लेख

नारों से नहीं, व्यवहार से होगा गौ संरक्षण

डा. विनोद बब्बर 

भारत सत्य सनातन संस्कृति का अनुगामी है जहां गौ, गंगा, गायत्री, गुरु गोविंद के प्रति श्रद्धा है। हमारी आस्था और विश्वास है कि गौमाता में 33 कोटि देवता निवास करते हैं। हर सनातनी परिवार में गौ-ग्रास निकालने की परम्परा रही है।  गौ पूजा के अनेक पर्व हैं तो भगवान श्रीकृष्ण की गौ सेवक की छवि सर्वाधिक लोकप्रिय है। गांधी जी के मतानुसार गौ-संरक्षण उनके लिए केवल गाय का नहीं, कमजोर और असहायों का संरक्षण भी है। गौ संरक्षण देश के लिए, पर्यावरण के लिए, अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। उसका दूध भी माँ के दूध के बाद सर्वश्रेष्ठ है इसलिए उसे उत्तम स्वास्थ्य के लिए आवश्यक माना जाता है। गोमूत्र कैंसर  सहित अनेक बीमारियों में रामबाण औषधि माना जाता है। एक शोध रिपोर्ट के अनुसार  गाय दूध ही नहीं, सोना भी देतीं है। तीन सदस्यीय टीम ने अपने चार वर्ष के शोध के दौरान गिर नस्ल की 400 से अधिक गायों के यूरीन का क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री विधि के प्रयोग से  परीक्षण कर गौमूत्र से सोना प्राप्त होने की पुष्टि की। उनके अनुसार, ‘प्राचीन ग्रंथों में गोमूत्र में स्वर्ण पाए जाने की चर्चा थी लेकिन कुछ लोग बार-बार कहते थे कि  इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इस परीक्षण प्रमाण से उनका मुंह बंद हो जाना चाहिए।’

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि  गौ-संरक्षण के नाम पर जोश और नारे तो बहुत हैं लेकिन व्यवहार कम ही देखने को मिलता है। शहरों में स्थान का अभाव और अनेक तरह के नियम बाधक हैं तो दूसरी ओर गांवों में भी नई पीढ़ी शिक्षा अथवा रोजगार के लिए शहरों की ओर मुख कर रही है अतः अब गाँव में भी लोग गाय पालने से बचने लगे हैं। तेजी से फैली टीवी संस्कृति ने गांव की महिलाओं को अपनी लपेट में ले लिया है। वे गाय की सेवा में घंटों लगाने की बजाय बाजार से दूध लेना चाहती हैं। इसके अनेक अन्य कारण भी है। . अब गांवों में चारागाह की समस्या हो रही है। पहले हर गांव में चारागाह, (जिसे ओरण, अरण्य, बणी, गौचर भी कहा जाता है) छोड़ी जाती थी लेकिन इधर जमीनों में दाम बढ़ने से पंचायतों की मिली भगत से बाहुबलियों के कब्जे होने लगे हैं। जिसका सीधा दुष्प्रभाव छोटे व भूमिहीन गौ पालकों पर पड़ा है। इधर फसल कटाई की स्वचालित मशीनों  कि बढ़ते प्रचलन से भूसे का बहुत बड़ा भाग बर्बाद हो जाता है। साधारण व्यक्ति के लिए अब गांव में भी हरा चारा चरी, खल, चूरा आदि खरीद कर खिलाना बहुत महंगा पड़ता है।  गाय यदि किसी दूसरे के खेत में घुस गई तो विवाद की नौबत आ जाती है। 

बदलते परिवेश में लोगों का व्यवहार भी बदला है। दिखावे के लिए जरूर गाय को माता कहते हैं लेकिन घरों में कुत्ते पालने का प्रचलन बढ़ा है। गौ पालन में कमी का कारण उसका लाभकारी न होना बताने वाले कुत्ते से होने वाले आर्थिक लाभ के प्रश्न पर मौन रहने को विवश होते है या इसे अपनी रुचि बताकर पल्ला झाड़ लेते है।

