लेखक परिचय

संजीत त्रिपाठी

संजीत त्रिपाठी

उदीयमान छत्तीसगढ़िया युवा पत्रकार जो ब्लागरी और वेब पत्रकारिता को भी हथियार के बतौर इस्तेमाल करते हैं. रायपुर के एक स्थानीय दैनिक में काम के साथ ही ब्लाग लेखन और वेब पत्रकारिता में दखल.

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स्वामी अग्निवेश और रमेश नैयर जी, जवाब किनसे मिलेगा

-संजीत त्रिपाठी

स्वामी अग्निवेश, आज कौन नहीं जानता इन्हें देश में। विज्ञापन की भाषा में कहूं तो सिर्फ नाम ही काफी है।

छत्तीसगढ़ के देशबंधु पत्र समूह जिसका सबसे प्रमुख प्रकाशन दैनिक देशबंधु है,के  प्रधान संपादक ललित सुरजन जी ने 16 सितंबर के अंक के संपादकीय पेज में  स्वामी अग्निवेश और छत्तीसगढ़ का मीडिया शीर्षक से लेख लिखा।

लेख में वे लिखते हैं साहित्यिक पत्रिका हंस ने 31 जुलाई को नई दिल्ली में एक विचार गोष्ठी आयोजित की। इसका विषय था- ”वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति।” जाहिर है कि यह गोष्ठी राज्य द्वारा की जा रही हिंसा (स्टेट टैरर) पर चर्चा करने के लिए थी। प्रमुख वक्ता स्वामी अग्निवेश थे। उन्होंने जो वक्तव्य दिया वह हंस के सितम्बर 2010 के अंक में प्रकाशित हुआ है। इस सुदीर्घ वक्तव्य में उन्होंने अपनी छत्तीसगढ़ यात्रा के अनुभव भी दर्ज किए हैं। उल्लेखनीय है कि देश के अनेक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसी वर्ष मई माह में छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के परिप्रेक्ष्य में एक शांति यात्रा का आयोजन किया था। इसमें सुप्रसिध्द गांधीवादी नारायण देसाई, प्रतिष्ठित शिक्षाशास्त्री प्रोफेसर यशपाल, आजादी बचाओ आन्दोलन के प्रमुख नेता प्रोफेसर बनवारीलाल शर्मा इत्यादि के साथ स्वामी अग्निवेश भी थे। मैं यहां हंस में प्रकाशित स्वामी जी के वक्तव्य का एक अंश अक्षरश: उध्दृत कर रहा हूं- ”इस बीच एक बड़ी मजेदार बात हुई। रायपुर की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का नजारा बता दूं। हमें रायपुर और दंतेवाड़ा में लगा कि हम पत्रकारों से बात नहीं कर रहे बल्कि बड़े-बड़े उद्योगपतियों के दलालों से बात कर रहे हैं। खरीदे हुए लोग। मुख्यमंत्री के समझाए हुए लोग, सब के सब बिके हुए लगे। फिर भी हमने किसी तरह प्रेस कॉन्फ्रेंस की। बाद में रमेश नैयर जी ने बताया कि स्वामी जी यहां पत्रकारिता का बहुत बुरा हाल है। लेकिन फिर भी आप लोग आ गए हैं तो आगे बढ़िए?”

इसके कुछ और पैराग्राफ ( जिस संदर्भ में मैं यहां लिख रहा हूं उस संदर्भ में यही दो पैराग्राफ महत्वपूर्ण है इसलिये बाकी नहीं ले रहा) के बाद सुरजन जी अंत में लिखते हैं कि अपने वक्तव्य में स्वामी अग्निवेश ने रमेश नैय्यर का जिक्र किया है। श्री नैय्यर पिछले पैंतालीस-छियालीस साल से पत्रकारिता में हैं। वे रायपुर के अनेक अखबारों में काम कर चुके हैं तथा मेरे पुराने मित्र होने के अलावा एक समय ”देशबन्धु” में सहयोगी भी रह चुके हैं। उनमें किसी को भी अपना बना लेने का भरपूर कौशल है। इसीलिए बुनियादी तौर से संघ परिवार से जुड़े होने के बावजूद पीयूसीएल के मंच पर भी उसी सम्मान के साथ आमंत्रित कर लिए जाते हैं। ऐसा व्यक्ति अपने ही पेशे की बुराई करेगा इस पर भरोसा तो नहीं होता, लेकिन जब सार्वजनिक तौर से स्वामी जी ने उनके हवाले से यह बात कही है तो मेरी ही नहीं, छत्तीसगढ़ के हर पत्रकार की नैय्यर जी से अपेक्षा होगी कि वे इस संबंध में अपनी स्थिति स्पष्ट करें।”

