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क्या इलेक्ट्रिक मालवाहक गाड़ियां ड्राइवरों की कमाई भी बढ़ा सकती हैं? नई रिपोर्ट ने दिया चौंकाने वाला जवाब

भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की चर्चा अक्सर पेट्रोल-डीजल की बचत, प्रदूषण कम करने और कार्बन उत्सर्जन घटाने तक सीमित रहती है।

लेकिन अगर कोई कहे कि इलेक्ट्रिक मालवाहक गाड़ियां ड्राइवरों की कमाई भी बढ़ा सकती हैं, तो शायद पहली बार में यकीन करना मुश्किल हो।

नई रिपोर्ट कहती है कि ऐसा संभव है।

Smart Freight Centre ने नई दिल्ली में India Zero Emission Freight Alliance (India ZEFA) की शुरुआत की है। इसके साथ ही Shell Foundation के सहयोग से तैयार एक नई रिपोर्ट जारी की गई है, जिसमें भारत के 11 राज्यों के 1,500 से अधिक मालवाहक वाहन चालकों के अनुभवों का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक सही वित्तीय मॉडल और बेहतर परिचालन व्यवस्था मिलने पर इलेक्ट्रिक मालवाहक वाहन चलाने वाले ड्राइवरों की आय पारंपरिक वाहनों की तुलना में बढ़ सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार, इलेक्ट्रिक मालवाहक वाहन अपनाने वाले कई ड्राइवरों की आय में लगभग 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई। अध्ययन में शामिल तीन पहिया इलेक्ट्रिक मालवाहक वाहन चलाने वाले ड्राइवरों की मासिक आय में 4,000 से 8,000 रुपये तक की बढ़ोतरी देखी गई, जबकि चार पहिया इलेक्ट्रिक मालवाहक वाहन चलाने वाले ड्राइवर औसतन करीब 4,000 रुपये प्रति माह अधिक कमाने लगे।

हालांकि रिपोर्ट यह भी साफ करती है कि हर ड्राइवर को एक जैसा लाभ नहीं मिलता। आय इस बात पर निर्भर करती है कि वाहन कितनी बार इस्तेमाल हो रहा है, ड्राइवर किस कारोबारी मॉडल में काम कर रहा है और उसे किस तरह की वित्तीय सुविधा मिली है।

रिपोर्ट बताती है कि इलेक्ट्रिक वाहनों का सबसे बड़ा फायदा इनके कम परिचालन और रखरखाव खर्च में है। लेकिन दूसरी तरफ़ कई ड्राइवरों के लिए वाहन खरीदने का कर्ज़ सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। कई मामलों में हर महीने चुकाई जाने वाली ईएमआई इतनी अधिक होती है कि इलेक्ट्रिक वाहन से होने वाली बचत का बड़ा हिस्सा उसी में चला जाता है। खासकर उन ड्राइवरों के लिए जो खुद वाहन के मालिक भी हैं।

यही वजह है कि रिपोर्ट सिर्फ़ इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने की बात नहीं करती, बल्कि वित्तीय व्यवस्था बदलने पर भी ज़ोर देती है। इसमें लीज़-टू-ओन मॉडल, प्लेटफ़ॉर्म आधारित लीज़िंग, एंकर-लिंक्ड फाइनेंसिंग, बैटरी लीज़िंग, ब्लेंडेड फाइनेंस और कम ब्याज वाले ऋण जैसे विकल्प सुझाए गए हैं, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा ड्राइवर इलेक्ट्रिक मालवाहक वाहनों की ओर बढ़ सकें।

नई पहल India Zero Emission Freight Alliance (India ZEFA) का मकसद भी यही है। यह एक ऐसा राष्ट्रीय मंच है, जिसमें सरकार, लॉजिस्टिक्स कंपनियां, वाहन निर्माता, ऊर्जा कंपनियां, चार्जिंग सेवा प्रदाता, वित्तीय संस्थान और विकास साझेदार मिलकर भारत में शून्य-उत्सर्जन माल परिवहन को बढ़ावा देंगे। इसका उद्देश्य सिर्फ़ इलेक्ट्रिक ट्रकों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि पूरे सड़क माल परिवहन तंत्र में मौजूद बाधाओं को मिलकर दूर करना है।

