आसियान के माध्यम से चीन को चुनौती

दुलीचन्द रमन
इस बार का गणतंत्र दिवस समारोह कुछ खास रहा क्योंकि इस वर्ष 69वें गणतंत्र दिवस की परेड के दौरान आसियान के दस देशों (म्यांमार, थाईलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिपिन्स, सिंगापुर, कंबोडिया, लाओस और बु्रनेई) के सर्वोच्च नेता मुख्य अतिथि के रूप में नई-दिल्ली में उपस्थित रहे। यह गणतंत्र दिवस के इतिहास मे पहला मौका था जब एक साथ दस देशों के राष्ट्राध्यक्षों के गणतंत्र-दिवस परेड़ का मुख्य अतिथि के रूप में अवलोकन किया।
गणतंत्र-दिवस के अवसर पर किसी भी विदेशी मेहमान की मौजूदगी भारतीय विदेश-नीति की दिशा तय करती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के गठन के बाद 2015 में अमेरिका के तात्कालिक राष्ट्रपति बराक ओबामा, 2016 में फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसिसों होलन्दे 2017, मे संयुक्त अरब अमीरात के किंग मोहम्मद बिन जायेद उपस्थित रहे। इसी कड़ी मे 2018 में आसियान के शासनाध्यक्षों की मौजूदगी भारतीय विदेश नीति मे आसियान के महत्व को रेखांकित करती है। यह भारत की ‘एक्ट ईस्ट पाॅलिसी’ की दिशा मे एक और कदम है।
पिछले कुछ दिनों में अंतराष्ट्रीय कुटनीति तथा भारत के पड़ोस मे सामारिक परिदृश्य में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए है। अमेरिका, चीन के दोनों मित्र देशों (उतर-कोरिया और पाकिस्तान) को आड़े हाथों ले चुका है। उत्तर-कोरिया के खिलाफ अमेरिका व अन्य देशों द्वारा लगाये गये आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद चीन उसकी मदद करता आ रहा है। पाकिस्तान को लेकर भी नये साल की नई सुबह में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को ज्ञान प्राप्त हुआ कि पाकिस्तान ने अमेरिका से पिछले पन्द्रह-बीस सालों में अरबों अमेरिकी डालर की मदद लेकर भी अमेरिका के साथ धोखा किया है। चीन ने तुरंत अपने चेले पाकिस्तान को आतंकवाद से लड़ने के उसके ट्रेक-रिकार्ड को देखते हुए प्रशंसा-पत्र दे दिया। बदले में पाकिस्तान के केन्द्रीय बैंक ने पाकिस्तान में चीनी मुद्रा युवान को ‘निवेश’ व व्यापार में प्रचलन की आज्ञा दे दी। जो सीपैक के बाद चीनी चंगुल में जाने का एक और कदम है।
चीन की मंशा इस क्षेत्र में भारत को घेरने की रही है। भारत की बढ़ रही अंतराष्ट्रीय प्रतिष्ठा एशिया में चीनी चैधर के लिए खतरा लग रही है। यह सही है कि पिछले चालीस-पचास सालों से भारत-चीन सीमा पर अमूमन शंाति रही है। लेकिन दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास की कमी रही है तथा स्थितियाँ शीत-युद्व जैसी बनी रही है। चीन ने भारत के पड़ोसी सार्क देशों के संबंधो में सेध्ंा लगाने का भरसक प्रयास किया है जो कुछ-कुछ सफल भी रहा है।
हमारे चिर-मित्र पड़ोसी नेपाल में राजशाही के खात्में और उसके बाद गृहयुद्व के दिनों में वहाँ परिस्थितियों के पीछे अगर चीनी वामपंथी विचारधारा का हाथ रहा तो उसके बाद संविधान निमार्ण में भारतीय मूल के मधेशी समुदाय के हितों को लेकर भारत द्वारा की गई आर्थिक नाकेबंदी से स्थितियाँ लगातार चीन के पक्ष में होती चली गई। नेपाल में वामपंथी दलों का सत्ता में आना चीन को रास आ गया। फलस्वरूप नेपाल में सरकार चीनी कठपूतली की तरह काम कर रही है।
भूटान को लेकर भारतीय और चीनी सेनायें डोकलाम क्षेत्र मे आमने-सामने डटी रही। 75 दिनों के बाद यह मुद्दा आंशिक रूप से सुलझा लिया गया क्योंकि चीनी कंम्यूनिस्ट पार्टी की 19वीं बैठक होनी थी। पिछले दिनों उपग्रह से प्राप्त चित्रों के माध्यम से ज्ञात हुआ है कि चीन अपने क्षेत्र में स्थायी सैन्य निर्माण कर रहा है जिससे भूटान सरकार पर अनावश्यक दबाव बढ़ने की सभावना है। क्योंकि इस क्षेत्र में पहले चीनी सेना पैट्रोलिंग हेतु आती थी तथा बाद में लौट जाती थी। भूटान की सुरक्षा को लेकर भारत अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है। लेकिन देर सवेर चीन भूटान के साथ अपने कूटनीतिक संबंध स्थापित करने की कोशिश करेगा। इसके लिए वह सैन्य दबाव व आर्थिक निवेश का लालच दे सकता है।
श्रीलंका में तमिल मुद्दे को लेकर भारत के साथ अविश्वास की स्थिति बनी। हमने परिस्थितियों को भांपते हुए भारतीय शांति सेना भेजी। लेकिन श्रीलंका में बहुसंख्यक सिहंली समुदाय और राजनीतिक नेतृत्व में भारत के प्रति अविश्वास के कारण चीन को वहां भी मौका मिल गया। आधारभूत संरचना और आर्थिक विकास व निवेश के नाम पर हब्वनटोटा जैसी अव्यवहारिक व गैर लाभप्रद बंदरगाह के नाम पर निवेश के माध्यम से श्रीलंका की सरकार को अपने ़ऋणजाल में फंसा लिया। श्रीलंका ने इस बंदरगाह को 99 साल के पट्टे पर चीन को सौंप कर अपना ऋण बोझ तो हल्का कर दिया लेकिन भारत के लिए एक खतरे का बीज अपनी भूमि में रोंप दिया।
