कुमार कृष्णन
शक्ति की आराधना केवल देवी के किसी रूप के सामने सिर झुकाने का नाम नहीं है। भारतीय लोकजीवन में शक्ति उस चेतना का नाम भी है, जो संकट के समय मनुष्य को भीतर से खड़ा करती है। शारदीय नवरात्र इसी शक्ति की उपासना का पर्व है। नौ रातों तक देवी के नौ रूपों की आराधना के बीच मुंगेर का चंडिका स्थान अपनी अलग आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान के साथ सामने आता है। गंगा के किनारे, श्मशान की निकटता और लोकविश्वास की गहरी जड़ों के बीच स्थित यह स्थल श्रद्धा, साधना और शक्ति की एक ऐसी परंपरा को अपने भीतर समेटे हुए है, जिसकी स्मृति सदियों से लोकमानस में चली आ रही है।
मुंगेर शहर से लगभग चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित चंडिका स्थान को स्थानीय परंपरा में शक्तिपीठ माना जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव जब सती के जले हुए शरीर को लेकर विचरण कर रहे थे, तब सती की बाईं आंख यहां गिरी थी। इसी कारण इस स्थान का संबंध शक्ति की उपासना से जोड़ा जाता है। शक्तिपीठों की संख्या और उनके संबंध में विभिन्न धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं। चंडिका स्थान की पहचान भी इसी लोकपरंपरा और आस्था से निर्मित हुई है।
यहां देवी को चंडिका के रूप में पूजा जाता है। चंडी शक्ति का वह उग्र रूप हैं, जो केवल विनाश का प्रतीक नहीं, बल्कि अधर्म और अराजकता के विरुद्ध प्रतिरोध की ऊर्जा का भी प्रतीक है। शारदीय नवरात्र में इस अर्थ की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।
चंडिका स्थान की विशेषता उसकी भौगोलिक स्थिति भी है। मंदिर के पूर्व और पश्चिम में श्मशान और समीप बहती गंगा ने इस स्थल को एक विशिष्ट आध्यात्मिक वातावरण दिया है। जीवन और मृत्यु, सृजन और विनाश, आस्था और वैराग्य—इन विरोधी प्रतीत होने वाले तत्वों का एक साथ उपस्थित होना इस स्थान को साधना की दृष्टि से अलग पहचान देता है। यही कारण है कि लोकमान्यता में चंडिका स्थान को तंत्र-साधना का भी महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है और नवरात्र में विभिन्न स्थानों से साधक यहां आते हैं।
मंदिर में पूजा की परंपरा भी विशिष्ट है। नवरात्र के दौरान प्रातःकाल से ही पूजा-अर्चना आरंभ हो जाती है और संध्या में श्रृंगार पूजन होता है। अष्टमी के दिन विशेष पूजा होती है। उस दिन देवी का विशेष श्रृंगार किया जाता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मुंगेर के साथ-साथ खगड़िया और बेगूसराय सहित आसपास के क्षेत्रों से भी श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है।
चंडिका स्थान से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध लोककथाओं में महाभारत के कर्ण और उज्जैन के राजा विक्रमादित्य की कथा है। लोकविश्वास के अनुसार कर्ण देवी चंडिका के परम भक्त थे। वे प्रतिदिन गंगा स्नान के बाद देवी की आराधना करते और खौलते हुए तेल की कड़ाही में कूदकर अपने प्राण अर्पित कर देते। देवी उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें जीवनदान देतीं और सोना प्रदान करतीं। कर्ण उस सोने को मुंगेर के कर्ण चौरा में ले जाकर लोगों के बीच बांट देते थे।
