सृष्टिकर्त्ता ईश्वर हमारा आचार्य है

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मनमोहन कुमार आर्य

आचरण की शिक्षा देने वाले विद्वान, शिक्षक व मनुष्य को आचार्य कहते हैं। यह आचार्य पद प्रायः हमारे विद्यालयों वा गुरुकुलों में अध्यापन कार्य करने वाले गुरुओं के लिए प्रयोग में लाया जाता है।  यह उचित ही है क्योंकि गुरुकुल के शिक्षक विद्यार्थियों को आचरण के साथ धर्म व कर्म की शिक्षा भी देते हैं। महर्षि दयानन्द ने संस्कार विधि में वृहद् अग्निहोत्र से पूर्व स्तुति, प्रार्थना व उपासना के आठ मंत्रों का विधान कर उनके हिन्दी भाषा में अर्थ भी दिये हैं। इन स्तुति मंत्रों के सातवें मन्त्र का अर्थ बताते हुए उन्होंने लिखा है कि वह परमात्मा अपना गुरु, आचार्य, राजा और न्यायाधीश है। यह भी कहा है कि अपने लोग मिलकर सदा उसकी भक्ति किया करें। महर्षि दयानन्द ने यह अर्थ मन्त्र में आये पदों ‘स विधाता’ का किया है। ऋषि दयानन्द जी वेदों के उच्च कोटि के विद्वान थे। वह वेदों के सर्वत्र प्रामाणिक अर्थ ही करते हैं। अतः संसार का रचयिता ईश्वर सभी मनुष्यों का आचार्य सिद्ध होता है। अब यह जानना रहता है कि ईश्वर हमें कब व कैसे आचरण की शिक्षा देता है।

 

ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वव्यापक व सर्वातिसूक्ष्म सत्ता है। आंखों से वह किसी को दिखाई नहीं देती। संसार में अनेक ऐसे भौतिक सूक्ष्म पदार्थ हैं जो आंखों से दिखाई नहीं देते। वायु व अनेक गैसें भौतिक पदार्थ हैं। यह भी आंखों से इस लिए दिखाई नहीं देते क्योंकि आंखों की देखने की क्षमता से भी सूक्ष्म कणों वाले यह गैसीय पदार्थ होते हैं। ईश्वर सबसे सूक्ष्म व सबसे बड़ा, सबसे पास व सबसे दूर भी होने से दिखाई नहीं देता है। वह जीवात्माओं को वेदों के द्वारा शिक्षा देता है। सृष्टि के आदि काल में उसने चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को चार वेदों का ज्ञान दिया था। इस वेद ज्ञान में मनुष्यों के लिए आवश्यक सभी प्रकार के आचरणों की शिक्षा है। सत्य बोलों और धर्म पर चलों, यह भी वेदों की शिक्षा का सार है। माता, पिता, आचार्य, राजा, विद्वान यह सब हमारे आदरणीय एवं सम्मानीय हैं, इसकी शिक्षा भी वेद ज्ञान से मिलती है। जीवात्मा व ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव सहित संसार के समस्त भौतिक पदार्थों का ज्ञान भी वेद से होता है। आज हमें सभी वेद हिन्दी तथा अंग्रेजी व कुछ अन्य भाषाओं के भाष्यों व टीकाओं सहित सुलभ हैं। हम इन भाष्यों से वेद के एक एक पद व शब्द का अर्थ जान सकते हैं। महर्षि मनु जी ने, जो वेदों के अधिकारी विद्वान थे और जिनका सृष्टि के आदिकाल में जन्म हुआ था, कहा है कि ‘वेदऽखिलो धर्ममूलम्’ अर्थात् वेद की समस्त शिक्षायें व मान्यतायें ही धर्म का मूल अर्थात् आधार हैं। संसार के अन्य जितने भी ग्रन्थ व धर्मग्रन्थ हैं, उनमें जहां जहां धर्म विषयक बातें पायी जाती हैं वह सब वहां वेदों से ही गई हैं अथवा उन्होंने वह वेदों से ही ली हैं। इसे उदाहरणों व युक्तियों से सिद्ध किया जा सकता है। यह भी जान लें कि धर्म में मनुष्य के द्वारा किये जाने वाले आचरण की सभी शिक्षायें सम्मिलित हैं।

 