म्यंमार में पूर्व की लोकतंत्र विरोधी सैन्य सरकार के कार्यकाल के दौरान हमने कूटनीतिक पर्दा सा गिरा रखा था। इस दौरान चीन वहां भी अपना प्रभाव बढ़ा चुका था। वहां भी क्योकप्यू बंदरगाह के विकास के नाम पर म्यंमार सरकार पर चीनी कर्ज का बोझ बढ़ चुका है। रोहिग्या मसले में भी वह अपनी टांग अड़ाता रहता है। म्यंामार में सक्रिय सभी चरमपंथी गुटो को भी चीन ही मदद कर रहा है। म्यांमार भी आशा की दृष्टि से अब भारत की तरफ देख रहा है।
मलद्वीव में भी चीन भारत से बाजी मार ले गया। नवम्बर 2017 के आखिरी सप्ताह में मालद्वीव की संसद ने चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर मोहर लगा दी। एक समय था जब 1988 में भारत ने मालद्वीव में राष्ट्रपति अब्दुल गयूम की सरकार का तख्ता पलट की कोशिश को नाकाम किया था। फिर वह समय भी आया जब वर्तमान राष्ट्रपति यामीन ने माले में अतंराष्ट्रीय हवाई अड्डे के निर्माण में लगी भारतीय कंपनी के साथ समझौता तोड़कर उसे चीन की कंपनी को दे दिया।
सार्क का एक सदस्य पाकिस्तान पहले ही चीन के हाथों में खेल रहा है। अफगानिस्तान भी पिछले दिनों सीपैक के मसौदे पर कुछ-कुछ हिचक के साथ चीन की हाँ में हाँ मिला चुका है।
दक्षिण एशिया में बढ़ता चीनी हस्तक्षेप भारतीय कुटनीति को संकुचित नही कर सकता। शायद यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी व विदेश मंत्रालय लगातार एक्ट ईस्ट पाॅलिसी पर काम कर रहा है। आसियान के देशों के राष्ट्राध्यक्षों का गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बनना इसी दिशा एक कदम है। भारत और आसियान के देशों के बीच सदियों पुराने रिस्ते रहे है। ये संबंध इतिहास, संस्कृति, वाणिज्य और शिक्षा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में फैले हुए है। सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से रामायण और महात्मा बुद्व हमें एक-दूसरे के करीब लाते है।
आसियान देश भारत के साथ संवाद सांझेदारी के 25 साल पूरे कर चुके है। सिंगापुर और वियतनाम चाहते है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत की पैठ बढ़े क्योंकि चीनी दखल से इस क्षेत्र में असुरक्षा का भाव है। वियतनाम, फिलिपिन्स, मलेशिया और ब्रुर्नेई के साथ तो चीन का सीमा संबंधी विवाद है। फिलिपिन्स दक्षिण चीन सागर के मामले को लेकर अतंराष्ट्रीय न्यायालय में भी जा चुका है जिसका फैसला चीन के खिलाफ आया हैं वियतनाम के साथ भारत दक्षिण चीन सागर में तेल उत्पादन व रक्षा क्षेत्र में सहयोग कर रहा है। आसियान के सम्मेलन के दौरान ‘समुद्री सुरक्षा और नौ परिवहन आजादी’ पर सहमति व्यक्त की गई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आसियान के छः राष्ट्राध्यक्षों के साथ द्विपक्षीय वार्ता भी की। जिससे इस आसियान सम्मेलन का महत्व और भी बढ़ गया है। हिन्द-प्रशांत क्षेत्र ने भारत, अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया की संयुक्त नौ सैनिक अभ्यास से आसियान के देशों में चीनी आक्रमकता का डर कम किया जा सकता है। यह बात सही है कि विदेश-नीति की गुणा-भाग कोई भी देश अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार करता है। चीन वर्तमान में आर्थिक निवेश और तकनीकी कुशलता का मुखौटा लगाकर विश्व में अपने हित साध रहा है। दुनिया-भर मे रेल लाईनों, हवाई अड्डों और बंदरगाहों के निर्माण के लिए तीसरी दुनिया के ज्यादातर देश उसकी सेवायें ले रहे है। चीन निवेश को हथियार के रूप में प्रयोग कर रहा है जिससे वह संबंधित देश की नीतियों को प्रभावित करने की स्थिति में पहुँच जाता है।
आर्थिक रूप से सुदृढ़ भारत ही क्षेत्रिय तथा वैश्विक मंचों पर अपनी पहचान बना सकता है इसके लिए अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक सुधार, उच्च आर्थिक विकास तथा घरेलू मोर्च पर कृषि और रोजगार जैसे विषयों पर ध्यान देने की दरकार है।
हमें सार्क, आसियान, अफ्रीकी संघ, जी-20 तथा दूसरे मंचों पर सभी परिस्थितियों में निरन्तर प्रयास करने होंगे ताकि भारत के हितों की रक्षा की जा सके। इक्कीसवीं सदी एशिया के साथ-साथ भारत की सदी बन सके।

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