बीता शुक्रवार आजाद न्यायपालिका के ७० साला इतिहास में एक ऐसी बगावत का साक्षी बनने को मजबूर किया गया  जिसकी न ही देश को उम्मीद थी और न ही जरूरत।
सर्वोच्च न्यायालय के दूसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश चेलमेश्वर ने न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ  के साथ शुक्रवार की सुबह अपने तुगल रोड स्थित आवास पर प्रेस कन्फ्र ेंस में आरोप लगाये कि देश की सर्वोच्च अदालत की कार्यप्रणाली में प्रशासनिक व्यवस्थाओं का पालन नहीं किया जा रहा है और मुख्य न्यायाधीश द्वारा न्यायपीठों को सुनवाई के लिये मुकदमे मनमाने ढंग से आवंटित करने से न्याय पालिका की विश्वस्नीयता पर दाग लग रहा है। उन्होने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को इसके लिये सीधे जिम्मेदार ठहराया।
इन न्यायाधीशों ने न्यायमूर्ति मिश्रा को लिखे एक पत्र में कहा कि मुख्य न्यायाधीश का पद समान स्तर के न्यायाधीशों में पहला होता है। उन्होने पत्र में लिखा कि तय सिद्धांतों के अनुसार मुख्य न्यायाधीश को रोस्टर तय करने का विशेष अधिकार होता है और वह न्यायालय के न्यायाधीशों या पीठों को सुनवाई के लिये मुकदमें आवंटित करता है। मुख्य न्यायाधीशों को यह अधिकार अदालत के सुचारू रूप से कार्य संचालन एवं अनुशासन बनाये रखने के लिये है ना कि मुख्य न्यायाधीशों पर अधिकारपूर्ण सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए। इस प्रकार से मुख्य न्यायाधीश का पद समान स्तर के न्यायाधीशों में पहला होता है, न उससे कम और न उससे अधिक।
उन्होने चुनिंदा ढंग से मुकदमें सुनवाई के लिये चुनिंदा न्यायाधीशों को आवंटित किए जाने का आरोप लगाते हुए कहा कि रोस्टर तय करने के लिये परिभाषित प्रक्रिया एवं परंपराएं मुख्य न्यायाधीश को दिशा निर्देशित करती है जिनमें किन प्रकार के मुकदमों की सुनवाई के लिये कितने न्यायाधीशों की पीठ बनायी जाये, उसकी परम्परायें भी शामिल है। न्यायाधीशों ने कहा कि इन परम्पराओं एवं नियमों की अवहेलना से ना केवल अप्रिय स्थित बनेगी बल्कि संस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होगी और गंभीर परिणाम होगें।
जरा गौर करें उपरोक्त आरोप लगाने के पहले न्यायामूर्ति चेलमेश्वर ने कहा ‘यह कांफ्रेंस करने में हमें खुशी नहीं है। यह बहुत ही कष्टप्रद है।Ó हमने दो माह पहले सीजेआई को पत्र लिखा था और अपनी शिकायत रखी थी कि महत्वपूर्ण मामले उनसे जूनियर जज को न दिए जाएं। लेकिन सीजेआई ने कुछ और ऐसे फैसले किए, जिससे और सवाल पैदा हुए।Ó जज चेलमेश्वर ने कहा, इतना ही नहीं आज शुक्रवार को भी हम मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मिश्र से मिले और संस्थान को प्रभावित करने वाले मुद्दे उठाए, लेकिन वह नहीं मानें। इसके बाद हमारे सामने कोई विकल्प नहीं रह गया था। इसलिए हमने अपनी बात देश के सामने रखने का फैसला किया। कल लोग यह न कह दें कि हम चारों जज ने अपनी आत्मा बेच दी है।
इसी पत्रकार वार्ता में न्यायाधीशों ने वह ७ पृष्ठों का पत्र भी जारी कर दिया जो उन्होने मुख्य न्यायाधीशों को लिखा था।
इस पत्रकार वार्ता के बाद जहां इसके पक्ष विपक्ष में न्याय क्षेत्र में ही तीखी बहस शुरू हो  गई वहीं राजनीतिक दलों ने भी राजनीति करने से गुरेज नहीं किया। न्याय क्षेत्र के जहां अधिसंख्य न्यायधीशों ने पत्रकार वार्ता को अनुचित व न्यायापालिका की गरिमा गिराने वाला बताया वहीं कुछ ने इसे सही ठहराया। वरिष्ठ अधिवक्ता उज्जवल निकम ने अपनी प्रतिक्रिया में बेहद कठोर शब्दों का प्रयोग करते हुये कहा कि यह न्यायपालिका के लिये काला दिन है। प्रेस कान्फ्रेस के बाद हर कोई न्यायपालिका के  फ ैसले को शक की निगाहों से देखेंगा। अब से हर फैसले पर सवाल उठने शुरू हो जायेंगे।
