोशिश करते हुए दिखते हैं.
ईरान के राष्ट्रपति डॉक्टर मसूद पेज़ेश्कियान ने नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात की. दोनों नेताओं के बीच द्बिपक्षीय बातचीत भी हुई है.
पीएम मोदी ने इस मुलाक़ात के बाद एक्स पर लिखा, ’’ईरान के राष्ट्रपति डॉक्टर मसूद पेज़ेश्कियान से मिलकर खुशी हुई. यह यात्रा इसलिए और ख़ास है क्योंकि यह भारत की उनकी पहली यात्रा है.’’
’’हमने भारत-ईरान मित्रता पर चर्चा की. हमारा मानना है कि हमें दीर्घकालिक और दोनों पक्षों के लिए लाभकारी रणनीति के साथ आगे बढ़ना चाहिए. उनसे क्षेत्र की मौजूदा स्थिति पर भी चर्चा हुई. भारत स्थायी शांति की दिशा में प्रयासों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर कायम है.’’
धनंजय त्रिपाठी मानते हैं कि ब्रिक्स 2०26 में एक बात पर गौर करने लायक है कि भारत ने ईरान के साथ अपने संबंधों को बेहतर करने की कोशिश की है जो बीते कुछ समय में कूटनीतिक स्तर पर कमज़ोर होते दिख रहे थे.
उनका कहना है कि ऐसा लगा कि भारत ने ईरान को काफ़ी अहमियत दी है. दोनों देशों के बीच बहुत पुराने और बहुत अच्छे संबंध रहे हैं, तो यह इस लिहाज़ से काफ़ी अहम है. वहीं ब्रिक्स देशों के अपने घोषणापत्र में इसराइल का नाम लिए बगैèर उसे महत्वपूर्ण संदेश दिया है.
दरअसल नई दिल्ली घोषणापत्र में मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव पर गहरी चिता जताई गई है. ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल देशों की ओर से पहले फ़लस्तीन और फिर अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध से घिरे मध्य-पूर्व के संकट को अधिकतम संयम और कूटनीति के ज़रिए सुलझाने की अपील की गई.
घोषणापत्र में ग़ज़ा और कब्ज़े वाले फ़लस्तीनी इलाकों की मानवीय स्थिति पर भी गंभीर चिता जताई गई. इसमें ग़ज़ा में सीज़फ़ायर बनाए रखने और बगैèर किसी बाधा के मानवीय मदद पहुंचाने की अपील की गई.इसमें फ़लस्तीनियों को जबरन विस्थापित किए जाने का विरोध किया गया है.
समूह ने दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन किया, जिसमें 1967 की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य सीमाओं के भीतर एक संप्रभु और स्वतंत्र फ़लस्तीन राज्य की बात की गई है और जिसकी राजधानी पूर्वी यरूशलम बताई गई है. ग़ज़ा की मानवीय स्थिति पर चिता जताते हुए ब्रिक्स देशों ने नागरिकों, स्वास्थ्य केंद्रों और अन्य नागरिक ढांचे पर हमलों तथा मानवीय सहायता रोकने की निदा की.
पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि ब्रिक्स देशों ने जो कहा है उसमें नया कुछ नहीं है, यह संयुक्त राष्ट्र का पुराना सिद्धांत रहा है. ब्रिक्स में उसी को आगे बढ़ाया गया है.
धनंजय त्रिपाठी का मानना है कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से क्या हासिल हुआ, अगर यह पूछा जाए तो इसकी कोई ठोस उपलब्धि नहीं है. भारत और रूस के बीच जो द्बिपक्षीय बातचीत हुई, उसमें भी कुछ नया नहीं हैं. लेकिन इसने ख़ासकर ग्लोबल साउथ के देशों, महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे, एकतरफा टैरिफ़ और आर्थिक मुद्दों पर बाक़ी दुनिया को संदेश देने की कोशिश की है कि उन्हें इस तरफ ध्यान देना होगा.
ब्रिक्स ने संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों में विकासशील देशों और महिलाओं, खासकर ग्लोबल साउथ की महिलाओं के बेहतर प्रतिनिधित्व पर ज़ोर दिया. ब्रिक्स देशों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1325 और महिला, शांति एवं सुरक्षा एजेंडे को लागू करने की प्रतिबद्धता दोहराई. नेताओं ने शांति और सुरक्षा से जुड़े सभी स्तरों के निर्णयों में महिलाओं की पूर्ण, समान, सुरक्षित और सार्थक भागीदारी पर ज़ोर दिया.
संयुक्त घोषणापत्र के अंदर की बात
यह सम्मेलन एक संयुक्त घोषणापत्र जारी करने में कामयाब रहा, ऐसे वक़्त में जब सदस्यों के बीच मतभेद शायद ही कभी इतने साफ़ नज़र आए हों. इस साल इससे पहले दो बार, ब्रिक्स मंत्रियों की बैठकें एक साझा बयान जारी करने में नाकाम रही थीं. इस बार सहमति तो बन गई, लेकिन उन मुद्दों को टालकर, जिन पर सदस्यों के बीच गहरे मतभेद हैं, और समाधान बहुत कम निकले.
”नई दिल्ली घोषणापत्र’’ को सम्मेलन के पहले दिन ही स्वीकार कर लिया गया. लेकिन ग़ौर करने वाली बात ये है कि इसमें क्या नहीं कहा गया है. मध्य-पूर्व युद्ध को लेकर, घोषणापत्र ”अधिकतम संयम’’ बरतने की अपील करता है. यह ’”नागरिक बुनियादी ढांचे और शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं पर हमलों’’ की निदा भी करता है, लेकिन इसके लिए किसी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराता.
यह दो-राष्ट्र समाधान (टू-स्टेट सॉल्यूशन) के समर्थन को फिर से दोहराता है, फ़लस्तीनियों के ज़बरन विस्थापन या ऐसे किसी भी क़दम का विरोध करता है जो ”क़ब्ज़े को वैध बना दे या उसे लंबा खींच दे’’, और इसे मौजूदा संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के दायरे में बड़ी सावधानी से पेश करता है. इसमें यूक्रेन में रूस के युद्ध का कोई ज़िक्र तक नहीं है जो पिछले ब्रिक्स घोषणापत्रों से हटकर है.
व्यापार को लेकर भी ऐसी ही सतर्कता बरती गई है. इसमें ”बेतरतीब ढंग से बढ़ते टैरिफ़’’ पर चिता जताई गई है और एकतरफ़ा प्रतिबंधों की निदा की गई है, लेकिन अमेरिका का नाम लेने से परहेज़ किया गया है, जिससे शायद वॉशिगटन की नाराज़गी से बचा जा सके.
ब्रिक्स के कई सदस्य राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को नाराज़ करने से बचना चाहते होंगे, क्योंकि वे पहले भी इस समूह के प्रस्तावों को ”अमेरिका-विरोधी’’ बता चुके हैं, जिनमें सीमा-पार व्यापार के लिए केंद्रीय बैंकों की डिजिटल करेंसी को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव भी शामिल है.
इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के वरिष्ठ विश्लेषक प्रवीण डोंथी कहते हैं, ”मध्य पूर्व के संघर्ष की निदा करते समय भी किसी देश का नाम नहीं लेना, भारत के तरीक़े की पहचान है.’’ उन्होंने कहा, ”मुझे यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि टैरिफ़ का मज़बूती से ज़िक्र किया गया. भारत इस मुद्दे पर शायद सीधे तरीके से बात नहीं करना चाहता था, लेकिन उसके पास यह अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने का एक मौक़ा था.’’


