विज्ञान समाज

टूटता भरोसा, दबाव में भविष्य: नीट संकट का लंबा साया

मणिमाला शर्मा 

उस घर में लौटिए जहाँ बेटे के कमरे की मेज पर अभी भी खुली हुई किताबें पड़ी हैं लेकिन पढ़ाई रुक चुकी है; उस माँ को देखिए जिसने अपने गहने गिरवी रखकर कोचिंग की फीस भरी थी; उस पिता को समझिए जिसने जमीन का एक टुकड़ा बेचकर यह भरोसा खरीदा था कि उसका बच्चा “डॉक्टर” बनेगा। और उस छात्र को महसूस कीजिए, जिसने अपनी उम्र के सबसे उजले साल एक ही लक्ष्य के पीछे खपा दिए। अब उसी लक्ष्य, NEET, के डगमगाने के साथ ये सभी एक साथ खड़े हैं;अनिश्चितता, दबाव और टूटते भरोसे के बीच। जाँच का मामला सेंट्रल  ब्यूरो ऑफ़  इन्वेस्टीगेशन (सीबीआई) तक पहुँच चुका है, रोज़ाना गिरफ्तारियां भी हो रहीं हैं पर क्या फ़ायदा? जिन जिंदगियों पर इसका असर पड़ा है, उनके लिए यह केवल एक केस नहीं, बल्कि एक गहरा झटका है।

इस झटके को केवल “री-एग्ज़ाम” कहकर कम नहीं आँका जा सकता। करीब 24 लाख अभ्यर्थियों के लिए यह परीक्षा जीवन की दिशा तय करने वाला मोड़ है। ऐसे में परीक्षा का रद्द होना या इसमें महीनों की देरी होना सिर्फ एक तारीख बदलना नहीं, बल्कि एक छात्र के पूरे भविष्य को अनिश्चितता में धकेल देना है। एक साल का खिसकना उस छात्र के लिए बहुत बड़ा है जिसने 12वीं के बाद ड्रॉप लेकर तैयारी की है। उम्र बढ़ती है, अवसर भी सीमित होते जाते हैं और प्रतिस्पर्धा हर साल और कठोर हो जाती है। यह देरी केवल समय की नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की भी होती है। अदालती कार्रवाइयों और प्रशासनिक जांच की भेंट चढ़ते समय की कीमत कोई नहीं आंकता; पैसा फिर भी कमाया जा सकता है, लेकिन युवावस्था के ये सुनहरे साल कभी लौटकर नहीं आते और पूरा अकादमिक कैलेंडर ध्वस्त हो जाता है।

इस पूरे संकट का सबसे गहरा असर मध्यम वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर पड़ता है। कोचिंग, हॉस्टल, टेस्ट सीरीज और किताबों पर एक परिवार सालाना 4 से 6 लाख रुपये तक खर्च करता है। यह पैसा अक्सर कर्ज लेकर या गहने-ज़मीन गिरवी रखकर जुटाया जाता है। भारत की मेडिकल कोचिंग इंडस्ट्री का आकार 60,000 से 75,000 करोड़ रुपये के बीच आँका जाता है। ऐसे में जब परीक्षा रद्द होती है, तो यह केवल शैक्षणिक व्यवधान नहीं, बल्कि आर्थिक झटका बन जाता है। लाखों परिवारों के लिए यह “फिर से शुरुआत” का दबाव है। फिर वही खर्च, फिर वही अनिश्चितता।

इसके साथ ही, यह संकट ‘समान अवसर’ के संवैधानिक सिद्धांत की विफलता को भी उजागर करता है। NEET का मौजूदा स्वरूप इस कदर ‘कोचिंग-सेंट्रिक’ हो चुका है कि जो छात्र बड़े शहरों के महंगे कोचिंग संस्थानों की फीस नहीं भर सकते, वे सिर्फ अपनी स्कूली पढ़ाई और सीमित संसाधनों के दम पर इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा में शुरुआत से ही पीछे छूट जाते हैं। यह ढांचा देश के ग्रामीण और हाशिए पर खड़े बच्चों के डॉक्टर बनने के सपने को लगभग असंभव बना देता है, जो सामाजिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ है।

लेकिन इस आर्थिक और सामाजिक दबाव से भी अधिक गंभीर है वह मानसिक दबाव, जो छात्रों पर लगातार बढ़ता जा रहा है। कोटा जैसे शहरों में पढ़ने वाले छात्रों का जीवन एक सीमित ढाँचे में सिमट जाता है। सुबह से रात तक टेस्ट, रैंक और कट-ऑफ का गणित। असफलता का डर इतना गहरा होता है कि वह केवल एक परिणाम का डर नहीं रह जाता, बल्कि पूरी पहचान के टूटने का भय बन जाता है। पिछले पाँच वर्षों में केवल कोटा में ही लगभग 90 से अधिक छात्रों की आत्महत्याएँ दर्ज की गई हैं, और राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव से जुड़ी ऐसी घटनाएँ हर साल सामने आती रही हैं। ये घटनाएं यह बताने के लिए काफी है कि यह दबाव केवल मानसिक स्वास्थ्य को ही नुकसान नहीं पहुँचा रहा बल्कि यह अक्सर असहनीय बोझ बन जाता है। ऐसे में परीक्षा से जुड़ी अनिश्चितता इस बोझ को और बढ़ा देती है।

