चीन से सबक ले भारत

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संदर्भः चीन में जनसंख्या नियंत्रण नीति में बदलाव

प्रमोद भार्गव
चीन ने तीन दशक से चली आ रही एक बच्चे की विवादास्पद कठोर सरकारी नीति को बदलने का फैसला लिया है। चीन में अब सभी दंपतियों को दो बच्चे पैदा करने की छूट होगी। चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ने जनसंख्या वृद्धि दर में आई तेज गिरावट और बिगड़ते लिंगानुपात के चलते यह फैसला लिया है। चीन में बच्चों की 15 साल के भीतर इतनी कमी हो गई थी कि आधे से ज्यादा प्राथमिक पाठशालाएं बच्चों की कमी के चलते बंद करनी पड़ी थी। साथ ही चीन में एक बड़ी आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही थी। इन कारणों के चलते चीन में परिवार नियोजन के जिन उपायों का कड़ाई से पालन किया जा रहा था,उन्हें अब उदार बनाया जा रहा है। भारत भी जनसंख्या नियंत्रण के एकांगी उपायों के चलते जहां बूढ़े भारत की और बढ़ रहा है,वहीं धर्म के आधार पर जनसंख्या के घनत्व में भी असंतुलन बढ़ रहा है। अतः देश को एक ऐसी समग्र जनसंख्या नीति की जरूरत है,जिससे जनसंख्या नियंत्रण में देशव्यापी एकरूपता की झलक दिखाई दे।
कुछ समय पहले संयुक्त राष्ट्र की जनसंख्या संबंधी अनुमानित रिर्पाट आई थी। इसके अनुसार भारत की आबादी 2050 तक 1 अरब 71 करोड़ होने जा रही हैं। बढ़ती आबादी पर नियंत्रण हेतु परिवार नियोजन के कड़े उपाय अमल में लाने की सलाहें भी दी थीं। लेकिन इस परिप्रेक्ष्य में जो अहम् सवाल है उसे कमोबेश नजरअंदाज किया गया है। बढ़ती आबादी में बूढ़ों की आबादी को जिस तरह से तव्वजो दी जा रही है, उसके तहत ऊर्जावान व क्र्रियाशील युवा आबादी के रोजगार व जैविक हितों की अनदेखी की जा रही है। क्योंकि बूढ़ों और युवाओं के बीच उम्र व रोजगार का अनुपात जिस तरह से गड़बड़ा रहा है, उसके गंभीर परिणाम वैसे ही निकलने वाले हैं, जैसे स्त्री-पुरुष की जन्म दर बिगड़ने से सामने आए हैं। हालांकि फिलहाल हम ऐसे दौर में हैं, जहां क्रियाशील युवाpopulationओं की संख्या बूढ़ों की तुलना में कहीं ज्यादा है। इसे 65 प्रतिशत बताया जा रहा हैं। परंतु जनसंख्या रिपोर्ट में इस स्थिति के पलट जाने के संकेत भी हैं। बदली स्थिति में युवाओं से कहीं ज्यादा लाचार बुजुर्ग होंगे। आयु समूह का यह असंतुलन मानवीय विकास और राष्ट्र की प्रगति, संपन्नता व सुरक्षा में एक बड़ा रोड़ा बनकर तो उभरेगा ही, स्वास्थ्य लाभ के बुनियादी ढांचे को भी चरमरा देगा। चीन एक बच्चे की सख्त नीति के चलते असंतुलन की इसी स्थिति से गुजर रहा है। चीन के नेता माओ जेदोंग के शासन काल के दौरान 1979 में एक दंपति,एक बच्चा राष्ट्रीय नीति के रूप में लागू की गई थी। इसका लक्ष्य जनसंख्या को नियंत्रित करना था। नीति का उल्लंघन करने वाले दंपतियों को सजाएं दी जाती थीं,जिनमें अर्थदंड से लेकर नौकरी छीनने और जबरन गर्भपात कराने के नियम शामिल थे। अब इस कठोर नीति के दुष्परिणाम चीन झेल रहा है।
जनसांख्यिकी संरचना संबंधी अनुमान के आधार पर तैयार संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट का मकसद है कि इन आंकड़ों के बूते दुनिया के भविष्य का बुनियादी विकास से जुड़ा खाका तैयार किया जाए। इस रिपोर्ट में यह एक अच्छी जानकारी आई है कि चीन अफ्रीका और अन्य विकसित देशों की तुलना में भारत कहीं अधिक युवा आबादी वाला देश है। 25 साल के औसत आयु समूह की यह एक ऐसी सक्रिय जनसंख्या है,जिसकी ऊर्जा का इस्तेमाल देश के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में किया जा सकता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि देश की 15 से 60 वर्ष आयु समूह की आबादी में से जो 58 फीसदी आबादी काम करने लायक है,उसमें से 10 प्रतिशत आबादी के पास कोई संतोषजनक रोजगार या पर्याप्त काम नहीं है। जबकि 2060 के आसपास का यही वह समय होगा,जब जनसंख्या जन्म दर में गिरावट की वजह से भारत में लाचार और बीमार बुजुर्गों की संख्या भयावह आंकड़े को छू लेगी। 2050 में जन्म दर 2.1 पर अटक जाने का अनुमान है। यदि कार्यशील आबादी घटेगी तो इसका सीधा असर सकल घरेलू उत्पाद ;जीडीपी पर पड़ेगा। बूढ़ी आबादी के कारण एक ओर तो प्रति व्यक्ति जीडीपी की विकास गति कम होगी, वहीं इन पर पेंशन व स्वास्थ्य संबंधी प्रति व्यक्ति खर्च बढ़ जाएंगे। कालांतर में निर्मित होने जा रहे ये हालात देश के विकास की लय को लड़खड़ा सकते हैं।
