गजेन्द्र सिंह
कॉकरोच जनता पार्टी का 20 दिनों तक चला अनशन अब निर्णायक मोड़ पर है। शुरुआत पेपर लीक और युवाओं के भविष्य जैसे गंभीर मुद्दे से हुई थी लेकिन समय के साथ आंदोलन का केंद्र बदलता हुआ दिखाई दिया। अनशन के मंच पर सामाजिक कार्यकर्ता, कवि, प्रोफेसर, राजनीतिक नेता, फिल्मी हस्तियाँ और अन्य सार्वजनिक चेहरे दिखाई दिए जिनमें से अधिकांश अपने विवादित वैचारिक बयानों के कारण चर्चा में रहे हैं। हिंदू आस्थाओं और सांस्कृतिक प्रतीकों पर दिए गए वक्तव्यों ने आंदोलन के मूल उद्देश्य को कमजोर किया और इसे युवाओं के अधिकारों के बजाय हिंदू विरोधी वैचारिक राजनीति की दिशा में मोड़ दिया। आइए, अब क्रमवार उन प्रमुख विवादों और सार्वजनिक बयानों पर नज़र डालते हैं, जिनके कारण आंदोलन विवाद का विषय बना ।
कहने को इस अभियान के प्रमुख अभिजीत दीपके बोस्टन विश्वविद्यालय से शिक्षित हैं लेकिन वहाँ रोजगार की तलाश करते-करते भारत में युवाओं का आंदोलन शुरू कर बैठे। अपने शुरुआती दौर में वे आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया टीम से भी जुड़े रहे। 6 जून को दिल्ली में आयोजित विरोध-प्रदर्शन के दौरान भीषण गर्मी के कारण निर्धारित समय से पहले ही कार्यक्रम छोड़ने को लेकर उनकी आलोचना हुई। इसके बाद विभिन्न शहरों में आयोजित विरोध-प्रदर्शनों में भी अपेक्षित जनभागीदारी नहीं दिखी। कहीं प्रशासनिक अनुमति प्राप्त करने में कठिनाइयाँ रहीं तो कहीं जमीनी तैयारी, नेतृत्व और समन्वय की कमी को लेकर अभियान विवादों में घिरा रहा। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मत है कि यह अभियान मुख्यतः आधुनिक, सुविधाभोगी और अपेक्षाकृत संपन्न सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले ऐसे युवाओं द्वारा संचालित था जिनका जनआंदोलनों का अनुभव सीमित रहा। उनके अनुसार, यह प्रवृत्ति इस ओर भी संकेत करती है कि सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने वाले कुछ युवा अब उसे राजनीतिक पहचान और सार्वजनिक जीवन में प्रवेश के माध्यम के रूप में देखने लगे हैं।
इसी बीच पार्टी ने अपने तीन आधिकारिक प्रवक्ताओं की घोषणा की। इनमें आशुतोष रांका पूर्व में आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया टीम से जुड़े रहे हैं। सौरव दास उस समय चर्चा में आए जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े एक मामले में न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा के संबंध में सोशल मीडिया पर कथित अपमानजनक टिप्पणी के मामले में उन्हें नोटिस जारी किया। उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर पर भी विवादित टिप्पणियाँ की हैं। इसके अतिरिक्त, उमर खालिद के साथ उनकी एक सोशल मीडिया पोस्ट भी चर्चा में रही जिसमें वे उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते दिखाई देते हैं। इसी प्रकार, पटकथा लेखक और डिजिटल कंटेंट निर्माता विजेता दहिया के बारे में सार्वजनिक रूप से यह कहा जाता रहा है कि वे यूट्यूबर ध्रुव राठी के लिए सामग्री लेखन से जुड़े रहे हैं। उनके कुछ पुराने वीडियो भगवान शिव, आदि शंकराचार्य, दक्ष प्रजापति और सती जैसे धार्मिक विषयों की आपत्तिजनक प्रस्तुति को लेकर विवादों में रहे हैं। अनेक लोगों का आरोप है कि ऐसी प्रस्तुतियाँ हिंदू धार्मिक आस्थाओं का अपमान करती हैं। ब्राह्मणवाद, सामाजिक परंपराओं और महिलाओं से जुड़े उनके कुछ वक्तव्यों व वीडियो की भी व्यापक आलोचना हुई है। एक अन्य वीडियो में वे मालेगांव और हरियाणा से जुड़े कुछ घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए तथाकथित “हिंदू आतंकवाद” सिद्धांत के समर्थन में तर्क प्रस्तुत करते दिखाई देते हैं।
जेन-जी’ के नाम पर प्रस्तुत यह सोशल मीडिया आंदोलन जितनी तेजी से लोकप्रिय हुआ, उतनी ही तेजी से इसकी कार्यशैली, मंशा, नेतृत्व और विशेष रूप से महिला नेतृत्व की वास्तविक भागीदारी पर भी प्रश्न उठने लगे। आंदोलन का घोषित उद्देश्य परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, प्रश्नपत्र लीक पर प्रभावी कार्रवाई और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग था किंतु जमीनी स्तर पर जंतर-मंतर का धरना सोशल मीडिया कंटेंट और रील निर्माण का केंद्र बना रहा । वहीं, मंच पर आमंत्रित वक्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्र नेताओं की वैचारिक पृष्ठभूमि तथा उनके पूर्व सार्वजनिक वक्तव्यों ने भी आंदोलन की दिशा और मंशा को लेकर नई बहस छेड़ दी।