सम्मेलन से आगे
ट्रंप की व्यापार धमकियों और मध्य-पूर्व युद्ध के झटके के बाद, वैश्विक व्यवस्था को नया आकार देना कई सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक ज़रूरी ज़रूरत बन गया है. यह सम्मेलन जो चीज़ ज़रूर दे पाया, वह है ऐसी मुलाक़ातों के लिए एक मंच, जिनकी कल्पना कुछ महीने पहले तक मुश्किल लगती थी.
ईरान के पेज़ेशकियान और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस ने साथ बैठकर बातचीत की, युद्ध शुरू होने के बाद से दोनों देशों के बीच यह अब तक की सबसे उच्च-स्तरीय आमने-सामने की मुलाक़ात मानी जा रही है. इस वीकेंड ने तेहरान को यह दिखाने का मौक़ा दिया कि अमेरिका और इसराइल के सैन्य हमलों और आर्थिक दबाव के बीच वह अकेला नहीं खड़ा है.
जहां ईरान अमेरिकी प्रतिबंधों, वॉशिगटन के ”ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’’ और अपने बंदरगाहों पर नौसैनिक नाकाबंदी का सामना करने की कोशिश कर रहा है, वहीं पेज़ेश्कियान ने मलेशिया, भारत और इथियोपिया समेत ब्रिक्स सदस्यों के साथ गहरे आर्थिक संबंधों पर ज़ोर दिया.
राष्ट्रपति शी की 7 साल में दिल्ली की पहली यात्रा
शी जिनपिग और नरेंद्र मोदी ने गर्मजोशी से हाथ मिलाया. हालांकि, मोदी अपने जाने-पहचाने अंदाज़ में इस बार उनसे गले नहीं मिले
चीन की बात करें तो राष्ट्रपति शी जिनपिग सात साल बाद पहली बार दिल्ली आए थे. साल 2०2० के सीमा विवाद के बाद से भारत और चीन के बीच गहरा अविश्वास रहा है, लेकिन अब यह तनाव कम हुआ है. दोनों देशों के व्यापार में भी बड़ा असंतुलन है और व्यापार घाटा चीन के पक्ष में बहुत ज़्यादा झुका हुआ है.
लेकिन इसके बावजूद, इतने उलझे हुए रिश्ते वाले इन दो देशों के लिए यह वीकेंड एक बड़ा पल था. आधिकारिक बयानों के मुताबिक़, दोनों नेता कारोबारी संबंधों और आवागमन (ट्रांसपोर्ट) संपर्क को मज़बूत करने और व्यापार में आने वाली बाधाओं को दूर करने पर सहमत हुए. यह हाल के सालों में रिश्तों में आ रही धीरे-धीरे गर्माहट का ही एक हिस्सा है, और दोनों पक्षों की तरफ़ से साथ मिलकर काम करने की इच्छा भी है. लेकिन इससे कोई ठोस प्रगति होगी या नहीं, यह देखना अभी बाक़ी है.


आगे क्या होगा?
इस सम्मेलन ने दिखाया कि ब्रिक्स, पश्चिम के दबदबे वाली संस्थाओं से बाहर, प्रतिद्बंद्बियों के लिए बातचीत करने और रणनीतिक तालमेल बिठाने की जगह बना सकता है. सबसे मुश्किल सवाल यह है कि आगे क्या होगा. यह साफ़ है कि सदस्य इस बात पर सहमत हैं कि उन्हें पहले से कहीं ज़्यादा एक नई वैश्विक व्यवस्था की ज़रूरत है, लेकिन इसकी जगह असल में क्या आना चाहिए और वहां तक कैसे पहुंचा जाए, इसका जवाब देना कहीं ज़्यादा चुनौतीपूर्ण है. 

राजेश श्रीवास्तव