भारत को इस दुष्चक्र में फंसने से पहले उन देशों से सबक लेना चाहिए जो पहले ही बूढ़ी आबादी की गिरफ्त में आकर आर्थिक विकास का संकट झेलने को मजबूर हुए हैं। स्वीडन, कनाडा और आस्ट्रेलिया में जन्म दर बेतरह घट जाने के कारण सामाजिक,आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी हालात चिंताजनक हो गए हैं। एशियाई देशों में इसी संकट से चीन एवं जापान घिर गए हैं। इन देशों ने अपनी अवाम को बेहतर जीवन स्तर, स्वास्थ्य सुविधाएं और आर्थिक व सामाजिक सुरक्षाएं दीं। नतीजतन एक ओर तो मृत्युदर में आशातीत कमी आई, वहीं दूसरी ओर जनसंख्या नियंत्रण के उपायों के चलते जन्म दर भी अप्रत्याशित ढंग से गिर गई। जबकि नीति-नियंताओं को यहां ऐसे उपाय भी बरतने थे, जिससे आबादी का संतुलन बना रहता। क्योंकि किसी भी देश और समाज के संतुलित ढंग से आगे बढ़ने के लिए जरुरी है कि समाज में बच्चों, किशोरों, युवाओं, प्रौढ़ और बूढ़ों की संख्या का एक स्वस्थ व प्राकृतिक अनुपात गतिशील बना रहे। किसी भी एक आयु वर्ग का औसत की सीमा लांघना, मानव विकास का भविष्य अवरुद्ध करने वाला साबित होता है,जिसके दुष्परिणामों से आज चीन और जापान सामना कर रहे हैं।
हमें बूढों के बीच खड़ी युवा आबादी के रोजगार, जैविक जरुरतों और सामाजिक सरोकारों की चिंता करने की इसलिए भी जरुरत है क्योंकि यदि हम इनकी मनोकामनाओं को तुष्ट करने में सफल नहीं होते हैं तो युवा आबादी का एक हिस्सा अराजक और आपराधिक कृत्यों की ओर बढ़ेगा। चोरी, लूट और डकैती के मामले तो बढ़ेंगे ही,जैविक जरुरतों का शमन नहीं होने के कारण व्यभिचार और यौनाचार भी बढेंगे। इसलिए केंद्र व राज्य सरकारों को सत्ता में दीर्घकालिक बने रहने की लालसा से निर्लिप्त रहकर ऐसे कड़े उपाय और नीतियां अमल में लाने की जरुरत है,जो युवाओं को रोजगार के साधन उपलब्ध कराएं। इस बात से यह आशय कतई नहीं लगाना चाहिए कि हम अपने ही अभिभावक बुजुर्गों को नकार रहे हैं। न ही बुजुर्गों को यह भ्रम अथवा कुशंका पालने की जरुरत है कि बुजुर्गों की उपेक्षा की जा रही है।
ऐसा होता है तो युवाओं के सही उम्र में रोजगार, जैविक व सामाजिक सुरक्षा के हित संरक्षित होंगे और बुजुर्गों को बेवजह पेंशन व स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं बढाकर अन्य आयु समूह के लोगों को उनके वास्तविक अधिकारों से वंचित नहीं होना पड़ेगा। हम देश के बुजुर्गों के संचित अनुभव और ज्ञान का उपयोग, यदि वाकई उनमें है तो युवाओं की दक्षता कौशल बढ़ाने में ले सकते हैं। क्योंकि ज्ञान जितना बंटेगा, उतना ही विभाजित होकर फैलेगा। फलस्वरुप देश की समग्र आबादी के लिए कल्याणकारी साबित होगा।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट को वक्त का तकाजा मानते हुए केंद्र व राज्य सरकारों को जरुरत है कि वे सरकारी कर्मचारी व अधिकारियों की नौकरी की उम्र बढाने और वेतन-भत्तों में बेतहाशा वृद्धि करना बंद करें। क्योंकि ये वृद्धियां आमजन को बुनियादी सुविधाओं से वंचित करने वाली साबित हो रही हैं। छठा वेतनमान लागू होने के बाद अनेक कर्मचारी-अधिकारियों ने चार-चार मकान और कृषि भूमियां खरीद लिए हैं। इस कारण अचल संपत्ति के मूल्य आसमान छू रहे हैं। जिन्हें वाकई खेती के लिए जमीन और रहने के लिए घर की जरुरत है,उस वर्ग का एक समुदाय जहां घर और भूमि से विस्थापित हो रहा है,वहीं दूसरा समुदाय इन बुनियादी जरूरतों को खरीदने के लिए सक्षम ही नहीं रह गया है। इसलिए जरुरी है कि न केवल सरकारी कर्मचारियों को सांतवां वेतन मान देने की जो तैयारी चल रही हैं,उसे तो प्रतिबंधित किया ही जाए,साथ ही इनकी नौकरी की उम्र और वेतन-भत्ते भी कम किए जाएं। इसी तर्ज पर सांसद और विधायकों के वेतनमान घटाने चाहिए। युवाओं को रोजगार से जोड़ने का तात्पर्य बढ़ते बुजुर्गों के बोझ को रचनात्मक योगदान में बदलना होगा और जो धन संपदा कुछ चंद लोगों के पास इकट्ठी होती जा रही है,उसे बांटने के उपाय करने होंगे। चीन की जनसंख्या नीति में परिवर्तन और संयुक्त राष्ट्र के परिप्रेक्ष्य में भारत को भी समग्र जनसंख्या नीति को अमल में लाते हुए जनसंख्या नियंत्रण के उपायों में एकरूपता लाने की जरूरत है।
प्रमोद भार्गव

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