वीरेन्द्र सिंह परिहार
भारत की जी.डी.पी. वर्तमान तिमाही में 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी। इस खबर से जहाँ भारत विरोधियों के पेट में मरोड़ उठ रही है, वहीं कांग्रेस समेत भारत के विरोधी दलों का भी रवैया कुछ अलग नहीं है। यू तो 7.8 प्रतिशत की दर से जी.डी.पी. का बढ़ना सामान्यतया कोई चमत्कार नहीं कहा जा सकता पर जिन परिस्थितियों में यह 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है, उसे निश्चित रूप से चमत्कार कहा जा सकता है। पहले 2020-21 में कोरोना काल और उसके ठीक बाद सतत रूस-यूक्रेन युद्ध और उसके पश्चात अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते जहाँ पूरे विश्व की सप्लाई चेन बुरी तरह से टूट गई। पूरी दुनिया में ऊर्जा और कच्चे तेलों के दाम कुछ ऐसे बढ़े कि पूरी विश्व की आर्थिक व्यवस्था लड़खड़ा गई। यहाँ तक कि क्रूड आयल में आत्मनिर्भर अमेरिका भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ लेकिन देश में मोदी सरकार ने ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी अर्थतंत्र को जिस ढंग से संभाला, वह निश्चित रूप से काबिले तारीफ है। इतना ही नहीं क्रूड आयल के संकट को सरकार ने पूरी तरह झेला और उपभोक्ताओं को उल्टे राहत दी और 10 रूपये लिटर की दर से रेट कम कर दिये।
यह देखा जा सकता है कि भारत की 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही जीडीपी के मुकाबले चीन जो इधर कुछ दशकों से बहुत तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है, उसकी जीडीपी दर मात्र 4.3 प्रतिशत है। अमेरिका जैसे विश्व के सबसे समृद्ध और शक्तिशाली कहे जाने वाले देश की जीडीपी मात्र 0.5 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है तो सदियों तक भारत में राज करने वाले इंग्लैण्ड की जीडीपी मात्र 1 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। द्वितीय विश्व युद्ध में नष्ट-भष्ट जापान जो अभूतपूर्व ढंग से विकसित हुआ, वर्तमान में उसकी जी.डी.पी. दर मात्र 0.7 प्रतिशत है। कभी भारत का अंग रहे पाकिस्तान की जीडीपी मात्र 3.7 प्रतिशत की दर से ही बढ़ रही है पर इसके बावजूद भारत में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ट्रम्प के सुर में सुर मिलाते हुये भारत की अर्थव्यवस्था को डेड बताते रहे हैं। कुछ विपक्षी दल के नेता तो यहाँ तक कहते हैं कि यह आकड़ो का खेल है और भारत की जीडीपी मात्र 2.6 प्रतिशत की दर से ही बढ़ रही है। विपक्षी दल कह रहे हैं कि यदि जी.डी.पी. इस गति से बढ़ रही है तो देश में भयावह मँहगाई और बेरोजगारी कैसे बढ़ रही है ? देश में निवेश क्यों नहीं आ रहा ? जबकि 2022-23 के बेस इयर के चलते यह 10.3 प्रतिशत है जो महँगाई घटा कर 7.8 प्रतिशत होती है जबकि सभी को यह पता है कि 2004 से 2014 के मध्य यू.पी.ए. शासन के दौर में मँहगाई की दर डबल डिजिट में थी जबकि मोदी सरकार के दौर में मँहगाई की मुद्रा स्फीति की दर कभी भी 5.50 प्रतिशत से ऊपर नहीं गई।
जहाँ तक बेरोजगारी का प्रश्न है, तो आर.बी.आई. के एक डेटा के अनुसार 2004 से 2014 के यू.पी.ए. शासन में मात्र 2 करोड़ 92 लाख लोगो को रोजगार प्राप्त हुआ पर आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं, 2014 से 2024 के मध्य 17 करोड़ 18 लाख लोगो को रोजगार प्राप्त हुआ। वर्ष 2014-15 में जहाँ 47 करोड़ 15 लाख लोगो को रोजगार प्राप्त था वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा 64 करोड़ 33 लाख का है, यानी एन.डी.ए. शासन में 36 प्रतिशत की बढ़ोतरी। नौकरी-नौकरी चिल्लाने वाले कांग्रेसियों को पता होना चाहिए कि 31 दिसम्बर 1955 को पण्डित नेहरू ने स्वतः कहा था कि हम 40 करोड़ लोगो को नौकरी नहीं दे सकते पर आज जब देश की जनसंख्या 140 करोड़ है तो मोदी ने कभी यह नहीं कहा कि हम 140 करोड़ लोगो को रोजगार नहीं दे सकते। मोदी सरकार के पूर्व जहाँ बेरोजगारों और रोजगार पाने वालों को आकड़े 5 वर्ष में आते थे, वहीं अब हर महीने जाब निर्मित होने हैं और बेरोजगारी दर के आकड़े आ रहे हैं। 2014 में जहाँ बेरोजगारी दर 6 प्रतिशत थीं, वहीं अब 3.1 प्रतिशत है। सच्चाई यह है कि ऐसे संकट के दौर में भी मोदी सरकार ने पूँजीगत खर्च ज्यादा किया है। सड़क, पुल, रेल, ऊर्जा में इस तिमाही में 21 हजार 708 करोड़ रूपये से ज्यादा खर्च किये हैं। इस तिमाही में 1 लाख 15 हजार से ज्यादा लोगो को सब्सिडी दी गई। सवाल यह कि यदि 7.8 प्रतिशत की दर से जीडीपी नहीं बढ़ी तो बिजली खपत कैसे ज्यादा हो गई ? जी.एस.टी. कलेक्शन कैसे बढ़ गया ?