योग भी ईश्वर से जुड़ने व उससे ज्ञान प्राप्त करने का एक साधन है। मनुष्य जब योगाभ्यास करते हुए ध्यानावस्थित होता है तब वह जिस विषय का ध्यान करता है उसको वह विषय प्रत्यक्ष ज्ञात हो जाता है। ध्यानावस्था में ईश्वर का ध्यान करते हुए योगी मनुष्य को समाधि अवस्था में ईश्वर का भी साक्षात्कार होता है। ईश्वर से इतर विषयों का साक्षात् करना ईश्वर के साक्षात्कार से किंचित सरल है। अतः ध्यानावस्था में भी ईश्वर हमें इच्छित विषयों का ज्ञान कराता है। हमारा अनुमान है कि वैज्ञानिकों ने जो आविष्कार किये हैं वह उन्होंने उन विषयों का विचार, चिन्तन और ध्यान करते हुए ही किये हैं। उनका ऐसा करना भी ईश्वर से ज्ञान प्राप्ति के अन्तर्गत ही आता है। भले ही वह इस तथ्य को न जानते हों परन्तु उन्हें चिन्तन व ध्यान करते हुए जो ज्ञान मिला है व मिलता है वह सर्वव्यापी व सर्वान्तर्यामी ज्ञानस्वरूप ईश्वर से ही मिलता है। अतः सभी प्रकार से ईश्वर मनुष्यों का आचार्य सिद्ध होता है। योगदर्शनकार महर्षि पतंजलि जी ने कहा है कि ईश्वर संसार के सभी मनुष्यों का प्रथम गुरु है, इस कारण कि उसने सृष्टि के आरम्भ में वेदों का ज्ञान व उपदेश चार ऋषियों को किया व उनके द्वारा अन्य सभी मनुष्यों को भी कराया था और वही परम्परा आज भी विद्यमान है।

 

हम गायत्री मन्त्र का पाठ व जप करते हैं। इसमें हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ अर्थात् ईश्वर हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ मार्ग पर चलाये व चलने की प्रेरणा करे। हमने प्रत्यक्ष अनुभव किया है कि गायत्री मन्त्र का अर्थ सहित जप करने से मनुष्यों की बुद्धि तीव्र व पवित्र होती है और ऐसा करके मनुष्य धर्मात्मा अर्थात् धर्माचरण करने वाला बनता है। इससे यह ज्ञात होता है कि गायत्री मन्त्र का जप करने पर ईश्वर हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ व पवित्र बनाने के साथ हमें सत्प्रेरणा द्वारा हमारे जीवन का मार्गदर्शन करता है जिससे हम जीवन में बुराईयों से बचते हैं और अभीष्ट की ओर बढ़ते व सफल होते हैं। वेदों का जब हम स्वाध्याय करते हैं तो मन्त्रों के अर्थों को पढ़ते हुए हमें जो ज्ञान प्राप्त होता व बोध होता है वह भी हमें हमारी आत्मा में ईश्वर ही कराता है। इसका कारण है कि वेद मन्त्रों की रचना ईश्वर से हुई है। भाषा का ज्ञान प्राप्त कर जब हम उन मंत्रों को पढ़ते हैं तो उससे मिलने वाला ज्ञान एक प्रकार से हमें ईश्वर द्वारा ही होता है क्योंकि वह वेदमन्त्र साक्षात् ईश्वर व ईश्वरस्वरूप होते हैं। इस प्रकार से ईश्वर हमारा वा सभी मनुष्यों का प्रथम व वर्तमान में भी आचरण की शिक्षा देने वाला आचार्य सिद्ध होता है। हमें प्रयास करना चाहिये कि हम वेदों का स्वाध्याय करते हुए वेदों से जुड़े रहे। ऐसा करके हम अपने भावी जीवन को उज्जवल व सफल बना सकते हैं। वेदों का स्वाध्याय कर हम जीवन में आगे बढ़ते हैं और इससे हमारा वर्तमान व भावी जीवन तथा परजन्म भी सुधरता है। हम स्वाध्याय व उपासना से जो ज्ञान प्राप्त करते हैं उसे अन्यों में प्रचारित व प्रसारित करके भी हम ईश्वर की आज्ञा का पालन करते हुए जीवन को सफल कर सकते हैं। अतः ईश्वर हमारा आचार्य है। उससे प्राप्त शिक्षाओं व ज्ञान का प्रचार कर हम भी उसके अनुयायी आचार्य बन व कहला सकते हैं। इसी के साथ इस लेख को विराम देते हैं।

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