संतोष कुमार तिवारी
भारत में सोना केवल धातु नहीं, बल्कि विश्वास, परंपरा और सुरक्षा का प्रतीक है। गांव की गृहिणी से लेकर शहर के व्यापारी तक, हर वर्ग के लिए सोना संकट के समय की सबसे भरोसेमंद पूंजी माना जाता है। लेकिन अब यही सोना आर्थिक बहस के साथ-साथ राजनीतिक विमर्श का भी बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।
हाल ही में प्रधानमंत्री का सोने को लेकर बयान काफ़ी चर्चा में है और इसमें राजनीति भी देखने को मिल रही है। देश की पूंजी घर की तिजोरियों में बंद रहने के बजाय विकास और उत्पादक क्षेत्रों में लगनी चाहिए। प्रधानमंत्री के इस बयान को अर्थव्यवस्था में सोने पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के संकेत के रूप में देखा गया। इसके बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक यह चर्चा तेज हो गई कि क्या सरकार भविष्य में सोने की खरीद पर और सख्ती करने जा रही है।
हालांकि केंद्र सरकार की ओर से सोना खरीदने पर किसी प्रतिबंध की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है लेकिन इस मुद्दे ने राजनीति को जरूर गर्मा दिया है। विपक्षी दल सरकार पर आम लोगों की पारंपरिक बचत पर नियंत्रण की कोशिश का आरोप लगा रहे हैं। कई विपक्षी नेताओं ने इसे मध्यम वर्ग और ग्रामीण समाज की आर्थिक स्वतंत्रता से जोड़कर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जिस देश में करोड़ों परिवार सोने को भविष्य की सुरक्षा मानते हों, वहां इस तरह के बयान लोगों में असुरक्षा पैदा कर सकते हैं।
दूसरी ओर भाजपा और सरकार समर्थक अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि देश की पूंजी यदि केवल तिजोरियों में बंद रहेगी तो उद्योग, रोजगार और विकास प्रभावित होगा। उनका कहना है कि भारत हर साल भारी मात्रा में सोना आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार और व्यापार घाटे पर दबाव पड़ता है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार भारत दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण उपभोक्ता देशों में शामिल है और वर्ष 2025 में देश में लगभग 700 से 800 टन सोने की खपत हुई। अनुमान है कि भारत हर साल 45 से 60 अरब डॉलर तक का सोना आयात करता है।
यही कारण है कि मोदी सरकार लगातार लोगों को बैंकिंग, म्यूचुअल फंड, शेयर बाजार और सरकारी बॉन्ड जैसी योजनाओं की ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रही है। Sovereign Gold Bond, डिजिटल गोल्ड और Gold ETF जैसी योजनाएं इसी रणनीति का हिस्सा हैं। सरकार मानती है कि यदि घरेलू बचत उत्पादक क्षेत्रों में जाएगी तो अर्थव्यवस्था को अधिक मजबूती मिलेगी।
लेकिन राजनीति केवल अर्थशास्त्र से नहीं चलती, भावनाओं से भी चलती है। भारत में सोना सामाजिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा हुआ है। शादी-विवाह, त्योहार और धार्मिक आयोजनों में सोने की भूमिका इतनी गहरी है कि कोई भी राजनीतिक दल खुलकर इसके खिलाफ जाने का जोखिम नहीं लेना चाहता। यही वजह है कि विपक्ष इस मुद्दे को जनभावनाओं से जोड़कर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है।
सोशल मीडिया पर भी इस विषय को लेकर दो तरह की धाराएं दिखाई दे रही हैं। एक वर्ग इसे आर्थिक सुधार की दिशा में जरूरी सोच बता रहा है, जबकि दूसरा वर्ग इसे जनता की निजी संपत्ति और परंपरागत निवेश पर सरकारी नजर के रूप में देख रहा है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में यह मुद्दा आर्थिक राष्ट्रवाद बनाम व्यक्तिगत आर्थिक स्वतंत्रता की बहस में बदल सकता है।
सच्चाई यह है कि सरकार के सामने चुनौती दोहरी है। एक ओर उसे देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है, दूसरी ओर करोड़ों लोगों की पारंपरिक मानसिकता और भावनात्मक जुड़ाव को भी समझना है। केवल नियमों और नियंत्रण से यह बदलाव संभव नहीं होगा। जनता का भरोसा जीतना और बेहतर निवेश विकल्प देना उतना ही जरूरी होगा।
अंततः यह बहस केवल सोने की नहीं, बल्कि उस भारत की है जो तेजी से बदल रही अर्थव्यवस्था और पुरानी सामाजिक परंपराओं के बीच संतुलन तलाश रहा है। आने वाले वर्षों में यह मुद्दा आर्थिक नीति के साथ-साथ राजनीतिक रणनीति का भी अहम हिस्सा बन सकता है। विपक्षी दलों के लोग प्रधानमंत्री के सोने, पेट्रोल इत्यादि के बयान पर खूब राजनीति कर रहे है।
संतोष कुमार तिवारी