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हिंदी : हमारी आवाज, हमारी स्मृति और हमारा आत्मसम्मान

शम्भू शरण सत्यार्थी

भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं होती। वह मनुष्य की स्मृतियों, संवेदनाओं, अनुभवों और सपनों को अपने भीतर सँजोकर रखती है। हम जिस भाषा में पहली बार माँ को पुकारते हैं, जिस भाषा में बचपन की कहानियाँ सुनते हैं, जिस भाषा में दुख में किसी का कंधा खोजते हैं और खुशी में किसी को आवाज देते हैं, वह भाषा हमारे जीवन का हिस्सा भर नहीं रहती, वह हमारी पहचान का हिस्सा बन जाती है। हिंदी भी हमारे लिए ऐसी ही भाषा है। वह करोड़ों लोगों की बोलचाल, संवेदना, साहित्य, पत्रकारिता और सार्वजनिक जीवन की भाषा है। इसलिए हिंदी दिवस केवल एक भाषा के सम्मान का अवसर नहीं  बल्कि यह सोचने का दिन भी है कि हम अपनी भाषा के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं।

14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। इसी ऐतिहासिक अवसर की स्मृति में प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। लेकिन सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी हिंदी के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि उसका बोलने वाला कितने लोग हैं। असली सवाल यह है कि ज्ञान, शिक्षा, रोजगार, प्रशासन, न्याय, विज्ञान और तकनीक की दुनिया में हिंदी को कितना सम्मान और अवसर मिला है।

हमारे समाज में अंग्रेजी का ज्ञान अक्सर योग्यता और प्रतिष्ठा का पर्याय मान लिया जाता है। अंग्रेजी जानना बुरा नहीं है। दूसरी भाषाएँ सीखना हमेशा मनुष्य की क्षमता को बढ़ाता है। समस्या तब पैदा होती है जब भाषा को बुद्धिमत्ता का प्रमाणपत्र बना दिया जाता है। किसी व्यक्ति की प्रतिभा, संवेदना, वैज्ञानिक दृष्टि या रचनात्मकता का मूल्य केवल इस आधार पर तय नहीं किया जा सकता कि वह अंग्रेजी कितनी अच्छी बोलता है। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है, बुद्धिमत्ता का पैमाना नहीं।

दुर्भाग्य यह है कि आज भी अनेक परिवारों में बच्चे से हिंदी बोलने पर कोई विशेष गर्व नहीं किया जाता लेकिन अंग्रेजी के कुछ वाक्य बोल लेने पर उसे आधुनिक और योग्य समझ लिया जाता है। विद्यालयों में भी कई बार भाषा ज्ञान का माध्यम बनने के बजाय सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन जाती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान उन बच्चों को होता है जिनके पास प्रतिभा तो है, लेकिन अंग्रेजी माध्यम की सुविधा नहीं। भाषा उनके सामने अवसर का दरवाजा खोलने के बजाय दीवार बन जाती है।

हिंदी की शक्ति केवल उसके मानक रूप में नहीं, बल्कि उन तमाम लोकभाषाओं और बोलियों में भी है जिनसे उसका संसार समृद्ध हुआ है। भोजपुरी, मगही, अवधी, ब्रज, बुंदेली, हरियाणवी, राजस्थानी और अनेक अन्य भाषिक रूप हिंदी क्षेत्र की सांस्कृतिक जमीन को सींचते हैं। इनके लोकगीतों, कहावतों, कथाओं और जीवन-अनुभवों ने हिंदी को व्यापक संवेदना दी है। इसलिए हिंदी को मजबूत करने का अर्थ इन भाषाओं को कमजोर करना नहीं हो सकता। हिंदी तभी समृद्ध होगी जब वह भारतीय भाषाओं के बीच पुल बनेगी, दीवार नहीं।

हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती ज्ञान की भाषा को लेकर है। यदि विज्ञान की पुस्तकें, चिकित्सा संबंधी जानकारी, कानून की भाषा, तकनीकी शिक्षा, शोध सामग्री और आधुनिक ज्ञान का बड़ा हिस्सा किसी व्यक्ति की पहुँच से केवल भाषा के कारण दूर हो जाए, तो यह केवल भाषाई समस्या नहीं रहती, यह सामाजिक न्याय का प्रश्न बन जाती है। ज्ञान पर किसी एक भाषा का एकाधिकार नहीं होना चाहिए। भारत जैसे बहुभाषी देश में ज्ञान जितनी अधिक भारतीय भाषाओं में पहुँचेगा, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।

