चुनावी गठबंधन

अनिल अनूप

अंततः सपा-बसपा में गठबंधन की घोषणा कर दी गई और कांग्रेस को बाहर रखा गया। लखनऊ में ऐतिहासिक पल थे कि मायावती और अखिलेश यादव ने एक साथ, एक ही मंच से, मीडिया को संबोधित किया। साथ-साथ फोटो सेशन भी कराया गया। करीब 25 साल के बाद एक बार फिर दोनों दलों के बीच चुनावी गठबंधन हुआ है। 1993 में विधानसभा चुनावों के लिए किया गया था, लेकिन अब दोनों दल उप्र में 38-38 लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारेंगे। कांग्रेस के लिए, गठबंधन के बिना ही, अमेठी और रायबरेली की सीटें छोड़ी गई हैं,जो राजनैतिक प्रतीकवाद के अलावा कुछ भी नहीं है। उसमें रणनीति ढूंढने की नाकाम कोशिश नहीं की जानी चाहिए। कांग्रेस को बसपा प्रमुख मायावती ने खूब गरियाया और कहा कि गठबंधन के पुराने अनुभव बताते हैं कि बसपा का वोट उधर चला जाता है, लेकिन कांग्रेस के वोट बसपा की ओर ‘ट्रांसफर’ नहीं होते। गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, घोटालों को लेकर भी मायावती ने कांग्रेस के पुराने चिट्ठे खोले, लेकिन सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कांग्रेस के खिलाफ  एक भी शब्द नहीं बोला। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ अपनी ‘दोस्ती’ का रास्ता खुला रखा है। बहरहाल इस गठबंधन में देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस भी नहीं है और अब सबसे बड़ी पार्टी भाजपा तथा प्रधानमंत्री मोदी को ‘गठबंधन की वजह’ करार दिया है, लिहाजा गठबंधन का स्वरूप, आधार, चुनावी प्रभाव उप्र तक ही सीमित रहेगा, यह बिल्कुल स्पष्ट है। बेशक मायावती और अखिलेश ने गरीबों, दलितों, पिछड़ों, मुसलमानों, महिलाओं और छोटे दुकानदारों, नौजवानों की चिंताओं के प्रति सरोकार जताया है, लेकिन यह सोचना बेमानी है कि गठबंधन ऐसी चिंताओं को संबोधित करने के लिए बनाया गया है। मायावती ने 2 जून, 1995 के लखनऊ राज्य अतिथि गृह वाले ‘कातिलाना कांड’ का जिक्र तो किया, लेकिन जनहित और राष्ट्रहित में उसे भी नेपथ्य में धकेल दिया गया। अखिलेश ने भी भरोसा दिलाया कि मायावती का सम्मान और अपमान, अब उनका ही सम्मान, अपमान होगा। सवाल है कि क्या गठबंधन होने के बाद अब मायावती उस कांड की शिकायत अदालत से वापस ले लेंगी? उस आपराधिक केस में सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव भी आरोपी हैं। दरअसल हमारा विश्लेषण यह है कि सपा-बसपा महज एक चुनावी गठबंधन है। इसे क्रांति या आंदोलन अथवा परिवर्तन, विकास का प्रतीक नहीं मानना चाहिए। यह एक मौकापरस्त और बेमेल राजनैतिक गठबंधन है, जो राष्ट्र के संदर्भ में प्रभावी नहीं हो सकता और न ही उसका उम्मीदवार देश का प्रधानमंत्री बन सकता है। बेशक 2019 के आम चुनावों के बाद समीकरण कुछ भी बनें, लेकिन गठबंधन की घोषणा के दिन अखिलेश ने सार्वजनिक तौर पर इतना-सा बयान नहीं दिया कि वह प्रधानमंत्री पद के लिए मायावती का समर्थन करेंगे। उन्होंने सिर्फ  यह खुशी जताई कि एक बार फिर उप्र से ही प्रधानमंत्री बने! हालांकि मायावती ने दावा किया है कि यह एक लंबा और स्थायी गठबंधन होगा और सपा-बसपा अगला विधानसभा चुनाव (वर्ष 2022 में) भी साथ-साथ लड़ेंगी। बेशक गठबंधन की घोषणा हो गई है और उप्र में यह भाजपा के लिए बड़ी चुनौती भी साबित होगा, लेकिन वह चुनावी मकसद पहली कोशिश में ही ध्वस्त हो गया कि प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के मुकाबले ‘महागठबंधन’ का ही उम्मीदवार उतारा जाना चाहिए। यदि इसी तरह तीन तरफा चुनावी मुकाबला होता है, तो ऐसा नहीं है कि कांग्रेस अगड़ों के वोट ही काटेगी और भाजपा को नुकसान होगा! कांग्रेस मुस्लिम वोट भी तोड़ेगी, नतीजतन नुकसान गठबंधन को हो सकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि वोट बंटने से चुनावी फायदा भाजपा को हो सकता है। पुराने अनुभव भी ऐसे ही रहे हैं। इस गठबंधन का जो जातीय आधार माना जाता रहा है, उसका एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा भाजपा के पक्ष में भी जाता रहा है। एक और तथ्य गौरतलब है कि यदि इसी तरह क्षेत्रीय दलों के बीच गठबंधन होते रहे, तो कांग्रेस सरीखी राष्ट्रीय पार्टी दौड़ से बाहर ही रहेगी और महागठबंधन कैसे आकार ले सकेगा? बेशक मायावती ने इसे ‘गुरु-चेले’ (प्रधानमंत्री मोदी-भाजपा अध्यक्ष अमित शाह) की नींद उड़ाने वाला गठबंधन करार दिया है, लेकिन आम चुनाव के मानक कुछ उपचुनावों से ही तय नहीं किए जा सकते।

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