लेखक परिचय

शिव शरण त्रिपाठी

शिव शरण त्रिपाठी

वरिष्ठ पत्रकार सम्प्रति सम्पदक-दि मॉरल मो - 9450329077

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शिव शरण त्रिपाठी
पांच राज्यों के चुनाव परिणाम केवल इस बात के गवाह नहीं है कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में भाजपा को प्रचण्ड अप्रत्याशित जीत हासिल हो गई। केवल इस बात के ही गवाह नहीं है कि पंजाब में अकाली दल, भाजपा का गठजोड़ जमीन सूघ्ंा गया और कांग्रेस की शान से सत्ता में वापसी हो गई। इस बात के गवाह नहीं है कि गोवा, मणिपुर में किसी एक दल को बहुमत नहीं मिल सका।
उपरोक्त चुनाव परिणामों का गहन छोडि़ए फ ौरी विश£ेषण से जो कुछ सामने आता है उससे स्पष्ट है कि ५ राज्यों के चुनाव में कुछ कारक/कारण एक समान रूप से प्रभावी रहे है। इनमें भ्रष्टाचार, कुशासन व खराब कानून व्यवस्था मुख्य हंै।
उत्तर प्रदेश की बात करें तो नि:संदेह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नेतृत्व में पांच वर्षो में उत्तर प्रदेश में विकास के कई उल्लेखनीय कार्य तो हुये ही है समाज के विभिन्न वर्गो के लिये अनेक कल्याणकारी योजनायें भी लागू हुई हैं पर उनकी सरकार भ्रष्टाचारों के आरोपों से मुक्त न हो सकी। इस सम्बन्ध में उनकी कार्यवाहियां भी सिर्फ दिखावटी ही साबित हुई है। अनेक मत्रियों के साथ अनेक नौकरशाहों ने जमकर माल बटोरा। बार-बार अगुंलिया उठने के बावजूद उन पर अंाच तक नहीं आई। सिर्फ एक मंत्री गायत्री प्रजापति का उदाहरण सब कुछ कहने के लिये काफ ी है।
कानून व्यवस्था के नाम पर अखिलेश सरकार ने भले ही महिलाओं के लिये १०९० सेवा तथा जन सामान्य के लिये १०० नम्बर की विशेष सेवा जैसे कई बेहतर उपाय किये पर उनसे अपराधों पर अंकुश न लग सका। दंगें फ सादों पर भी सरकार प्रभावी नियंत्रण न कर पाने के लिये दोषी मानी जाती रही है।
इन चुनावों से साफ हो गया है कि अमूमन लोग जाति-पांत व धर्म-सम्प्रदाय के बंधन से मुक्त होना चाहते है। यदि ऐसा न होता तो जाति-पांत, धर्म-सम्प्रदाय के आधार पर खड़े किये गये प्रत्याशियों की लुटिया न डूबती। सूबे में सपा, बसपा के उभार के बाद जाति-पांत व धर्म-सम्प्रदाय की राजनीति इस कदर परवान चढ़ी कि इन पार्टियों के पैर लगातार मजबूत होते चले गये। सपा जहां हर चुनाव में यादव व मुस्लिम विरादरी को खास तव्वजो देने लगी वहीं बसपा ने पहले दलित समाज को फि र दलित व मुस्लिम गठजोड़ को आगे बढ़ाया। इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा सवर्ण जातियों के सहारे रह गई तो कांग्रेस का दिवाला ही पिट गया।
२०१४ के लोक सभा चुनाव ने उत्तर प्रदेश में जाति-पात, धर्म-सम्प्रदाय की दीवारे पूरी तरह ढहा दी। नतीजतन भाजपा को सभी जातियों, वर्गो के जमकर वोट मिले और उसने ७३ सीटे सीटकर इतिहास रच दिया।
बड़े-बड़े विश्लेषकों की राय थी कि इस बार भी विधान सभा चुनाव पर जाति-पांत व धर्म-सम्प्रदाय का समीकरण जरूर रंग दिखायेगा पर ऐसा नहीं हुआ। सभी जाति धर्म के लोगो ने सारे कयासों को धता बताते हुये भाजपा के पक्ष में वोट डाले। इसके परिणाम स्वरूप उसे ४०३ में से ३०१२ सीटों पर ऐतिहासिक जीत हासिल हुई। सहयोगी दलों को मिलाकर उसने ३२५ सीटों पर कब्जा कर लिया।
इस चुनाव से यह भी साफ हो गया कि अब क्षेत्रीय दलों का भविष्य खतरे में है। उत्तर प्रदेश में चाहे ताकतवर सपा व बसपा रही हो, चाहे कल तक राष्ट्रीय लोकदल सभी के पांव बुरी तरह लखड़ाते नजर आने लगे है। रालोद का सूपड़ा ही साफ हो गया। उसे सिर्फ एक ही सीट ही मिल सकी। बसपा का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खत्म होना तय है तो सपा का भविष्य भी बेहद धुंधला है। उम्मीद की जा रही है क्षेत्रीय पार्टियों के कमजोर होने से पटरा हो चुकी कांग्रेस को लाभ मिल सकता है।
ऐसा ही हाल आप व अन्य क्षेत्रीय दलों का भी देखने को मिला है। पंजाब की सत्ता हथियाने का सपना देख रही आप पंजाब में नम्बर दो की पार्टी भले ही बन गई पर गोवा में वह खाता भी न खोल सकी। क्षेत्रीय पार्टियों का ऐसा ही हाल गोवा व मणिपुर में भी देखने को मिला।