अधिसंख्य राजनीतिक दलों ने इस अभूतपूर्व घटना से अपने को दूर रखा पर कांग्रेस के नवनियुक्त अध्यक्ष ने अनावश्यक मुखरता दिखाने में देर नहीं लगाई। उन्होने कहा कि यह घटना पहली बार हुई है। चारों न्याय धीशों ने जो सवाल उठाये है उन पर ध्यान दिया जाना चाहिये साथ ही उन्होने कहा कि न्याय व्यवस्था पर पूरे देश को भरोसा है उन्होने जज बीएच लोया का भी मुद्दा उठाया।
श्री गांधी ने कहा कि लोया की मौत मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट में उच्च स्तर पर होनी चाहिये। उन्होने कहा कि हम अपनी न्यायिक व्यवस्था में विश्वास करते है।
भाकपा नेता डि राजा तो न्यायमूर्ति चेलमेश्वर के आवास जा पहुंचे पत्रकारों के पूछने पर सफ ाई दी कि वह तो न्यायमूर्ति से मिलकर घटना के बारे में जानने के लिये गये थे।
नि:संदेह भाजपा व मोदी सरकार ने इस मामले में बेहद परिपक्वता का परिचय दिया। कानून राज्यमंत्री श्री पीपी चौधरी ने कहा ‘हमारी न्यायपालिका विश्व भर में प्रतिष्ठित है। वह स्वत्रंत है और मामले को खुद सुलझा लेगी।
इसी बीच जस्ट्सि लोया की मौत पर भी जमकर राजनीति हुई। इस पर न्यायमूर्ति लोया के पुत्र अनुज लोया ने एक पत्रकार वार्ता बुलाकर साफ-साफ  कह दिया कि उनके पिता की मृत्यु दिल का दौरा पडऩे से ही हुई थी। अतएव अनायास इस मामले को तूल देने की कोई जरूरत नहीं है।
चार वरिष्ठ न्यायाधीशों की बगावत के बाद जहां अटार्नी जनरल श्री के.के. वेणुगोपाल ने कहा जो कुछ भी हुआ उसे टाला जा सकता था। न्यायाधीशों को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि मदभेदों को पूरी तरह समाप्त किया जाये और भविष्य में पूरा सद्भाव परस्पर समझ बने। इसी तर्ज पर बार कौन्सिल आफ   इण्डिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने मामले को सुलझाने की ठोस पहल की और भरोसा जताया जल्द ही संकट का समाधान हो जायेगा।
चार दिनों बाद ४ न्यायाधीशों की बगावत भले ही फ ुस्स साबित हो गई पर इस बगावत के निहितार्थ की तह में जाना ही होगा। यदि सब कुछ इतना ही आसान था तो फि र ४ न्यायाधीशों ने अन्दरूनी मसलों को उसी मीडिया के सामने क्यों उठाया जिस पर अक्सर स्वयं जज बनने के आरोप लगते रहे हैं। फि र जब चारों न्यायाधीशों ने सभी न्यायाधीशों को समान बताया तो फि र मुख्य न्यायाधीश ने किस मामले को किस न्यायाधीश के पास भेजा इस पर अंगुली उठाने की गुंजाइश ही कहां रह जाती है।
यह प्रश्न भी उद्वेलित करने वाला है कि एक तरफ  बगावत करने वाले न्यायाशीशों ने आरोप लगाया कि जब मुख्य न्यायाधीश ने उनकी नहीं सुनी तो उन्हे मजबूरन मीडिया के समक्ष अपनी बात रखनी पड़ी वहीं दूसरी तरफ  कहा कि सर्वोच्च न्यायालय में कोई संवैधानिक संकट नहीं है और फि र कहा कि संकट के समाधान के लिये किसी बाहरी दखल की जरूरत नहीं है।
देशवासी यह नहीं समझ पा रहे है कि जब कोई संकट था ही नहीं और जब समस्या का अंदरूनी निपटारा हो सकता था तो फि र चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने मीडिया के सामने तिल का ताड़ बनाने की क्यों कोशिश की। इसी तरह जस्टिस लोया के मामले को तीन वर्षो बाद संदिग्ध बनाकर क्यों उठाया गया और उस पर ही इन न्यायाधीशों ने विशेष तवज्जों क्यों दी।
यह ठीक है चौतरफ ा विभिन्न पक्षों की सूझबूझ से एक गंभीर संकट टल गया पर सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुंचाने व देश के भरोसे पर चोट करने वाले न्यायाधीशों को न्यायिक इतिहास शायद ही क्षमा करें। नि:संदेह न्यायपालिका इन्हे पीडि़त मानने की बजाय बगावती ही मानेगी। यह भी कहीं आवश्यक है कि भविष्य में देश में  कोई न्यायाधीश मीडिया के सामने शिकायत न रख सके इसके लिये नये सिरे से ठोस पहल व मजबूत व्यवस्था बनायी जाये।
हिन्दू संस्कृति पर जारी घातक प्रहारों का दोषी कौन?