लोककथा आगे बताती है कि इस रहस्य की जानकारी उज्जैन के राजा विक्रमादित्य को हुई। वे स्वयं चंडिका स्थान पहुंचे और इस अद्भुत दृश्य को देखा। एक दिन उन्होंने कर्ण से पहले मंदिर पहुंचकर देवी की परीक्षा लेने का प्रयास किया। वे भी खौलते हुए तेल की कड़ाही में कूदे। देवी ने उन्हें जीवनदान दिया। ऐसा तीन बार हुआ। चौथी बार जब विक्रमादित्य कड़ाही में कूदने लगे तो देवी ने उन्हें रोक दिया और वरदान मांगने को कहा। उन्होंने सोना देने वाला थैला और अमृत कलश मांगा। लोकविश्वास है कि उनकी इच्छा पूरी करने के बाद देवी ने कड़ाही को उलट दिया और उसमें अंतर्ध्यान हो गईं। मंदिर में आज भी उस कड़ाही से जुड़ी परंपरा का स्मरण किया जाता है।
इस कथा का धार्मिक अर्थ जितना महत्वपूर्ण है, उससे कम महत्वपूर्ण इसका लोकनैतिक अर्थ नहीं है। कर्ण की कथा में शक्ति पाने से अधिक महत्वपूर्ण है शक्ति का लोककल्याण में उपयोग। यदि प्राप्त संपदा केवल स्वयं के लिए हो तो वह शक्ति नहीं, संग्रह है। कर्ण के प्रसंग में लोकस्मृति उस संपदा को बांटने और दूसरों के जीवन में उपयोग करने की बात करती है। शायद इसी कारण कर्ण की कथा चंडिका की आराधना से जुड़कर शक्ति को दान और लोककल्याण के अर्थ से जोड़ देती है।
चंडी के स्वरूप को लेकर परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती की व्याख्या इस लोकविश्वास को एक व्यापक आध्यात्मिक अर्थ देती है। उनके अनुसार चंडी देवी का आक्रामक पहलू हैं। जब मानवीय और दैवीय प्रयास अपनी सीमा तक पहुंच जाते हैं, तब चंडी की शक्ति प्रकट होती है। दुर्गासप्तशती की कथा में देवताओं और असुरों के संघर्ष की पृष्ठभूमि में यही भाव सामने आता है। देवताओं की शक्तियां जब अकेले असुरों का सामना करने में असमर्थ होती हैं, तब विभिन्न देवशक्तियों के तेज से एक नई शक्ति का प्राकट्य होता है।
चंडी इसलिए केवल किसी बाहरी शत्रु के विनाश की कथा नहीं हैं। वे मनुष्य के भीतर की उस शक्ति का भी प्रतीक हैं, जो निराशा और असहायता के क्षण में जागती है। नवरात्र की साधना का अर्थ इसी आंतरिक जागरण से भी है। नौ रातें केवल उपवास, पूजा और अनुष्ठान की रातें नहीं हैं। वे अपने भीतर झांकने, अपनी कमजोरियों को पहचानने और जीवन में संतुलन स्थापित करने का अवसर भी हैं।
चंडिका स्थान की आस्था में आंख गिरने की कथा भी प्रतीकात्मक अर्थ रखती है। आंख केवल देखने का माध्यम नहीं है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में दृष्टि ज्ञान और विवेक से भी जुड़ी है। यदि लोकविश्वास में सती की बाईं आंख यहां गिरी, तो उसे केवल एक पौराणिक घटना के रूप में देखने के बजाय शक्ति की दृष्टि के प्रतीक के रूप में भी समझा जा सकता है—ऐसी दृष्टि जो संसार को केवल बाहरी रूप में नहीं, उसके भीतर छिपे सत्य के साथ देखती है।
चंडिका स्थान से जुड़े श्रद्धालुओं के बीच यह विश्वास भी प्रचलित है कि यहां देवी के दर्शन और पूजा से आंखों से संबंधित समस्याओं में लाभ होता है। मंदिर में विशेष काजल की परंपरा भी बताई जाती है। ऐसे विश्वास धार्मिक आस्था और लोकचिकित्सा की परंपराओं का हिस्सा हैं। इन्हें आधुनिक चिकित्सा के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि लोकविश्वास के रूप में समझना अधिक उचित है।