धरने में पहुंचे कुणाल कामरा फिर से “सीता के पति के नाम से गीता ” जैसे व्यंग्य से खुले रूप से हिन्दू आस्था का मखौल उड़ाते दिखे। नंदिता नारायण पत्नी श्री राशिद अंसारी ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का, जो ग़ायब भी है, हाज़िर भी…” जैसी पंक्तियाँ गाती हुई दिखाई देती है। वीडियो में वह यह भी कहती है कि इसी पंक्ति से “राइट विंग” को आपत्ति होती है क्योंकि “उन्हें समझ नहीं आता कि यह उच्च श्रेणी का वेदांत है।” बिना किसी गंभीर दार्शनिक आधार के वेदांत का संदर्भ देकर हिंदू दर्शन की मनमानी व्याख्या धार्मिक भावनाओं के साथ अनावश्यक खिलवाड़ है । उल्लेखनीय है कि यह गीत फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की प्रसिद्ध नज़्म “हम देखेंगे” का अंश है, जो मूलतः पाकिस्तान में जनरल ज़िया-उल-हक़ के सैन्य शासन के विरोध के संदर्भ में प्रसिद्ध हुई थी। इसी क्रम में जेएनयू छात्रसंघ के दानिश अली ने संबोधन के दौरान शरजील इमाम और उमर खालिद जैसे अपराधी का खुल कर पक्ष रखा । परीक्षा प्रणाली और छात्रों की समस्याओं पर केंद्रित आंदोलन को वैचारिक एवं राजनीतिक मंच में परिवर्तित कर दिया गया , उनके वक्तव्य में गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की गई ।
निवेदिता मेनन भी अपनी विचारधारा, वक्तव्यों और गतिविधियों के कारण लंबे समय से विवादों में रही हैं। चाहे कश्मीर मुद्दे से जुड़ा “भारत ने अवैध रूप से कश्मीर पर कब्ज़ा किया है” वाला वक्तव्य हो अथवा हिंदू समाज को लेकर “हिंदू समाज दुनिया में सबसे हिंसक, अपनी जड़ों तक में हिंसक समाज है” जैसी टिप्पणी । इसके अतिरिक्त हिंदू लड़कियों और मुस्लिम लड़कों को लेकर की गई टिप्पणियाँ हिंदू महिलाओं के प्रति अनुचित और आपत्तिजनक विषय बनीं। यासीन मलिक के साथ उनके संबंधों और मंच साझा करने को लेकर भी प्रश्न उठे हैं। यासीन मलिक को वर्ष 2022 में आतंकवादी गतिविधियों के वित्तपोषण (टेरर फंडिंग) के मामले में दोषी ठहराया गया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। कश्मीरी पंडितों के पलायन और हिंसा में भी उनका नाम सार्वजनिक विमर्श में । इसी प्रकार सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ वीडियो में नेहा भारती स्वयं को दलित और हिन्दू विरोधी आवाज़ के रूप में प्रस्तुत करती हैं। एक वीडियो में वे यह कहती हुई दिखाई देती हैं कि दलित स्वयं को हिंदू नहीं मानते तथा मंदिरों में उनके साथ भेदभाव होता है जबकि मस्जिदों में उन्हें इस प्रकार की बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ता। इसके अतिरिक्त, नेहा भारती रमज़ान के दौरान जामा मस्जिद में खाद्य पदार्थों के वितरण करती दिखाई देती हैं।
समग्र रूप से देखें तो कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से अधिक विवादों के कारण चर्चा में रहा। आंदोलन के प्रमुख चेहरों, प्रचार-प्रसार से जुड़े व्यक्तियों की वैचारिक पृष्ठभूमि, उनके पूर्व संबंधों, सार्वजनिक वक्तव्यों तथा जमीनी अनुभव की कमी ने इसकी विश्वसनीयता पर लगातार प्रश्न खड़े किए। इसके साथ ही मंच पर आमंत्रित वक्ताओं की पृष्ठभूमि, धार्मिक विमर्श, राजनीतिक प्रतीकवाद और नेतृत्व शैली से जुड़े विवादों ने भी आंदोलन के घोषित उद्देश्य को चुनौती दी।
छात्रों, प्रतियोगी परीक्षाओं और शिक्षा सुधार जैसे मूल मुद्दे धीरे-धीरे वैचारिक बहसों के पीछे छूटते चले गए और आंदोलन का मंच ऐसे व्यक्तियों और विचारों को भी स्थान देने लगा, जिन पर लंबे समय से हिंदू आस्था, सामाजिक परंपराओं तथा भारतीय राज्य व्यवस्था के प्रति विवादास्पद रुख अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। इसी कारण कुछ पर्यवेक्षकों ने इसे वैचारिक और राजनीतिक संदेश देने वाले मंच के रूप में देखना शुरू किया।