 व्यवसायिक होते दौर में लोगों की मानसिकता में भी बदलाव हुआ है तो कुछ लोग विशिष्ट नस्ल की गायों को ही ‘गौ-माता’ मानते हुए शेष का बहिष्कार करने की आहृवान करते हैं तो ऐसे लोगों की भी  कमी नहीं है जिनका मत है कि  विदेशी नस्ल की गायों के कारण से ही इस देश में दूध की उपलब्धता बढ़ी है। गोवंश का संरक्षण किया जाना चाहिए लेकिन न जाने क्यों सड़कों पर भटकती गायों के मुद्दे पर बात करने से बचते हैं लेकिन इस बात से मुख नहीं मोड़ा जा सकता कि सड़कों पर भटकने को मजबूर गायें भी हमारे बीच रहने वालो की ही हैं। हमारे समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो दूध निकाल लेने के बाद अपनी गाय को गलियों- बाजारों में धक्के खाने के लिए छोड़ देते हैं। जो लोग गाय का दूध बेचकर रोजी-रोटी चलाते हैं, गौ दुग्ध बेचकर अपने लिए सुविधाएं और साधन जुटाने वाले बूढ़ी अथवा बीमार होने पर गायों को सड़कों पर धक्के खाने के लिए छोड़ने वाले अपराधी हैं या नहीं? नगरों और महानगरों में एक ऐसा माफिया पनप रहा है जो दूध निकालने के बाद गाय को ड़ंडा मार निकाल देते हैं। क्या ऐसे लोगों के लिए  गौ-पालक अथवा गौ रक्षक जैसे किस  शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए?

अक्सर देखा जाता है कि बरसात के दिनों में गायों के झुंड देशभर के हाई-वे पर आ बैठते हैं। अनेक बार दुर्घटनाएं भी होती हैं। गाय को राष्ट्र माता घोषित करने की मांग और आंदोलन करने वालों को ऐसी दुर्घटनाओं में गायों के स्थाई रूप से घायल अथवा निष्प्राण होने के मुद्दे पर कुछ कहते हुए बहुत कम ही सुना जाता है। गौ माता का दोहन- शोषण करने वालों की मानसिकता में बदलाव करने अथवा इस प्रवृत्ति के विरुद्ध जनमत जागृत करने के लिए सरकारों को कोसने वालों का मौन चुभता है।

 इन पंक्तियों के लेखक ने राजस्थान, गुजरात सहित अनेक राज्यों के अपने प्रवास के दौरान पाया कि हाई-वे या आसपास बैठी गाय कम,  बछड़े अधिक होते हैं। इधर आधुनिकता ने अधिक दूध की चाह में कृत्रिम गर्भाधान और वर्ण संकर नस्ल को बढ़ावा दिया है। बछिया तो ठीक पर बछड़े को बोझ समझकर कोई नहीं पालना चाहता। बैल आधारित खेती का प्रचलन लगभग समाप्ति है। दूसरे विदेशी नस्ल के बछड़े जुताई आदि में कारगर भी नहीं होते। ऐसे में बछड़ों को महत्व कम अथवा समाप्त हो रहा है। इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि बछड़ों की उपयोगिता कैसे बढ़ाई जाय। उसकी उपयोगिता बचाये बिना उसे इस तरह लावारिस होने से नहीं बचाया जा सकता। सीधे स्वीकार करें या झूठी शान के चक्कर में बात को घूमाएं लेकिन कटु सत्य है कि इंसान परले दर्जे का स्वार्थी है। जो अनुपयोगी जो जाने पर अपने माँ – बाप को नहीं रखना चाहता, वह अनुपयोगी बछड़े को क्यों पालेगा? क्या सरकार पर गाय को राष्ट्र माता घोषित करने का दबाव देने वाले इन बछड़ों की उपयोगिता के बारे में भी कुछ विचार करेंगे? आज जब चारों ओर सोलर एनर्जी की धूम है तो क्या गोपालकों को ऐसे छोटे-छोटे टरबाइन निशुल्क अथवा नाम मात्र की कीमत पर नहीं देने चाहिए जिन्हें बछड़े -बैल सहजता से चलते हुए बिजली का उत्पादन करें? यदि इस ओर ध्यान दिया जाए तो स्थिति में बहुत बड़ा बदलाव हो सकता है। इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए कि  ‘बेटी बचाओं’ के नारे लगाने वाला समाज का ‘बछड़े’ की दुर्दशा अर्थात लैंगिक भेदभाव  पर मौन क्यों?

