लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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हमारी लालचें क्या हमें संवेदना से मुक्त कर चुकी हैं ?

-संजय द्विवेदी

देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी जो महात्मा गांधी से भी अपनी रिश्ता जोड़ते हुए नहीं थकती है, की अखिलभारतीय बैठक की सबसे बड़ी चिंता वह भ्रष्टाचार नहीं है जिससे केंद्र सरकार की छवि मलिन हो रही है। दुनिया के भ्रष्टतम देशों में हम अपनी जगह बना रहे हैं। उनकी चिंता ए. राजा, सुरेश कलमाड़ी, शीला दीक्षित और शहीदों के फ्लैट हड़प जाने वाले मुख्यमंत्री नहीं हैं। चिंता है उस हिंदू आतंकवाद की जो कहीं दिखाई नहीं देता किंतु उसे पैदा करने की कोशिशें हो रही हैं।

नैतिकता और समझदारी पर उठते सवालः

मुंबई के आर्दश ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी के मामले ने हमारी राजनीति की नैतिकता और समझदारी पर फिर सवाल कर दिए हैं। जब मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठा व्यक्ति भी कारगिल के शहीदों के खून के साथ दगाबाजी करे और सैनिकों की विधवाओं के लिए स्वीकृत फ्लैट पर नजरें गड़ाए हो, तो आप क्या कह सकते हैं। किंतु यही भ्रष्टाचार अब हमारा राष्ट्रीय स्वभाव बन गया है। हमारी लालचें हमें संवेदना से रिक्त कर चुकी हैं और हमें अब किसी भी बात से शर्म नहीं आती। ऐसे कठिन समय में हम उम्मीद से खाली हैं क्योंकि इस लालच से मुक्ति की कोई विधि हमारे पास नहीं है। कामनवेल्थ खेलों में हमने अपनी आंखों से इसी बेशर्मी के तमाम उदाहरण देखे, किंतु हम ऐसे सवालों पर लीपापोती से आगे बढ़ नहीं पाते। जाहिर तौर पर हमें अब इन सवालों पर सोचने और इनसे दो-दो हाथ करने की जरूरत है। क्या यह मुद्दा वास्तव में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के इस्तीफे से खत्म हो जाएगा? उनकी जरा सी असावधानी कुर्सी के लिए खतरा बन गयी। किंतु जैसा वातावरण बन चुका है क्या उसमें कोई राजनेता या राजनीतिक दल आगे से भ्रष्टाचार न करने की बात सोच सकता है ? क्योंकि राजनीतिक क्षेत्र में पद इसी तरह मिल और बंट रहे हैं।

राजनीति में धन का बढ़ता असरः

राजनीति में धन एक ऐसी आवश्यक्ता है जिसके बिना न तो पार्टियां चल सकती हैं न चुनाव जीते जा सकते हैं। इसी से भ्रष्टाचार फलता-फूलता है। राष्ट्रीय संपत्ति की लूट और सरकारी संपत्ति को निजी संपत्ति में बदलने की कवायदें ही इस देश में फल-फूल रही हैं। हम भारत के लोग इस पूरे तमाशे को होता हुआ देखते रहने के लिए विवश हैं। हर घटना के बाद हमारे पास बलि चढ़ाने के लिए एक मोहरा होता है और उसकी बलि देकर हम अपने पापों का प्रायश्चित कर लेते हैं। कामनवेल्थ के लिए कलमाड़ी और अब आर्दश सोसायटी के लिए शायद चव्हाण की बलि हो जाए। किंतु क्या इससे हमारा राजनीतिक तंत्र कोई सबक लेगा, शायद नहीं क्योंकि राजनीति में आगे बढ़ने की एक बड़ी योग्यता भ्रष्टाचार भी है। इसी गुण ने तमाम राजनेताओं की अपने आलाकमानों के सामने उपयोगिता बना रखी है। वफादारी और भ्रष्टाचार की मिली-जुली योग्यताएं ही राजनीतिक क्षेत्र में एक आदर्श बन चुकी है। शहीदों की विधवाओं के फ्लैट निगल जाने का दुस्साहस हमें यही घटिया राजनीति देती है।

