भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का गिरता स्तर

Posted On by & filed under चिंतन, समाज

देवेंद्रराज सुथार किसी भी देश में स्वास्थ्य का अधिकार जनता का सबसे पहला बुनियादी अधिकार होता हैं। लेकिन भारत में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में रोज़ाना हजारों लोग अपनी जान गंवा देते हैं। भारत स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बांग्लादेश, चीन, भूटान और श्रीलंका समेत अपने कई पड़ोसी देशों से पीछे हैं। इसका खुलासा… Read more »

देश बदलना है तो देना होगा युवओ को सम्मान

Posted On by & filed under चिंतन, समाज

डॉ नीलम महेंद्र भारत एक युवा देश है। इतना ही नहीं , बल्कि युवाओं के मामले में हम विश्व में सबसे समृद्ध देश हैं। यानि दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा युवा हमारे देश में हैं। भारत सरकार की यूथ इन इंडिया,2017 की रिपोर्ट के अनुसार देश में 1971 से 2011 के बीच युवाओं… Read more »

  प्रदूषण कम करने में सबकी सहभागिता जरूरी

Posted On by & filed under चिंतन, समाज

प्रदूषण कम करने में सबकी सहभागिता जरूरी हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के 15 सबसे प्रदूषित शहरों की लिस्ट जारी की है। जिसमें एक दो नहीं बल्कि 14 शहर भारत के हैं। प्रदूषित शहरों की इस लिस्ट में उत्तर प्रदेश का शहर कानपुर जहां पहले स्थान पर है, वहीं राजधानी दिल्ली के… Read more »

सड़क दुर्घटनाओं पर क़ाबू पाने की चुनौती

Posted On by & filed under चिंतन

भारत डोगरा भारत में सड़क दुर्घटनाओं के बढ़ते आंकड़े एक भयानक सच्चाई की तरफ इशारा करते हैं। इसमें जान और माल दोनों की क्षति उठानी पड़ती है। सदी के पहले 15 वर्षों के दौरान विश्व स्तर पर इसमें कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई थी। लेकिन रोज़-ब-रोज़ आधुनिक तकनीक वाली मशीनों के ईजाद ने सड़कों पर जहाँ गाड़ियों की संख्या को… Read more »

 मेरा ईश्वर सबसे महान है

Posted On by & filed under चिंतन, धर्म-अध्यात्म

मनमोहन कुमार आर्य इससे पूर्व कि हम ईश्वर की महानता की चर्चा करें, हम यह जान लें कि ईश्वर है क्या? ईश्वर वह है जो इस संसार की रचना करता है, इसका पालन करता है और अवधि पूरी होने पर इसकी प्रलय करता है। यह कार्य स्वतः नहीं हो सकता। जड़ पदार्थों में स्वमेव किसी… Read more »

सन्ध्या व अग्निहोत्र यज्ञ का महत्व व लाभ

Posted On by & filed under चिंतन, धर्म-अध्यात्म

                सन्ध्या एक शास्त्रीय विधान है जिसका अनुष्ठान प्रत्येक स्त्री व पुरुष का कर्तव्य है। शैशव काल से माता-पिता के सान्निध्य से इसका आरम्भ हो जाता है। गुरुकुल व विद्यालयों में बच्चे अपने आचार्य के सान्निध्य में इसे करते हैं और गृहस्थ व अन्य आश्रमों में रहते हुए इसे प्रातः व सायं दोनों समय बिना… Read more »

आज का मनुष्य मनुष्योचित गुणों से हीन उसकी आकृति मात्र है

Posted On by & filed under चिंतन, धर्म-अध्यात्म

मनमोहन कुमार आर्य संसार के अनेक प्राणियों में मनुष्य नाम व आकृति वाला भी एक प्राणी है। संसार के प्राणी दो व चार पैर वाले हैं जिनमें मनुष्य ही सम्भवतः दो हाथ व दो पैरों वाला प्रमुख व विशेष प्राणी है। मनुष्य की विशेषता इसकी विशेष आकृति व आकृति के अतिरिक्त इसमें विशेष बुद्धि तत्व… Read more »

ऋषि दयानन्द जीवन के प्रमुख महान कार्य

Posted On by & filed under चिंतन, धर्म-अध्यात्म

ऋषि दयानन्द का पहला प्रमुख कार्य तो उनका गुरु विरजानन्द जी से आर्ष शिक्षा को प्राप्त करना था जिससे वह वेदों के यथार्थ स्वरूप सहित वेद मन्त्रों के यथार्थ अर्थ जान सके। यदि यह न हुआ होता तो फिर ऋषि दयानन्द, दयानन्द व स्वामी दयानन्द ही रहते जैसे कि आज अनेकानेक साधु संन्यासी व विद्वान हैं। कोई उनको जानता भी न। गुरु विरजानन्द जी की शिक्षा ने उन्हें संसार के सभी विद्वानों से अलग किया जिसका कारण उनकी प्रत्येक मान्यता का आधार वेद सहित सत्य व तर्क पर आधारित होने के साथ उनका सृष्टि क्रम के अनुकूल होना भी है।

जानिए वास्तु अनुसार आदर्श घर कैसा होना चाहिए?

Posted On by & filed under चिंतन, धर्म-अध्यात्म

 वास्तु कुछ नियमों का पालन का विकास करने,इमारतों और हमारे आसपास के प्राकृतिक सकारात्मक ऊर्जा को बनाए रखने के लिए एक बहुत पुरानी प्रथा है। भारतीय सभ्यता की यह सदियों पुरानी प्रथा अद्भुत परिणाम देती है और इसके चिकित्सकों का जीवन सफल, समृद्ध और शांतिपूर्ण बनाती है |बढ़ती हुई आबादी और जगह की कमी की… Read more »

ईश्वर से विज्ञान एवं राज्यादि ऐश्वर्य की प्रार्थना होने से वेद संसार के सर्वोत्तम धर्मग्रन्थ

Posted On by & filed under चिंतन, धर्म-अध्यात्म

मनमोहन कुमार आर्य महर्षि दयानन्द महाभारत काल के पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने संसार को ईश्वर, जीव व प्रकृति, इन तीन सत्ताओं का सिद्धान्त दिया जिसे त्रैतवाद के नाम से जाना जाता है। यह सिद्धान्त युक्ति, तर्क तथा प्रत्यक्षादि प्रमाणों से भी सिद्ध होता है। इस कारण इसके विपरीत अन्य सभी सिद्धान्त अपूर्ण व दोषपूर्ण होने… Read more »