हिंदी को रोजगार की भाषा बनाने की बात भी इसी संदर्भ में समझनी होगी। यह जरूरी नहीं कि हर नौकरी में हिंदी ही पर्याप्त हो। जहाँ अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा की वास्तविक आवश्यकता है, वहाँ उसका ज्ञान होना चाहिए। लेकिन जहाँ किसी काम को हिंदी में बेहतर ढंग से किया जा सकता है, वहाँ केवल अंग्रेजी के आकर्षण के कारण हिंदी को पीछे रखना उचित नहीं। भाषा को योग्यता का अनावश्यक अवरोध बनाने के बजाय हमें बहुभाषिक दक्षता को अपनी ताकत बनाना चाहिए।

न्याय और प्रशासन में भाषा का प्रश्न और भी महत्वपूर्ण है। जिस नागरिक को अपने अधिकारों, सरकारी योजनाओं, नियमों और न्यायिक प्रक्रिया की जानकारी ही समझ में न आए, उसके लिए व्यवस्था कितनी भी आधुनिक क्यों न हो, वह दूर ही रहेगी। लोकतंत्र का अर्थ केवल मतदान का अधिकार नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि शासन की भाषा नागरिक की समझ में आए। सरल, स्पष्ट और नागरिक-केंद्रित हिंदी इस दूरी को कम कर सकती है।

आज हिंदी के सामने एक नया संसार भी खुला है—डिजिटल संसार। मोबाइल फोन, इंटरनेट, सामाजिक माध्यम और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने भाषा के उपयोग की सीमाएँ बदल दी हैं। हिंदी अब केवल किताबों और अखबारों तक सीमित नहीं है। वह वीडियो, ध्वनि, डिजिटल शिक्षा, सामाजिक माध्यम और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से करोड़ों लोगों तक पहुँच रही है। लेकिन यहाँ भी एक चुनौती है। हिंदी में मनोरंजन की सामग्री तो तेजी से बढ़ रही है, पर उच्च गुणवत्ता वाली ज्ञान सामग्री, वैज्ञानिक सामग्री, विश्वसनीय स्वास्थ्य जानकारी, तकनीकी प्रशिक्षण और शोधपरक सामग्री की अभी भी बड़ी आवश्यकता है। हमें ऐसी हिंदी चाहिए जो मनोरंजन करे, लेकिन केवल मनोरंजन तक सीमित न रहे; जो ज्ञान दे, प्रश्न पैदा करे और नई पीढ़ी को दुनिया समझने की क्षमता दे।

लेखकों, पत्रकारों और शिक्षकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। हिंदी को कठिन शब्दों से सजाकर महान बनाने की जरूरत नहीं। भाषा की असली ताकत उसकी स्पष्टता और प्रभाव में होती है। सरल हिंदी का अर्थ कमजोर हिंदी नहीं है। गंभीर विचारों को सरल भाषा में व्यक्त करना अपने आप में एक बड़ी रचनात्मक क्षमता है। हमें ऐसी हिंदी चाहिए जो गाँव के पाठक को भी अपनी लगे और विश्वविद्यालय के विद्यार्थी को भी विचार दे सके।

हिंदी दिवस पर हम हर वर्ष भाषण देते हैं, शुभकामनाएँ देते हैं, गोष्ठियाँ करते हैं और कुछ दिनों तक हिंदी की चर्चा होती है। फिर जीवन अपनी सामान्य गति में लौट जाता है। शायद अब हमें इस परंपरा को बदलने की जरूरत है। हिंदी दिवस को केवल समारोह का दिन नहीं, बल्कि एक वर्ष के संकल्प का प्रारंभ बनाना चाहिए।