दुनिया की सर्वश्रेष्ठ, सर्वस्वीकार्य भारत की राष्ट्रवादी हिन्दू संस्कृति पर जिस तरह अपनो द्वारा ही लगातार घातक प्रहार जारी है, उस पर यदि अब भी रोक न लगाई जा सकी। काबू न पाया जा सका तो कल क्या होगा आसानी से कल्पना की जा सकती है।
बीते सप्ताह यानी १० जनवरी को मध्य प्रदेश के एक विनायक शाह नामक अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर देश के केन्द्रीय विद्यालयों में होने वाली प्रार्थना पर रोक लगाने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि केन्द्रीय विद्यालय में होने वाली हिन्दी की प्रार्थना और संस्कृत श£ोक हिन्दू धर्म को बढ़ावा देते है। संविधान के अनुच्छेद २८ (१) का हवाला देते हुए कहा गया है कि सरकारी खर्च पर चलने वाले शिक्षण संस्थानों में किसी तरह के धार्मिक निर्देश नहीं दिये जा सकते। यह भी कहा गया है कि प्रार्थना से अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों और नास्तिक लोग जो इस प्रार्थना की व्यवस्था से सहमति नहीं रखते के संवैधानिक अधिकारों का हनन होता है। इतना ही नहीं ये प्रार्थना बच्चों की वैज्ञानिक सोच  के विकास में बाधक है।
आगे कहा गया है कि केन्द्रीय विद्यालय के रिवाइज्ड एजुकेशन कोड के मुताबिक सुबह संस्कृत श£ोक, असतों मा सदगमय तमसों मा ज्योर्तिगमय, मृत्योमा, अमृतमंगमय के ऊं शाति  शाति शांति। बच्चों से बुलवाया जाता है। इसके बाद सुबह की प्रार्थना होती है जिसमें सभी बच्चों आंख बंद करके हाथ जोड़कर खड़े होते है और प्रार्थना दया कर दान विद्या का हमें परमात्मा देना, दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना। हमारे ध्यान में आओ तुम आंखों में बस जाओं अंधेरे दिल में आकर के, परम ज्योति जगा देना। करते है। कहा गया है कि संविधान सभी को व्यक्तिगत आजादी का हक देता है लेकिन स्कूल बच्चों को प्रार्थना करने के लिये बाध्य करता है। संविधान का अनुच्छेद १९ व्यक्ति की अभिव्यक्ति की आजादी देता है ऐसे में बच्चों को एक निश्चित तरीके से प्रार्थना करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
ठीक है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस याचिका को फ ौरी तौर पर असंगत, निरर्थक मानकर खारिज न करके इसे सुनने का फ ैसला किया है। और इस बाबत केन्द्र सरकार को नोटिस देकर जवाब मांगा है। न्यायिक स्तर पर यह तय हो सकेगा क्या सरकारी विद्यालयों अथवा सरकार द्वारा अनुदानित विद्यालयों में राष्ट्रवादी हिन्दू संस्कृति से सराबोर प्रार्थनायें की जाना उचित है या नहीं।
टंच राष्ट्रवादी हिन्दू संस्कृति पर हमला बोलने, सवाल उठाने की कोई यह पहली घटना नहीं है। सच तो यह है कि आजादी के बाद भारतीय संस्कृति पर भले ही बदले स्वरूप में पर वैसे ही हमले जारी है जैसे गुलामी के दौरान मुस्लिम व गोरे शासकों के समय हुआ करते थे।
