संचित पुरोहित

स्वतंत्र लेखक एवं ब्लॉगर

 सुरक्षा व्यवस्था का औचित्य एवं सार्थकता

भारत के जो गणमान्य सरकारी सहायता से अपनी जरूरत के अनुसार जिन विभिन्न श्रेणियों की सुरक्षा चाहें, उनको सुरक्षा व्यवस्था जरूर मुहैया की जानी चाहिए, लेकिन गणमान्यों के स्वयं के व्यय पर । क्योंकि जनता ने क्या गुनाह किया है, जिनके गाढे पसीने की कमाई का उपयोग किसी व्यक्ति की सरकारी सुरक्षा के लिये किया जा रहा है ।

भिक्षावृत्ति: बेचारगी में छुपा एक व्यवसाय

भिक्षावृत्ति के पक्ष और विपक्ष में अलग-अलग गणमान्यों के चर्चा के उपरान्त मुझे दो परस्पर विरोधाभासी राय मिली । पहले पक्ष ने राय दी कि सुपात्र को दान देना उचित है, कुपात्र को दान देना पाप है । अब आपको तय करना है कि भिक्षुक सुपात्र है अथवा कुपात्र है। दूसरे पक्ष द्वारा मिली राय के अनुसार जो भिक्षुक आपके पास याचना लेकर आया है, उसकी यथासंभव मदद करनी चाहिए ।

स्पर्धा में खेल भावना हर हाल में बनी रहने दें

भारत में क्रिकेट की दीवानगी का अंदाजा अनेक उदाहरणों को देखकर लगाया जा सकता है । इसी प्रकार के उदाहरणों में सामाजिक मीडिया में घूम रहे एक वीडियो ने पूरे भारत का ध्यान अपनी ओर खींचा जिसमें 18 जून को लंदन में में भारत और पाकिस्तान के बीच खेले गये चैम्पियन्स ट्राॅफी के फाईनल मुकाबले में भारत का पलडा हल्का होते देख एक मासूम बच्चे की आॅंखों से गिरते आॅंसू और उस पर उसकी माॅं द्वारा किस तरह उसका उलाहना-मिश्रित मजाक उडाया गया । ऐसा इसलिये कि भारत में क्रिकेट को एक पर्व की तरह मनाया जाता है । जनता इन मुकाबलों को देखने के लिये अपनी दिनचर्या के अनेक महत्वपूर्ण कामकाज का त्याग और बलिदान भी करती है । यदि मुकाबला चित-परिचित टीमों के साथ हो तो उसका रोमांच कई गुना बढ जाता है ।

प्रयास, उपलब्धि और सफलता

मानव जीवन की प्रत्येक परिस्थिति से निपटने का हौसला और दुस्साहस हमारे अंदर होना चाहिए । जब तक हम जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों ने नहीं गुजरेंगे, तब तक जीवन के सर्वोत्तम पहलुओं को पा लेने की कल्पना भी हमारे लिये असंभव है । क्योंकि, विजेता कभी मैदान नहीं छोडते और जो मैदान छोड देते हैं, वे कभी विजेता नहीं बन सकते । स्मरण रहे, कहने को तो जल से मृदु कुछ भी नहीं, लेकिन उसके बहाव के वेग से बडी-बडी चट्टानें तक टूट जाती हैं । एक विद्यार्थी के जीवन में भी ऐसा प्रयास होना चाहिए – यदि उसे कुछ समझ न आये तो सवाल करे, सहमत न होने की स्थिति मंे चर्चा करे । कोई बात नापसंद हो तो उसे विनम्रतापूर्वक नकारें, लेकिन मौन रहकर आत्म निर्णय कर लेना तो एकदम गलत है ।

पर्यावरण की सुरक्षा – हमारा नैतिक कर्त्तव्य

यदि कोई चाहकर भी वृ़क्षारोपण के कार्य में सहयोग न दे पाये तो कोई बात नहीं । वह कम से कम इतना सहयोग तो जरूर कर ही सकता है कि – हममें से हर कोई रेल और सडक मार्ग से यात्रा जरूर करता है । इन यात्राओं के दौरान खाये जाने वाले फलों के बीजों को इधर-उधर कचरे के रूप में न फेंककर यात्रा के दौरान ही सडक या रेल मार्ग के किनारे बिखेर दें । उन बिखेरे गये बीजों से कुछ नहीं तो यदि 10 प्रतिशत पौधे ही पनप जायें तो भी पर्यावरण संरक्षण की दिषा में उनका यह बहुत बडा योगदान होगा ।

परस्पर संवादहीनता: घातक जहर

कुछ ही पलों में घटना के पक्ष या विपक्ष में व्हाट्सअप के सजे हुए मैसेज आंकडों सहित वाइरल होने लगते हैं । पता नहीं देखते देखते तमाम आंकडे लिये ये मैसेज इतनी जल्दी, कहॉं से और कैसे बनकर लोगों के पास आ जाते हैं और उसके प्रत्युत्तर में भी लाजवाब मैसेज दनादन घूमने लगते हैं ।

इसके बाद सिलसिला शुरू होता है एसएमएस और व्हाट्सअप के माध्यम से घटना के विभिन्न पहलुओं के पक्ष और विपक्ष मंे अपनी राय देकर वोट करने का । जागरूक जनता अपना सभी जरूरी कार्य छोडकर ऐसी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग को प्राथमिकता भी देती है । यही सिलसिला एक सप्ताह, पंद्रह दिन, और कई बार तो महीने भर से ज्यादा की ब्रेकिंग न्यूज का हिस्सा बनकर हमंे व्यस्त और तनावग्रस्त किये रहती है ।