इस शक्तिपीठ की एक और विशिष्टता यह है कि यहां तंत्र-साधना की परंपरा को कामाख्या से जोड़कर देखा जाता है। गंगा और श्मशान की निकटता ने इस स्थान की तांत्रिक कल्पना को और गहरा किया है। श्मशान भारतीय साधना परंपरा में केवल मृत्यु का स्थान नहीं, बल्कि जीवन की क्षणभंगुरता का स्मरण कराने वाला स्थल भी है। चंडिका की उपासना और श्मशान की निकटता मिलकर मनुष्य को उस सत्य के सामने खड़ा करती है, जिससे वह सामान्य जीवन में बचता रहता है—जीवन नश्वर है और शक्ति का अर्थ केवल विजय नहीं, बल्कि विवेक भी है।
चंडिका स्थान का इतिहास केवल लोककथाओं और धार्मिक परंपराओं तक सीमित नहीं है। पिछले दशकों में इसके विकास के प्रयास भी हुए हैं। मंदिर के विकास में रायबहादुर केदारनाथ गोयनका और बाद में श्याम सुंदर भंगड़ के योगदान का उल्लेख स्थानीय स्तर पर किया जाता है। सामाजिक दायित्व के तहत आईटीसी की ओर से भी मंदिर परिसर के विकास में सहयोग किया गया है।
अब पर्यटन विभाग की ओर से चंडिका स्थान के सौंदर्यीकरण और विकास की योजना पर काम किया जा रहा है। लगभग 4.18 करोड़ रुपये की लागत से धर्मशाला, बहुउद्देशीय सभागार, मुख्य प्रवेश द्वार से गर्भगृह तक पाथवे, चाहरदीवारी, सीसीटीवी, बैठने की व्यवस्था, हाईमास्ट लाइट, प्राथमिक उपचार कक्ष तथा जलनिकासी और वर्षाजल संचयन जैसी सुविधाएं विकसित किए जाने की योजना है। ऐसे विकास कार्यों की सफलता का वास्तविक पैमाना केवल भवन और प्रवेश द्वार नहीं होंगे। असली कसौटी यह होगी कि श्रद्धालुओं की सुविधा बढ़े, मंदिर की आध्यात्मिक गरिमा बनी रहे और आसपास का पर्यावरण भी सुरक्षित रहे।
शारदीय नवरात्र में जब चंडिका स्थान में भक्तों की भीड़ बढ़ती है, तब यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि धार्मिक पर्यटन और आस्था के विस्तार के साथ स्थानीय पर्यावरण, गंगा और मंदिर की सांस्कृतिक पहचान को कैसे बचाया जाए। किसी तीर्थ का विकास केवल उसके पत्थर और सीमेंट का विकास नहीं होता। उसकी आत्मा उसके लोकविश्वास, परंपरा, प्रकृति और लोगों के साथ उसके संबंध में होती है।
चंडिका स्थान इसी अर्थ में केवल एक मंदिर नहीं है। यह मुंगेर की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है। यहां कर्ण की लोककथा है, विक्रमादित्य की आस्था है, गंगा है, श्मशान है, तंत्र-साधना की परंपरा है और नवरात्र में उमड़ता लोकविश्वास है। सबसे ऊपर चंडी की वह कल्पना है, जो मनुष्य को याद दिलाती है कि शक्ति का उद्देश्य केवल शक्तिशाली बनना नहीं, बल्कि शक्ति का उपयोग सत्य, न्याय और लोककल्याण के लिए करना है।
शारदीय नवरात्र की नौ रातों में देवी के अलग-अलग रूपों की आराधना करते हुए शायद चंडिका स्थान हमें यही सबसे बड़ा संदेश देता है—शक्ति बाहर किसी मंदिर में जितनी है, उतनी ही मनुष्य के भीतर भी है। सवाल यह है कि हम उस शक्ति का उपयोग किसके लिए करते हैं।
अगर शक्ति केवल अपने लिए है तो वह अहंकार बन सकती है। लेकिन वही शक्ति जब कमजोर के साथ खड़ी होती है, अन्याय के सामने आवाज बनती है और समाज में संतुलन स्थापित करती है, तब वह चंडी की वास्तविक चेतना बन जाती है।
यही चंडिका स्थान की लोकस्मृति का सबसे आधुनिक और सबसे मानवीय अर्थ है।
कुमार कृष्णन