इस मंच के शुभारंभ के दौरान डीपीआईआईटी (DPIIT) के अतिरिक्त सचिव अतीश कुमार सिंह, भारत में नीदरलैंड्स के उप राजदूत हुइब माइनारेंड्स, डीपीआईआईटी के उप सचिव प्रवीण कुमार साहुकारी, उद्योग जगत के प्रतिनिधि और विभिन्न संस्थाओं के अधिकारी मौजूद रहे। कार्यक्रम में भारत के लॉजिस्टिक्स क्षेत्र को अधिक प्रतिस्पर्धी, स्वच्छ और भविष्य के लिए तैयार बनाने पर ज़ोर दिया गया।

Smart Freight Centre के मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रो. डॉ. इंग. क्रिस्टोफ़ वोल्फ़ ने कहा कि भारत के पास दुनिया की सबसे प्रतिस्पर्धी और टिकाऊ माल परिवहन व्यवस्था बनाने का अवसर है। उनके मुताबिक यह बदलाव सिर्फ़ नई तकनीक का नहीं, बल्कि उन लाखों ड्राइवरों का भी है जो भारत की सप्लाई चेन की रीढ़ हैं। उन्होंने कहा कि सही वित्तीय मॉडल, भरोसेमंद बुनियादी ढांचा और सभी पक्षों के बीच सहयोग से ऐसा माल परिवहन तंत्र बनाया जा सकता है जो स्वच्छ होने के साथ-साथ लोगों की आजीविका भी बेहतर बनाए।

Shell Foundation के वरिष्ठ सलाहकार डारा ओवोयेमी ने कहा कि इलेक्ट्रिक माल परिवहन का मतलब सिर्फ़ नई तकनीक अपनाना नहीं है। यह उन लोगों की ज़िंदगी बेहतर बनाने का भी अवसर है जो हर दिन देश की सप्लाई चेन को चलाते हैं। उन्होंने कहा कि यदि सस्ती वित्तीय सुविधा, स्थिर मांग और वाहन स्वामित्व के अवसर उपलब्ध कराए जाएं, तो इलेक्ट्रिक वाहन ड्राइवरों की आय बढ़ाने के साथ-साथ पूरे माल परिवहन क्षेत्र को अधिक समावेशी बना सकते हैं।

रिपोर्ट यह भी कहती है कि भारत में सड़क मार्ग से माल ढुलाई लगातार बढ़ रही है। ऐसे में यदि यह क्षेत्र धीरे-धीरे शून्य-उत्सर्जन वाहनों की ओर बढ़ता है, तो इससे एक तरफ़ ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम होगा और दूसरी तरफ़ ड्राइवरों की आय तथा आर्थिक सुरक्षा भी बेहतर हो सकती है। लेकिन इसके लिए सिर्फ़ वाहन बदलना पर्याप्त नहीं होगा। वित्त, चार्जिंग ढांचा, कारोबार के मॉडल, नीतियां और बुनियादी ढांचा, इन सभी को साथ लेकर चलना होगा।

भारत का एनर्जी ट्रांजिशन सिर्फ़ बिजली बनाने या ईंधन बदलने की कहानी नहीं है। यह उन लाखों लोगों की भी कहानी है जिनकी रोज़ी-रोटी सड़कों पर चलने वाले मालवाहक वाहनों से जुड़ी है। नई रिपोर्ट का संदेश साफ़ है कि अगर जलवायु के लिए किए जा रहे बदलाव लोगों की आय और जीवन को भी बेहतर बनाएं, तभी यह बदलाव लंबे समय तक टिकाऊ साबित होगा।