28 फरवरी: राष्ट्रीय विज्ञान दिवस
बाबूलाल नागा
28 फरवरी का दिन केवल एक तिथि नहीं बल्कि समाज के लिए चेतना और जागरूकता का अवसर है। इसी दिन 1928 में भारत के महान वैज्ञानिक सी. वी. रमन ने ‘रमन प्रभाव’ की खोज करके भारत को वैज्ञानिक दुनिया में स्थापित किया। यह खोज न केवल विज्ञान की उपलब्धि थी बल्कि यह दिखाती है कि तर्क, प्रयोग और जिज्ञासा के बल पर समाज और राष्ट्र दोनों नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकते हैं। आज, जब हम राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मना रहे हैं, तो यह सवाल उठाना भी जरूरी है कि क्या हम सच में वैज्ञानिक सोच को अपने जीवन में उतार पाए हैं या सिर्फ तकनीक और दिखावे के पीछे भाग रहे हैं।
आज का समाज तकनीक के मामले में काफी आगे बढ़ चुका है। स्मार्टफोन, इंटरनेट, ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल भुगतान, आधुनिक अस्पताल—यह सब हमारी जीवनशैली का हिस्सा बन चुका है। किसान नई तकनीक से खेती कर रहे हैं, बच्चे डिजिटल माध्यम से पढ़ाई कर रहे हैं। बावजूद इसके समाज के एक बड़े हिस्से में अंधविश्वास और पाखण्ड की जड़ें गहरी बनी हुई हैं। लोग बीमारी में डॉक्टर की बजाय झाड़-फूंक और टोटकों का सहारा लेते हैं। प्राकृतिक घटनाओं को चमत्कार या अशुभ संकेत बताकर डर फैलाते हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में वैज्ञानिक सलाह की बजाय पारंपरिक और तर्कहीन पद्धतियों पर भरोसा किया जाता है।
यह स्थिति न केवल तर्कहीनता को दिखाती है, बल्कि हमारे संविधान द्वारा स्थापित मूल्यों और अधिकारों के खिलाफ भी है। संविधान ने हर नागरिक को ज्ञान का अधिकार (आर्टिकल 21ए), समानता और स्वतंत्रता का अधिकार (आर्टिकल 14, 19) और समान अवसर का अधिकार (आर्टिकल 15) दिया है। जब हम अंधविश्वास और झूठी मान्यताओं के अधीन रहते हैं, तब हम न केवल अपने अधिकारों से वंचित होते हैं बल्कि समाज में समानता, न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों को भी कमजोर करते हैं। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब नागरिक सोच-समझकर निर्णय लें और सत्य पर आधारित जानकारी अपनाएं।
अंधविश्वास केवल व्यक्तिगत सोच की कमजोरी नहीं है बल्कि यह एक संगठित उद्योग का रूप भी ले चुका है। कई लोग डर और आशंका का फायदा उठाकर दूसरों को शोषित करते हैं। टोटकों, मंत्रों और चमत्कारों के नाम पर आर्थिक और मानसिक शोषण होता है। गरीब और अशिक्षित वर्ग इसका सबसे अधिक शिकार होता है। संवैधानिक रूप से सभी नागरिकों को समान सुरक्षा और संरक्षण का अधिकार है, लेकिन अंधविश्वास इसे कमजोर कर देता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का अर्थ है हर बात का कारण जानने की जिज्ञासा रखना, प्रमाण मांगना और तर्क के आधार पर निर्णय लेना। विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं और कक्षा की किताबों तक सीमित नहीं है, यह जीवन जीने का तरीका है। जब समाज में यह मानसिकता विकसित होगी, तभी लोकतंत्र की नींव मजबूत होगी। बच्चों को बचपन से ही सवाल पूछने, प्रयोग करने और तथ्यों को परखने की आदत डालना जरूरी है। अगर प्रश्न पूछने को विद्रोह या असम्मान समझा जाए, तो अंधविश्वास और पाखण्ड को बढ़ावा मिलता है।
मीडिया और सोशल मीडिया इस स्थिति को और जटिल बना रहे हैं। अफवाहें मिनटों में लाखों लोगों तक फैल जाती हैं। विज्ञान की बजाय सनसनी और डर को बढ़ावा देने वाली खबरें वायरल होती हैं। संविधान के अनुसार, सत्य और न्याय की रक्षा करना सभी नागरिकों का कर्तव्य है। इसलिए हमें हर जानकारी को परखना और प्रमाणित करना सीखना होगा। बिना जांचे-परखे जानकारी फैलाना केवल समाज की वैज्ञानिक चेतना को कमजोर करता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से वैज्ञानिक जागरूकता की आवश्यकता है। गांवों में शिक्षा और वैज्ञानिक जानकारी की कमी के कारण अंधविश्वास तेजी से फैलता है। स्वास्थ्य, कृषि और पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं का समाधान विज्ञान के पास है, लेकिन जानकारी की कमी और पुरानी मान्यताओं के कारण लोग टोटकों और परंपरागत पद्धतियों पर निर्भर हो जाते हैं। यदि स्कूल, पंचायत और सामाजिक संगठन लोगों तक सरल भाषा में विज्ञान की जानकारी पहुंचाएं, तो स्थिति बदल सकती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का मतलब यह नहीं कि हमें अपनी आस्था छोड़नी होगी। आस्था व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है और इसे संविधान धार्मिक स्वतंत्रता (आर्टिकल 25) के तहत सुरक्षित करता है लेकिन जब कोई आस्था या विश्वास समाज को नुकसान पहुंचाए, मानव जीवन या शिक्षा के लिए खतरा बने, तब तर्क और विज्ञान के आधार पर उसका मूल्यांकन करना नागरिक का अधिकार और कर्तव्य बन जाता है।
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस केवल भाषणों और औपचारिक कार्यक्रमों का दिन नहीं है। यह दिन हमें आत्ममंथन का अवसर देता है कि क्या हम अपने परिवार और समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दे रहे हैं। क्या हम बच्चों को सवाल पूछने के लिए प्रोत्साहित करते हैं? क्या हम अफवाहों और झूठी मान्यताओं के खिलाफ आवाज उठाते हैं? क्या हम संवैधानिक मूल्यों—सत्य, न्याय और समानता—को अपनाकर जीवन जीते हैं?
अगर हम सच में प्रगतिशील और सशक्त समाज चाहते हैं, तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना होगा। अंधविश्वास और पाखण्ड से मुक्त नागरिक ही लोकतंत्र के सही संरक्षक बन सकते हैं। संविधान ने हमें अधिकार और स्वतंत्रता दी है, लेकिन उनका सही इस्तेमाल तभी संभव है जब हम तर्क और वैज्ञानिक सोच को अपनाएं।
28 फरवरी का दिन हमें यही संदेश देता है कि असली रोशनी डर और भ्रम से नहीं आती, बल्कि ज्ञान, जिज्ञासा और तर्क से आती है। यही राष्ट्रीय विज्ञान दिवस का सच्चा संदेश है। यही भविष्य की मजबूत नींव है, जो समाज को संवैधानिक मूल्यों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण दोनों के साथ आगे ले जाएगी।
आज जरूरत इस बात की है कि हम विज्ञान को केवल किताबों में न पढ़ें, बल्कि उसे अपने व्यवहार में उतारें। जब हर नागरिक तर्कशील बनेगा, तभी समाज अंधविश्वास की जकड़न से मुक्त होकर आगे बढ़ पाएगा। यही हमारी संवैधानिक जिम्मेदारी है और यही एक सशक्त, प्रगतिशील और न्यायपूर्ण भारत की नींव भी है।
बाबूलाल नागा