लेखक परिचय

संचित पुरोहित

संचित पुरोहित

स्वतंत्र लेखक एवं ब्लॉगर

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विगत कुछ महीनों से ऐसा प्रायः देखने में आ रहा है कि एक चुपचाप, सौहाद्रपूर्ण और प्रसन्न माहौल को चीरता हुआ अचानक कोई न कोई गैर प्रासंगिक वक्तव्य उछाल दिया जाता है, मीडिया द्वारा उसे बहस का मुद्दा बनाकर उस पर बेवजह तूल दिया जाता है, उस पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विभिन्न चैनल, विषय विषेष के विष्लेषकों के साथ दिन-रात बहस में व्यस्त दिखने लगते हैं । यही समाचार पत्रांे की मुख्य खबरें भी बनने लगती हैं । इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट मीडिया तथा लगभग सभी प्रकार के प्रचार माध्यम परस्पर टीका टिप्पणी करते दिख जाते हैं । कुछ खोजी संवाददाता और पत्रकार अपने तमाम स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रमुख खबरों से अपना ध्यान हटाकर अपना पूरा जोर उस एक घटना की पूरी पडताल के पीछे खपा देते हैं और पल पल की रिपोर्टिंग कर ब्रेकिंग न्यूज के माध्यम से घटना को दिलचस्प बना देते हैं ।

देखते ही देखते तमाम राजनीतिक दल भी घटना का राजनीतिक फायदा लेने की होड में घटना के पक्ष या विपक्ष में अपने आपको तुरंत प्रस्तुत कर लेते हैं और घटना के लिये विपक्षियों पर आरोप-प्रत्यारोप के तीखे प्रहार शुरू कर देते हैं । यह बात और है कि बाद में घटना के सच या झूठ, उचित या अनुचित प्रमाणित होने पर बडी सफाई और अपने वाक्चातुर्य से अपने आपको पृथक कर पल्ला भी झााड लेते हैं ।

स्थिति तो और भी हास्यास्पद तब हो जाती है जब निरीह जनता भी इस घटना के विभिन्न पहलुओं से अपने आपको जोडकर उस पर अपनी राय बनाना शुरू कर देती है कि वास्तव में क्या होना चाहिए था और क्या नहीं होना चाहिए था ।

कुछ ही पलों में घटना के पक्ष या विपक्ष में व्हाट्सअप के सजे हुए मैसेज आंकडों सहित वाइरल होने लगते हैं । पता नहीं देखते देखते तमाम आंकडे लिये ये मैसेज इतनी जल्दी, कहॉं से और कैसे बनकर लोगों के पास आ जाते हैं और उसके प्रत्युत्तर में भी लाजवाब मैसेज दनादन घूमने लगते हैं ।

इसके बाद सिलसिला शुरू होता है एसएमएस और व्हाट्सअप के माध्यम से घटना के विभिन्न पहलुओं के पक्ष और विपक्ष मंे अपनी राय देकर वोट करने का । जागरूक जनता अपना सभी जरूरी कार्य छोडकर ऐसी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग को प्राथमिकता भी देती है । यही सिलसिला एक सप्ताह, पंद्रह दिन, और कई बार तो महीने भर से ज्यादा की ब्रेकिंग न्यूज का हिस्सा बनकर हमंे व्यस्त और तनावग्रस्त किये रहती है ।

ऐसा करके हम अपना कीमती समय और उर्जा तो खोते ही हैं । साथ ही हम उस जिम्मेदार तबके के हाथों जाने-अनजाते में ही कठपुतली भी बन जाते हैं जो दरअसल आपको विकास की मुख्य धारा से भटकाकर आपका ध्यान कहीं और खींचे रखना चाहते हैं । हम अपने आपको तब और भी ठगा महसूस करते हैं जब हमें पता चलता है कि उस कथित घटना का उद्देष्य ही किसी विषय विषेष से हमारा और जनता का ध्यान भटकाने का था, जिसमें वो लॉबी कामयाब भी हो गई । आष्चर्य तो तब और होता है जब हम दोबारा, तिबारा और बार-बार ठगे जाने के लिये स्वयं ही तैयार हो जाते हैं । स्वयं के ठगे जाने की जानकारी होते हुए भी अन्य को इस कथित कथा में शामिल न होते देख उन्हें पिछडा, स्वार्थी, दोषी और राष्ट्रद्रोही तक कहने लगते हैं ।

आखिर हमारी क्या मजबूरी है कि हम अपनी बात मीडिया के माध्यम से कहें । समय गवाह है हमने जब-जब किसी से सीधे मुखातिब होने की बजाय किसी तीसरे कान का सहारा लिया है, बात हमारे मन के मुताबिक न होकर किन्हीं अन्य अर्थों में ही अपने गंतव्य तक पहुॅंची है ।

One Response to “परस्पर संवादहीनता: घातक जहर”

  1. sanjit purohit

    Respected members, through this article, I am trying to fill up the gap of the communication with each other and build up a perfect and innocent platform for all.

    Reply

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