संकल्प भी ऐसे हों जिन्हें मापा जा सके। हम प्रतिदिन कम-से-कम 15 मिनट हिंदी पढ़ने का संकल्प लें और हर महीने एक अच्छी हिंदी पुस्तक, कहानी-संग्रह, निबंध या पत्रिका पढ़ें। एक वर्ष में कम-से-कम 12 पुस्तकों का लक्ष्य रखा जा सकता है। परिवार में सप्ताह में कम-से-कम तीन दिन बच्चों के साथ हिंदी में सहज संवाद किया जाए। विद्यालयों में प्रत्येक महीने कम-से-कम एक पठन, लेखन, वाद-विवाद या वक्तृत्व गतिविधि आयोजित हो और विद्यार्थियों को वर्ष में कम-से-कम छह अच्छी हिंदी पुस्तकों से परिचित कराया जाए। विज्ञान और तकनीक को हिंदी से जोड़ने के लिए प्रत्येक विद्यार्थी वर्ष में कम-से-कम दो वैज्ञानिक या तकनीकी विषयों पर हिंदी में प्रस्तुति दे।

कार्यालय और संस्थान भी अपने लिए स्पष्ट लक्ष्य तय कर सकते हैं। जहाँ हिंदी में काम करना संभव है, वहाँ सप्ताह में कम-से-कम एक दिन हिंदी में कामकाज का अभ्यास किया जाए। प्रत्येक विभाग वर्ष में कम-से-कम पाँच उपयोगी मूल सामग्री—जैसे मार्गदर्शिका, सूचना-पुस्तिका, प्रशिक्षण सामग्री या डिजिटल संसाधन—हिंदी में तैयार करे। नागरिकों से जुड़ी आवश्यक सूचनाएँ सरल हिंदी में उपलब्ध कराई जाएँ। हिंदी का प्रयोग केवल अंग्रेजी सामग्री के अनुवाद तक सीमित न रहे; हिंदी में मूल ज्ञान-सामग्री तैयार करने पर भी जोर दिया जाए।

डिजिटल दुनिया में भी हम अपने हिस्से का लक्ष्य तय कर सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति महीने में कम-से-कम दो उपयोगी हिंदी सामग्री तैयार या साझा करे। शिक्षक, लेखक, पत्रकार और विशेषज्ञ कठिन विषयों को सरल हिंदी में समझाने की पहल करें। संस्थाएँ वर्ष में कम-से-कम एक विश्वसनीय हिंदी ज्ञान-संसाधन तैयार करें, चाहे वह विज्ञान, कानून, तकनीक, नागरिक अधिकार, शिक्षा या किसी अन्य उपयोगी विषय पर हो। यदि लाखों लोग छोटे-छोटे ऐसे संकल्पों को निभाएँ, तो हिंदी की दुनिया में बड़ा परिवर्तन संभव है।

लेकिन हिंदी के प्रति प्रेम का अर्थ दूसरी भाषाओं से घृणा करना नहीं है। हमें अंग्रेजी सीखनी है, दूसरी भारतीय भाषाएँ सीखनी हैं और दुनिया की भाषाओं से संवाद करना है। जितनी अधिक भाषाएँ हम सीखेंगे, हमारा संसार उतना ही विस्तृत होगा। हिंदी को मजबूत करने का उद्देश्य किसी भाषा को हटाना नहीं, बल्कि हिंदी को भी बराबरी का अवसर दिलाना है। भाषाएँ एक-दूसरे की दुश्मन नहीं होतीं; वे मनुष्य की विविध स्मृतियों और अनुभवों की अलग-अलग खिड़कियाँ होती हैं।

हिंदी को बचाने की नहीं, उसे बराबरी का अवसर देने की जरूरत है। उसे नारे नहीं, प्रयोग चाहिए; केवल उत्सव नहीं, निरंतर अभ्यास चाहिए। 14 सितंबर को इसलिए केवल हिंदी दिवस न मनाएँ, बल्कि इसे अपनी भाषा के प्रति अपने व्यवहार को बदलने का दिन बनाएँ।

एक वर्ष बाद जब हम पीछे मुड़कर देखें तो हमारे पास केवल हिंदी दिवस की तस्वीरें, भाषण और शुभकामना संदेश न हों। हमारे पास पढ़ी गई पुस्तकों की संख्या हो, लिखी गई रचनाएँ हों, विद्यालयों की गतिविधियों का लेखा हो, तैयार की गई ज्ञान-सामग्री हो और हिंदी में किए गए वास्तविक काम का हिसाब हो। तभी हमारा हिंदी दिवस सचमुच सार्थक होगा।

हिंदी हमारी स्मृति है, हमारी अभिव्यक्ति है और हमारे भविष्य की संभावनाओं की भाषा भी है। जरूरत केवल इतनी है कि हम हिंदी के पक्ष में बोलने से आगे बढ़ें और हिंदी में काम करना शुरू करें।