आज जब बादल छाएं

-प्रवीण गुगनानी-
poem

(१) कैसे होगा बादल कभी और नीचे
और बरस जायेगा,
फुहारों और छोटी बड़ी बूंदों के बीच,
मैं याद करूंगा तुम्हें
और तुम भी बरस जाना

(२) कुछ बूंदों पर लिखी थी तुम्हारी यादें,
जो अब बरस रही है,
सहेज कर रखी इन बूंदों पर से
नहीं धुली तुम्हारी स्मृतियां
न ही नमी भी आई उन पर,
यादें तुम्हारी अब भी
उष्णता और उर्जा को लिये बहती है
और मैं उसमे नाव चला लेता हूं

(३) बरसात अभी कहीं होने को है,
हवा बता रही है,
यह भी पता चला है
कि तुमने गूंथी हुई चोटी खोल ली है
तुम्हारी

(४) भूमि अभी कड़क है
नहीं पड़ रहे पैरों के निशान अभी .
कि
इसलिए ही तुम अभी कहीं न जाना ,
मुझे आना है
इस बार वर्षा में तुम्हारे पीछे

(५) नहीं होती है उतनी अप्रतिम ज्ञान कि अभिलाषा भी
कि जितनी पहली वर्षा की बूंदों की चिंता,
मेरी प्रज्ञा में
डूबते उतरती तुम्हारी गंध,
बसी ही होंगी अबके बारिश कि बूंदों में

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