ध्वस्त हो गई योजना, धरे रह गये सपने

सपा बनाने, गढऩे व उसे बुलन्दियों पर पहुंचाने वाले अपने पिता मुलायम सिंह यादव की गद्दी चुनावी बेला पर छीनकर यानी राष्ट्रीय अध्यक्ष पद हथियाकर चुनाव में ३०० से भी अधिक सीटे जीतकर उनसे बड़ी लकीर खींचने का सपना पाले अखिलेश यादव के अरमान तो मिट्टी में ही मिल ही गये पार्टी को भी रसातल में डुबो दिया।
अखिलेश यादव पर अपने सुशासन , सरकार के विकासकार्यो का नशा इस कदर चढ़ा कि वे अपने उसी पिता को अतीत मान बैठे जिसने राजनीति में न जाने कितने चतुर सुजानों को जमीन सुंघाने में सफ लता हासिल की थी। यदि ऐसा न होता तो चुनाव में कांग्रेस से हाथ मिलाने वाले अखिलेश यादव अपने उन पिता मुलायम सिंह यादव से एक बार पूंछ तो लेते ही जिन्होने कांग्रेस के धुरविरोध पर ही उत्तर प्रदेश में सपा को मजबूत बनाने में सफ लता पाई थी। सूबे में पांच साल सपा की सफ ल सरकार चलाने वाले अखिलेश यादव शायद भूल गये कि २०१२ में उन्हे सत्ता की कमान बाप के बलबूते व बदौलत ही मिली थी। वो यह सच भी भूल गये कि सत्ता चलाना उतना कठिन नहीं है जितना सत्ता प्राप्त करना। यदि उन्हे सत्ता प्राप्त करने का जरा भी राजनीतिक अनुभव होता तो वह ऐन चुनाव के वक्त कम से कम उत्तर प्रदेश में निर्जीव हो चुकी कांग्रेस से तो गठजोड़ न ही करते। ऐन चुनाव के समय अपने सगे चाचा एवं अपने पिता के कद्दावर साथियों को खुलेआम इस कदर तो बेईज्जत न ही करते कि उन्हे मन ही मन उनकी पराजय की कामना व बगावत करने की जरूरत महसूस होती।
यदि कोई कल यह कह रहा था कि अखिलेश यादव की पांच सालों की कमियों खासकर कानून व्यवस्था की खस्ता हालत पर पर्दा डालने की नीयत से पिता की गद्दी छीनना, चाचा व चचाओं को धता बताना एक सधी योजना का हिस्सा भर था तो अंतत: सपा सरकार डूबने में खस्ता हाल कानून व्यवस्था का कम योगदान नहीं रहा। माना की सबकुछ सुनियोजित था तो भी योजना के परखचे उड़ाने में स्वयं अखिलेश यादव का हाथ कम नहीं रहा था। पूरे सूबे ने देखा कि #भ्रष्टाचार के पर्याय बन चुके गायत्री प्रजापति को लेकर किस कदर अखिलेश यादव ने अपनी ही चालें पलटी। यदि उन्होने मत्रिमंडल से बर्खास्तगी के बाद दुबारा प्रजापति को मंत्रिमण्डल में शामिल न किया होता। टिकट काटने के बाद उन्हे टिकट न दिया होता तो बीच चुनाव में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उनके विरूद्ध बलात्कार की रपट दर्ज होने में व उनकी फ रारी आदि के चलते जनता के बीच जो गलत संदेश गया वो तो नहीं जाता। गायत्री प्रजापति तो चुनाव हार ही गये पर उनका पार्टी पर लगाया गया बदनामी का दाग पार्टी को किस हद तक नुकसान पहुंचा गया इसका आभास अब तो अखिलेश यादव को हो ही गया होगा।
चुनाव में ३०० से अधिक सीटे जीतकर राष्ट्रीय अध्यक्ष पद दुबारा पिता को सौपने का पुत्र का सपना कदाचित साकार भी हो सकता था यदि पिता ने किन्ही कारणोंवंश सब कुछ पुत्र के भरोसे ही न छोड़ दिया होता।
मुलायम सिंह यादव का चुनावी प्रचार से दूर रहना जहां समर्पित सपाईयों में यह संदेश देने ने का काम कर गया कि अब सपा में उनकी कोई जरूरत नहीं रह गई है वहीं सपा की थाती समझे जाने वाले यादव व मुस्लिम विरादगरी ने भी सपा के प्रति समर्पण के बजाय अपनी पसंद पर वोट डालने को प्राथमिकता दी। सपा के गढ़ इटावा व मैनपुरी में सपा की दुर्गति का इससे बड़ा प्रमाण और हो भी क्या सकता है?
अब जब चुनाव में सपा की वैसी ही दुगति हुई है जैसी की कांग्रेस की तो अखिलेश यादव को यह अहसास हो गया होगा कि यूपी को यह साथ पसंद है का नारा सिर्फ नारा ही रह गया। उन्हे यह भी एहसास हो गया होगा कि पिता के बदले जिस चचेरे चाचा राम गोपाल यादव की सलाहों को सरमाथे लगाया वे सलाहे ही उनकी तबाही का कारण बन गई। और शायद अखिलेश यादव को यह भी एहसास हो गया होगा कि सबकु छ नौकरशाहों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

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