असलियत यह कि मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में जहाँ इस तिमाही में 9.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई, वहीं कंस्ट्रक्शन में 7.7 प्रतिशत की ग्रोथ देखने को मिली। वाहनों की बिक्री में भी भारी उछाल देखने को मिला। सेवा क्षेत्र में तो 10 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिली। विरोधियों की दृष्टि में देश में भले निवेश न हो रहा हो पर इस क्षेत्र में 11.9 प्रतिशत वृद्धि देखने को मिली जो पिछली तिमाही में मात्र 5.8 प्रतिशत थी। विदेशी मुद्रा भण्डार ने नये रिकार्ड कायम किये हैं, जो 740 अरब डालर के पार पहुँच गया है। इस तरह से इस पहली तिमाही ने यह बता दिया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था बाहरी चुनौतियों के बावजूद मजबूत वृद्धि दर्ज कर सकती है। यह सब तब है जब 2025 में मोदी सरकार ने प्रत्यक्षकारों में राहत और जी.एस.टी. में कटौती कर देशवासियों को राहत दी, जबकि पहले सरकारें राहत के बजाय करों का बोझ ही बढ़ाती थीं।
उपरोक्त उपलब्धियों के चलते ही जापानी रेटिंग एजेंसी ने भारत की फारेन करेंसी लांग टर्म और लोकल करेंसी लांग टर्म इश्युअर रेटिंग को बी.बी.सी. प्लस से बढ़ाकर ‘ए स्टेबल’ कर दिया है, एजेंसी ने इसकी मुख्य वजह अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार बताई है। स्थिति यह कि जिस सेमीकंडक्चर चिप के लिये भारत पूरी तरह विदेशों पर निर्भर था। मोबाइल, कार, टी.बी. और घरेलू उपकरणों में लगने वाली छोटी सी चिप के लिये भारत अरबों डालर का आयात करता था लेकिन चमत्कार यह कि देश ने अब आयात की जगह अब चिप का निर्यात करना शुरू कर दिया है जो देश में तकनीकी आत्मनिर्भरता का बड़ा उदाहरण है जिसके चलते भारत अंतरिक्ष में इमेजिंग सेटलाईट ई.ओ.एस.-0.5 को सफलतापूर्वक लाँच कर पृथ्वी से 36 कि.मी. दूर से देश की जरूरत पूरी करेगा और चीन-पाकिस्तान की प्रत्येक गतिविधि पर नजर रखेगा। तभी तो दुनिया के कई देश भारत से बड़ी-बड़ी डील कर रहे हैं। अभी हाल में भारत आये बेलिज्यम के प्रधानमंत्री ने कहा कि मोदी के नेतृत्व में भारत काफी बदल रहा है। सबसे बड़ी बात यह कि यदि देश में तेजी से और अभूतपूर्व गति से विकास नहीं कर रहा तो लगातार तीन चुनावों में भारतीय मतदाता कैसे मोदी के साथ खड़ा है ? ताजा सर्वे भी यही कहता है कि देश का जनमत मोदी के साथ है पर मोदी सरकार की इन उपलब्धियों को जो एक तरह से राष्ट्र की उपलब्धियां कही जा सकती हैं, उनके बारे में विपक्ष के नकारात्मक रवैये के चलते तुलसी दास की यही लाइन लागू होती है – “मूदहु आंख कतहुं कुछ नाहीं”