(इसी मुद्दे पर रायपुर प्रेस क्लब प्रेसीडेंट अनिल पुसदकर जी ने भी कुछ लिखा है, यहां देखें)

अब बात दोनों की होती है। एक तो यह कि स्वामी अग्निवेश जिनका नाम आज देश में हर वह आदमी जानता है जो देश को जानता है और वह भी जो रोजाना अखबार पढ़ता है।  देश को जानने वाला इसलिए जानेगा कि स्वामी अग्निवेश ने इतने सालों में अपने कार्यों से जो विश्वसनीयता अर्जित की है वह आज उनका नाम है। रोजाना अखबार पढ़ने वाला उनका नाम इसलिए जानेगा कि आज हर दूसरी खबर में वह इसलिए छाए हुए हैं क्योंकि वे नक्सलियों के साथ मध्यस्थता करने का प्रस्ताव लेकर डटे” हुए हैं।  भले ही इसी एक मुद्दे के चलते वे इतने बरसों की कमाई हुई अपनी वह विश्वसनीयता खो रहे हैं जिस विश्वसनीयता की बदौलत आज उन्हें देश जानता है।

बाबा और स्वामियों के इस देश में वर्तमान में एक स्वामी अग्निवेश जी हैं जो अपनी थोड़ी बहुत विश्वसनीयता बचाए हुए  चल रहे हैं, नहीं तो अभी जुम्मा-जुम्मा चार दिन नहीं हुए कि टीवी चैनल पर साधु-संतों का स्टिंग ऑपरेशन इस देश की जनता ने देखा। गनीमत है कि स्वामी अग्निवेश इस तरह के साधु-संतों में शुमार न तो होते हैं न किए जाते हैं।

इंटरनेट पर स्वामी अग्निवेश के नाम से हिंदी और अंग्रेजी दोनो ही भाषा में जानकारी एकत्र करने की कोशिश करने पर बकायदा उनके नाम की वेबसाइट मिली।  यहां और आश्चर्य हुआ कि किसी प्रोफेशनल की तरह  उनका सीवी/CV जिसे रिज्यूमे भी कहते हैं , मौजूद है। वह सीवी जिसे प्रोफेशनल्स नौकरी या प्रोजेक्ट पाने के लिए अप्लाई करने के लिए कहीं भेजते या उपयोग करते हैं।

लेकिन एक मुख्य बात यह है कि वह सज्जन जो खुद अपनी विश्वसनीयता खो रहे हैं ( ऐसा उनके साथ पिछले दिनों छत्तीसगढ़ आए उनके साथियों ने ही उन्हें लिखे अपने पत्र में कहा है कि वे स्व्यंभू मुखिया बन रहे हैं)

वे सज्जन, किसी एक राज्य  छत्तीसगढ़ की मीडिया को, किसी एक पत्रकार नहीं, किसी एक चैनल नहीं,  किसी एक अखबार को नहीं बल्कि समूचे पत्रकारिता जगत को ही बिकाऊ कह रहे हों और बकौल उनके जब वे ऐसा कह रहे हैं तो उसी समय देश भर में छत्तीसगढ़ की वर्तमान पत्रकारिता का प्रतिनिधित्व करने वाली शख्सियतों में से एक श्री रमेश नैयर जी कह रहे हैं कि स्वामी जी यहां पत्रकारिता का बहुत बुरा हाल है। लेकिन फिर भी आप लोग आ गए हैं तो आगे बढ़िए?”

आश्चर्य होता है कि जिन रमेश नैयर जी से छत्तीसगढ़ की एक पूरी पीढ़ी ने पत्रकारिता का ककहरा सीखा हो, वे ऐसा कहेंगे……?