भारतीय जनता का स्मृतिदोषः

आज हमारे राजनीतिक तंत्र को यह लगने लगा है कि भारत की जनता की स्मृति बहुत कमजोर है और वह कुछ भी गलत करेंगें तो भी उसे जनता थोड़े समय बाद भूल जाएगी। चुनावों के कई फैसले, कई बार यही बताते हैं। आप मुंबई हमलों की याद करें कि जिसके चलते महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख और केंद्रीय मंत्री शिवराज पाटिल को अपनी कुर्सियां गंवानीं पड़ीं किंतु बाद में हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को भारी सफलता मिली। ऐसे स्मृतिदोष को चलते ही हमारा हिंदुस्तान बहुत से संकटों से मुकाबिल है। हमें अपनी स्मृति के साथ अपने राजनीतिक तंत्र पर नियंत्रण रखने की विधि भी विकसित करनी पड़ेगी वरना यह लालच हमारे जनतंत्र को बेमानी बना देगा, इसमें दो राय नहीं है। हमें भ्रष्टाचार को शिष्टाचार बनने से रोकना होगा वरना हमारे पास उस खोखले जनतंत्र के अलावा कुछ नहीं बचेगा, जिसे राजनीति की दीमक चाट चुकी होगी।सही मायने में भ्रष्टाचार भारत की एक ऐसी समस्या बन चुका है जिससे पूरा समाज त्राहि-त्राहि कर रहा है किंतु उससे बचने का कोई कारगर रास्ता नजर नहीं आता। अब जबकि ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की रेंकिंग में भारत तीन पायदान फिसलकर 87 वें नंबर पर जा पहुंचा है तो हमें यह सोचना होगा कि दुनिया में हमारा चेहरा कैसा बन रहा है। संस्था का यह अध्ययन बताता है कामनवेल्थ खेलों ने हमारी भ्रष्ट छवि में और इजाफा किया है। इससे पता चलता है कि भ्रष्टाचार को रोकने में हम नाकाम साबित हुए हैं और दुनिया के अतिभ्रष्ट देशों की सूची में हमारी जगह बनी हुयी है। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के चेयरमैन पीएस बावा का कहना है कि भारत में कुशल प्रशासक होने के बावजूद गर्वनेंस का स्तर नहीं सुधरना, चिंताजनक और शर्म का विषय है।

विकास को खा रहा है भ्रष्टाचारः

निश्चय ही भारत जैसे महान लोकतंत्र के लिए भ्रष्टाचार की समस्या एक बड़ी चुनौती है। इसके चलते भारत का जिस तेजी से विकास होना चाहिए वह नहीं दिखता। साथ ही तमाम विकास की योजनाओं का धन भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। इसका सबसे बड़ा शिकार वह तबका होता है जो सरकारी योजनाओं का लाभार्थी होता है। उसका दर्द बढ़ जाता है, जबकि सरकारी योजनाएं कागजों में सांस लेती रहती हैं। सरकार के जनहितकारी प्रयास इसीलिए जमीन पर उतरते नहीं दिखते। इसी तरह सार्वजनिक योजनाओं की लागत भ्रष्टाचार के नाते बढ़ जाती है। देश की बहुत सी पूंजी का प्रवाह इसी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। तमाम कानूनों और प्रतिरोधक उपायों के बावजूद हमारे देश में यह समस्या बढ़ती जा रही है। सूचना के अधिकार कानून के बावजूद , पारदर्शिता के सवाल पर भी हम काफी पिछड़े हुए हैं। एक लोकतंत्र के लिए ये स्थितियां चिंताजनक है। क्या हम इसके समाधानों की ओर बढ़ नहीं सकते, यह सवाल सबके मन में है। आखिर क्या कारण है भ्रष्टाचार हमारे समाज जीवन की एक अपरिहार्य जरूरत बन गया है।