यह संभव है कि कुछ फर्जी गौ सेवक भी हों लेकिन गौ सेवा को समर्पित लोगों की भी कमी नहीं है। ऐसे लोगों के पुरुषार्थ और परोपकार भाव से ही देश भर में लाखों गौशालाएं चल रही है। सामान्य सनातनी परिवार भी अपनी श्रद्धा और समर्थ के अनुसार गौसेवा में योगदान देते हैं। कोरी नारेबाजी की बजाय गौ सेवा के इस भाव को और प्रबल करने की आवश्यकता है।

यहाँ मेवाड़ के गौभक्त उद्योगपति श्री अशोक कोठारी जी की चर्चा समीचीन होगी जिन्हें अपने परिवार से अधिक गौमाता की चिंता रहती है। सूचना मिलते ही है चारे की व्यवस्था, सुरक्षा की व्यवस्था उनकी प्राथमिकता है। मन वचन और कर्म से गौ सेवक यह व्यक्तित्व दूध चाय लेगा भी तो केवल गाय के दूध की ही। भोजन में दही, छाछ, घी आदि केवल तभी स्वीकार यदि हो गाय दुग्ध का अन्यथा नमक रोटी स्वीकार। उनके प्रयासों से क्षेत्र में अनेक चारागाहों की व्यवस्था हुई है। अनेक स्थानो पर कब्जे छुड़ाये गये लेकिन वह इसे ही पर्याप्त नहीं मानते। उनके अनुसार अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। सबसे जरूरी है गाय केवल धार्मिक आस्था तक सीमित न रहे बल्कि हर परिवार का एक महत्वपूर्ण सदस्य बनें।

इसी प्रकार लुधियाना के गौधाम की सुव्यवस्था देखते ही बनती है। बीमार, अंधी, स्थायी रूप से विकलांग गायों की देखभाल, साफ- सफाई, सबके लिए अलग- अलग बाड़ें। भटकती गाय की सूचना पाते ही उसे गौधाम लाने के लिए उनके पास वाहन भी है। ऐसे गौसेवकों को जनता का भरपूर सहयोग मिलना  स्वाभाविक है। उसके आसपास चारे आदि की अनेक दुकान हैं जहां से गौग्रास खरीदकर गौधाम भेजा जा सकता है। वहां गौघृत सहित अन्य उत्पाद भी प्राप्त किये जा सकते है। इसी परिसर में भव्य मंदिर भी है। इसी प्रकार हरियाणा के मेवात क्षेत्र में ग्वाला गद्दी उल्लेखनीय कार्य कर रही है। देश की राजधानी दिल्ली के कुछ क्षेत्रों में घर-घर जाकर गौग्रास एकत्र करने वाले रिक्शा हैं। बेशक  प्राप्ति से खर्च अधिक है लेकिन लोगों को गौसेवा से जोड़ने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

गुजरात में घर – घर गौ पालन परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने में योगदान कर रहा है । वहां प्रत्येक गांव में सहकारी समितियां के माध्यम से चलने वाले दूध कलेक्शन सेंटर है जहाँ सुबह शाम एक निश्चित समय पर सायरन बजाता है तो सभी गोपालक अपना-अपना दूध लेकर पहुंचाते हैं। दूध की गुणवत्ता के आधार पर उनके अकाउंट में कंप्यूटर से राशि दर्ज की जाती है । हर जिले में दूध को विभिन्न उत्पादों में बदलने वाली विशाल डेरी हैं जो देश भर में अमूल के नाम से उत्पादों को पहुंचाती है। आवश्यकता है गुजरात के इस सहकारी प्रयोग को देश के अन्य भागों में भी तत्परता से लागू किया जाए ।

सनातन संस्कृति में गौहत्या को ब्रह्म हत्या के समान महापाप माना गया है।  इसीलिए कुछ स्थानों से गौ-हत्या अथवा गौ तस्करी के समाचारों से देश के बहुसंख्यक वर्ग के हृदय में रोष उत्पन्न होना स्वाभाविक है। अनेक लोगों का मत है कि यह सब प्रशासन में छिपी काली भेड़ों के सहयोग बिना संभव नहीं है। प्रत्येक राज्य सरकार को निष्पक्ष लोगों की समिति बनानी चाहिए जो ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें कठोर दंड सुनिश्चित करें। 

प्रत्येक सनातनी गौ संरक्षण चाहता है जो केवल गगनभेदी नारों से नहीं बल्कि हम सबके व्यवहार में गौसेवा को शामिल करते से ही संभव है। इधर कुछ लोग गाय को राष्ट्र माता घोषित करने की मांग जोर-शोर से उठा रहे हैं। उन्हें ऐसा करने का अधिकार अवश्य है लेकिन जब वे व्यक्तिगत आक्षेप लांछन करते हैं तो उनके वास्तविक इरादे पर संदेह होता है। समाज को बांटकर नहीं अपितु स्नेह सदभाव एकता से गौ संरक्षण भाव जागृत करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।( अदिति फीचर्स )

डा. विनोद बब्बर