राष्ट्रवादी हिन्दू संस्कृति का यदि किसी ने सर्वाधिक नुकसान किया है तो वह देश के राजनीतिक दल है। राजनीतिक दलों ने महज वोटों के लिये  न केवल पूरे देश को खंाचों में बांट डाला वरन् धर्मनिरपेक्षता के नाम पर पग-पग हिन्दुओं की आस्था व धर्म पर प्रहार करने में कोई चूक  नहीं की। कभी करोड़ो-करोड़ हिन्दुओं के आराध्य भगवान श्रीराम की अयोध्या स्थित जन्मस्थली को नकारा गया तो कभी उनके काल में बनाये गये रामेश्वरम् सेतु को। हद तो यह देखिये कि अब तो उनके अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह खड़े किये जाने लगे है। दुनिया का शायद ही कोई मुल्क होगा जहां उसके आराध्यों पर अपना तो छोड़ कोई गैर भी अंगुली उठाता हो।
जिस भारत की आदि भाषा संस्कृत को दुनिया के मूर्धन्य वैज्ञानिक तक सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक भाषा मान व बता चुके हो उसी संस्कृत की खिल्ली उड़ाने में  हमारे अपने पीछे नहीं रहते। ऐसी ही विकृति व ध्वंसकारी मानसिकता के लोग संस्कृत को पढऩे व पढ़ाने को हिन्दू धर्म को बढ़ावा देना मानते है। वो यह प्रलाप भी करने में नहीं चूकते कि संस्कृत भाषा सिर्फ  कथावाचक बना सकती है रोजगार नहीं दे सकती।
देश की राष्ट्रवादी वैदिक मान्यताओं/परम्पराओं पर ही कुठाराघात करने की हद तो सीमा पार करती ही जा रही है देश के स्वाभिमान के प्रतिक राष्ट्रगान पर भी आये दिन बखेड़े खड़े किये जाते है। राष्ट्रगीत को तो शायद नई पीढ़ी जानती भी न होगी।
दुनिया का इतिहास गवाह है कि जितनी उदार, सहिष्णु व सर्वधर्म समभाव हमारी सनातन संस्कृति है उसकी बाल बराबरी तो दूर अन्य संस्कृति उसे छू भी नहीं सकतीं।
विड़म्बना देखिये कि आज उसी सनातन संस्कृति पर एक तरफ जहां चौरतफ ा हमले हो रहे है। उसे विकृत, घृणित बनाने का षडय़ंत्र रचा जा रहा है वहीं दूसरी तरफ  देश में विधर्मी ताकतें मसलन ईसाई मिशनरियां व इस्लामिक संगठन अपने-अपने धर्मो को बढ़ाने में तेजी से जुटे हैं। देश में ईसाई व इस्लाम धर्म मनाने वालों की तेजी से बढ़ रही जनसंख्या इसके स्वप्रमाण है।
इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि जिस भारतीय सनातन संस्कृति को मिटाने के हजारो वर्ष अनवरत प्रयास किये गये उस संस्कृति का प्रकाश आज भी सूर्य की भांति चमक/दमक रहा है पर हम इतने से संतुष्ट कैसे रह सकते  हंै। क्योकि हमारी चिंता उस नई पीढ़ी को लेकर है जिसके मनमस्तिष्क में हमारे राजनीति के खिलाड़ी सिर्फ  अपना उल्लू सीधा करने व कतिपय राष्ट्रघाती तत्व सनातन संस्कृति के प्रति जहर घोलने में संलग्न है।
इस दिशा में देश को न्यायपालिका से ही कहीं अधिक उम्मीद है। वो ही राष्ट्र की सनातन संस्कृति पर गहरे हो रहे हमलों से बचा सकती है वहीं उसे निर्वाध ढंग से अपनी मान्यताओं परम्पराओं पर आगे बढऩे की ताकत भी दे सकती है।

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