इस तनाव के बीच जब धांधली के आरोप सामने आते हैं, तो स्थिति और भयावह हो जाती है। अलग-अलग राज्यों में हुई जांचों के दौरान कुछ मामलों में यह दावा किया गया कि प्रश्नपत्र तक अग्रिम पहुँच दिलाने के बदले 30 से 50 लाख रुपये तक वसूले गए। हालाँकि इन दावों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है। लेकिन इतना भर भी पर्याप्त है कि एक छात्र के मन में यह संदेह घर कर जाए कि उसकी मेहनत ही पर्याप्त है या नहीं। जब यह सवाल खड़ा हो जाता है, तो परीक्षा केवल प्रतिस्पर्धा नहीं रहती, बल्कि भरोसे का संकट बन जाती है।

यह संकट सिर्फ आज के छात्रों का नहीं है, इसका हमारे देश के भविष्य के ‘हेल्थकेयर सिस्टम’ पर गहरा और दूरगामी असर पड़ेगा। जब पूरी व्यवस्था संदिग्ध लगने लगती है, तो देश की सबसे बेहतरीन और ईमानदार प्रतिभाओं का इस पवित्र पेशे से मोहभंग होने लगता है। वे या तो अन्य क्षेत्रों की ओर रुख करेंगी या ‘ब्रेन ड्रेन’ का हिस्सा बनकर विदेशों में अपनी सेवाएं देंगी। इससे भी अधिक भयावह कल्पना यह है कि यदि पैसे और भ्रष्टाचार के दम पर अयोग्य लोग मेडिकल सीटों पर कब्जा करने में सफल हो जाते हैं, तो भविष्य में देश के नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन की बागडोर किन हाथों में होगी?

यही वह जगह है जहाँ व्यवस्था की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।  नेशनल  टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) को एक पारदर्शी और सुरक्षित परीक्षा प्रणाली के लिए बनाया गया था, लेकिन लगातार उठते सवाल यह संकेत देते हैं कि या तो सुरक्षा और निगरानी में खामियाँ हैं, या कम से कम ऐसा विश्वास बन चुका है। विडंबना यह है कि गड़बड़ी होने पर बड़ी-बड़ी कमेटियां बना दी जाती हैं, लेकिन शीर्ष स्तर पर बैठे नीति-निर्धारकों की त्वरित जवाबदेही तय नहीं होती। जब तक शीर्ष नेतृत्व जिम्मेदारी स्वीकार नहीं करेगा, तब तक नीचे की व्यवस्था में सुधार की उम्मीद बेमानी है। जब तक इन सवालों के स्पष्ट और सार्वजनिक उत्तर नहीं मिलते, तब तक हर अगली परीक्षा भी संदेह के घेरे में रहेगी।

दरअसल समस्या केवल पेपर लीक या एक बार की चूक की नहीं है। यह उस पूरे प्रशासनिक ढाँचे की समस्या है जिसमें करोड़ों छात्रों का भविष्य एक ही दिन, एक ही परीक्षा पर टिका दिया गया है। यह मॉडल अपने आप में असमानता और दबाव पैदा करता है। जिन छात्रों के पास बेहतर कोचिंग, संसाधन और वातावरण है, वे स्वाभाविक रूप से आगे निकल जाते हैं, जबकि बाकी छात्र शुरुआत से ही पीछे रह जाते हैं। इस तरह सरकार का “समान अवसर” का दावा व्यवहार में असमानता में बदल जाता है।

इसलिए समाधान भी केवल सतही नहीं हो सकता। दोषियों की गिरफ्तारी जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं। परीक्षा प्रणाली को तकनीकी रूप से इतना मजबूत बनाना होगा कि उसमें सेंध लगाना लगभग असंभव हो जाए, हालांकि इस तकनीकी समाधान के साथ हमें ‘डिजिटल डिवाइड’ का भी ध्यान रखना होगा ताकि ग्रामीण क्षेत्रों के छात्र वंचित न रह जाएं। पेपर लीक जैसे अपराधों के लिए त्वरित और कठोर दंड सुनिश्चित करना होगा। एक ही परीक्षा पर निर्भरता कम करने के लिए मल्टीपल अटेम्प्ट और वैकल्पिक मूल्यांकन जैसे विकल्पों पर गंभीरता से विचार करना होगा। साथ ही, छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा नीति का अनिवार्य हिस्सा बनाना अब टाला नहीं जा सकता।

अंततः यह संकट हमें एक गहरी सच्चाई के सामने खड़ा करता है। हमें यह समझना होगा कि परीक्षा में बैठने वाला हर छात्र सिर्फ एक ‘रोल नंबर’ या ‘OMR शीट’ नहीं है; वह एक परिवार की उम्मीद, देश का भविष्य और एक साँस लेता हुआ इंसान है। जब व्यवस्था एक प्रश्नपत्र की सुरक्षा नहीं कर पाती, तो असल में वह उस छात्र के आत्मसम्मान और देश के प्रति उसके विश्वास की हत्या कर रही होती है। जब एक छात्र को यह लगने लगे कि उसकी ईमानदारी और कड़ी मेहनत के बावजूद परिणाम पहले से तय हैं, तब वह केवल एक परीक्षा नहीं हारता वह व्यवस्था पर से विश्वास भी खो देता है। और जब लाखों छात्र एक साथ यह विश्वास खोने लगें, तो यह केवल शिक्षा का संकट नहीं रहता, बल्कि समाज के भविष्य का संकट बन जाता है।

आज असली परीक्षा छात्रों की नहीं, व्यवस्था की है। अगर यह भरोसा वापस नहीं लाया गया, तो अगली परीक्षा चाहे जब हो, वह केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाएगी। और जिस समाज में शिक्षा औपचारिकता बन जाए, वहाँ भविष्य केवल संयोग बनकर रह जाता है।