जनता का मानस भी ऐसा बन गया है कि बिना रिश्वत दिए कोई काम नहीं हो सकता। क्या हम ऐसे परिवेश को बेहतर मान सकते हैं। जहां जनता के मन में इतनी निराशा और अवसाद घर कर गया हो। क्या यह देश के जीवन के लिए एक चिंताजनक स्थिति नहीं है। सरकारी स्तर पर भ्रष्टाचार को रोकने के सारे प्रयास बेमानी साबित हुए हैं। भ्रष्टाचार नियंत्रण और जांच को लेकर बनी हमारी सभी एजेंसियों ने भी कोई उम्मीद नहीं जगायी है। ऐसे में भ्रष्टाचार के राक्षस से लड़ने का रास्ता सिर्फ यही है कि जनमन में जागृति आए और लोग संकल्पित हों। किंतु यह काम बहुत कठिन है। जनता के सामने विकल्प बहुत सीमित हैं। वह अपने स्तर पर सारा कुछ नहीं कर सकती। किंतु एक जागृत समाज काफी कुछ कर सकता है इसमें कोई संदेह नहीं है। देश का सबसे बड़ा राजनीतिक दल यानि मुख्यधारा की राजनीति ही अगर भ्रष्टाचार के सवाल पर किनारा कर चुकी है, तो क्या हम भारत के लोग अपने देश की छवि को बचाने के लिए कुछ जतन करेंगें या इसे यूं ही कलमाड़ी और ए.राजा जैसों के भरोसे छोड़ देगें।

( लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

4 Responses to “हम भ्रष्टन के, भ्रष्ट हमारे !!!”

  1. B K Sharma

    मोहन भगवत का इस प्रकार रोड पर आना . इस पर भी कुछ लिखे तो अच्छा होगा.

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  2. sunil patel

    धन्यवाद द्विवेजी जी.

    आजादी के बाद बाद भी हम पूर्ण रूप से झूठा इतिहास पढ़ रहे है, अपने बच्चो को पढ़ा रहे है. सच्चाई का पता नहीं, खून में उबाल कहाँ से आएगा. स्वाभिमान का जज्बा कहाँ से आयेगा. नेतिकता केवल किताबो में दिखती है, जिस महूल में हम है वाही माहोल अपने बच्चो को दे रहे है. क्या नया है?. भारत ने दुनिया को क्या नहीं दिया है, और एक किताब लिखी गई है, सीरियल भी बना है २०-२५ साल पहले “भारत एक खोज” जैसे हमारा कोई अस्तित्व था ही नहीं.

    इस प्रथ्वी पर इंसान सबसे ज्यादा समजदार, ज्ञानी है. जब जानवर भी जानते है की फलां फलां रस्ते पर भोजन मिलेगा, कहाँ मर पड़ेगी, कहाँ पानी मिलेगा तो हमारे देश के इंसान क्यों भ्रष्टाचार नहीं छोड़ते.

    जब डंडा घूमता है तो कुत्ते भी इंसानों का जुर्म कुबूल कर लेते है. जरुरत है राजनैतिक और व्यक्तिगत इक्षाशक्ति की. हैं यहा पर सबसे महत्वपूर्ण है है व्यक्तिगत जिम्मेदारी और कर्तव्यों की. हम भ्रष्टाचारी का सामजिक बहिस्कार करेंगे भले ही वोह हमारे दोस्त, रिश्तेदार हो तो कुछ समय में काफी बदलाब आएगा.

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  3. Anil Sehgal

    हम भ्रष्टन के, भ्रष्ट हमारे !!! – by – संजय द्विवेदी

    (१) राष्ट्रमंडल खेल के भ्रष्ट्राचार / आदर्श सोसाइटी कारगिल फ्लाट्स भ्रष्ट्राचार, में लिप्त लोगों को कभी नहीं दबोचा जा सकता.

    (२) कारण ? दल-गत राजनीति या यह प्रयत्न कि किसी को भी दोषी बना डालो क्योंकि अपने दल वाले की रक्षा करनी है. मंशा दोषी को दण्डित करने की नहीं बल्कि अपने भ्रष्ट को बचाने की है.

    (३) ऐसे में भ्रष्टाचार कभी समाप्त नहीं हो सकता. हमारा लोकतंत्र ही भ्रष्ट हो गया है.

    (४) राजनीति नेता प्रयास करेगा कि अधिकारी हाथ में आ जाये, फ़ौजी फसें.
    ऐसे खेल में दोषी दण्डित नहीं हो पाता.

    (५) अब युवा आगे बड़े और क्रांति लाये.

