मनोरंजन मीडिया

दुनिया भर में पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियां

3 मई विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस

 अमरपाल सिंह वर्मा

-अगर सच बोलने वालों को हतोत्साहित किया जाता रहा तो सच भी धीरे-धीरे हाशिए पर चला जाएगा। यह स्थिति न तो किसी समाज के लिए शुभ कही जा सकती है और न ही किसी देश या दुनिया के लिए। तय हमें ही करना है कि हम क्या चाहते हैं?
 हर साल तीन मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस आते ही बयान जारी होते हैं। प्रतिबद्धताओं को दोहराया जाता है और प्रेस की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की रीढ़ बताया जाता है लेकिन सवाल यह है कि क्या यह रीढ़ अब भी सीधी खड़ी है या धीरे-धीरे झुक चुकी है? हालात ऐसे बन रहे हैं कि अब खबर लिखना ही जोखिम का काम होता जा रहा है। जिस प्रकार पत्रकारों को मौत के घाट उतारा जा रहा है, उन पर घातक हमले हो रहे हैं, उन्हें जेलों में बंद किया जा रहा है, इसे देखते हुए लगता है कि प्रेस अब कहने मात्र के लिए स्वतंत्र रह गई है। बड़ा सवाल है कि क्या विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाने की औपचारिकता पूरी करके प्रेस की स्वतंत्रता का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है? क्या सच कहने की कीमत चुका कर पत्रकारिता सिमटती नहीं जा रही है?
हम कहते हैं कि प्रेस स्वतंत्र है। लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल अलग कहानी सुनाती है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने हाल में जो बयान दिया है, उससे पता चलता है कि दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश बचा हो जहां पत्रकार पूरी तरह सुरक्षित हों। यह किसी एक देश की कहानी नहीं है। यह लगभग पूरी दुनिया का हाल है जहां सच लिखना धीरे-धीरे खतरनाक होता जा रहा है। दुनिया के युद्धग्रस्त क्षेत्रों में यह जोखिम साफ तौर पर नजर आता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार गाजा में जारी संघर्ष के दौरान करीब तीन सौ पत्रकार मारे जा चुके हैं। ये पत्रकार किसी पक्ष का हिस्सा नहीं थे बल्कि केवल घटनाओं की तथ्यपरक जानकारी को आम लोगों तक पहुंचाने का अपना दायित्व पूरा कर रहे थे। युद्ध क्षेत्रों में पत्रकारों को अक्सर जान बूझकर निशाना बनाया जाता है और हाल के समय में मारे गए पत्रकारों की संख्या में तेजी देखी गई है लेकिन पत्रकारों पर खतरा केवल युद्ध तक सीमित नहीं है। अन्य इलाकों में भी इस साल की शुरुआत से अब तक कई पत्रकारों की हत्या हो चुकी है और कुछ देशों को आज मीडिया के लिए सबसे खतरनाक जगहों में गिना जा रहा है।
यह भी चिंताजनक है कि पत्रकारों की हत्या के मामलों में न्याय की दर बेहद कम है। जब अपराध होते हैं और सजा नहीं होती तो यह केवल एक व्यक्ति के खिलाफ अन्याय नहीं रहता बल्कि एक ऐसा माहौल बनता है जिसमें लोगों का डरना धीरे-धीरे सामान्य हो जाता है। सोचिए, दस में से नौ मामलों में आज तक किसी को जवाबदेह नहीं ठहराया गया। दुनिया भर में लगभग 330 मीडिया कर्मी और 500 नागरिक पत्रकार इस समय जेलों में बंद हैं। वर्तमान में पत्रकारों पर खतरे का स्वरूप भी बदल रहा है। पहले खतरा केवल मैदान में दिखता था, जो अब कागज और स्क्रीन के जरिए भी सामने आता है। मानहानि और साइबर अपराध जैसे कानूनों का इस्तेमाल असहमति को दबाने के लिए किया जा रहा है। दूसरी ओर, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मीडिया कर्मियों, खासकर महिला पत्रकारों, को जिस तरह की धमकियों और उत्पीडऩ का सामना करना पड़ रहा है उससे एक अलग तरह का दबाव पैदा हो रहा है। यह दबाव दिखाई कम देता है  लेकिन असर गहरा छोड़ता है।
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि युद्ध में सबसे पहले सत्य की हत्या होती है लेकिन अब यह बात और ज्यादा व्यापक अर्थों में सच लगने लगी है। क्योंकि अब सत्य की हत्या केवल युद्ध में नहीं बल्कि उन तमाम परिस्थितियों में हो रही है जहां सच को सामने लाने की कोशिश की जाती है। बड़ा सवाल है कि अगर पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं तो समाज कितना सुरक्षित है? क्योंकि पत्रकार केवल खबर नहीं लिखते, वे समाज को हकीकत के बारे में बताते हैं। अगर यह प्रक्रिया बाधित होती है तो जानकारी भी सीमित होती जाती है और फैसले भी आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर लिए जाने लगते हैं।
प्रेस की स्वतंत्रता बनी रहे, इसके लिए सिद्धांतत: सब सहमत होते हैं लेकिन अब इसे एक अनिवार्यता के रूप में देखने की जरूरत है। अगर पत्रकार डर के माहौल में काम करेंगे तो सच भी डर जाएगा। और जब सच डरता है तो लोकतंत्र कमजोर होता है। पत्रकार बिना डर के काम कर सकें, इसके लिए वैसा माहौल बनाने की जिम्मेदारी सरकारों की है। पत्रकारों को सुरक्षा देने वाले कानूनों की जरूरत है। असहमति को अपराध बताकर परेशान करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। पत्रकारों के खिलाफ होने वाले अपराधों में जवाबदेही तय करना अपरिहार्य है। इस काम में समाज की सजग भूमिका भी जरूरी है। समाज को भी यह तय करना चाहिए कि उसे किस तरह की पत्रकारिता की दरकार है। क्या हम केवल वही सुनना चाहते हैं जो हमें सहज लगे या वह भी सुनने की इच्छा रखते हैं जो हमें असहज भले ही कर दे लेकिन सच हो?
हम इस बात को भूलते जा रहे हैं कि पत्रकारिता का काम केवल सूचना देना नहीं है बल्कि सवाल उठाना भी है। सवाल कई बार विचलित भी करते हैं। तीन मई को प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाने की औपचारिकता पूरी करने के बजाय इस दिन को एक चेतावनी की तरह भी देखा जाना चाहिए। अगर सच बोलने वालों को इसी प्रकार हतोत्साहित किया जाता रहा तो सच भी धीरे-धीरे हाशिए पर चला जाएगा। यह स्थिति न तो किसी समाज के लिए शुभ कही जा सकती है और न ही किसी देश या दुनिया के लिए। तय हमें ही करना है कि हम क्या चाहते हैं?

अमरपाल सिंह वर्मा