ललित सुरजन जी ने अपने लेख में सिर्फ रमेश नैयर जी से अपेक्षा की है कि वे अपनी स्थिति स्पष्ट करें लेकिन बतौर एक पाठक और एक छत्तीसढ़िया के साथ भारतीय होने के कारण रमेश नैयर जी के साथ-साथ स्वामी अग्निवेश जी से भी अपेक्षा करूंगा कि वे अपनी स्थिति स्पष्ट करें। बावजूद इसके कि मैं इन दोनों के सामने ही अकिंचन हूं लेकिन एक नागरिक हूं, एक पाठक हूं। जवाब की अपेक्षा दोनों से ही कर सकता हूं।

पता नहीं आप इन दोनों में से किनसे जवाब की अपेक्षा करेंगे, करेंगे भी या नहीं…? बताएं……

6 Responses to “छत्तीसगढ़ का मीडिया बिकाऊ?”

  1. shishir chandra

    संजीत जी आपके तर्क काफी दमदार हैं. स्वामी अग्निवेश को कोई भी बात सोच समझ के करना चाहिए. लगता है उन्होंने सस्ती लोकप्रियता या फिर अतिरंजित सोच के कारन यह आरोप छत्तीसगढ़ की मीडिया पर जड़ दिया. उनके आरोपों में सचाई हो सकती है लेकिन पूर्ण रूप से नहीं. छत्तीसगढ़ के पत्रकार राष्ट्रीय पत्रकारों से अधिक ईमानदार हैं और नाक्साली समस्या को अधिक कवरेज देते हैं. स्वामी अग्निवेश ऐसे आरोप लगा कर अपनी विश्वसनीयता पर ही सवालिया निशान लगा रहे हैं. किसी भी बात के गहरे में जाये बगैर ऐसे आरोप लगा देना सिर्फ सनसनी फैलाना है. छत्तीसगढ़ के लोग भालिभंतीं समझते हैं.

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  2. bhoopen

    ये सच बात है पत्रकार वाकई बिकाऊ होते है ये किसी भी आम जनता से पुच सकते है पैसा मिल गया तो खबर नहीं छापेंगे मिल गया तो कौन सी खबर
    खबर कितना और कब छापना है सब के लिए कुछ मिलता है तभी तो लोग सिर्फ पत्रकार कहलाकर इतने शान से रहते कोल्लेक्टोर एस. पी . हाथ मिलते और आम लोगो को मिलने के लिए पर्ची भेजना पड़ता है खबर छपने के नाम पर अपना उल्लू सीधा करते है . भ्रस्ताचार में उनका भी बराबर हिस्सा है .पत्रकार कमी खोजते है पैसा कमाते है और कूचा भी नहीं सच्चे पत्रकार तो लगभग १०% होंगे वो भी कहा पता नहीं
    मेरे इल्जामो का जवाब जरुर दीजियेगा

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  3. डॉ. महेश सिन्‍हा

    डॉ महेश सिन्हा

    लगता है इन स्वामी जी से निरंतर मिलने के कारण ही चिदम्बरम को भगवा आतंकवाद(नक्सली समर्थक) का ध्यान आया होगा

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  4. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    सुमित कर्ण की इतनी अच्छी यथार्थ और पूरी तरह से सच्चाई पर आधारित टिप्पणी के उपरान्त किसी को कुछ कहना सुनना बाकि नहीं रहा .आलेख में जो विषय वस्तु अन्तर्निहित है उसको परिभाषित करने का बढ़िया काम सुमित ने किया बधाई .

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  5. सुमित कर्ण

    सुमित कर्ण

    स्‍वामी अग्निवेश का दिमाग खराब हो गया है। भगवा चोला धारण करने वाले ये तथाकथित बुद्धिजीवी भारतीय समाज में वैमनस्‍यता फैला रहे हैं। विदेशी ताकतों के हाथों ये बिके हुए हैं। माओवाद मानवता के नाम पर कलंक है। छत्तीसगढ़ के पत्रकारों की प्रशंसा होनी चाहिए कि वे माओवाद के दलालों को सबक सिखा रहे हैं। इस लेख के लिए संजीत जी को हार्दिक धन्‍यवाद।

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