    देश खतरे में है क्योंकि पोलिस, राजनीति नेता, काफी हद तक अखबार और कुछ न्यायाधीश और वरिष्ट सेना अधिकारी – सभी भ्रष्टाचार में लिप्त कहे जा रहे हैं.

    – अनिल सहगल –

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  4. Pardafash.Com

    इस देश में भ्रष्टाचार की चिन्ता किसको है? अब तो यह खोज का विषय है!

    आतंकवाद की चिन्ता तो हर किसी को होनी ही चाहिये।

    यदि हिन्दू आतंकवाद है तो चिन्ता का और भी बडा कारण है।

    जहाँ आतंकवाद देश को तोडता है, वहाँ हिन्दू आतंकवाद तो वोट भी तोडता है।

    यह तो लेखक ही बेहतर जानते हैं कि कौन किस आतंकवाद को पैदा कर रहा है? लेकिन आतंकवाद तो आतंकवाद होता है, जिसके लिये हिन्दू आतंकवाद या इस्लामिक आतंकवाद नाम देना आतंकवाद की समस्या को कमजोर करना है!

    भ्रष्टाचार में हर धर्म, हर नस्ल, हर वर्ग, हर जाति, हर दल और हर विचारधारा का व्यक्ति लिप्त है, जिसके लिये किसी एक को जिम्मेदार ठहराकर इस जिम्मेदारी से हम मुक्त नहीं हो सकते हैं। भ्रष्टाचार एक ऐसी भयंकर समस्या है, जिसकी ओर हम सभी ने आँखें बन्द कर रखी हैं।

    यह सही है कि सत्ताधारी दल की संवैधानिक जिम्मेदारी बनती है, लेकिन इस जिम्मेदारी को किसी भी दल ने कभी भी नहीं निभाया। वोट के लिये किसी को बदनाम करना अलग बात है। राज्यों में करीब- करीब सभी दलों की सरकारें हैं, लेकिन भ्रष्टाचार सर्वत्र तेजी से बढती हुई गति से व्याप्त है।

    आदरणीय श्री मधुसूदन जी गुजरात में भ्रष्टाचार के नियन्त्रण की बात लिखते हैं। जिसके बारे में मैंने अपने कार्यकर्ताओं से जाँच-पडताल करवाई तो हमारे एक कार्यकर्त्ता जो स्वयं भाजपा एवं संघ से सम्बन्धित हैं, का कहना है कि भ्रष्टाचार गुजरात में घटा नहीं, बढा है और आगे भी बढता रहेगा।

    मैंने इस बारे में अहमदाबाद, आणन्द, सूरत, दाहोद, बडोदरा, नवसारी, मेहसाणा, राजकोट, साबरकांठा आदि अनेक जिलों के अनेक तालुका स्तर के कार्यकर्त्ताओं से पडताल करवाई, लेकिन किसी ने नहीं कहा कि मोदी के शासन में भ्रष्टाचार घटा है।

    मैं तो स्पष्ट तौर पर मानता हूँ कि भ्रष्टाचार का किसी दल से कोई लेना-देना नहीं है।

    हम जैसा समाज बना रहे हैं। उसका ही परिणाम है-भ्रष्टाचार। समाज जैसे नागरिकों का उत्पाद करेगा, वैसे ही परिणाम सामने आयेंगे।

    हमारी चुनाव प्रणाली इतनी भ्रष्ट है कि कोई भी जनप्रतिनिधि चाहकर भी भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिये सोच भी नहीं सकता। इस बारे में व्यवस्था में भारी परिवर्तन के लिये हमें तैयार होना होगा।

    मैं समझता हूँ कि इसके लिये अभी हम तैयार नहीं है। हमें इन्तजार है; उस दिन का जिस दिन कोई विदेशी ताकत हमारी भ्रष्ट हो चुकी सेना को खरीद ले और हमारे ऊपर कब्जा कर ले, लेकिन तब हमारे पास करने को कुछ नहीं बचने वाला है।

    कांग्रेस या भाजपा को जिम्मेदार ठहराना ही इस बात का प्रमाण है कि हम भ्रष्टाचार को रोकने के लिये न तो संजीदा हैं और न हीं ईमानदार हैं।

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